Tuesday, 30 July 2019

यन्त्रचालित,

कर्म की प्रेरणा 
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वैसे तो किसी भी कर्म / कार्य के होने में समय और परिस्थिति सर्वाधिक महत्त्व रखते हैं लेकिन मूलतः तो कर्म किए जाने के लिए जिन्हें मूल कारण कह सकते हैं वे इस प्रकार हैं :
1 प्रेरणा
2 संकल्प
3 इच्छा
4 आवश्यकता
और
5 बाध्यता
मनुष्य की स्थिति में पहले चार कारण अधिक प्रभावशाली होते हैं।
अन्य जीव प्रायः बाध्यता के ही कारण कर्म में संलग्न होते हैं।
किसी समाचार, प्रसंग या घटना को टीवी पर देखते हुए इनमें से कोई भी एक या अधिक कारण हमें कर्म करने के लिए प्रवृत्त कर सकते हैं।  हो सकता है कि हम चाय पीते हुए, खाना खाते हुए टीवी देख रहे हों या बस या ट्रेन में सफर करते हुए खिड़की से बाहर देख रहे हों, उपरोक्त चार कारणों में से किसी एक या अधिक कारण से हम किसी कर्म को करने के लिए तत्पर हो उठते हैं।
किसी कवि, लेखक या विचारक को जहाँ कोई नई कल्पना सूझती है तो किसी वैज्ञानिक को कोई नया विचार,  सिद्धांत।  किसी खिलाड़ी को खेल की नई तकनीक, तो राजनीतिक व्यक्ति को कोई नई ख़ुराफ़ात भी सूझ सकती है। यहाँ तक कि किसी संगीतज्ञ को कोई नई धुन भी। अच्छे या बुरे व्यक्ति को भी बैठे-बैठे ही कोई नया ख़याल आ सकता है जिसे वह वर्तमान में या निकट या सुदूर भविष्य में पूरा करने के बारे में सोच सकता है।
1 प्रेरणा प्रायः संस्कार से ही आती है और संस्कार अभ्यास से ही दृढ़ होता है।
2 संकल्प से ही अभ्यास होता है।
3 अभ्यास करने के लिए इच्छा होना ज़रूरी होता है।
4 इच्छा आवश्यकता अनुभव होने पर ही जाग्रत होती है।
5 बाध्यता इन चारों से भिन्न प्रकार का कारण है क्योंकि वह मनुष्य या किसी भी दूसरे जीव को भी यंत्र की तरह कार्य करने के लिए बाध्य करती है।
बाध्यता पहले चार कारणों
1 प्रेरणा
2 संकल्प
3 इच्छा
और
4 आवश्यकता
का मिला-जुला प्रभाव भी हो सकता है।
किसी भी कर्म या कार्य का औचित्य या अनौचित्य, उसे हेय या श्रेयस्कर समझा जाना भी व्यक्ति-व्यक्ति, समूह-समूह, समुदाय-समुदाय और वर्ग-वर्ग के अनुसार तय होता है इसलिए हर कोई किसी भी विशिष्ट कार्य का मूल्यांकन अपने अपने ढंग से निंदनीय, और कोई और कर्तव्य या उत्तरदायित्व के रूप में करता है।
मनुष्य चूँकि समूह में रहनेवाला एक प्राणी है और इसलिए समूह की मानसिकता ही यह तय करती है कि कौन सा कार्य किस प्रकार का है।
इसी आधार पर समाज में स्पष्ट या अस्पष्ट विभाजन-रेखाओं सहित  भिन्न-भिन्न दृष्टि, आचार-विचार, संस्कार आदि रखने वाले अनेक समूह होते हैं।  ये सभी समूह किसी न किसी सामूहिक प्रेरणा से प्रेरित होकर अस्तित्व में आते हैं और यह प्रेरणा ही उन्हें एकजुट बनाए रखती है।    
यन्त्रचालित, तन्त्रचालित, मन्त्रचालित 
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हर व्यक्ति, हर समूह, हर परिवार, हर वर्ग तथा हर समुदाय; जिसे राष्ट्र भी कहा जा सकता है, भिन्न भिन्न तलों और स्तरों पर अलग अलग तरह से परिभाषित किया जाता है इसलिए उनमें से किसी को सुनिश्चित रूप से परिभाषित या उनके स्वरूप का सही-सही और वास्तविक निर्धारण करना कठिन है।
इसलिए, या शायद इसीलिए कोई भी व्यक्ति या समूह कभी यन्त्रचालित, कभी तन्त्रचालित और कभी मन्त्र-चालित या इनके मिले-जुले ढंग से कार्य करता है फिर वह उसकी प्रेरणा, संकल्प, इच्छा या आवश्यकता हो।
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इसे प्रारब्ध incipient, नियति destiny, प्रकृति nature, स्वभाव behavior या चरित्र character भी कहा जाता है।
कर्म का वर्गीकरण पुनः अतीत, वर्तमान और आगामी के रूप में भी किया जाता है, और चूँकि ये तीनों परस्पर आश्रित जान पड़ते हैं इसलिए ये तीनों एक ही वस्तु (काल) के प्रतीत होनेवाले तीन प्रकार / पक्ष मात्र हैं। 
यह समझ पाना कठिन है कि किस प्रकार न केवल अतीत ही वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करता है, बल्कि वर्तमान और भविष्य भी अतीत को, और वर्तमान भी शेष दोनों को उतना ही प्रभावित करते हैं।
इस प्रकार काल वही व्यतीत न होनेवाला तत्व (Principle) है जिसे हम व्यतीत होनेवाले समय की तरह -
अतीत, वर्तमान और आगामी के रूप में वर्गीकृत कर उसे ही पूर्ण सत्य समझ बैठते हैं। 
फिर भाग्य fate क्या है?
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Gabriella Burnel on Festival of Bharat

नन्दति नृत्यति ..... आनन्दः 
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मैंने इस ब्लॉग में कितने ही पोस्ट्स संस्कृत की विशेषताओं पर लिखे हैं।
मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि
Gabriella Burnel
ने इस विडिओ में उसे ही बहुत कम शब्दों में मुझसे कहीं अधिक बेहतर ढंग से कहा है।
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वैसे इस ब्लॉग में मैंने आर्ष-अङ्गिरा /Arch-Angel Prophet Gabriel (ऋषि जाबालि) का भी उल्लेख
अनेक बार किया है इसलिए Gabriella Burnel के शब्दों और नाम से भी मुझे प्रेरणा हुई कि इसे औरों
के लिए यहाँ शेयर करूँ !
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Saturday, 27 July 2019

नृवंश का इतिहास : राक्षस-सभ्यता और मय-सभ्यता

वाल्मीकि रामायण,
उत्तरकाण्ड,
सर्ग ५८-५९,
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ययाति को शुक्राचार्य का शाप
श्रीराम के ऐसा कहने पर शत्रुवीरों का संहार करनेवाले लक्ष्मण ने तेज से प्रज्वलित होते हुए-से महात्मा श्रीराम को सम्बोधित करके इस प्रकार कहा --
’तपश्रेष्ठ ! राजा विदेह (निमि) तथा वसिष्ठ मुनि का पुरातन वृत्तान्त अत्यन्त द्भुत् और आश्चर्यजनक है ।
’परंतु राजा निमि क्षत्रिय, शूरवीर और विशेषतः यज्ञ की दीक्षा लिये हुए थे; अतः उन्होंने महात्मा वसिष्ठ के प्रति उचित बर्ताव नहीं किया’
लक्ष्मण के इस तरह कहने पर दूसरों के मन को रमाने (प्रसन्न रखने) वालों में श्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि श्रीराम ने सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता और उद्देप्त तेजस्वी भ्राता लक्ष्मण से कहा --
’वीर सुमित्राकुमार ! सभी पुरुषों में वैसी क्षमा नहीं दिखाई देती, जैसी राजा ययाति में थी । राजा ययाति ने सत्त्वगुण के अनुकूल मार्ग का आश्रय ले दुःसह रोष को क्षमा कर लिया था । वह प्रसंग बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो
’सौम्य ! नहुष के पुत्र राजा ययाति पुरवासियों, प्रजाजनों की वृद्धि करनेवाले थे । उनके दो पत्नियाँ थीं, जिनके रूप की इस भूतल पर कहीं तुलना नहीं थी .
’नहुषनन्दन राजर्षि ययाति की एक पत्नी का नाम शर्मिष्ठा था, जो राजा के द्वारा बहुत ही सम्मानित थी । शर्मिष्ठा दैत्यकुल की कन्या और वृषपर्वा की पुत्री थी ।
’पुरुषप्रवर ! उनकी दूसरी पत्नी शुक्राचार्य की पुत्रा देवयानी थी । देवयानी सुन्दरी होने पर भी राजा को अधिक प्रिय नहीं थी । उन दोनों के ही पुत्र बड़े रूपवान् हुए । शर्मिष्ठा ने पूरु को जन्म दिया और देवयानी ने यदु को । वे दोनों बालक अपने चित्त को एकाग्र रखनेवाले थे ।
’अपनी माता के प्रेमयुक्त व्यवहार से और अपन्र् गुणों से पूरु राजा को अधिक प्रिय था । इससे यदु के मन में बड़ा दुःख हुआ । वे माता से बोले --
"माँ ! तुम अनायास ही महान् (अक्लिष्ट) कर्म करनेवाले देवस्वरूप शुक्राचार्य के कुल में उत्पन्न हुई हो तो भी यहाँ हार्दिक दुःख और दुःसह अपमान सहती हो ।
"अतः देवि ! हम दोनों एक ही साथ अग्नि में प्रवेश कर जाय्ँ । राजा दैत्यपुत्री शर्मिष्ठा के साथ अनन्त रात्रियों तक रमते रहें ।
"यदि तुम्हें यह सब कुछ सहन करना है तो मुझे ही प्राणत्याग की आज्ञा दे दो । तुम्हीं सहो । मैं नहीं सहूँगा । मैं निःसन्देह मर जाऊँगा ।
’अत्यन्त आर्त् होकर रोते हुए अपने पुत्र यदु की यह बात सुनकर देवयानी को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने तत्काल अपने पिता शुक्राचार्यजी का स्मरण किया ।
’शुक्राचार्य अपनी पुत्री की उस चेष्टा को जानकर तत्काल उस स्थान पर आ पहुँचे, जहाँ पर देवयानी विद्यमान थी ।
’बेटी को अस्वस्थ, अप्रसन्न और अचेत-सी देखकर पिता ने पूछा --’वत्से ! यह क्या बात है?’
’उद्दीप्त तेजवाले पिता भृगुनन्दन शुक्राचार्य जब बारंबार इस प्रकार पूछने लगे, तब देवयानी ने अत्यन्त कुपित होकर उनसे कहा -- ’मुनिश्रेष्ठ ! मैं प्रज्वलित अग्नि या अगाध जल में प्रवेश कर जाऊँगी अथवा विष खा लूँगी; किंतु इस प्रकार अपमानित होकर जीवित नहीं रह सकूँगी
"आपको पता नहीं है कि मैं यहाँ कितनी दुःखी और अपमानित हूँ । ब्रह्मन् ! वृक्ष के प्रति अवहेलना होने से उसके आश्रित फूलों और पत्तों को ही तोड़ा और नष्ट किया जाता है (इसी तरह आपके प्रति राजा की अवहेलना होने से ही मेरा यहाँ अपमान हो रहा है ।
"भृगुनन्दन ! राजर्षि ययाति आपके प्रति अनादर का भाव रखने के कारण मेरी भी अवहेलना करते हैं और मुझे अधिक आदर नहीं देते हैं ’
’देवयानी की यह बात सुनकर भृगुनन्दन शुक्राचार्य को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने नहुषपुत्र ययाति को लक्ष्य करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया --
"नहुषकुमार ! तुम दुरात्मा होने के कारण मेरी अवहेलना करते हो, इसलिए तुम्हारी अवस्था जरा-जीर्ण वृद्ध के समान हो जायगी -- तुम सर्वथा शिथिल हो जाओगे’
’राजा से ऐसा कहकर पुत्री को आश्वासन दे महायशस्वी ब्रह्मर्षि शुक्राचार्य पुनः अपने घर को चले गये
’सूर्य के समान तेजस्वी तथा ब्राह्मणशिरोमणियों में अग्रगण्य शुक्राचार्य देवयानी को आश्वासन दे नहुषपुत्र ययाति को ऐसा कहकर उन्हें पूर्वोक्त शाप दे फिर चले गये ’
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इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ।
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पात्र-परिचय,
जैसा कि पिछले पोस्ट में संकेत किया गया, ’ययाति’ वही है जिसका वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् के द्वितीय अध्याय के प्रथम ब्राह्मण में अजातशत्रु और गार्ग्य के संवाद के अन्तिम भाग में ’विज्ञानमय पुरुष’ के रूप में किया गया । शुक्राचार्य भृगुपुत्र वही हैं जो दैत्यगुरु हैं । देवयानी शुक्राचार्य की पुत्री है और शर्मिष्ठा दैत्य वृषपर्वा की पुत्री अर्थात् दैत्यकुल की कन्या है । शर्मिष्ठा का अर्थ है शर्मि-स्था जो सुख-सुविधा के जीवन की अभ्यस्त है ।
देवयानी का अर्थ है देवतत्व के यान से संबद्ध जीवन-प्रवाह, प्राण और चेतना जो इन्द्रिय-संवेदन और ’मन’ का आधार है । पूरु शर्मिष्ठा का पुत्र है जबकि यदु देवयानी का । दैत्यकुल शारीरिक सुखों उपभोगों में प्रवृत्त बुद्धि है । ’यदु’ मन के विषयों चिन्ता, भय, मान-सम्मान, अभिमान और विशेष रूप से स्मृति तथा स्मृति से संबद्ध ’परिचय’ ’पूरु’ और ’यदु’ दोनों को ही ’समाहित-चित्त’ कहा गया है क्योंकि इन्द्रियाँ स्वभाव से ही अपने-अपने विषयों के प्रति समाहित-चित्त अर्थात् एकाग्रचित्त होती हैं । जब मन किसी एक इन्द्रिय से प्रवृत्त होकर किसी विषय का उपभोग करता है तो किसी दूसरी इन्द्रिय के किसी भी विषय से पूर्णतः अनभिज्ञ होता है । जैसे मन द्वारा जब नेत्रों से देखने का कार्य लिया जाता है तो श्रवण, स्वाद, स्पर्श, घ्राण आदि अन्य चार स्थूल इन्द्रियाँ स्तब्ध रहती हैं । इसी प्रकार ये पाँचों इन्द्रियाँ अर्थात् पूरु समाहित-चित्त है । इसी प्रकार जब मन सूक्ष्म-इन्द्रिय की तरह किसी विषय से संलग्न होता है अर्थात् कल्पना या स्मृति से संलग्न होता है तो किसी भी विषय के ऐसे चिन्तन में अनायास एकाग्र अर्थात् समाहित-चित्त होता है । इस प्रकार पूरु का कार्य स्थूल शारीरिक तल पर होता है जबकि यदु का मानस तल पर । इसलिए कला, काव्य, संगीत आदि का संबंध देवयानी अर्थात् शुक्र (की पुत्री) से है, जबकि स्थूल इन्द्रिय उपभोगों का दैत्य वृषपर्वा की पुत्री से ।
जब राजा ययाति को शुक्राचार्य (जीवन की उस गतिविधि का अधिष्ठाता ’देवता’ जिससे स्थूल शरीर जन्म लेता, युवा होता, और संतति उत्पन्न करता है,) द्वारा जराग्रस्त होने का शाप दिया जाता है और ययाति अपने पुत्र यदु से कहता है कि उसे कुछ काल के लिए अपना यौवन दे दे क्योंकि अभी उसका मन जीवन के भोगों से तृप्त नहीं हुआ और यदु इसे अस्वीकार कर देता है, और पूरु इसके लिए प्रसन्नता से राजी हो जाता है तो इसका अर्थ यही है कि यदु (मन) सदा युवा रहता है और रहना चाहता भी है, कभी बूढ़ा (जराग्रस्त) नहीं होता जबकि पूरु (स्थूल शरीर) बिना आपत्ति किये बूढ़ा होता है । देवयानी के द्वारा पिता शुक्राचार्य को स्मरण किया जाना तथा ब्रह्मर्षि शुक्राचार्य (उशनस् / उशना) का तत्काल उपस्थित होना मनो-आकाश की घटना है किन्तु आधिदैविक रूप से वह कल्पना मात्र नहीं है क्योंकि मन की गति वैसे भी समय से अधिक तीव्र है ।
वह विज्ञानमय पुरुष (पुरे शेते यः - जो पुर अर्थात् अस्तित्व में सर्वत्र व्याप्त स्थान / आकाश में शयन करता है वही पुरुष है) वही ब्रह्म है जो सुषुप्ति में ’मैं कुछ नहीं जानता’ इस ज्ञान से युक्त होता है, जो स्वप्न में स्व्प्न-शरीर और मनो-आकाश में सूक्ष्म-इन्द्रियों का उपभोग करता है, और जागृति में स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों इन्द्रियों का । पूरु तथा यदु जिसकी संतान हैं । इस प्रकार यह कथा आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों तलों को अपने में समाहित किए हुए है और उसी परिप्रेक्ष्य में ग्रहण की जानी चाहिए । किन्तु इतना ही नहीं यह मनुष्य के नृवंश के इतिहास का एक ठोस वर्णन भी है क्योंकि इस कथा में राक्षस तथा यातुधान (माया) सभ्यताओं का उद्भव भी स्पष्ट किया गया है । सत्यं तु समग्रं भवति ।
यातुधान, जातुधान, धातुयान की समानता भी दृष्टव्य है ।
आज की भौतिक प्रगति और विकास राक्षसों (राक्षस-सभ्यता) और यदुवंश के वंशजों यातुधानों (मय-सभ्यता) तथा यादवों की ही देन है । 
इस प्रकार अजातशत्रु क्षत्रिय होते हुए भी जिस ’विज्ञानमय पुरुष’ का परिचय गार्ग्य (ब्राह्मण) को देता है वह यद्यपि शास्त्र से विपरीत है किन्तु ब्रह्म-विद्या के गौरव का सूचक ही है ।
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वाल्मीकि रामायण,
उत्तरकाण्ड,
सर्ग ५९
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ययाति का अपने पुत्र पुरू को अपना बुढ़ापा देकर बदले में उसका यौवन लेना और भोगों से तृप्त होकर पुनः दीर्घकाल के बाद उसे उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरु का अपने पिता की गद्दी पर अभिषेक तथा यदु को शाप
शुक्राचार्य के कुपित होने का समाचार सुनकर नहुषकुमार ययाति को बड़ा दुःख हुआ । (उन्हें ऐसी अवस्था प्राप्त हुई, जो दूसरे की जवानी से बदली जा सकती थी ।) उस विलक्षण जरावस्था को पाकर राजा ने यदु से कहा --
’यदो ! तुम धर्म के ज्ञाता हो । मेरे महायशस्वी पुत्र ! तुम मेरे लिये दूसरे के शरीर में संचारित करने के योग्य इस जरावस्था को ले लो ।
मैं भोगों द्वारा रमण करूँगा -- अपनी भोगविषयक इच्छा को पूर्ण करूँ ।
’नरश्रेष्ठ ! अभी तक मैं विषयभोगों से तृप्त नहीं हुआ हूँ । इच्छानुसार विषयसुख का अनुभव करके प्गिर अपनी वृद्धावस्था मैं तुमसे ले लूँगा ।’
उनकी यह बात सुनकर यदु ने नरश्रेष्ठ ययाति को उत्तर दिया -- ’आपके लाड़ले बेटे पूरु ही इस वृद्धावस्था को ग्रहण करें ।
’पृथ्वीनाथ ! मुझे तो आपने धन से तथा पास रहकर लाड़प्यार पाने के अधिकार से भी वञ्चित कर दिया है; अतः जिनके साथ बैठकर आप भोजन करते हैं, उन्हीं लोगों से युवावस्था ग्रहण कीजिये’
यदु की यह बात सुनकर राजा ने पूरु से कहा --
’महाबाहो ! मेरी सुख-सुविधा के लिये तुम इस वृद्धावस्था को ग्रहण कर लो’
नहुष-पुत्र ययाति के ऐसा कहने पर पूरु हाथ जोड़कर बोले -- ’पिताजी ! आपकी सेवा का अवसर पाकर मैं धन्य हो गया । यह आपका मेरे ऊपर महान् अनुग्रह है । आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए मैं हर तरह से तैयार हूँ’
पूरु का यह स्वीकारसूचक वचन सुनकर नहुषकुमार ययाति को बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्हें अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ और उन्होंने अपनी वृद्धावस्था पूरु के शरीर में संचारित कर दी । तदनन्तर तरुण हुए राजा ययाति ने सहस्रों यज्ञों का अनुष्ठान करते हुए कई हजार वर्षों तक इस पृथ्वी का पालन किया । इसके बाद दीर्घकाल व्यतीत होने पर राजा ने पूरु से कहा -- ’बेटा ! तुम्हारे पास धरोहर के रूप में रखी हुई मेरी वृद्धावस्था को मुझे लौटा दो ।
’पुत्र ! मैंने वृद्धावस्था को धरोहर के रूप में ही तुम्हारे शरीर में संचारित किया था, इसलिए उसे वापस ले लूँगा । तुम अपने मन में दुःख न मानना ।
’महाबाहो ! तुमने मेरी आज्ञा मान ली, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई । अब मैं बड़े प्रेम से राजा के पद पर तुम्हारा अभिषेक करूँगा ’
अपने पुत्र पूरु से ऐसा कहकर नहुषकुमार राजा ययाति देवयानी के बेटे से कुपित होकर बोले --
’यदो ! मैंने दुर्जय क्षत्रिय के रूप में तुम-जैसे राक्षस को जन्म दिया । तुमने मेरी आज्ञा का उल्लङ्घन किया है,अतः तुम अपनी संतानों को राज्याधिकारी बनाने के विषय में विफल-मनोरथ हो जाओ ।’मैं पिता हूँ, गुरु हूँ; फिर भी तुम मेरा अपमान करते हो, इसलिए भयंकर राक्षसों और यातुधानों को तुम जन्म दोगे
’तुम्हारी बुद्धि बहुत खोटी है । अतः तुम्हारी संतान सोमकुल में उत्पन्न वंशपरम्परा में राजा के रूप से प्रतिष्ठित नहीं होगी । तुम्हारी संतति भी तुम्हारे ही समान उद्दण्ड होगी’
यदु से ऐसा कहकर राजर्षि ययाति ने राज्य की वृद्धि करनेवाले पूरु को अभिषेक के द्वारा सम्मानित करके वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश किया ।
तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् प्रारब्ध-भोग का क्षय होने पर नहुषपुत्र राजा ययाति ने शरीर को त्याग दिया और स्वर्गलोक को प्रस्थान किया
उसके बाद महायशस्वी पूरु ने महान् धर्म से संयुक्त हो काशिराज की श्रेष्ठ राजधानी प्रतिष्ठानपुर में रहकर उस राज्य का पालन किया ।
राजकुल से बहिष्कृत यदु ने नगर में तथा दुर्गम क्रौञ्चवन में सहस्रों यातुधानों को जन्म दिया ।
शुक्राचार्य के दिये हुए इस शाप को राजा ययाति ने क्षत्रिय धर्म के अनुसार धारण कर लिया । परंतु राजा निमि ने वसिष्ठजी के शाप को सहन नहीं किया
सौम्य ! यह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें सुना दिया । समस्त कृत्यों का पालन करनेवाले सत्पुरुषों की दृष्टि (विचार / प्रेरणा) का ही हम अनुसरण करते हैं, जिससे राजा नृग की भाँति हमें दोष न प्राप्त हो । चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाले श्रीराम जब इस प्रकार कथा कह रहे थे, उस समय आकाश में दो-ही-एक तारे रह गये । पूर्व दिशा अरुण किरणों से रञ्जित हो लाल दिखायी देने लगी, मानो कुसुम रंग रँगे हुए अरुण वस्त्र से उसने अपने अङ्गों को ढँक लिया हो ।
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इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ।
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ययाति को शुक्राचार्य का शाप

