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Monday, 27 February 2023

।।तस्य