उत्तरकाण्ड,
वाल्मीकि-रामायण,
उत्तरकाण्ड,
सर्ग ५८
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अष्टपञ्चाशः सर्गः
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ययाति को शुक्राचार्य का शाप
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एवं ब्रुवति रामे तु लक्ष्मणः परवीरहा ।
प्रत्युवाच महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा ॥१
महदद्भुतमाश्चर्यं विदेहस्य पुरातनम् ।
निर्वृत्तं राजशार्दूलं वसिष्ठस्य मुनेश्च यः ॥२
निमिस्तु क्षत्रियः शूरो विशेषेण च दीक्षितः ।
न क्षमं कृतवान् राजा वसिष्ठस्य महात्मनः ॥३
एवमुक्तस्तु तेनायं रामः क्षत्रियपुङ्गवः ।
उवाच लक्ष्मणं वाक्यं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥४
रामो रमयतां श्रेष्ठो भ्रातरं दीप्ततेजसम् ।
न सर्वत्र क्षमा वीर पुरुषेषु प्रदृश्यते ॥५
सौमित्रे दुःसहो रोषो यथा क्षान्तो ययातिना ।
सत्त्वानुगं पुरस्कृत्य तन्निबोध समाहितः ॥६
नहुषस्य सुतो राजा ययाति पौरवर्धनः ।
तस्य भार्याद्वयं सौम्य रूपेणाप्रतिमं भुवि ॥७
एका तु तस्य राजर्षेर्नाहुषस्य पुरस्कृता ।
शर्मिष्ठा नाम दैतेयी दुहिता वृषपर्वणः ॥८
अन्या तूशनसः पत्नी ययातेः पुरुषर्षभ ।
न तु सा दयिता राज्ञो देवयानी सुमध्यमा ॥९
तयोः पुत्रौ तु सम्भूतौ रूपवन्तौ समाहितौ ।
शर्मिष्ठाजनयत् पूरुं देवयानी यदुं तदा ॥१०
पूरुस्तु दयितो राज्ञो गुणैर्मातृकृतेन च ।
ततो दुःखसमाविष्टो यदुर्मातरमब्रवीत ।।११
भार्गवस्य कुले जाता देवस्याक्लिष्टकर्मणः ।
सहसे हृद्गतं दुःखमवमानं च दुःसहम् ॥१२
आवां च सहितौ देवि प्रविशाव हुताशनम् ।
राजा तु रमतां सार्धं दैत्यपुत्र्या बहुक्षपाः ॥१३
यदि वा सहनीयं ते मामनुज्ञातुमर्हसि ।
क्षम त्वं न क्षमिष्येऽहं मरिष्यामि न संशयः ॥१४
पुत्रस्य भाषितं श्रुत्वा परमार्तस्य रोदतः ।
देवयानी तु संक्रुद्धा सस्मार पितरं तदा ॥१५
इङ्गितं तदभिज्ञाय दुहितुर्भार्गवस्तदा ।
आगतस्त्वरितं तत्र देवयानी स्म यत्र सा ॥१६
दृष्ट्वा चाप्रकृतिस्थां तामप्रहृष्टामचेतनाम् ।
पिता दुहितरं वाक्यं किमेतदिति चाब्रवीत् ।।१७
पृच्छन्तमसकृत् तं वै भार्गवं दीप्ततेजसम् ।
देवयानी तु संक्रुद्धा पितरं वाक्यमब्रवीत् ॥१८
अहमग्निं विषं तीक्ष्णमपो वा भूमिसत्तम ।
भक्षयिष्ये प्रवेक्ष्ये वा न तु शक्ष्यामि जीवितुम् ॥१९
न मां त्वमवजानीषे दुःखितामवमानिताम् ।
वृक्षस्यावज्ञया ब्रह्मंश्छिद्यन्ते वृक्षजीविनः ॥२०
अवज्ञया च राजर्षिः परिभूय च भार्गव ।
मय्यवज्ञां प्रयुङ्क्ते हि न च मां बहु मन्यते ॥२१
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कोपेनाभिपरीवृतः ।
व्याहर्तुमुपचक्राम भार्गवो नहुषात्मजम् ॥२२
यस्मान्मामवजानीषे नाहुषं त्वं दुरात्मवान् ।
वयसा जरया जीर्णः शैथिल्यमुपयास्यसि ॥२३
एवमुक्त्वा दुहितरं समाश्वास्य स भार्गवः ।
पुनर्जगाम ब्रह्मर्षिर्भवनं स्वं महायशाः ॥२४
स एवमुक्त्वा द्विजपुङ्गवाग्र्यः
सुतां समाश्वास्य च देवयानीम् ।
पुनर्ययौ सूर्यसमानतेजा
दत्त्वा च शापं नहुषात्मजाय ॥२५
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः
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एकोनषष्टितमः सर्गः
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ययाति का अपने पुत्र पूरु को अपना बुढ़ापा देकर बदले में उसका यौवन लेना और भोगों से तृप्त होकर पुनः दीर्घकाल के बाद उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरु का अपने पिता की गद्दी पर अभिषेक तथा यदु को शाप
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श्रुत्वा तूशनसं क्रुद्धं तदार्तो नहुषात्मजः ।
जरां परमिकां प्राप्य यदुं वचनमब्रवीत् ॥१
यदो त्वमसि धर्मज्ञो मदर्थं प्रतिगृह्यताम्
जरा परमिका पुत्र भोगै रंस्ये महायशः ॥२
न तावत् कृतकृत्योऽस्मि विषयेषु नरर्षभ ।
अनुभूय तदा कामं ततः प्राप्स्याम्यहं जराम् ॥३
यदुस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच नरर्षभम् ।
पुत्रस्ते दयितः पूरुः प्रतिगृह्णातु वै जराम् ॥४
बहिष्कृतोऽहमर्थेषु संनिकर्षाच्च पार्थिव ।
प्रतिगृह्णातु वै राजन् यैः सहाश्नासि भोजनम् ॥५
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राजा पूरुमथाब्रवीत् ।
इयं जरा महाबाहो मदर्थं प्रतिगृह्यताम् ॥६
नाहुषेणैवमुक्तस्तु पूरुः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि शासनेऽस्मि तव स्थितः ॥७
पूरोर्वचनमाज्ञाय नाहुषः परया मुदा ।
प्रहर्षमतुलं लेभे जरां संक्रामयच्च ताम् ॥८
ततः स राजा तरुणः प्राप्य यज्ञान् सहस्रशः ।
बहुवर्षसहस्राणि पालयामास मेदिनीम् ॥९
अथ दीर्घस्य कालस्य राजा पूरुमथाब्रवीत् ।
आनयस्व जरां पुत्र न्यासं निर्यातयस्व मे ॥१०
न्यासभूता मया पुत्र त्वयि संक्रामिता जरा ।
तस्मात् प्रतिगृहीष्यामि तां जरां मा व्यथां कृथाः ॥११
प्रीतश्चास्मि महाबाहो शासनस्य प्रतिग्रहात् ।
त्वां चाहमभिषेक्ष्यामि प्रीतियुक्तो नराधिपम् ॥१२
एवमुक्त्वा सुतं पूरुं ययातिर्नहुषात्मजः ।
देवयानीसुतं क्रुद्धो राजा वाक्यमुवाच ह ॥१३
राक्षसस्त्वं मया जातः क्षत्ररूपो दुरासदः ।
प्रतिहंसि ममाज्ञां त्वं प्रजार्थे विफलो भव ॥१४
पितरं गुरुभूतं मां यस्मात् त्वमवमन्यसे ।
राक्षसांयातुधानांस्त्वं जनयिष्यसि दारुणान् ॥१५
न तु सोमकुलोत्पन्ने वंशे स्थास्यति दुर्मतेः ।
वंशोऽपि भवतस्तुल्यो दुर्विनीतो भविष्यति ॥१६
तमेवमुक्त्वा राजर्षिः पूरुं राज्यविवर्धनम् ।
अभिषेकेण सम्पूज्य आश्रमं प्रविवेश ह ॥१७
ततः कालेन महता दिष्टान्तमुपजग्मिवान् ।
त्रिदिवं स गतो राजा ययातिर्नहुषात्मजः ॥१८
पुरूश्चकार तद् राज्यं धर्मेण महता वृतः ।
प्रतिष्ठाने पुरवरे काशिराज्ये महायशाः ॥१९
यदुस्तु जनयामास यातुधानान् सहस्रशः ।
पुरे क्रौञ्चवने दुर्गे राजवंशबहिष्कृतः ॥२०
एष तूशनसा मुक्तः शापोत्सर्गो ययातिना ।
धारितः क्षत्रधर्मेण यं निमिश्चक्षमे न च ॥२१
एतत् ते सर्वमाख्यातं दर्शनं सर्वकारिणाम् ।
अनुवर्तामहे सौम्य दोषो न स्यात् यथा नृगे ॥२२
इति कथयति रामे चन्द्रतुल्याननेन
प्रविलरतारं व्योमयज्ञे तदानीम् ।
अरुणकिरणरक्ता दिग्बभौ चैव पूर्वा
कुसुमरसविमुक्तं वस्त्रमागुण्ठितेव ॥२३
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकिये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ॥
--
भूमिका :
उपरोक्त दो सर्गों में राक्षसवंश तथा मय (माया) सभ्यताओं के उद्भव की कथा वर्णित है।
उशनस् जो उशना अर्थात्  शुक्राचार्य हैं उनकी पुत्री थी देवयानी।
पौरवर्धन (सभ्यता का संवर्धन तथा विकास करनेवाला) राजा नहुष का पुत्र था ययाति। 
[नहुषस्य सुतो राजा ययाति पौरवर्धनः ।
तस्य भार्याद्वयं सौम्य रूपेणाप्रतिमं भुवि ॥७]
राजा ययाति (यः आयाति, प्रयाति संयाति च स ययाति) वही 'विज्ञानमय पुरुष' है जिसकी कथा बृहदारण्यक उपनिषत् के दूसरे अध्याय के प्रथम ब्राह्मण में अजातशत्रु और गार्ग्य के संवाद में वर्णित है जिसे इसी ब्लॉग में पहले लिखा जा चुका है।
ययाति की शेष कथा अगली पोस्ट में !
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Friday, 26 July 2019

श्रीरमणगीता / śrīramaṇagītā

॥ ॐ नमो भगवते श्रीरमणाय ॥
श्रीरमणगीतायाम् 
नान्यं मृगयते मार्गं निसर्गादात्मनि स्थितः ।
सर्वासामपि शक्तीनां समष्टिः स्वात्मनि स्थितिः ॥२३
(अध्याय ११)
स्वरूपं लक्षणोपेतं लक्षणं च स्वरूपवत् ।
तादात्म्येनैव सम्बन्धस्त्वनयोः सम्प्रकीर्तितः ॥३२/
तटस्थलक्षणेनैवं व्यापाराख्येन मारिष
यतो लक्ष्यं स्वरूपं स्यान्नित्यव्यापारवत्ततः ॥३३
(अध्याय १२)
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|| om̐ namo bhagavate śrīramaṇāya ||
śrīramaṇagītāyām 
nānyaṃ mṛgayate mārgaṃ nisargādātmani sthitaḥ |
sarvāsāmapi śaktīnāṃ samaṣṭiḥ svātmani sthitiḥ ||23
(Chapter 11)
svarūpaṃ lakṣaṇopetaṃ lakṣaṇaṃ ca svarūpavat |
tādātmyenaiva sambandhastvanayoḥ samprakīrtitaḥ ||32
taṭasthalakṣaṇenaivaṃ vyāpārākhyena māriṣa |
yato lakṣyaṃ svarūpaṃ syānnityavyāpāravattataḥ ||33
(Chapter 12)
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Going through श्रीरमणगीता / śrīramaṇagītā noted an interesting reference to Sri Nisargadatta Maharaj and another to Maurice Frydman.
Just wonder-struck how true and relevant it is if we think these are composed by the Author (kavyakant Ganapati Muni / काव्यकान्त गणपति मुनि) quite long ago, as if a prediction came true !! Those who know Sri Nisargadatta Maharaj, and the Book 'I AM THAT' need not be given any more information about this whole matter.
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The stanzas say about the 'ज्ञानी' / Sage and the one who brought His words to Light of the day.
By the way, In Sanskrit,
मारिष / māriṣa
means a noble soul, a friend.
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Thursday, 25 July 2019

.. मुझे लगता है ...

दिल जो न कह सका, 
वही राज़ दिल कहने की बात आई ! 
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बिस्मिल्लाह-उर्-रहमान-उर्-रहीम ...
को संस्कृत में इस प्रकार पढ़ा / समझा जा सकता है ।     
"वि स्म इल आह -उत् -रहमान उत् -रहीम",
या;
"भीष्म इल आह -उत् -रहमान उत् रहीम"
रहसि / रहिं स्थितो यः स रहिष्मानः रहिमानः वा रहिम् / रहीम ।
रहसि / रहिं का अर्थ है रहस्य / राज़ के आवरण में छिपा हुआ, ’कूटस्थ’ ।
तात्पर्य है कि उसे इन नेत्रों से नहीं देखा जा सकता ।
उसे भक्ति या ज्ञान के नेत्रों से ही जाना / देखा जा सकता है ।
दूसरा अर्थ यह है कि वह 'अन्तर्यामी' है ।
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विस्तार से मैंने इसे पिछली पोस्ट में लिखा है ।
इल’ के बारे में भी कुछ पोस्ट्स में लिखा है ।
--
इसलिए
"बिस्मिल्लाह-उर्-रहमान-उर्-रहीम ..."
कहकर किसी कार्य को आरंभ करने में क्या आपत्ति हो सकती है ?
(लेकिन यदि इसे कहने से अनावश्यक विवाद पैदा होता है तो क्या इसे कहना तब भी इतना ज़रूरी है?)
मुझे नहीं पता, कि चाहे हिन्दू हों या मुसलमान, कितने लोग हैं जो इस प्रकार की विवेचना या इसे इस अर्थ में सुनना तक स्वीकार करेंगे ।
हिन्दू के लिए यह नितान्त अनावश्यक है और विभिन्न मुसलमान भी इसका अर्थ अलग-अलग करते हैं ।
विश्वास न हो तो तारेक फ़तह (Tarek Fateh) से पूछ लीजिए !
--   
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। 
(गीता 10/20) 

एक ज्वलन्त प्रश्न

 ... और एक बुनियादी सवाल :
क्या 1947 में भारतवर्ष का विभाजन हिन्दुओं तथा मुसलमानों के लिए दो अलग अलग राष्ट्रों की स्वीकृति के आधार पर ही नहीं किया गया था ? तब 'धर्मनिरपेक्षता' / Secularism कहाँ था?
पाकिस्तान ने खुद को 'इस्लामी' राष्ट्र घोषित किया तो भारत को खुद को 'हिन्दू' राष्ट्र क्यों नहीं घोषित किया गया? यह भी मान लिया कि भारत में सभी धर्मों को सम्मान दिया जाएगा तो फिर हिन्दुओं से अन्य धर्म के मतावलम्बियों के लिए 'विशेषाधिकार' और 'तुष्टिकरण' क्यों ?
और वह भी हिन्दू-हितों की कीमत पर?
क्या यह हिन्दुओं के साथ सरासर अन्याय नहीं है?
यदि यह जारी रहता है तो गजवा-ए-हिन्द से भारतवर्ष को बचाने की कोई उम्मीद करना मूर्खता ही है।   
सिर्फ़ जानकारी के लिए :
(यदि मैंने यह ’वीडियो’ न देखा होता तो इस पोस्ट को कभी प्रकाशित न करता । और कृपया ध्यान दें कि इस पोस्ट को किसी विद्वेष या दुर्भावना से प्रेरित होकर नहीं लिखा गया है  )
मैं यूँ भी किसी भी प्रकार का या वास्तविक या तथाकथित धर्म का धर्मगुरु नहीं हूँ किन्तु केवल सन्दर्भ के रूप में यह जानकारी प्रस्तुत करना चाहता हूँ :
ला इल आ हि इल अल् आह ।
केवल इतने ही वाक्य की व्याख्या इस प्रकार से की जा सकती है :
लृ आ इल आह इल इल आह ।
अण् प्रत्याहार -
१.विधीयमानोऽण् आदेशप्रत्यायागमरूपस्तद्भिन्नोऽण् उद्देश्यभूतः स स्वसवर्णस्य संज्ञा इत्यर्थः ॥
अत्रेदं प्रमाणम् --
परेणैवेण्ग्रहाः सर्वे पूर्वेणैवाण्-ग्रहा मताः ।
ऋतेऽनुदित्सवर्णस्येत्येतदेकं परेण तु ॥इति॥
उरण् रपरः ॥
(१/१/५१)
अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः
(१/१/६९) लाकृतिः
लृ + आकृतिः = लाकृतिः
’लृकारस्य, आकृतिः स्वरूपम्’ अथवा लृ के आकार के समान जिसका आकार है वह, कृष्ण भगवान् ।
बाँसुरी बजाने के समय उनकी आकृति ’लृ’ के जैसी होती है ।

...ऋलृवर्णयोः सवर्णसंज्ञाविधायकं वार्त्तिकम्
ऋलृवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्
जहाँ ’लृ’ के स्थान में अण् आदेश होगा, वहाँ लपर होगा ।
वाल्मीकि रामायण में ’पृथ्वी के एकमात्र परमेश्वर राजा इल’ का उल्लेख है ।
पश्चिम की परंपराओं में एकेश्वरवाद की संकल्पना वहीं से आई है ।
इसी की पुष्टि के रूप में मूलतः वैदिक संस्कृत का यह ’मन्त्र’ प्रमाण है ।
मैं नहीं कह सकता कि वास्तव में यह मन्त्र इस रूप में बैदिक ग्रन्थों में कहीं उपलब्ध है या नहीं किन्तु इतना तो तय है कि वेदों के कुछ अंश आज भी अनुपलब्ध हैं अतः इसे उनमें भी पाया जा सकता है ।
अब
’ला इल आ हि इल अल् आह ।’
का संभावित अर्थ यह है (जिसका प्रमाण वाल्मीकि रामायण में है) :
राजा इल के अतिरिक्त अन्य कोई ’ईश्वर’ पृथ्वी पर नहीं है ।
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निश्चित ही इस प्रथम मन्त्र को यथावत् रखकर दूसरा अंश
’मुहम्मद रसूल अल्लाह ।’
को अरबी भाषा में जोड़ दिया गया ।
अरबी वर्ण हम्जः की उत्पत्ति भी अहम्-जः अर्थात् आत्मा से जन्मा के अर्थ में स्पष्ट है ।
’म’ उपसर्ग लगाकर महम्मद या मोहम्मद बनाया गया ।
जैसे ’मक्का’ ’महा’ का अपभ्रंश है ।
अस् धातु से ’ल’ प्रत्यय जोड़कर अस्ल, असल, उसूल, वसूल, मुसल, रसूल, अरबी भाषा में ’सला’ (फ़ारसी तथा फ़ारसी से उर्दू में नमाज; -जो पुनः ’नम्’ तथा ’यज्’ धातु से प्राप्त होता है ) आदि शब्दावलि बनी है ।
अरबी भाषा की उत्पत्ति संस्कृत से ही ’उणादि’ प्रत्ययों के प्रयोग से सिद्ध होती है ।
इसीलिए उन्, उत्, उल्, उर्, उस्, उम्, आदि का प्रयोग संबंधवाची अर्थ में होता है ।
इसी के साथ ’अण्’ अर्थात् ’अ इ उ ण्’ इस प्रथम माहेश्वर सूत्र से अरबी भाषा में ये तीनों वर्ण परस्पर विनिमेय होते हैं ।
यहाँ तक कि ’संप्रसारण’ तथा ’गुण’ भी अरबी की संरचना का आधारभूत सिद्धान्त है । ’य’ का ’इ’ एवं ’व’ का ’उ’ या ’ओ’ हो जाना (गुण) तथा इससे विपरीत क्रम में ’इ’ का ’ये’/ ’य’, ’उ’ तथा ’ओ’ का ’व’ हो जाना (संप्रसारण) का ही प्रयोग है ।
यहाँ तक कि अंग्रेज़ी भाषा में भी वर्ण (आय) का (वाय) होना तथा (वाय) का ’आय) होना इसी कारण पाया जाता है ।
इसमें सन्देह नहीं कि अरबी भाषा का अस्तित्व इस्लाम के आगमन से बहुत पूर्व से है ।
फ़िनीशियन, आरामाइक तथा हिब्रू भाषाओं से ही अरबी भाषा की लिपि एवं व्याकरण अस्तित्व में आया ।
ऋग्वेद में अर्वण (अरबी भाषा या वंश, नस्ल) की उत्पत्ति के बारे में उल्लेख है कि यह या तो समुद्र से उत्पन्न हुई (अर्थात् यह भूमि पुरा काल में समुद्र में डूबी हुई हो सकती है, जो बाद में उठकर उभर आई), या फिर पुरीष  (’विस्थापन’ के अर्थ में भूमि के एक टुकड़े का धीरे-धीरे अपने स्थान से बहुत दूर चले जाना) से अस्तित्व में आई ।
संभवतः यहाँ पुरीष  का तात्पर्य ’मल’ नहीं है, जैसा कि समझा / माना जाता है ।
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Tuesday, 23 July 2019

प्रवृत्ति मार्ग / निवृत्ति मार्ग

श्रीभृगु-संहिता (मूल)
आत्मतया तदा गुरोः भृगोः वा इत्युक्तवान् ।
प्रभो ब्रूहि कथां बलेः वामनस्य ममश्रुणुवे ॥
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तब आत्मतया (हातिम ताई) ने आचार्य भृगु से कहा :
"हे प्रभो ! मुझसे कृपया राजा बलि तथा वामन की कथा कहें । मैं आपके मुख से इस कथा का श्रवण करना चाहता हूँ ।"
ऋषि भृगु ने तब कहना प्रारंभ किया :
पुराकल्प में किसी समय दैत्यराज बलि ने अत्यन्त पराक्रम से तीनों लोकों को युद्ध में परास्त कर सम्पूर्ण पृथ्वी सहित सर्वस्व दान कर दिया ।
किन्तु दान देने के गर्व से उसका अहंकार और भी अत्यन्त दृढ तथा प्रबल हो उठा ।
तब भगवान् नारायण ब्राह्मण बटुक (वामन) वेश धारण कर उसके समक्ष आ खड़े हुए ।
उस समय हमारे पूर्वकुल में हुए आचार्य भृगु जो उस काल में राजा बलि के राजपुरोहित एवं भी राजगुरु भी थे,
ने बलि को चेताते हुए कहा :
"यह बटुक ब्राह्मण कोई और नहीं, ब्राह्मण के वेश में साक्षात् भगवान् हरि श्रीमन्नारायण स्वयं हैं ।
तुम इनके धोखे में मत आओ ।"
जब राजा बलि ने उनसे दान ग्रहण करने की प्रार्थना की, और उन्हें दान में कौन सी वस्तु चाहिए,
यह प्रश्न किया तो ब्राह्मण वेश में अवस्थित बटुक बोला :
"मुझे केवल साढ़े तीन पग भूमि चाहिए ।"
जब राजा बलि ने हठपूर्वक गुरु की चेतावनी को अनसुना कर दिया, तो भार्गव उस पात्र के जल-मार्ग में जाकर बैठ गए, (जहाँ से दान के संकल्प के लिए शास्त्रोक्त रीति से जल हथेली पर छोड़ा जाता है ।)  ताकि जल न छोड़ा जा सके और राजा का संकल्प तथा दान पूर्ण न हो सके । तब बटुकवेशधारी वामन बोले :
"राजन् ! लगता है जल-पात्र की नली (चञ्चु / बिल) में कुछ कचरा आ जाने से जल का मार्ग अवरुद्ध हो गया है । तुम इस सींक से उस बाधा को दूर कर दो ।"
तब राजा बलि ने उस सींक से चञ्चु में स्थित बाधा को हटाने का यत्न किया ।
चूँकि वहाँ आचार्य भृगु बैठे हुए थे और उस सींक से उनका दक्षिण नेत्र बिंध गया (विद्ध हो गया), इसलिए वे बिलबिलाकर उस बिल से बाहर आ गए ।
(तब से हमारे कुल तथा सम्प्रदाय में कृष्ण यजुर्वेद की परंपरा चल पड़ी ।)
आत्मतया ! (हातिम ताई !) तत्पश्चात् संकल्प पूरा हो जाने पर राजा ने बटुकवेशधारी बटुकेश्वर वामन से कहा कि वे साढ़े तीन पग चलें, - जितनी भूमि उनके पग के तले आ जाए, उसे दान में ग्रहण कर लें । तब वामन ने एक पग में मृत्युलोक को, दूसरे में स्वर्ग को तथा तीसरे में अंतरिक्ष को माप लिया और राजा से पूछा :
"आधा पग कहाँ रखूँ ?"
"प्रभो ! अब तो मेरा मस्तक (अहंकार) ही वह शेष स्थान है जिस पर आप अपना पावन चरण रखकर मुझे धन्य करें ।"
इस प्रकार आधे पग में, अर्थात् बाँए (तीसरे) पग में अन्तरिक्ष को माप चुके तीसरे पग पर खड़े वामन ने दाहिने घुटने (आधा पग) से बलि के मस्तक को दबाकर उसे पाताल भेज दिया अर्थात् पाताल का राज्य प्रदान किया ।
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तब हातिम ताई अत्यन्त चकित हुआ  । उसने आचार्य से प्रार्थना की कि इस कथा का गूढ तात्पर्य भी उसे समझाएँ ।
उसके इस निवेदन पर आचार्य (भृगु) पुनः बोले :
"प्रकृति से उत्पन्न शरीर ही नारायण का पहला पग है जिस पर सबसे पहले अहंकार अपना आधिपत्य और स्वामित्व मान लेता है । यह मान्यता ही मन है । अहंकार के विकास और विस्तार के साथ वह बलवान् (बली) होकर मन रूपी साम्राज्य का स्वामी बन बैठता है और अपने आपको एक स्वतंत्र एकछत्र राजा घोषित करता है ।
तीसरे पग में वह मन से संयुक्त अहंकार / मन; - अन्तरिक्ष (मन के गूढ रहस्य) में विचरता रहता है । चूँकि अन्तरिक्ष असीम और अनन्त है इसलिए वह उसका अतिक्रमण नहीं कर पाता ।
पहले पग की भूमि (जन्म), दूसरे पग की भूमि (शरीर) का अतिक्रमण तो मन / अहंकार अनायास ही कर लेता है किन्तु मन से पूर्व (जो तत्व है उस तत्व) का अतिक्रमण करना उसके लिए संभव नहीं ।
वह भूमि नारायण की है । वह भूमि नारायण को समर्पित कर दिए जाने के बाद भी मन / अहंकार दान के उद्धत मस्तक गर्व से भरा खड़ा रहता है । जब उस गर्व को वामन अपने दाहिने घुटने से कुचलकर नष्टप्राय कर देता है, तब वह मन / अहंकार पाताल में जाकर छिप जाता है किन्तु फिर भी नष्ट नहीं होता क्योंकि वह आत्मा का अंश है, जबकि नारायण सम्पूर्ण आत्मतत्व है ।
कठोलिक परंपरा में इसे ही जानने की दूसरी प्रक्रिया है जिसकी शिक्षा कठोनिषद् और तैत्तिरीय उपनिषद् आदि से प्राप्त होती है ।
कापालिक परंपरा में इतनी कठिनता नहीं है ।
कापालिक परंपरा प्रवृत्ति-मार्ग है, कठोलिक परंपरा निवृत्ति मार्ग है ।
प्रवृत्ति मार्ग से वृत्ति परमेश्वर में लीन हो जाती है, निवृत्ति-मार्ग में अन्ततः अहंकार शेष रह जाता है जो परमेश्वर की कृपा से ही विलीन होता है ।
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इति श्री भृगु-संहिता
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(कल्पित)
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[इस पोस्ट को लिखते समय ध्यान आया की इसी तिथि (24 जुलाई 1997) को पूज्य पिताजी का देहावसान हुआ था।  इसलिए यह पोस्ट उन्हीं की स्मृति को समर्पित है। ] 
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Monday, 22 July 2019

The Semitic.

While writing the last post I suddenly knew that the word 'Semitic' is closely connected with this aspect of
'शमन-धर्म'
We can conveniently and convincingly arrive at the conclusion that the Sanskrit Language and the word 'Sanskrit' संस्कृत itself is a derivative of the word
'शं';
Though another way of elucidating could be by splitting the word as :
'सं' -स्कृत / सं कृत,
where the letter / वर्ण स् creeps in between  सं and कृत .
This also clarifies that संस्कृत is not संकृत (which means hybrid or admixture). 
संकृत is a word used in a derogatory sense, while संस्कृत is treated in the sense of 'refined'/ 'chaste' /शुद्ध / परिमार्जित .
Whatever be the truth, the word 'Semitic' could be interpreted in both ways.
There is the Language that is what we know 'Semitic' and the tradition as well that is thought of as 'Semitic'.
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जब हातिम ताई ने आचार्य के मुख से 'ईश्वर' और 'परमेश्वर' सुना तो उनसे जिज्ञासावश पूछा :
"क्या ये दोनों एक ही नहीं हैं ?"
"एक हैं, और अनेक भी हैं, - और एक अथवा अनेक से विलक्षण भी हैं।  इसलिए ये एकवचन, द्विवचन और बहुवचन भी हैं।"
हातिम ताई को कुछ स्पष्ट नहीं हुआ।
"अभी इसे समझने की जल्दी मत करो ।"
हातिम ताई को वे दिन याद आए जब कापालिकों के नगर में विष्णु-प्रतिमा के सामने स्थित दो गरुड-स्तंभों में से एक पर स्थित गरुड-प्रतिमा और दूसरे पर बैठे वास्तविक गरुड़ के बारे में उसे यही संशय हुआ था :
"क्या ये दोनों एक ही नहीं हैं ?"
तब आसपास खड़े लोगों ने उसे अचरजभरी निगाहों से देखा था क्योंकि उनमें से किसी को इस बात की कल्पना तक नहीं थी कि हातिम ताई का आगमन उनके बीच क्यों और कैसे हुआ था। क्योंकि वास्तव में उन दोनों में से किसी ने उसे उसके घर से अपहृत कर वहाँ से कुछ दूर एक ख़जूर के पेड़ पर ला रखा था।
हातिम ताई ने भी फिर और आग्रह नहीं किया।
बहुत दिनों तक नित्य शान्ति-पाठ करते करते उसे कौंधा कि जैसे 'शं' ही मित्र है और 'शं' ही वरुण है; जैसे 'शं' ही अर्यमा (होता) है और  'शं' ही इन्द्र तथा बृहस्पति है, ... और जैसे 'शं' ही विष्णु उरुक्रम भी है, ठीक उसी तरह वे दोनों एक हैं, अनेक हैं तथा एक और अनेक से विलक्षण भी हैं।
विस्मय से भर गया था वह।
आचार्य ने जब उसे विस्मय-चकित देखा तो पूछा :
"क्या हुआ ?"
कुछ पल तक तो वह कुछ बोल ही न सका।
फिर उसने कहा :
"आचार्यजी ! मैं जिस स्थान से आया हूँ उस कापालिकों के नगर में एक बड़ा मंदिर है जहाँ 360 प्रतिमाएँ ईश्वर की हैं, किन्तु परमेश्वर की कोई प्रतिमा नहीं हैं। 'कठोलिक' सम्प्रदाय के भृगु अङ्गिरा परंपरा के आचार्य समझ गए कि हातिम ताई कहाँ से आया था।
उन्होंने कहा :
"वे प्रतिमाएँ 24 तत्वों की हैं और प्रत्येक प्रतिमा एक ही आदित्य की है।
इस तरह आदित्य 12 होकर भी प्रतिमा के रूप में 24 तत्व भी हैं। और प्रत्येक तत्व पुनः कृष्ण-पक्ष तथा शुक्ल पक्ष  के पंद्रह पंद्रह दिनों का होता है। इस प्रकार वे 360 प्रतिमाएँ, वर्ष की 360 तिथियों के रूप में संवत्सर की ही प्रतिमाएँ हैं जिनमें से प्रत्येक ही संवत्सर है।"
हातिम ताई का विस्मय तब और भी बढ़ गया था।
बहुत दिनों बाद उसे याद आया कि कापालिकों के उस मंदिर में एक भव्य स्वर्ण तथा रत्न-जटित शिव-लिङ्ग भी था जिसे वे लोग 'परमेश्वर' या 'ईश्वर' भी कहते थे।
तब उसने एक दिन आचार्य से  प्रश्न किया कि क्या 'ईश्वर', 'परमेश्वर' तथा 'महेश्वर' एक ही हैं ?
तब आचार्य बोले :
"हाँ ! उन्हें ही 24 तत्वों के रूप में भी देखा जाता है, जिसकी चर्चा मैंने तुमसे पहले भी की थी। "
आचार्य को भी यह जानकर आश्चर्य हुआ कि हातिम ताई को 'महेश्वर' के बारे में कैसे पता चला ?
वैसे आचार्य को यह भी ज्ञात था कि साङ्ख्य के आचार्य कपिल, भगवान् कपालीश्वर के भक्त भी थे, और उन्हें उनका ही अवतार भी कहा जाता है। आचार्य ने इसी आधार पर 24 तत्वों के उल्लेख से हातिम ताई को इसका संकेत भी दिया। 
तब उन्होंने उसे बताया :
"इस पूरे क्षेत्र की लोकभाषा में ईश्वर को ईसर या इस्र तथा महेश्वर को महेसर या मिस्र कहा जाता है। मिस्र उस स्थान का नाम है जो यहाँ से बहुत दूर है।"
तब हातिम ताई को याद आया कि वास्तव में गरुड़ ने उसे उसी 'मिस्र' में स्थित उसके घर से पहली बार तब उठाया था, जब वह दो-तीन साल की आयु का था और अपने घर के बाहर अकेला ही खेल रहा था।  वह प्रायः किसी अज्ञात प्रेरणा से उस रेगिस्तान की रेत से शिव-लिङ्ग बनाकर उसे ईश्वर मानकर, शीश झुकाकर, दोनों  हाथ जोड़कर उसके सामने कुछ बुदबुदाता रहता था। हाँ उसने एक या दो बार माता-पिता के साथ 'मिस्र' के दर्शन भी किए थे।
हातिम ताई बहुत देर तक देह-भान भूलकर आनंदमग्न दशा में बैठा रहा।
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(24 तत्वों और 3 गुणों से ही 72000 नाड़ियों में;
- प्राणों की गति परिभाषित, प्रकाशित और व्यक्त होती है। )
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The Bridge-Valley भृगुवल्ली / तैत्तिरीय

भृगुवल्ली / तैत्तिरीय / कृष्ण-यजुर्वेद 
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शमन-धर्म
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हातिम-ताई का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ तो वह ऋषि भृगु - अङ्गिरा (Angel) के गोत्र के गुरुकुल का अन्तेवासी हो गया ।
तब उसे आचार्य के अन्य शिष्यों के साथ शिक्षा-सत्र में शामिल होने का प्रसंग उपस्थित हुआ ।
दूसरे सभी शिष्य अभी बालक वटुक थे, जबकि हातिम-ताई आयु के तीसरे पड़ाव को पार कर चुका था ।
"आचार्य ने उससे उसके पूर्व-जीवन का वृत्तान्त क्यों नहीं पूछा?"
हातिम ताई के इस प्रश्न पर आचार्य ने कहा :
"तुम आयु के तीसरे पड़ाव (सोपान) को पार कर चुके हो । ये वटुक अभी आयु के पहले पड़ाव का अतिक्रमण कर चुके हैं । इसलिए उन्हें ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी गई । आयु की दृष्टि से तुम गृहस्थ आश्रम की मर्यादा पूरी कर चुके हो । इसलिए उस पूर्व-जीवन से निवृत्त होकर इस वानप्रस्थ जीवन में प्रवृत्त होने पर तुम वैसे भी ब्रह्मचर्य में ही स्थित हो । वे ब्रह्मचारी वटुक भी प्रकृति से ही ब्रह्मचर्य में स्थित हैं और यदि अभी उन्हें संस्कार प्राप्त हो जाता है, तो वे आयु के आगामी सोपान तक पहुँचने से पूर्व ही विवेक-वैराग्य की उस भूमिका को प्राप्त कर लेंगे जिसे तुमने तुम्हारे पूर्व के शुभ कर्मों से तुम्हारी आयु के इस सोपान पर अदृश्य संयोग से प्राप्त किया है । अदृश्य इसलिए क्योंकि इसे ईश्वर-कृपा या दैव भी कहा जाता है । ईश्वर ही देवता है जिसे ब्रह्मचर्यपूर्वक वर्णों के अभ्यास से जाना जाता है । इसी देवता का नाम शंकर, शम्भू आदि है जो परिणाम (परि-नाम) के रूप में शान्त की तरह भी ग्रहण किया जाता है ।
यही (शम् - वर्ण) शान्ति के रूप में सर्वत्र अवस्थित नित्य-तृप्त परमेश्वर है । इसी प्रच्छन्न शान्त को शान्ति-पाठ के माध्यम से प्रकटतः जाना जाता है । अब तुम इस कक्षा के छात्र हो अर्थात् इस शिष्य मंडल की छाया में हो, अतः यहाँ बैठकर इसकी यह शिक्षा ग्रहण करो ।"
तब आचार्य ने शाम (साम) स्वरों में शान्ति-पाठ का उपदेश इस प्रकार प्रारंभ किया :

शं नो मित्रः । शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा ।
शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो ।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ।
ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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om̐
śaṃ no mitraḥ śaṃ varuṇaḥ | śaṃ no bhavatvaryamā |
śaṃ no indro bṛhaspatiḥ | śaṃ no viṣṇururukramaḥ |
namo brahmaṇe | namaste vāyo |
tvameva pratyakṣaṃ brahmāsi | tvāmeva pratyakṣaṃ brahma vadiṣyāmi |
ṛtaṃ vadiṣyāmi | satyaṃ vadiṣyāmi |
tanmāmavatu | tadvaktāramavatu | avatu mām | avatu vaktāram |
om̐ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||
टिप्पणी :
सुरलोक को तब सुरीय / स्वरीय / स्वरीया आदि नामों से जाना जाता था । लोकभाषा के प्रभाव (असर) से इसमें ’अ’ उपसर्ग संयुक्त होने से इसे आगे चलकर असुरीय या असीरिया और वर्तमान में सीरिया (शाम) कहा जाने लगा । यह है सीरिया / शाम का प्रागितिहास । उर्दू भाषा में सीरिया को शाम कहा जाता है। 
'साम' वैसे तो सामवेद का तत्व है, किन्तु अर्थ-साम्य (purport / meaning) तथा ध्वनि-साम्य (phonetics) के आधार पर 'Psalm' को इसी का सज्ञात (cognate) कहा जा सकता है।
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Friday, 19 July 2019

निमि : व्यतीत और न व्यतीत होनेवाला समय,

समय : 
व्यक्तिगत और वैश्विक;
व्यतीत होनेवाला समय,
और न व्यतीत होनेवाला काल,
जो व्यतीत होनेवाले समय की तरह से हर मनुष्य को,
अपनी निज प्रतीति की तरह स्मृति में,
अपने-आपको एक पृथक् जीव की तरह,
अपने एक कल्पित पृथक् संसार में अनुभव होता है ।
ब्रह्मा, वसिष्ठ और निमि भी ऐसे ही विशिष्ट व्यक्ति हैं ।
--
श्री वाल्मीकि रामायण,
उत्तरकाण्ड,
सर्ग ५७
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वसिष्ठ का नूतन शरीर धारण और निमि का प्राणियों के नयनों में मिवास
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तां श्रुत्वा दिव्यसंकाशां कथामद्भुतदर्शनाम् ।
लक्ष्मणः परमप्रीतो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥1
निक्षिप्तदेहौ काकुत्स्थ कथं तौ द्विजपार्थिवौ ।
पुनर्देहेन संयोगं जग्मतुर्देवसम्मतौ ॥2
तस्य तद्भाषितं श्रुत्वा रामः सत्यपराक्रमः ।
तां कथां कथयामास वसिष्ठस्य महात्मनः ॥3
यः स कुम्भो रघुश्रेष्ठ तेजःपूर्णो महात्मनः।
तस्मिंस्तेजोमयौ विप्रौ सम्भूतावृषिसत्तमौ।।4
पूर्वं समभवत् तत्र अगस्त्यो भगवानृषिः।
नाहं सुतस्तवेत्युक्त्वा मित्रं तस्मादपाक्रमत् ।।5
तद्धि तेजस्तु मित्रस्य उर्वश्याः पूर्वमाहितम्।
तस्मिन् समभवत् कुम्भे तत्तेजो यत्र वारुणम् ।।6
कस्यचित् त्वथ कालस्य मित्रावरुणसम्भवः।
वसिष्ठतेजसा युक्तो जज्ञे इक्ष्वाकुदैवतम् ।।7
तमिक्ष्वाकुर्महातेजा जातमात्रमनिन्दितम्।
वव्रे पुरोधसं सौम्य वंशस्यास्य हिताय नः ।।8
एवं त्वपूर्वदेहस्य वसिष्ठस्य महात्मनः।
कथितो निर्गमः सौम्य निमेः शृणु यथाभवत् ।।9
दृष्ट्वा विदेहं राजानामृषयः सर्व एव ते।
तं च ते याजयामासुर्यज्ञदीक्षां मनीषिणः ।।10
तं च देहं नरेन्द्रस्य रक्षन्ति स्म द्विजोत्तमाः।
गन्धैर्माल्यैश्च वस्त्रैश्च पौरभृत्यसमन्विताः ।।11
ततो यज्ञे समाप्ते तु भृगुस्तत्रेदमब्रवीत्।
आनयिष्यामि ते चेतस्तुष्टोऽस्मि तव पार्थिवः ।।12
सुप्रीताश्च सुराः सर्वे निमेश्चेतस्तदाब्रुवन्।
वरं वरय राजर्षे क्व ते चेतो निरूप्यताम्।। 13
एवमुक्तः सुरैः सर्वैर्निमेश्चेतस्तदाब्रवीत्।
नेत्रेषु सर्वभूतानां वसेयं  सुरसत्तमाः ।।14
बाढमित्येव विबुधा  निमेश्चेतस्तदाब्रुवन्।
नेत्रेषु सर्वभूतानां वायुभूतश्चरिष्यसि ।।15
त्वत्कृते च निमिष्यन्ति चक्षूंषि पृथिवीपते।
वायुभूतेन चरता विश्रामार्थं मुहुर्मुहुः ।।16
एवमुक्त्वा तु विबुधाः  सर्वे जग्मुर्यथागतम्।
ऋषयोऽपि महात्मानो निमेर्देहं समाहरन् ।।17
अरणिं तत्र निक्षिप्य मथनं चक्रुरोजसा।
मन्त्रहोमैर्महात्मानः पुत्रहेतोर्निमेस्तदा ।।18
अरण्यां मथ्यमानायां प्रादुर्भूतो महातपाः।
मथनान्मिथिरित्याहुर्जननाज्जनकोऽभवत् ।।19
यस्माद् विदेहात् सम्भूतो वैदेहस्तु ततः स्मृतः।
एवं विदेहराजश्च जनकः पूर्वकोऽभवत् ।
मिथिर्नाम महातेजास्तेनायं मैथिलोऽभवत् ।।20
(त्रिपदीय श्लोक)
इति सर्वमशेषतो मया
कथितं सम्भवकारणं तु सौम्य ।
नृपपुङ्गवशापजं द्विजस्य
द्विजशापाच्च यदद्भुतं नृपस्य ।।21
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकिये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः।।     
--
अर्थ :   
उस दिव्य एवं अद्भुत् कथा को सुनकर लक्ष्मण को बड़ी प्रसन्नता हुई । वे श्रीरघुनाथजी से बोले --
’काकुत्स्थ ! वे ब्रह्मर्षि वसिष्ठ तथा राजर्षि निमि जो देवताओं द्वारा भी सम्मानित थे, अपने-अपने शरीर को छोड़कर फिर नूतन शरीर से किस प्रकार संयुक्त हुए ?’
उनका यह प्रश्न सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीराम ने महात्मा वसिष्ठ के शरीर-ग्रहण से सम्बन्ध रखनेवाली उस कथा को पुनः कहना आरम्भ किया --
’रघुश्रेष्ठ ! महामना मित्र और वरुणदेवता के तेज (वीर्य) से युक्त जो वह प्रसिद्ध कुम्भ था, उससे दो तेजस्वी ब्राह्मण प्रकट हुए । वे दोनों ही ऋषियों में श्रेष्ठ थे ।
’पहले उस घट से महर्षि भगवान् अगस्त्य उत्पन्न हुए और मित्र से यह कहकर कि ’मैं आपका पुत्र नहीं हूँ’ वहाँ से अन्यत्र चले गये ।
(इस प्रकार, क्या ऋषि अगस्त्य वरुण के पुत्र हुए?)
’वह मित्र का तेज था, जो उर्वशी के निमित्त से पहले ही उस कुम्भ में स्थापित किया गया था । तत्पश्चात् उस कुम्भ में वरुणदेवता का तेज भी सम्मिलित हो गया था ।
’तत्पश्चात् कुछ काल के बाद मित्रावरुण (मित्रावरुण) के उस वीर्य से तेजस्वी वसिष्ठमुनि का प्रादुर्भाव हुआ ।जो इक्ष्वाकुकुल के देवता (गुरु या पुरोहित थे)
(इस प्रकार ऋषि वसिष्ठ यद्यपि वरुण के औरस पुत्र हुए किन्तु उन्हें मित्र का संस्पर्श भी प्राप्त हुआ था, इसलिए ऋषि वसिष्ठ ’द्वैमुष्यायन’ अर्थात् दो पिताओं के पुत्र हुए ।)
’सौम्य लक्ष्मण ! महातेजस्वी राजा इक्ष्वाकु ने उनके वहाँ जन्म ग्रहण करते ही उन अनिन्द्य वसिष्ठ का हमारे इस कुल के हित के लिए पुरोहित के पद पर वरण कर लिया ।
सौम्य ! इस प्रकार नूतन शरीर से युक्त वसिष्ठमुनि की उत्पत्ति का प्रकार बताया गया । अब निमि का जैसा वृत्तान्त है वह सुनो --
’राजा निमि को देह से पृथक् हुआ देख उन सभी मनीषी ऋषियों ने स्वयं ही यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करके उस यज्ञ को पूरा किया (-जिसे निमि के देह के ऋषि वसिष्ठ के शाप से अचेतन होकर गिर जाने से पूर्व निमि ने दीक्षा लेकर प्रारम्भ किया था) ।
’उन श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियों ने पुरवासियों और सेवकों के साथ रहकर गन्ध, पुष्प और वस्त्रोंसहित राजा निमि के उस शरीर को तेल के कड़ाह आदि में सुरक्षित रखा ।
’तदनन्तर जब यज्ञ समाप्त हुआ, तब वहाँ भृगु ने कहा --
’राजन् ! (राजा के शरीर के अभिमानी जीवात्मन् !) मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूँ, अतः यदि तुम चाहो तो तुम्हारे जीव-चैतन्य को मैं पुनः इस शरीर में ला दूँगा ।’
’भृगु के साथ ही अन्य सब देवताओं ने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर निमि के जीवात्मा से कहा --
’राजर्षे ! वर माँगो । तुम्हारे जीव-चैतन्य को कहाँ स्थापित किया जाय’
’समस्त देवताओं के ऐसा कहने पर निमि के जीवात्मा ने उस समय उनसे कहा --
’सुरश्रेष्ठ ! मैं समस्त प्राणियों के नेत्रों में निवास करना चाहता हूँ’
तब देवताओं ने निमि के जीवात्मा से कहा --
’बहुत अच्छा, तुम वायुरूप होकर समस्त प्राणियों के नेत्रों में विचरते रहोगे ।
"पृथ्वीनाथ ! वायुरूप (अर्थात् प्राणरूप) से विचरते हुए आप्कए सम्बन्ध से जो थकावट होगी, उसका निवारण करके विश्राम पाने के लिए प्राणियों के नेत्र बारंबार बंद हो जाया करेंगे ।’
’ऐसा कहकर सब देवता (यज्ञ होने के समय) जैसे आये थे, वैसे चले गये; फिर ऋषियों ने निमि के शरीर को पकड़ा और उस पर अरणि रखकर उसे बलपूर्वक मथना आरम्भ किया ।
’पूर्ववत् मन्त्रोच्चारणपूर्वक होम करते हुए उन महात्माओं ने जब निमि के पुत्र की उत्पत्ति के लिए अरणि-मन्थन आरम्भ किया, तब उस मन्थन से महातपस्वी मिथि उत्पन्न हुए । इस अद्भुत् जन्म का हेतु होने के कारण वे जनक कहलाये तथा विदेह (जीव रहित शरीर) से प्रकट होने के कारण उन्हें वैदेह भी कहा गया । इस प्रकार पहले (प्रथम) विदेहराज जनक का नाम महातेजस्वी मिथि हुआ, जिससे यह जनकवंश मैथिल कहलाया ।
’सौम्य लक्ष्मण ! राजाओं में श्रेष्ठ निमि के शाप से ब्राह्मण वसिष्ठ का और ब्राह्मण वसिष्ठ के शाप से राजा निमि का जो अद्भुत् जन्म घटित हुआ, उसका साआ कारण मैंने तुम्हें कह सुनाया ।’
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ।
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( टिप्पणी :
इस दृष्टि से मिथि, इक्ष्वाकु के पुत्र निमि के पुत्र हुए, और राजा जनक बाद में इक्ष्वाकु-कुल में उत्पन्न हुए, ऐसा कहना अनुचित न होगा । जानकी अर्थात् सीताजी उन्हीं राजा जनक की मुँहबोली पुत्री हुई जिसे उन्होंने धरती पर हल चलाते समय धरती से निकली स्वर्ण-मञ्जूषा के भीतर कन्या-शिशु की तरह प्राप्त किया था ।)     

Thursday, 18 July 2019

The Surrogate Motherhood.

ब्रह्मा, वसिष्ठ, वरुण, मित्र, उर्वशी, कुम्भ, वीर्य, पुरूरवा
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वाल्मीकि रामायणे उत्तरकाण्डे,
षट्पञ्चाशः सर्गः
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रामस्य भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा।
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा राघवं दीप्ततेजसम्।।1
निक्षिप्य देहो काकुत्स्थं कथं तौ द्विजपार्थिवौ।
पुनर्देहेन संयोगं जग्मतुर्देवसम्मतौ।।2
लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राम इक्ष्वाकु-नन्दनः।
प्रत्युवाच महातेजा लक्ष्मणं पुरुषर्षभ।।3
तौ परस्परशापेन देहमुत्सृज्य धार्मिकौ।
अभूतां नृपविप्रर्षी वायुभूतौ तपोधनौ।।4
अशरीरः शरीरस्य कृतेऽन्यस्य महामुनिः।
वसिष्ठस्तु महातेजा जगाम पितुरन्तिकम्।।5
सोऽभिवाद्य ततः पादौ देवदेवस्य धर्मवित्।
पिताहमथोवाच वायुभूत इदं वचः।।6
भगवन् निमि-शापेन विदेहत्वमुपागमम्।
देवदेव महादेव वायुभूतोऽहमण्डजः।।7      
सर्वेषां देहहीनानां महद् दुःखं भविष्यति।
लुप्यन्ते सर्वकार्याणि हीनदेहस्य वै प्रभो।।8
देहस्यान्य सद्भावे प्रसादं कर्तुमर्हसि।
तमुवाच ततो ब्रह्मा स्वयंभूरमितप्रभः।।9
मित्रा-वरुणजं तेज आविश त्वं महायशः।
अयोनिजस्त्वं  भविता तत्रापि द्विजसत्तम।
धर्मेण महता युक्तः पुनरेष्यसि मे वशम् ।।10
(त्रिपदीय श्लोक)
एवमुक्तस्तु देवेन अभिवाद्य प्रदक्षिणम्।
कृत्वा पितामहं तूर्णं प्रययौ वरुणालयम्।।11
तमेव कालं मित्रोऽपि वरुणत्वमकारयत्।
क्षीरोदेन सहोपेतः पूज्यमानैः सुरेश्वरैः।।12
एतस्मिन्नेव काले तु उर्वशी परमाप्सराः।
यदृच्छया तमुद्देशमागता सखिभिर्वृता।।13
तां दृष्ट्वा रूपसम्पन्नां क्रीडन्तीं वरुणालये।
तदाविशत् परो हर्षो वरुणं चोर्वशीकृते।।14
स तां पद्मपलाशाक्षीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम्।
वरुणो वरयामास मैथुनायाप्सरोवराम्।।15
प्रत्युवाच ततः सा तु  वरुणं प्राञ्जलिः स्थिता।
मित्रेणाहं वृता साक्षात् पूर्वमेव सुरेश्वर।।16
वरुणस्त्वब्रवीद् वाक्यं कन्दर्पशरपीडितः।
इदं तेजः समुत्स्रक्ष्ये कुम्भेऽस्मिन् देवनिर्मिते।।17
एवमुत्सृज्य सुश्रोणि त्वय्यह्ं वरवर्णिनी।
कृतकामोभविष्यामि यदि नेच्छसि सङ्गमम्।।18
तस्य तल्लोकनाथस्य वरुणस्य सुभाषितम्।
उर्वशी परमप्रीता श्रुत्वा वाक्यमुवाच ह।।19
काममेतद्भवत्वेवं हृदयं  मे त्वयि स्थितम्।
भावश्चाप्यधिकं तुभ्यं देहो मित्रस्य तु प्रभो।।20
उर्वश्या एवमुक्तस्तु रेतस्तन्महदद्भुतम्।
ज्वलदग्निसमप्रख्यं तस्मिन् कुम्भे न्यवासृजत्।।21  
उर्वशी त्वमगत् तत्र मित्रो वै यत्र देवता।
तां तु मित्रः सुसंक्रुद्ध उर्वशीमिदमब्रवीत्।।22
मयाभिमन्त्रिता पूर्वं कस्मात् त्वमवसर्जिता।
पतिमन्यं वृतवती किमर्थं दुष्टचारिणी।।23
अनेन दुष्कृतेन त्वं मत्क्रोधकलुषीकृता।
मनुष्यलोकमास्थाय कंचित् कालं निवत्स्यति।।24
बुधस्य पुत्र राजर्षिः कशिराजः पुरूरवाः।
तमभ्यागच्छ दुर्बुद्धे स ते भर्ता भविष्यति।।25
ततः सा शापदोषेण पुरूरवसमभ्यगात्।
प्रतिष्ठाने पुरूरवं बुधस्यात्मजमौरसम्।।26
तस्य जज्ञे ततः श्रीमानायुः पुत्रो महाबलः।
नहुषो यस्य पुत्रस्तु बभूवेन्द्रसमद्युतिः।।27
वज्रमुत्सृज्य वृत्राय श्रान्तेऽथ त्रिदिवेश्वरे।
शतं वर्षसहस्राणि येनेन्द्रत्वं प्रशासितम्।।28
सा तेन शापेन जगाम भूमिं
तदोर्वशी चारुदती सुनेत्रा।
बहूनि वर्णाण्यवसच्च सुभ्रुः
शापक्षयादिन्द्रसदो ययौ च।।29
--
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकिये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः।।
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 अर्थ :
श्री वाल्मीकि रामायण,
उत्तरकाण्ड,
सर्ग ५६
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(ब्रह्माजी के कहने से वसिष्ठ का वरुण के वीर्य में आवेश, वरुण का उर्वशी के समीप एक कुम्भ में अपने वीर्य का आधान तथा मित्र के शाप से उर्वशी का भूतल में राजा पुरूरवा के पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना )
श्रीरामचन्द्रजी के मुख से कही गयी यह कथा सुनकर शत्रुवीरों का संहार करनेवाले लक्ष्मण उद्दीप्त तेजवाले श्रीरघुनाथजी से हाथ जोड़कर बोले --
’ककुत्स्थभूषण ! वे महर्षि और वे भूपाल दोनों देवताओं के भी सम्मानपात्र थे । उन्होंने अपने शरीरों का त्याग करके फिर नूतन शरीर कैसे ग्रहण किया ?’
लक्ष्मण के इस प्रकार पूछने पर इक्ष्वाकुकुल-नन्दन महातेजस्वी पुरुषप्रवर श्रीराम ने उनसे इस प्रकार कहा :
’सुमित्रानन्दन ! एक-दूसरे के शाप से देह त्याग करके तपस्या के धनी वे धर्मात्मा राजर्षि और ब्रह्मर्षि वायुरूप (निराकार प्राणरूप) हो गये ।
’महातेजस्वी महामुनि वसिष्ठ शरीररहित हो जाने पर दूसरे शरीर की प्राप्ति के लिए अपने पिता ब्रह्माजी के पास गये ।
’धर्म के ज्ञाता वायुरूप वसिष्ठजी ने देवाधिदेव ब्रह्माजी के चरणों में प्रणाम करके उन पितामह से इस प्रकार कहा :
"ब्रह्माण्डकटाह से प्रकट हुए देवाधिदेव महादेव ! मैं राजा निमि के शाप से देहहीन हो गया हूँ; अतः वायुरूप में रह रहा हूँ ।
"प्रभो ! समस्त देहहीनों को महान् दुःख होता है और होता रहेगा; क्योंकि देहहीन प्राणी के सभी कार्य लुप्त हो जाते हैं । अतः दूसरे शरीर की प्राप्ति के लिये आप मुझ पर कृपा करें ।’
(टिप्पणी : देहरहित होने से वे वैसे ही देहभान से भी रहित थे जैसे मनुष्य व इतर प्राणी भी देह के होते हुए भी कभी कभी देहभान से रहित होकर मनोलोक में वृत्तिमात्र होकर विचरते रहते हैं ।)
’तब अमित तेजस्वी स्वयम्भू ब्रह्मा ने उनसे कहा --
’महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ ! तुम मित्र और वरुण के छोड़े हुए तेज (वीर्य) में प्रविष्ट हो जाओ । वहाँ जाने पर भी तुम अयोनिज रूप से ही उत्पन्न होओगे और महान् धर्म से युक्त हो पुत्ररूप से मेरे वश में आ जाओगे (मेरे पुत्र होने के कारण तुम्हें पूर्ववत् प्रजापति का पद प्राप्त होगा)’
(टिप्पणी : स्थान और व्यतीत होनेवाला काल भी ब्रह्माकी ही सन्तान हैं।)
’ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर उनके चरणों में प्रणाम तथा उनकी परिक्रमा करके वायुरूप वसिष्ठजी वरुणलोक को चले गये ।
’उन्हीं दिनों मित्रदेवता भी वरुण के अधिकार का पालन कर रहे थे । वे वरुण के साथ रहकर समस्त देवेश्वरों द्वारा पूजित होते थे ।
’इसी समय अप्सराओं में श्रेष्ठ उर्वशी सखियों से घिरी हुई अकस्मात् उस स्थान पर आ गई ।
’उस परम सुन्दरी अप्सरा को क्षीरसागर में नहाती और जलक्रीडा करती देख वरुण के मन में उर्वशी के लिए अत्यन्त उल्लास प्रकट हुआ ।
’उन्होंने प्रफुल्ल कमल के समान नेत्र और पूर्ण चन्द्रमा के समान मुखवाली उस सुन्दरी अप्सरा को समागम के लिए आमन्त्रित किया ।
’तब उर्वशी ने हाथ जोड़कर वरुण से कहा :
’सुरेश्वर ! साक्षात् मित्रदेवता ने पहले से ही मेरा वरण कर लिया है ।’
’यह सुनकर वरुण ने कामदेव के बाणों से पीड़ित होकर कहा --
’सुन्दर रूप-रंगवाली सुश्रोणि ! यदि तुम मुझसे समागम नहीं करना चाहतीं तो मैं तुम्हारे समीप इस देवनिर्मित कुम्भ में अपना यह वीर्य छोड़ दूँगा और इस प्रकार छोड़कर ही सफल मनोरथ हो जाऊँगा ।’
(टिप्पणी :
देवता भी मनुष्येतर प्राणियों की तरह भोगयोनि होने से विधाता के आदेश के अनुसार ही प्रारब्धवश स्वर्ग के भोगों को प्राप्त करते हैं, न कि अपनी इच्छा से उस तरह जैसे कि मनुष्य इच्छा, संकल्प, पराक्रम, और दैव के अनुकूल होने पर प्राप्त कर लेता है ।)
’लोकनाथ वरुण का यह मनोहर वचन सुनकर उर्वशी को बड़ी प्रसन्नता हुई और वह बोली --
"प्रभो ! आपकी इच्छा के अनुसार ऐसा ही हो । मेरा हृदय आपमें अनुरक्त है और आपका अनुराग भी मुझमें अधिक है; इसलिए आप मेरे उद्देश्य से उस कुम्भ में वीर्याधान कीजिये । इस शरीर पर तो इस समय मित्र का अधिकार हो चुका है ।
(व्यतीत होनेवाला काल, कामदेव, मित्र और वरुण की तरह स्वर्गलोक में वास करनेवाले देवता हैं, अप्सराएँ भी ऐसी ही देवता होती हैं किन्तु वे विधाता ब्रह्मदेवता के संकल्प से सृष्टि के कार्य में सहायक होती हैं । इस प्रकार देवताओं के लिए मानवोचित नैतिकता-अनैतिकता का प्रश्न ही नहीं उठता । वे प्रारब्धवश ही किसी कार्य में यन्त्रवत् संलग्न और संयुक्त होते हैं; - न कि अपने स्वतन्त्र संकल्प से ।)
’उर्वशी के ऐसा कहने पर वरुण ने प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशमान अपने अत्यन्त अद्भुत् तेज (वीर्य) को उस कुम्भ में डाल दिया ।
’तदनन्तर उर्वशी उस स्थान पर गयी, जहाँ मित्रदेवता विराजमान थे । उस समय मित्र अत्यन्त कुपित हो उस उर्वशी से इस प्रकार बोले --
"दुराचारिणी ! पहले मैंने तुझे समागम के लिए आमन्त्रित किया था; फिर किसलिए तूने मेरा त्याग किया और क्यों दूसरे पति का वरण कर लिया ?
"अपने इस पाप के कारण मेरे क्रोध से कलुषित हो तू कुछ काल तक मनुष्यलोक में जाकर निवास करेगी ।
"दुर्बुद्धे ! बुध के पुत्र राजर्षि पुरूरवा, जो काशिदेश के राजा हैं, उनके पास चली जा, वे ही तेरे पति होंगे’
’तब वह शाप-दोष से दूषित हो प्रतिष्ठानपुर (प्रयाग-झूसी) में बुध के औरस पुत्र पुरूरवा के पास गयी ।
(टिप्पणी :
जैसे भौतिक रूप से काशी पृथ्वी पर गंगातट पर भी अवस्थित है और दक्षिण में काञ्ची में भी, उसी प्रकार प्रतिष्ठान / प्रतिष्ठानपुर भी  दक्षिण में वर्तमान पैठण, महाराष्ट्र में भी अवस्थित है ।)
’पुरूरवा के उर्वशी के गर्भ से श्रीमान् आयु नामक महाबली पुत्र हुआ, जिसके इन्द्रतुल्य तेजस्वी पुत्र महाराज नहुष थे ।
’वृत्रासुर पर वज्र का प्रहार करके जब देवराज इन्द्र ब्रह्महत्या के भय से दुःखी हो छिप गये थे, तब नहुष ने ही एक लाख वर्षों तक ’इन्द्र’ पद पर प्रतिष्ठित हो त्रिलोकी के राज्य का शासन किया था ।
’मनोहर दाँत और सुन्दर नेत्रवाली उर्वशी मित्र के दिये हुए उस शाप से भूतल पर चली गयी । वहाँ वह सुन्दरी बहुत वर्षों तक रही । फिर पाप का क्षय होने पर इन्द्रसभा में चली गयी’
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ ।
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Tuesday, 16 July 2019

सत्य का सत्य

गार्ग्य-अजातशत्रु संवाद 
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बृहदारण्यक उपनिषद् में द्वितीय अध्याय के प्रथम ब्राह्मण में गार्ग्य और अजातशत्रु का संवाद है ।
गार्ग्य गोत्रोत्पन्न बालाकि नामक एक पुरुष बहुत घमंडी था और बहुत बोलनेवाला था ।
उसने काशिराज अजातशत्रु के पास जाकर कहा : ’मैं तुम्हें ब्रह्म का उपदेश करूँ ।’
अजातशत्रु ने कहा, ’इस वचन के लिए  मैं आपको सहस्र [गौएँ] देता हूँ ;
लोग ’जनक, जनक’ यों कहकर दौड़ते हैं ।
(अर्थात् सब लोग यही कहते हैं  कि ’जनक बड़ा दानी है, जनक बड़ा श्रोता है ।’ ये दोनों बातें आपने अपने वचन से मेरे लिए सुलभ कर दी हैं । इसलिये मैं आपको सहस्र गौएँ देता हूँ ।)’॥१॥
...
...
॥१३॥
[उसे (गार्ग्य को) मौन देखकर] वह अजातशत्रु बोला, ’बस, क्या इतना ही है?’
गार्ग्य : ’हाँ, इतना ही है।’
अजातशत्रु :’इतने से तो ब्रह्म नहीं जाना जाता ।’
वह गार्ग्य बोला :
’मैं आपकी शिष्यभाव से शरण लेता हूँ ।’ ॥१४॥
अजातशत्रु ने कहा :
’ब्राह्मण क्षत्रिय के प्रति, इस उद्देश्य से कि यह मुझे ब्रह्म का उपदेश करेगा, शिष्यभाव से शरण हो -- ’यह तो विपरीत है, तो भी मैं आपको उसका ज्ञान कराऊँगा ही ।’
तब अजातशत्रु  उसके हाथ पकड़कर उठा और वे दोनों एक सोये हुए पुरुष के पास गये । अजातशत्रु ने उसे
 ’हे ब्रह्म ! हे पाण्डरवास ! हे सोम राजन् !'
 इन नामों से पुकारा ।
परंतु वह न उठा ।
तब उसे हाथ से दबा-दबाकर  जगाया तो वह उठ बैठा ॥१५॥
अजातशत्रु ने कहा --
’यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब सोया हुआ था, तब कहाँ था ? और यह कहाँ से आया ?’
किंतु गार्ग्य यह न जान सका ॥१६॥
उस अजातशत्रु ने कहा :
’यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब सोया हुआ था, उस समय यह विज्ञान के  द्वारा इन इन्द्रियों की ज्ञानशक्ति को ग्रहणकर, - यह जो हृदय के भीतर आकाश है उसमें शयन करता है । जिस समय यह उन ज्ञानशक्तियों को ग्रहण कर लेता है, उस समय इस पुरुष का ’स्वपिति’ (सोता या स्वप्न देखता हुआ) नाम होता है ।
उस समय घ्राणेन्द्रिय (नासिका)  लीन रहती है, चक्षु (नेत्र) लीन रहता है , श्रोत्र (कर्ण)  लीन रहता है,
 और मन भी लीन रहता है । जिस समय यह आत्मा स्वप्रवृत्ति से बर्तता है, उस समय इसके वे लोक (दृश्य) उत्पन्न होते हैं । वहाँ कभी यह महाराज होता है, कभी महाब्राह्मण होता है अथवा ऊँची-नीची [गतियों] - को प्राप्त होता है । जिस प्रकार कोई महाराज अपने प्रजाजनों को लेकर (अधीन कर) अपने देश में यथेच्छ विचरता है । इसके पश्चात् जब वह गाढ़ निद्रा में होता है, जिस समय कि वह किसी के विषय में कुछ भी नहीं जानता, उस समय 'हिता' नाम की जो बहत्तर हजार नाड़ियाँ हृदय से सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर स्थित हैं, उनके द्वारा बुद्धि के साथ जाकर वह शरीर में व्याप्त होकर शयन करता है । जिस प्रकार कोई बालक अथवा महाराज किंवा महाब्राह्मण आनन्द की दुःखनाशिनी अवस्था को प्राप्त होकर शयन करे, उसी प्रकार यह शयन करता है ।॥१७-१९॥
जिस प्रकार वह ऊर्णनाभि (मकड़ा) तन्तुओं पर ऊपर की ओर जाता है तथा जैसे अग्नि से अनेकों क्षुद्र चिनगारियाँ उड़ती हैं, उसी प्रकार इस आत्मा से समस्त प्राण, समस्त लोक, समस्त देवगण और समस्त भूत विविध रूप से उत्पन्न होते हैं । ’सत्य का सत्य’ यह उस आत्मा का नाम है । प्राण ही सत्य हैं । उन्हीं का यह सत्य है ॥२०॥
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The above anecdote reminds me of :
George, Georgia, Gorge, Gorgeous, Gorgon, ... Gordon's Knot, 72
गार्ग्य, जॉर्जिया, गॉर्ज, गॉर्जियस, गॉर्गन, ... गौरजां / गौर्यां ज्ञात .. ..
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Monday, 15 July 2019

Of Man, Sages, Kings, Time and Space.

Entities Phenomenal.
भौतिक काल-स्थान का उद्भव
The Physical-Material Time-Space with reference to and in comparison to the Time-Space of the Celestial entities phenomena like Sages, and devata / देवता  .
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वाल्मीकि-रामायण, उत्तरकाण्ड,
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सर्ग ५३, ५४
राजा नृग मनुष्यों के राजा (नृप) थे :
नारायणो नरेषु यो नृपो भूत्वा नृगो ततः ।
शप्तो द्विजाभ्याम् तदा बभूव सः कृकलासो॥
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राजा निमि और वशिष्ठ का एक दूसरे के शाप से देहत्याग
सर्ग ५३ तथा ५४ में राजा नृग की कथा का वर्णन है । किस प्रकार नरेश अर्थात् मनुष्यों के राजा नृग ने उपेक्षापूर्वक यज्ञ और दान करने में प्रमादवश शास्त्र-अवहेलना की, जिसके फलस्वरूप उसे द्वापरयुग में भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार लिये जाने तक शाप का फल भोगना पड़ा ।
राजा नृग मनुष्य का उदाहरण है । यह कथा इस प्रकार उस मनुष्य का चित्रण है जो अत्यंत पुण्य करते हुए भी शास्त्रविधि की अवहेलना करने से गिरगिट जैसे जन्म को प्राप्त होता है और एक गड्ढे में जहाँ यद्यपि सुख-पूर्वक जीने के समस्त साधन उसे उपलब्ध होते हैं जीवन बिताते हुए शाप से मुक्ति की प्रतीक्षा करता रहता है ।
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वाल्मीकि रामायण, उतरकाण्ड,
सर्ग ५५
एष ते नृगशापस्य विस्तरतोऽभिहितो मया ।
यद्यस्ति श्रवणे श्रद्धा श्रुणुष्वेहापरां कथाम् ॥१
एवमुक्तस्तु रामेण सौमित्रिः पुनरब्रवीत् ।
तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे नृप ।२
लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राम इक्ष्वाकुनन्दनः ।
कथां परमधर्मिष्ठां व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥३
आसीद् राजा निमिर्ना इक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ।
पुत्रो द्वादशमो वीर्ये धर्मे च परिनिष्ठितः ॥४
स राजा वीर्यसम्पन्नः पुरं देवपुरोपमम् ।
निवेशयामास तदा अभ्याशे गौतमस्य तु ॥५
पुरस्य सुकृतं नाम वैजयन्तमिति श्रुतम् ।
निवेशं यत्र राजर्षिर्निमिश्चक्रे महायशाः ॥६
तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना निवेश्य सुमहापुरम् ।
यजेयं दीर्घसत्रेण पितुः प्रह्लादयन् मनः ॥७
ततः पितरमान्त्र्य इक्ष्वाकुं हि मनोः सुतम् ।
वसिष्ठं वरयामास पूर्वं ब्रह्मर्षिसत्तमम् ॥८
अनन्तरं स राजर्षिर्निमिरिक्ष्वाकु-नन्दनः
अत्रिमङ्गिरसं चैव भृगुं चैव तपोनिधिम् ॥९
तमुवाच वसिष्ठस्तु निमिं राजर्षिसत्तमम् ।
वृतोऽहं पूर्वमिन्द्रेण अन्तरं प्रतिपालय ॥१०
अनन्तरं महाविप्रो गौतमः प्रत्यपूरयत् ।
वसिष्ठोऽपि महातेजा इन्द्रयज्ञमथाकरोत् ॥११
निमिस्तु राजा विप्रांस्तान् समानीय नराधिपः ।
पञ्चवर्षसहस्राणि राजा दीक्षामथाकरोत् ॥१२
इन्द्रयज्ञावसाने तु वसिष्ठो भगवानृषिः ।
सकाशमागतो राज्ञो हौत्रं कर्तुमनिन्दितः ॥१३
तदन्तरमथापश्यद् गौतमेनाभिपूरितम् ।
कोपेन महाविष्टो वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः ॥१४
तस्मिन्नहनि राजर्षिर्निद्रयापहृतो भृशम् ।
ततो मन्युर्वसिष्ठस्य प्रादुरासीन्महात्मनः ।
अदर्शनेन राजर्षेर्व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥१६
यस्मात् त्वमन्य वृतवान् मामवज्ञाय पार्थिव
चेतनेन विनाभूतो देहस्ते पार्थिवैष्यति ॥१७
ततः प्रबुद्धो राजा तु श्रुत्वा शापमुदाहृतम् ।
ब्रह्मयोनिमथोवाच स राजा क्रोधमूर्च्छितः ॥१८
अजानतः शयानस्य क्रोधेन कलुषीकृतः ।
उक्तवान् मम शापाग्निं यमदण्डमिवापरम् ॥१९
तस्मात् तवापि ब्रह्मर्षे चेतनेन विनाकृतः
देहः स सुचिरप्रख्यो भविष्यति न संशयः ॥२०
इति रोषवशादुभौ तदानीमन्योन्यं शापितौ नृपद्विजेन्द्रौ ।
सहसैव बभूवतुर्विदेहौ तत्तुल्याधिगतप्रभाववन्तौ ॥२१
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकिये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ।
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अर्थ :
(श्रीराम ने कहा --)
’लक्ष्मण! इस तरह मैंने तुम्हें राजा नृग के शाप का प्रसङ्ग विस्तारपूर्वक बताया है । यदि सुनने की इच्छा हो तो दूसरी कथा भी सुनो !’
श्रीराम के ऐसा कहने पर सुमित्राकुमार फिर बोले :
’नरेश्वर ! इन आश्चर्यजनक कथाओं के सुनने से मुझे कभी तृप्ति नहीं होती है ।’
लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर इक्ष्वाकु-कुलनन्दन श्रीराम ने,
पुनः उत्तम धर्म से युक्त कथा कहनी आरम्भ की :
’सुमित्रानन्दन ! महात्मा इक्ष्वाकु के पुत्रों में निमि नामक एक राजा हो गए हैं, जो इक्ष्वाकु के बारहवें *पुत्र थे । वे पराक्रम में और धर्म में पूर्णतः स्थिर रहनेवाले थे । *श्रीमद्भाग्वत (नवम स्कन्ध ६/४) में, विष्णुपुराण (४/२/११) में तथा महाभारत (अनुशासन-पर्व २/५) में इक्ष्वाकु के सौ पुत्र बताए गए हैं । इनमें प्रधान थे -- विकुक्षि, निमि और दण्ड । इस दृष्टि से निमि द्वितीय पुत्र सिद्ध होते हैं; परंतु यहाँ मूल में इनको बारहवाँ बताया गया है । सम्भव है, गुण-विशेष के कारण ये तीन प्रधान कहे गए हों और अवस्था-क्रम से बारहवें ही हों ।
’उन पराक्रमसम्पन्न नरेश ने उन दिनों गौतम-आश्रम के निकट देवपुरी के समान एक नगर बसाया ।
’महायशस्वी राजर्षि निमि ने जिस नगर में अपना निवास-स्थान बनाया, उसका सुन्दर नाम रखा गया वैजयन्त । इसी नाम से उस नगर की प्रसिद्धि हुई (देवराज इन्द्र के प्रासाद का नाम वैजयन्त है, उसी की समता से निमि के नगर का भी यही नाम रखा गया था ।)
’उस महान् नगर को बसाकर राजा के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं पिता के हृदय को आह्लाद प्रदान करने के लिए एक ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान करूँ, जो दीर्घकाल तक चालू रहनेवाला हो ।
’तदनन्तर इक्ष्वाकु-नन्दन राजर्षि निमि ने अपने पिता मनुपुत्र इक्ष्वाकु से पूछकर अपना यज्ञ कराने के लिए सबसे पहले ब्रह्मर्षिशिरोमणि वसिष्ठजी का वरण किया । उसके बाद अत्रि, अङ्गिरा तथा तपोनिधि भृगु को भी आमन्त्रित किया ।
’उस समय ब्रह्मर्षि वसिष्ठ ने राजर्षियों में श्रेष्ठ निमि से कहा -- ’देवराज इन्द्र ने एक यज्ञ के लिए पहले ही से मेरा वरण कर लिया है; अतः वह यज्ञ जब तक समाप्त न हो जाए तब तक तुम मेरे आगमन की प्रतीक्षा करो ।’
वसिष्ठजी के चले जाने के बाद महान् ब्राह्मण महर्षि गौतम ने आकर उनके काम को पूरा कर दिया । उधर महातेजस्वी वसिष्ठ भी इन्द्र का यज्ञ पूरा कराने लगे ।
नरेश्वर राजा निमि ने उन ब्राह्मणों को बुलाकर हिमालय के पास अपने नगर के निकट ही यज्ञ आरम्भ कर दिया, राजा निमि ने पाँच हजार वर्षों तक के लिए यज्ञ की दीक्षा ली ।
उधर इन्द्र-यज्ञ की समाप्ति होने पर अनिन्द्य भगवान् वसिष्ठ ऋषि राजा निमि के पास होतृकर्म करने के लिए आये । वहाँ आकर उन्होंने देखा कि जो समय प्रतीक्षा के लिए दिया था, उसे गौतम ने आकर पूरा कर दिया
’यह देख ब्रह्मकुमार वसिष्ठ महान् क्रोध से भर गये और राजा से मिलने दो घड़ी वहाँ बैठे रहे । (एक मुहूर्त = दो घड़ी) । परंतु उस दिन राजर्षि निमि अत्यन्त निद्रा के वशीभूत हो सो गये थे ।
’राजा मिले नहीं इस कारण महात्मा वसिष्ठ मुनि को बड़ा क्रोध हुआ।  वे राजर्षि को लक्ष्य करके बोलने लगे :
'भूपाल निमे ! तुमने मेरी अवहेलना करके दूसरे पुरोहित का वरण कर लिया है, इसलिये तुम्हारा यह शरीर अचेतन होकर गिर जायगा। '
'तदनन्तर राजा की नींद खुली।  वे उनके दिये हुए शाप की बात सुनकर क्रोध से मूर्च्छित हो गये और ब्रह्मयोनि वसिष्ठ से बोले :
'मुझे आपके आगमन की बात मालूम नहीं थी, इसलिये सो रहा था।  परंतु आपने क्रोध से कलुषित होकर मेरे ऊपर दूसरे यमदण्ड की भाँति शापाग्नि का प्रहार किया है।
'अतः ब्रह्मर्षे ! चिरन्तन शोभा से युक्त जो आपका शरीर है, वह भी असतं होकर गिर जायगा -- इसमें संशय नहीं है।
'इस प्रकार उस समय रोष के वशीभूत हुए वे दोनों नृपेंद्र और द्विजेन्द्र परस्पर शाप दे सहसा विदेह हो गये।  उन दोनों के प्रभाव ब्रह्माजी के समान थे। '
(इस प्रकार श्री वाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्ड में पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ।)
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टिप्पणी :
ऋषि वसिष्ठ स्थान (Space) का पर्याय है और राजा निमि काल (Time) का।
दोनों का ही स्वरूपतः ब्रह्मा की ही तरह आत्मा में ही नित्य वास है।
उपरोक्त कथा में उन्हें चेतनायुक्त सशरीर सत्ताओं (व्यक्तियों) की तरह प्रस्तुत किया गया, जो बहुत बड़े यज्ञों का अनुष्ठान करते थे। चूँकि ऋषि वसिष्ठ को इन्द्र के यज्ञ को पूरा कराने में देवलोक के समय के पैमाने पर 5000 वर्ष लग गए और इस बीच राजा ने गौतम ऋषि की सहायता से भूलोक के समय के पैमाने पर यज्ञ पूरा कर लिया, इसलिए उनके समय परस्पर टकरा गए।  जैसे एक ही स्थान पर दूसरा स्थान नहीं हो सकता (क्योंकि एक ही स्थान पर समान आयतन आकार-विशेष की दो वस्तुएँ एक साथ नहीं राखी जा सकतीं, उसी तरह दो 'समय' भी एक ही काल में नहीं हो सकते।
इस कथा में आगे चलकर ज्ञात होगा कि किस प्रकार देहरहित होने के बाद वे वरुण तथा मित्र के अंश रूप से उर्वशी के माध्यम से स्थूल भौतिक रूप में  क्रमशः स्थान तथा काल के रूप में अभिव्यक्त हुए।
इस प्रकार इस कथा में गूढ संकेत हैं जिन्हें decode करने पर हमें कथा का बिलकुल भिन्न अर्थ प्राप्त होता है।
आगे चलकर ययाति, आयु, पुरु, देवयानी, शर्मिष्ठा, उर्वशी आदि के सन्दर्भ में इन अर्थों को और अच्छी तरह ग्रहण कर सकेंगे।
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Sunday, 14 July 2019

मूर्ति-पूजा

तस्य प्रतिमा नास्ति
(श्वेताश्वतर उपनिषद्, 4 -4)
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देवता तत्व वैसे तो स्थूल आधिभौतिक शरीर की दृष्टि से अशरीरी है किन्तु आधिदैविक स्तर पर उसकी चार प्रतिमाएँ होती हैं जिनके माध्यम से ईश्वर के उस आधिदैविक स्वरूप 'देवता' से संपर्क किया जा सकता है।
गीता अध्याय 3 में कहा गया है :
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।। 19
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इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता ।
तैर्दत्ता नप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।। 20
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जिस प्रकार ईश्वर एक और अनेक होते हुए भी एक तथा अनेक से विलक्षण भी है, उसी प्रकार उसे किसी भी देवता के माध्यम से जाना तथा अनुभव किया जा सकता है क्योंकि ईश्वर व्यक्ति-विशेष ही नहीं कार्य तथा कारण भी है जिसे उपनिषद् ईशावास्य उपनिषद् - शांकरभाष्य की भूमिका में 'ईशिता' नाम दिया गया है।
'एक' और 'अनेक' ईश्वर नामक सत्ता के विशेषण हैं, जिसका विशेष्य है - ईश्वर नामक सत्ता।
क्या 'एक' और 'अनेक' भी प्रतिमा ही नहीं है? 
ईशिता वै ईशानो,
यह ईशिता सबमें तथा सर्वत्र व्याप्त है किन्तु जब किसी देह-विशेष से संबद्ध चेतना उस देह को 'मेरा' जानते हुए भी प्रमादवश 'मैं' नाम देती है तो वही ईशिता इस प्रकार द्वैत-रूप लेती है।
द्वैत का अर्थ हुआ दो के बीच संबंध।
देवता के दो अवयव होते हैं 'प्राण' तथा 'चेतना' ।
छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा पिंड भी ईशिता से ओत प्रोत है और ईशिता प्रत्येक पिंड में।
स्थूल भौतिक आकाश भी इस प्रकार वैसा ही एक पिंड है, जैसा कि स्वप्न में अनुभव किया जानेवाला आकाश या जागृति की अवस्था में कल्पना में जाना-देखा जानेवाला कल्पित आकाश। इसी का एक अन्य रूप है वह आकाश, जिसमें सुषुप्ति के समय हम होते हैं।  जाग उठने के बाद ही हमें स्थूल भौतिक आकाश में एक दृश्य संसार अनुभव होता है, जिसमें हम असंख्य लोगों आदि को अपने (अर्थात् अपने भौतिक शरीर) से अन्य के रूप में देखकर अनुमान करते हैं कि यद्यपि वे हमारी सुषुप्ति के समय नहीं होते फिर भी पुनः पुनः देखे जाने से स्पष्ट है कि उनकी सुषुप्ति में भी उनके लिए हम 'नहीं' हो जाते हैं।
वैदिक वर्ण-मातृका (Matrix of letters - vowels and consonants) में प्रत्येक बोले जा सकने वाले वर्ण (letter) को देवता कहा जाता है क्योंकि प्राण तथा चेतना के अभाव में किसी भी वर्ण का उच्चारण कर पाना संभव नहीं।
तात्पर्य यह कि वर्ण के उच्चारण के लिए किसी न किसी प्रकार से प्राण तथा चेतना का आधार होना आवश्यक है।  वेद में इस प्रकार के मूल 33 वर्ण कहे गए हैं जिनकी भूमिका कार्य को सिद्ध करने में सहायक होती है।
इन्हें ही 33 कोटि (प्रकार के) देवता भी कहा जाता है।
कोटि का एक अर्थ करोड़ भी होता है इसलिए देवता को 33 करोड़ भी कहा जा सकता है।
वास्तव में ये सभी केवल मूलतः 33 देवताओं के ही अनेक ऐसे रूप हैं जिन्हें हर कोई अपने अपने तरीके से इष्ट और आराध्य मानता है।
इस मान्यता को वैदिक रीति से किसी नाम, मन्त्र, प्राण-चेतना तथा प्रतिमा (आकृति) इन चार तरीकों से साकार साक्षात रूप से जाना अनुभव किया जाता है।
भावना से ही प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा हो सकती है।
केवल मिट्टी, पत्थर, लकड़ी या सोने-चाँदी की स्थूल प्रतिमा ही नहीं किसी वृक्ष, पर्वत, नदी या स्थान में भीभावना के बल से ही मान्यता देवता की तरह जागृत हो उठती है।
वह देवता जो मूर्ति में मूर्च्छित चेतना की तरह अव्यक्त होकर अप्रकट छिपा रहता है, कार्य के माध्यम से अपने अस्तित्व का स्वयं प्रमाण होता है।
क्या नाम और मन्त्र की भी सुनिश्चित आकृति नहीं होती?
वर्ण ही नाम तथा मन्त्र की मूर्ति के अंग होते हैं।
क्या ईश्वर का कोई नाम नहीं है?
क्या उससे संपर्क मौन रहकर (वाणी से उच्चारण न करते हुए) किया जा सकता है?
क्या ईश्वर / देवता से संपर्क या उसकी उपासना-पूजा-ध्यान आदि करते समय उसका किसी न किसी रूप में स्मरण नहीं किया जाता ?
ऐसा ईश्वर निराकार कैसे हो सकता है?
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Saturday, 13 July 2019

॥ तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

प्रेरणा, संकल्प और कामना 
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कार्य / कर्म (का होना) कर्ता पर अवलंबित होता है ।
कर्म प्रकृति से होते हैं :
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥२७
(गीता, अध्याय ३)
’प्रकृति’ स्त्रीलिङ् के रूप ’मति’ के समान होते हैं ।
’प्रकृतेः’ इकारान्त स्त्रीलिङ् पञ्चमी / षष्ठी एकवचन रूप है ।
पञ्चमी अपादान कारक है ।
तात्पर्य है : प्रकृति से,
जैसे हिमालय से गंगा निकलती है : ’हिमालयात्’ पञ्चमी एकवचन रूप है ।
’गुणैः’ ’गुण’ - अकारान्त नपुं.लिङ् तृतीया बहुवचन रूप है ।
तात्पर्य है : गुणों के माध्यम से ।
अर्थात् गुण ही कर्ता हैं जबकि प्रकृति / मति / बुद्धि माध्यम (instrument) है ।
किन्तु गुण तो प्रकृति का अदृश्य रूप (abstract form) है,  इसलिए उस रूप में प्रकृति / (सत्व, रज, तम आदि) गुणों को प्रत्यक्षतः नहीं देखा जाता ।
प्रत्यक्षतः जिसे जाना और इस अर्थ में देखा जा सकता है वह है प्रेरणा, संकल्प और कामना ।
निस्सन्देह; - प्रेरणा, संकल्प और कामना तो प्रत्यक्षतः ही जान लिए जाते हैं, और मनुष्य जिस किसी भी कार्य में संलग्न होता है, उसके लिए इन्हीं तीन में से एक या अधिक, उसे कार्य करने के लिए प्रेरित (प्रेरणायुक्त), आग्रहशील (संकल्पयुक्त) और बाध्य (कामनायुक्त) करते हैं ।
जैसे ही किसी कार्य में संलग्न होने की प्रेरणा, संकल्प या कामना होती है मनुष्य में कर्तृत्व-भावना जन्म लेती है अर्थात् ’मैं’ कर्ता हूँ इस प्रकार से ’मैं’ नामक अहङ्कार पैदा होता है, जिसे बुद्धि ’कर्ता’ की तरह ग्रहण कर लेती है । (भय भी कामना का विपरीत प्रकार मात्र है।) 
इसी मोहित बुद्धि को यहाँ ’विमूढबुद्धि’ कहा गया है और इस बुद्धि से युक्त मनुष्य को विमूढात्मा ।
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सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥२४
(गीता, अध्याय ६)
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥२५
(गीता, अध्याय ६)
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरं ।
ततो ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥२६
(गीता, अध्याय ६)
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥२७
(गीता अध्याय ६)
उपरोक्त ४ श्लोकों में स्पष्ट किया गया है :
’संकल्प से पैदा हुई समस्त कामनाओं को संपूर्णतः त्यागकर’
’त्याग’ क्या संकल्प से संभव होगा?
यदि ऐसा है तो यह तो एक अन्तहीन दुष्चक्र हुआ और इस तर्क में विसंगति है, यह भी देखा जा सकता है ।
इसलिए केवल इतना जान / देख लेने से कि प्रकृति के (तीनों) गुणों से ही मन तथा इन्द्रियाँ प्रेरित होते हैं जिनसे (किसी कार्य / कर्म) को करने का संकल्प (तथा अपने-आपके स्वतन्त्र कर्ता होने का भ्रामक और मिथ्या विचार) पैदा होता है । अतः मन एवं इन्द्रियों को अच्छी तरह से हर प्रकार से संयमित करते हुए ,
धीरे धीरे क्रमशः बुद्धि से धृति (समझ) में धारण करते हुए,
मन को आत्मा (मैं-विचार या मैं स्फुर्णा, या वह स्फुर्णा जहाँ से आती है उस आत्मा) में स्थिरतापूर्वक स्थित कर, किसी भी विषय का चिन्तन (चित्त को विषय से संलग्न) न करे । और,
चित्त स्वभाव से ही चञ्चल होने से जहाँ जहाँ, जिस किसी भी हेतु (कारण या प्रयोजन) से अस्थिर होता है, उसे वहाँ वहाँ से लौटाकर आत्मा  (मैं-विचार या मैं स्फुर्णा, या वह स्फुर्णा जहाँ से आती है उस आत्मा) में स्थिर करे ।
इस प्रकार से शान्त हुआ मन ही, जो योगी का श्रेष्ठतम सुख है, - रजोगुण की शान्ति होने पर उसे तमोगुण (कल्मष) से रहित ब्रह्म (परब्रह्म / आत्मा) में प्रतिष्ठित करता है ।       
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॥ तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ 
(गीता, अध्याय २, श्लोक -५७, ५८, ६१, ६८)       
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Friday, 12 July 2019

Thought and Thought-Process

Modes and Models of Thought
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A Thought is a word-structure in a spoken language.
Thus a Thought could be classified under the following categories :
Primitive Thought  -
That is in the formative stage, when a spoken word is associated to an object.
Secondary Thought -
That is in the next stage, when a spoken word is associated to an abstract or real physical object.
Tertiary Thought -
Happens in the third stage, when a Thought that is interchanged with yet another Thought.
This gives us the basis for information and knowledge that could be digitized and stored / distributed in terms of data.
Again, a Thought could be further classified in the following 3 ways :
A Pro-active Thought :
That could be a result of the experience of the physical kind. hunger, thirst, rest, sleep, heat, cold, fatigue are the features of this kind of thought which are though 'felt' only in terms of experience. There are however 'emotions' that are not really 'felt' but evoking out of the responses at the mental level.
This could be again either in terms of :
A Reciprocated response or Provocative one.
A Thought-Process could be triggered out in many ways.
Normally, our Thought-Process is a bundled up mix of all these above-mentioned kinds of Thought.
This further complicates the communication through words.
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In Comparison and Contrast;
The word 'Thoughtless' and 'Thoughtlessness connotes a double meaning.
You could be 'Thoughtless' in the sense when you lack sensitivity, when you are apathetic towards the feelings and lives of others. Or, You are so sensitive towards the life within and around you, in other beings, creatures and animate or inanimate objects, that though being very sensitive, you don't think of translating your sensitivity into words. As a matter of fact you tend to cease thinking itself, and in that state of mind you discard all verbal structures, formations and formulations of Thought in one stroke.
Then though you may write poetry or paint a picture, compose a musical theme, You are just happy in your creativity and you don't even imagine or expect a reward. In the least, -you don't even think of preserving or conserving your spontaneous joy of such creativity. This joy and happiness is not a trivial worldly affair that could be stored or accumulated. Like the fragrance and beauty of a flower, this comes on its own without intimation or invitation and may take leave of you in those moments of creativity, when Thought is absolutely absent and flutters not. This too could be attributed to the 'Thoughtlessness' / 'Thoughtless state' of the mind.
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Thursday, 11 July 2019

समान्तर धर्म

गुरु-पूर्णिमा
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पहली बार वर्ष जब १९८२-८३ के समय मुझे ईश-कृपा का भान तब हुआ जब मैं श्री महर्षि रमण के वचनों का अध्ययन-पठन कर रहा था ।
उनकी शिक्षा और उपदेश का मूल तत्व तो एक पैने नुकीले बाण की तरह पहले ही हृदय (या हृदय-ग्रंथि) को भेद चुका था, किन्तु शिशु के जन्म के बाद भी उसके बड़े होने में समय लगता है, श्री महर्षि रमण की शिक्षाओं और उपदेशों की ज़रूरत मुझे थी और वह मुझे निरंतर प्राप्त होता रहा ।
उनसे बातचीत के मूल-संग्रह (अंग्रेज़ी संस्करण : 'Talks with Sri Raman Maharshi', तथा हिन्दी संस्करण "श्री रमण महर्षि से बातचीत") तथा दूसरी पुस्तकें ("मैं कौन?", "श्री रमण-वाणी" "आत्मानुसन्धान" "तत्वबोध") आदि को पढ़ने के बाद भी मुझे उन ग्रन्थों से निरन्तर वह सब प्राप्त होता रहा, जिसकी समय-समय पर मुझे आवश्यकता होती थी ।
उनकी शिक्षाओं के मूल-संग्रह में यहूदी, ईसाई तथा इस्लाम की विचारधारा के मूल-तत्वों (Tenets) से जुड़े अनेक ऐसे प्रसंग हैं जिनका सन्दर्भ आज के युग में भी अत्यन्त प्रासंगिक है । यह अवश्य है कि धर्म (सनातन धर्म) किस प्रकार इन तीनों ऐतिहासिक परंपराओं का उद्गम है और वे परस्पर किस तरह एक-दूसरे से जुड़े हैं इसे सन्तोषजनक रूप से जानने-समझने में मुझे ३५ वर्ष लग गए ।
सबसे पहले मेरी ध्यान बाइबिल की उस उक्ति "आय एम दैट आय एम" पर गया जिसका उल्लेख "श्री रमण महर्षि से बातचीत" के क्रमांक 77, 106, 112, 131, 164, 188, 189, 201, 311, 338, 354, 426, 436, 476, और 609 में पाया जाता है ।
इससे मुझे यह स्पष्ट हो गया कि तोराह (हिब्रू बाइबिल), कैथोलिक बाइबिल (ओल्ड तथा न्यू टेस्टामेन्ट) में ’यहोवा’, तथा क़ुरान  में वर्णित ’अल्लाह’ उसी दिव्य सत्ता के भिन्न भिन्न नाम हैं जिसे संस्कृत में ’ईश्वर’ (संज्ञा) तथा ’ईशिता’(क्रिया-विशेषण) कहा गया है । बाइबिल में इसका उल्लेख सीधे, बिल्कुल उसी प्रकार ’मैं’ के प्रयोग के माध्यम से उत्तम पुरुष एकवचन (’मैं’/ 'I') से किया गया है जैसा कि गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने किया है ।
इस प्रकार यह दिव्य सत्ता ही जिसे प्रत्यक्षतः हर कोई अनायास ’मैं’ की अन्तःस्फूर्ति से जानता है, वास्तविक ’यहोवा’ / 'Jehovah', ’अल्लाह’, ’मैं’  तथा ’ईश्वर’ का मूल वास्तविक स्वरूप है । वही एकमात्र ’यहोवा’, ’अल्लाह’, ’मैं’ तथा ’ईश्वर’ धर्म तथा अध्यात्म का सारतत्व है ।
आर्ष-अङ्गिरा / आर्ष-अङ्गिरस (Arch-Angel) जाबालि ऋषि (Gabriel) ने इसका ही उपदेश यहूदी संप्रदाय के प्रथम-पुरुष मूसा (Moses) को दिया, जिसका सीधा तात्पर्य (और व्याकरण के अनुसार अर्थ भी) वही है जिसे हिब्रू भाषा में ’यह्व’ अथवा ’यॉट्-हे-वौ-हे’(Y-H-V-H) से व्यक्त किया जाता है ।
निश्चित ही इसका उल्लेख ’यह्वः’ तथा ’यह्वी’ के रूपों में ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर बार बार पाया जाता है । Moses को पर्वत पर झाड़ियों में जिस प्रकाश / अग्नि के दर्शन हुए, ऋग्वेद में उसी अग्नि के ’यह्वः’ तथा ’यह्वी’ के उल्लेख से भी इसमें संशय नहीं हो सकता कि अग्नि ही वह दिव्य सत्ता है जिसका संकेत स्थूल अग्नि के माध्यम से Moses को इंगित किया गया । यहूदी (हिब्रू बाइबिल) के अनुकरण से ही ईसाई बाइबिल (संहिता) अस्तित्व में आया और (जैसा कि पहले कहा गया), जहाँ ’मैं’ के रूप में ’यहोवा’ / Jehovah का वर्णन ’उत्तम पुरुष एकवचन संज्ञा’ ('I') की तरह पाया जाता है ।
इन्हीं दो बाइबिल के अनुकरण से इस्लामी क़ुरान को उसका वर्तमान प्रचलित स्वरूप प्राप्त हुआ ।
क़ुरान के अध्याय 14 खण्ड (अल् इस्र / Exodus) में इसी प्रसंग का संक्षिप्त वर्णन है, जिसका बाइबिल में यह वर्णन पाया जाता है कि किस प्रकार यहूदी कबीले को मिस्र से बहिष्कृत होने के बाद Moses के नेतृत्व में अपने राज्य की खोज करते समय आर्ष-अङ्गिरा / आर्ष-अङ्गिरस (Arch-Angel) जाबालि ऋषि (Gabriel), इन्द्र (Metatron) और अग्नि (Light), शिव के ज्योतिर्लिङ्ग के दर्शन तथा सहायता मिली । वास्तव में ’मिस्र’ / Egypt तथा ’इस्र’ / Isra क्रमशः महेश्वर एवं ईश्वर के ही सज्ञात (cognates) हैं ।
इस ’इस्र’ / Isra के भी पुनः दो रूप हैं :
एक का वर्णन वाल्मिकी-रामायण में एक अत्यन्त पराक्रमी राजा ’इल’ के रूप में भगवान् श्रीराम ने कथा द्वारा अपने अनुज श्री लक्ष्मण से किया है ।
कहने की आवश्यकता नहीं, कि वहाँ राजा ’इल’ को संपूर्ण पृथ्वी का एकमात्र ईश्वर कहा गया है । आर्ष-अङ्गिरा / आर्ष-अङ्गिरस (Arch-Anjel) जाबालि ऋषि (Gabriel) ने ’ईश्वर’ का वर्णन जिस रूप में Moses से किया वह वही आध्यात्मिक ’ईश्वर’ है जिसे यहूदी परंपरा में ’यहोवा’/ 'Jehovah' कहा गया ।
इसे ही उस दिव्य सत्ता (परमेश्वर) का एकमात्र ’नाम’ कहा गया है ।
बृहदारण्यक उपनिषद् में ’अहम् नाम अभवत्’ का उल्लेख स्पष्ट प्रमाण है कि ’अहम्’ / ’मैं’ / "I AM THAT I AM" ही एकमात्र परमेश्वर है ।
’ईसर’, ’इस्र’, ’अल्-इस्र’, (इस्र-आलय -इसरायल / Israel) उसी ’ईश्वर’ के लोकभाषाओं में प्रचलित हुए पर्याय हैं । यही ’ईश्वर’ दक्षिण भारत में भगवान् शिव के रूप में आराध्य और पूज्य है, तो इसे ही मालवा, निमाड़ तथा ब्रजभूमि तक में ’ईसर’ एवं ’ईसुर’ के रूप में श्राद्धपक्ष के दिनों में लोक में प्रचलित परंपराओं में ’संजा’ के साथ देखा जा सकता है ।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ’संजा’ का उद्भव ’सन्ध्या’ में देखते हैं किन्तु स्कन्द-पुराण में जिस संज्ञा का वर्णन सूर्य की पत्नी के रूप में पाया जाता है वह अधिक ग्राह्य है । उसी सूर्य-पत्नी संज्ञा ने सूर्य के ताप से संत्रस्त होकर अपनी एक प्रतिमा छाया निर्मित की और उसे सूर्य के पास छोड़ते हुए यह कहकर पिता (विश्वकर्मा) के घर चली गई कि जब तक तुम पर अत्यन्त विपत्ति न आ जाए तब तक यह रहस्य सूर्यदेव पर खुलने मत देना । सूर्य और संज्ञा से ही यमराज, वैवस्वत् मनु एवं अश्विनौ (अश्विनीकुमार) / Equinox का जन्म हुआ । यह न केवल पौराणिक वर्णन बल्कि खगोल-विज्ञान का सत्य भी है कि अश्विनौ (अश्विनीकुमार) / Equinox - (Equin-oxen) पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा-पथ पर स्थित दो बिन्दु-युग्मों का नाम है जिसे अंग्रेज़ी में Equinox / इक्विनॉक्स तथा Solstice सोल्स्टिस् कहा जाता है । सूर्य से ही ’सौर’ तथा ’सोल’, ’सोलर’ तथा ’सोल्स्टिस्’ 'Solomon', ’सौरमान’, ’सोलोमन’,'सुलेमान’ -- शब्द बने और अश्विनौ या अश्विन्-ऊक्षिण से ’इक्विनॉक्स’/ Equinox बने; -जो दो विषुवों (Equinox तथा मकर और कर्क-संक्रान्तियों (Solstice) के रूप में वेद में वर्णित हैं ।
’अल् आ ह’ तथा ’अल् आ ह उ’ एवं ’अल् आ ह ऊ’, ’अल् आ ह ऊऽ’, ’अल् आ ह ऊऽऽ’ इत्यादि की विवेचना भी वैदिक ऋचा, मन्त्र, नाम आदि के रूप में की जा सकती है । इस प्रकार ’अल् आ ह’ तथा ’अल् आ ह उ’ एवं ’अल् आ ह ऊऽ’ एवं ’अल् आ ह ऊऽऽ’ ईश्वर के ही नाम, मन्त्रात्मक स्वरूप, सूक्ष्म आधिदैविक प्रतिमा (विश्व) तथा स्थूल आधिभौतिक प्रतिमा (दृश्य जगत्) भी हैं ।
’अल्’ शब्द वैसे भी व्याकरण सम्मत ’प्रत्याहार’ भी है जिसका अर्थ वही है जिसे अंग्रेज़ी में ’ऑल’ / 'All' से व्यक्त किया जाता है । ’अलं’ संस्कृत अव्यय पद है जिसका प्रयोग पूर्ण, पूर्ण करने के अर्थ में किया जाता है । अरबी भाषा में यही ’अल्’- ’आर्टिकल’ / उपपद एवं उपाधि की तरह प्रयुक्त होता है  । ’आलम’ शब्द को इसी प्रकार ’स्थिति’ या ’संसार’ ’दुनिया’ के पर्याय की तरह प्रयुक्त किया जाता है ।
संक्षेप में :
यहूदी, ईसाई तथा इस्लाम परंपराओं में ’यहोवा’/ 'Jehovah', ’मैं’ नामक ’God’, तथा ’अल्लाह’ को व्यक्तिवाचक सत्ता के रूप में स्वीकार किया गया जो संसार का एकमात्र स्वामी है और संसार को बनाता-मिटाता है । इससे ’एकेश्वरवाद’ का उद्भव हुआ, जिसे दुर्भाग्यवश ’पूर्ण सत्य’ मान लिया गया ।
’इल’ ऐसा ही एक राजा अवश्य था जो संपूर्ण पृथ्वी का एकमात्र ’ईश्वर’ था, जिसका वर्णन वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग 87 में विस्तार से किया गया है, किन्तु वह एकमात्र ’ईश्वर’ इला (पृथ्वी) का पति था / है, न कि परमेश्वर । परमेश्वर, महेश्वर, ईश्वर, परमात्मा तो वह है जिसे बाइबिल में ’यहोवा’ / 'Jehovah' तथा क़ुरान में ’अल्लाह’ कहा गया है । यह सृष्टिकर्ता और सृष्टि भी है । वही,  जिसे बृहदारण्यक उपनिषद् में ’अहम्’ नाम प्राप्त हुआ, जिसका वर्णन गीता में इस प्रकार है :
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥२०
(अध्याय १०)     
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अधिकारी और पात्र

कापालिक
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हातिम ताई का अधिकांश बचपन और कैशोर्य कापालिकों के देश में व्यतीत हुआ था ।
बचपन से वह इस अर्थ में ब्रह्मचारी था कि उसकी सभ्यता और संस्कृति में काम-भावना का संबंध दैहिक वृत्ति तक सीमित था । इस अर्थ में विवाह के बाद उसकी पत्नी ने उसके पुत्र-पुत्रियों को जन्म दिया किन्तु उसने कभी काम-भावना को मन का विषय नहीं बनाया । न तो वह काम-अनुभव को स्मृति का और न कल्पना का साधन बनाता था । हमें यह शायद असंभव जान पड़े किन्तु इसका एक कारण यह भी था कि कापालिकों की सभ्यता-संस्कृति में ईश्वर की पूजा भी लिंग-स्वरूप में की जाती थी इसलिए इसे उपहास, निन्दा या मनोरंजन की दृष्टि से देखने की कल्पना तक कर पाना उनके लिए असंभव था ।
वे सभी पुरुष एवं स्त्रियाँ इस दृष्टि से वैसे भी एक-पत्नीव्रत या एक-पतिव्रत का पालन करते थे कि पति या पत्नी वंशवृद्धि का साधन है, और भले ही एक पुरुष की एक से अधिक पत्नियाँ हों या एक स्त्री के एक से अधिक पति हों, विवाहेतर काम-संबंध रखना उनके लिए अकल्पनीय ही था ।
इस प्रकार कामवृत्ति का ऐसा संस्कार उनके लिए वैसा ही साधारण था जैसे भूख-प्यास, शीत-उष्ण, पीड़ा अथवा सुख के इन्द्रिय-भोग आदि से गुज़रना और निवृत्त होने के बाद मनोवृत्ति के रूप में उस बारे में कोई कल्पना या स्मृति तक न पैदा हो । हम कह सकते हैं कि यद्यपि उनका शैक्षिक विकास अल्पप्राय था, वे न तो पढ़े लिखे थे, न साहित्य या कलाओं में दक्ष थे, वे तो बस प्रकृति-प्रदत्त आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनायास उस कर्म में प्रवृत्त होते थे जिसकी प्रवृत्ति उस समय उनके शरीर में सक्रिय होती थी ।
एक दृष्टि से वे गीता के उस श्लोक की शिक्षा पर आचरण करते थे, जिसमें कहा गया है :
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥२२
(अध्याय १४)
इसलिए यद्यपि विवाह नामक संस्था उनके समाज में अवश्य थी किन्तु यह नैतिक-अनैतिक के कठोर नियमों से बँधी नहीं थी ।
शायद ही कोई पुरुष किसी अपनी या पराई स्त्री को भोग की वस्तु की तरह देखता, ऐसा विचार, कल्पना करता था, और न ही कोई स्त्री किसी अपने या पर-पुरुष को इस प्रकार देखती, ऐसा विचार या कल्पना करती थी ।
बहुत संक्षेप में वे काम के मानसिक-स्वरूप से जकड़े हुए न थे । शायद कभी दुर्घटनावश ऐसी स्थिति बन जाती जब इस प्रकार के संयोग घटित हो भी जाते थे तो वे दुःस्वप्न समझकर उसे बस हृदय से भूल जाते थे । न उसकी चर्चा करते, न निन्दा, न उसमें किसी प्रकार का गौरव अनुभव करते, न उसे महिमामण्डित करते, न किसी से ईर्ष्या, प्रतिशोध या अपराध या अपमान अनुभव करते ।
आज के युग में यह कुछ अटपटा और शायद असंभव भी लग सकता है किन्तु जब हम हातिम ताई के उन अनुभवों के बारे में जानेंगे जो उसे कठोलिकों की सभ्यता और संस्कृति में रहते हुए प्राप्त हुए तो हमें स्पष्ट हो जाएगा कि कठोलिकों की सभ्यता और संस्कृति की प्रेरणाएँ किस प्रकार कापालिकों की प्रेरणाओं से कुछ भिन्न थीं ।
कठोलिक
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जैसा कि गिरीश (ग्रीस) देश में ऋषि आचार्य शुक्र के कुल (भृगु-कुल) के प्रभाव में समाज और सभ्यता तथा संस्कृति अपने विकास के चरम पर थी, यह समझना कठिन न होगा कि कठोलिक मनोवृत्ति से उसी प्रकार का व्यवहार करते थे जैसा कि कापालिक शारीरिक वृत्तियों के संबंध में करते थे । उनका भी अलिखित विधान यही था जिसका प्रयोग वे मन पर करते थे । बिल्कुल वही प्रेरणा, जिससे कापालिक देह के स्तर पर भी आचरण करने मात्र से धर्म के अनुकूल चलते हुए परम श्रेयस् (पुरुषार्थ) सिद्ध करते थे । वही प्रेरणा जो मानों उन्हें गीता के इसी श्लोक से मिलती हो ।
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥२२
(अध्याय १४)
इस प्रकार देह की वृत्तियों को मन का विषय न बनाते हुए, उन वृत्तियों की निन्दा या प्रशंसा न करते हुए, उनका उपहास, अपराध या गौरव-बोध अनुभव न करते हुए, शरीरधर्म की और मनोधर्म की बाध्यताओं तथा मर्यादाओं को समझकर विवेकपूर्वक वे समस्त मनोवृत्तियों से उदासीन रहते हुए आत्मधर्म की जिज्ञासा और अनुसंधान करते थे ।
इस प्रकार शरीरधर्म और मनोधर्म के मध्य किसी प्रकार की टकराहट प्रायः नहीं होती थी ।
गीता के अध्याय् १४ के उपरोक्त उल्लिखित श्लोक २२ के तुरंत बाद का ही श्लोक इस प्रकार है :
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥२३
जिसकी भूमिका इस अध्याय से पूर्व के अध्याय ९ के निम्नलिखित श्लोक में भी दृष्टव्य है:
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं  तेषु कर्मसु ॥९ 
(अध्याय ९)
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किन्तु कठोलिकों की परंपरा इस दृष्टि से कापालिकों से भिन्न थी कि वे उस निवृत्ति-मार्ग पर चलते हुए आत्मानुसन्धान करते थे जिससे उनके पूर्व-पुरुष आचार्य
उशना वा वाजश्रवा (उशन् ह वाजश्रवसः सर्ववचसं ददौ -कठोपनिषद्)
 ने अपना सब कुछ विश्वजित यज्ञ के अनुष्ठान के समय दान कर दिया था । और तब उनके पुत्र नचिकेता ने प्रश्न किया था :
"फिर तो आप मेरा भी दान कर देंगे?"
उसके पिता जानते थे कि नचिकेता ने उसके पुत्र के रूप में इस मृत्युलोक में जन्म लिया और जिस दिन भी विधाता ने लिखा होगा, वह उससे पूर्व या वह स्वयं उसके बाद मृत्यु के अधिष्ठाता देवता यम के लोक को प्राप्त होगा । इस अटल सत्य को जानते हुए ही उसने पुत्र से कहा :
"मृत्यवे त्वा ददामीति ॥"
(मृत्युवे त्वा ददामि इति) 
तात्पर्य यह कि ’यह घर, स्त्री, पुत्र, धन, ज्ञान, इत्यादि ’मेरा है’, इस प्रकार का ज्ञान प्रथमतः ’मेरे द्वारा अपने-आपके ज्ञान’ के होने के उपरान्त ही घटित होता है ...’ इस सरल तथ्य के प्रति जागृत होकर विवेकपूर्वक उसने यमराज को वह (पुत्र) दान कर दिया अर्थात् लौटा दिया ।
कापालिक केवल ईश्वर-समर्पण बुद्धि से ’प्रवृत्ति-मार्ग’ पर चलते हुए, सहज और अनायास जीते हुए परम-श्रेयस् की सिद्धि कर लेते थे, जबकि कठोलिक अपेक्षाकृत भिन्न रीति से निवृत्ति-मार्ग (नेति-नेति) पर चलते हुए आत्मानुसन्धान करते थे ।
कठोपनिषद् अवश्य ही उनके सिद्धान्त का आधारभूत ग्रन्थ था ।
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गरुड़ ने हातिम ताई को इस प्रकार इसीलिए चुना कि हातिम ताई दोनों प्रकार की शिक्षाओं के लिए पूर्ण अधिकारी और पात्र था ।
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Tuesday, 9 July 2019

रामः शस्त्रभृतामहम्

गीता 
अध्याय 10 
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ।।31
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शांकरभाष्य में दिया गया अर्थ :
पवित्र करनेवालों में वायु और शस्त्रधारियों में दशरथपुत्र राम मैं हूँ, मछली आदि जलचर प्राणियों में मकर नामक जलचरों की जाति-विशेष मैं हूँ, स्रोतों में --नदियों में मैं जाह्नवी -- गङ्गा हूँ।
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एक शस्त्रभृत राम और हैं जिन्हें विष्णु का पाँचवा 'अवतार', 'भार्गव' कहा गया है। 
वे भी शस्त्रभृत (शस्त्रधारी) अवश्य हैं।
रोचक तथ्य यह है कि भगवान् परशुराम एक ओर भृगु-कुल में उत्पन्न होने से ब्राह्मण वर्ण के हैं, जिन्होंने पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियों से रहित कर दिया जबकि भगवान् श्रीराम ने क्षत्रिय-वंश में जन्म लेकर राक्षस-कुल के ब्राह्मण वर्ण के राजा रावण को युद्ध में परास्त किया।
आज भारत में आर्य-द्रविड, हिन्दू-मुसलमान को परस्पर भिन्न संस्कृतियों, सभ्यताओं (और धर्म) का भी कहकर राष्ट्रीय मानस को विखंडित करने का षड्यंत्र चल रहा है। आर्य-द्रविड सभ्यताओं में भिन्न-भिन्न परंपराएँ अवश्य हैं किन्तु वे सनातन-धर्म के ही भिन्न भिन्न प्रकार हैं, - आर्य न तो नस्ल है न जाति । आर्य-अनार्य मनुष्यमात्र में सिर्फ उसकी श्रेष्ठता और सद्गुणों, या दुर्गुणों-अवगुणों से तय होता है।  
इसी प्रकार 'हिन्दू' शब्द को अपनी अस्मिता की पहचान माननेवाले इस तथ्य की जानबूझकर या प्रमादवश भी अवहेलना कर देते हैं कि यह शब्द मूलतः सनातन-धर्म के किसी भी ग्रन्थ में नहीं पाया जा सकता। यह शब्द तो भारत पर इस्लामी आक्रमण और आधिपत्य होने के बाद ही भारत के उन मूल निवासियों के लिए प्रचलित हुआ जो धर्म के रूप में सनातन-धर्म का पालन भिन्न-भिन्न रूपों में करते थे।
हिन्दू-मुसलमान के कृत्रिम विभाजन के बाद इस प्रकार धर्म के आधार पर मुसलमानों ने पाकिस्तान नामक एक इस्लामी देश बना लिया। अब विभाजित भारत जो अगर हिंदुस्तान होता, तो सिर्फ हिन्दुओं का ही होना चाहिए था, -न कि सेक्युलर / धर्मनिरपेक्ष। इस सरल से तथ्य को भीरुता या तुष्टिकरण आदि के कारण अब तक की सरकारें दबाती-छिपाती रहीं जिसमें 'वोट-बैंक' की भी बहुत बड़ी भूमिका थी।
इस प्रकार 1947 के बाद से भारत में उस वर्ग के अधिकारों का लगातार हनन होता रहा जो अपने-आपको 'हिन्दू' कहता है। साथ ही कुछ ऐसे लोग भी उभर आए जिन्होंने ऐसे 'हिन्दुओं' को राजनैतिक दलों के रूप में संगठित किया और 'हिन्दू-राजनीति' की आधारशिला रख दी।
दूसरी ओर भारत के लगभग सभी मुसलमान इस प्रकार से 'हिन्दुओं' के विरूद्ध संगठित हो गए भले ही ऊपरी तौर से वे कांग्रेसी, कम्युनिस्ट, समाजवादी या मुस्लिम-लीग तथा विभिन्न क्षेत्रीय दलों के झंडे तले खड़े हुए हों।
आज भी इस प्रकार से लगभग सभी मुसलमान अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए 'धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार' को शस्त्र की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
'हिन्दुओं' में भी एक बड़ा विभाजन तब हुआ जब श्री बी.आर.आंबेडकर ने दलितों के लिए 'नवबौद्ध' आंदोलन प्रारम्भ किया। आज 'जय भीम'-'जय मीम' के नारे से दलितों को भ्रमित करनेवाले जानबूझकर भूल जाते हैं कि काश्मीर में बख़्शी, अब्दुल्ला और मुफ़्ती के शासन में मीम (मुस्लिम) ने दलित वाल्मीकियों को 35 A के ज़रिए किस प्रकार नागरिक और मूलभूत मानवीय अधिकारों से भी वंचित रखा। काश्मीरी पंडितों को 19 जनवरी 1990 से किस प्रकार काश्मीर से पलायन के लिए बाध्य किया क्रूरता से हत्याएँ और बलात्कार किए।
गाँधी और अम्बेडकर दोनों ही 'हिन्दू' शब्द से दिग्भ्रमित हुए और यह समझ ही न सके, कि मूलतः 'हिन्दू' अस्मिता या पहचान का न तो कोई ठोस या वास्तविक आधार है, न बुनियाद।
दूसरी ओर इसी हवा-हवाई शब्द 'हिन्दू' की रेतीली बुनियाद पर अनेक 'हिन्दू' राजनीतिक संगठन बने, खड़े हुए किन्तु उनमें से प्रत्येक केवल बचाव की मुद्रा में है क्योंकि 'हिन्दू' सहिष्णु है। 'हिन्दू' सतत संशयग्रस्त है। 
गीता में कहा गया है :
"... संशयात्मा विनश्यति।"
(अध्याय 4, श्लोक 40) 
इस्लाम को अपने लक्ष्यों के बारे में क़तई कोई संशय नहीं है। 
उनकी क़िताब का हर लफ़्ज़ उन्हें उनकी तात्कालिक और दीर्घकालिक रणनीति क्या हो, - इस बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है। इस प्रकार हिन्दू-मुसलमान का यह बेतुका संघर्ष पूरे राष्ट्र को टुकड़े-टुकड़े कर रहा है जिसका लाभ अंततः इस्लाम को ही होना है ऐसा कहना कोरी कल्पना नहीं है।
मुसलमानों से यह उम्मीद करना कि राष्ट्रहित को महत्व देकर वे इस्लाम की शिक्षाओं का पुनरावलोकन करें हमारी मूर्खता और बहुत बड़ी नासमझी भी होगी। क्योंकि उनकी शब्दावली में 'राष्ट्र' जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं, बस सिर्फ  'दार-उल-इस्लाम' या 'दार-उल-हर्ब' होता है।
इसलिए हिन्दू-राष्ट्र की बात करना बहुत बड़ी भूल है जो आत्मघात से कम कुछ नहीं है।
यदि इस आधार पर कोई संगठन खड़ा किया जाता है तो ऐसा संगठन बिखरा-बिखरा ही होगा क्योंकि उन्हें एकजुट बनाए रखने के लिए कोई सुनिश्चित, तय लक्ष्य कहीं नहीं है। "इस्लाम के वैश्विक-विश्वव्यापी अन्याय का विरोध" अवश्य ही ऐसा एक लक्ष्य हो सकता है, लेकिन उसके लिए 'हिन्दू' संगठन रूपी कोई फ़्रेमवर्क / ढाँचा बनाने का मतलब होगा अपने हाथों अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार लेना।
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वैनतेयश्च पक्षिणाम्

श्रीमद्भग्वद्गीता (śrīmadbhagvadgītā )
अध्याय 10
प्रह्लादस्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥30
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उपरोक्त श्लोक का अंग्रेज़ी लिप्यंतरण, और हिंदी तथा अंग्रेज़ी अर्थ,
मेरे गीता-सन्दर्भ ब्लॉग में देखा जा सकता है।
हातिम ताई ने स्मरणपूर्वक 'नाम' अर्थात् 'देवता' अर्थात् 'मन्त्र' अर्थात् 'प्रतिमा' का शुद्ध रूप इस प्रकार समझ लिया और उसका जप करने लगा कि कापालिकों की परंपरा का उच्चारण उसे विस्मृतप्राय हो गया ।
इसी बीच एक दिन उसे पुनः स्वप्न में गरुड़ के दर्शन हुए जिसने उसे मानवोचित वाणी में सूचना दी कि अब पुनः एक बार मैं तुम्हें लेने आया हूँ ।
इस बार गरुड़ अत्यन्त तेजस्वी आकृति में दिखाई दे रहा था ।
"वैनतेयोऽस्मि"
कहकर गरुड़ उड़ गया और उसी समय हातिम ताई की नींद भी खुल गई किन्तु वह स्वप्न भला वह कैसे भूल सकता था ।
दूसरे दिन उसने आचार्य से स्वप्न कह सुनाया ।
तब आचार्य ने उससे कहा :
"पूर्व-जन्म में अरजा का नाम विनता था जिसका पुत्र था गरुड़ । विनता का पुत्र होने से उसे वैसे ही ’वैनतेय’ नाम प्राप्त हुआ, जैसे इतरा के पुत्र को ’ऐतरेय’ नाम प्राप्त हुआ था । जैसे ऐतरेय में अत्यन्त वैराग्य और मुमुक्षा थे, वैसे ही वैनतेय भी अत्यन्त वैराग्य और मुमुक्षा से युक्त था ।
विनता और दोनों ही को प्रारब्धवश पक्षी-योनि में जन्म लेना पड़ा क्योंकि दोनों में प्राणत्व (वायु) प्रधान था ।
विनता किसी पूर्व-जन्म में हमारे (भृगु) वंश में ही अरजा के नाम से उत्पन्न हुई थी और बाद में उसकी प्रतिष्ठा नभ की तारका के रूप में आचार्य शुक्र के लोक में हुई ।
[इस प्रकार विनता और वीनस (Venus) का, तथा वैनतेय और फ़ीनिक्स (Phoenix) का साम्य दृष्टव्य है।]
प्राण-तत्व होने से उनका संपूर्ण नाश नहीं होता किन्तु प्रकृति और आकृति अवश्य बदलती रहती है ।
वही वैनतेय तुम्हें स्वप्न में दिखाई दिया । इसका फल यह है कि मृत्युलोक में तुम्हारी आयु हो जाने पर तुम्हें शेषशायी भगवान् विष्णु का लोक प्राप्त होगा । वही तुम्हें वहाँ ले जाएगा ।
वैसे भी संसार के अनित्य सुखों से हातिम ताई का मन भर चुका था इसलिए यह सुनकर वह और अधिक ईश्वर-स्मरण (नाम-स्मरण) करने लगा ।
एक दिन इसी प्रकार नाम-स्मरण करते हुए वह इतना तन्मय हो गया कि उसे देह और संसार का भान तक न रहा तभी उसे देह और संसार के भान से रहित लोक में गरुड़ की आकृति का एक तेज-पुञ्ज दूर से अपनी ओर आता दिखलाई दिया । हातिम ताई उस तेजपुञ्ज में समाकर इस लोक से विदा हो गया ।
तब आचार्य ने उसे समाधि दी, क्योंकि उसे जलाया नहीं जा सकता था और ऐसा करना शास्त्र का भी उल्लंघन होता ।
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हातिम ताई का वैदिक देवता, नाम, मन्त्र, प्रतिमा का वैदिक रूप :
अल् आ ह ।
था, जो वैदिक ऋचा भी हो सकता है । यह वैदिक मन्त्र भी है, और उस ’वैदिक-देवता’ का नाम भी जिसकी प्रतिमा का वर्णन वैसे तो किया जा सकता है किन्तु वह प्रतिमा स्थूल रूप से दृश्य नहीं हो सकती । यद्यपि सूक्ष्म-स्तर पर वह इन्द्रियगम्य, मनोगम्य और बुद्धिगम्य भी अवश्य है । जिसे कापालिकों ने किन्हीं कारणों से बदलकार ’अल् आ ह’ तथा ’अल् आ ह उ’ कर दिया था, कठोलिक आचार्य की परंपरा में जिसका विधान और प्रयोजन कापालिकों के विधान और प्रयोजन से भिन्न है ।
’अल्’[अलोऽन्त्यस्य १/१/५२]
वैसे भी प्रत्याहार है जो ’अ’ से ’ह’ तक संपूर्ण वर्णों का संक्षेप है ।
पुनः उ वर्ण जो उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित तीनों प्रकार से उच्चारणीय है इसलिए भी इसका यहाँ सम्यक् प्रकार क्या होगा यह संशय भी है ही ।
ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः
(पाणिनीय -१/२/२७)
उपरोक्त मन्त्र भी यहाँ केवल वर्णों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है और इसे पढ़ने मात्र से इसका वास्तविक ध्वन्यात्मक  वैदिक उच्चारण क्या है
यह जान पाना या वैसा प्रयास करना भी मेरे अधिकार से परे है - यद्यपि मैंने इसे सुना अवश्य है ।
इसलिए भी वेद का अध्ययन और अध्यापन अधिकारी / पात्र द्वारा ही किया जाना चाहिए, न कि अनधिकारी / अपात्र द्वारा ।
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टिप्पणी :
यह कथा  बाइबिल और क़ुरान के समय से पूर्ववर्ती काल की है और उस परिप्रेक्ष्य में नहीं है ।
कृपया इसे बाइबिल और क़ुरान से जोड़कर न देखें।
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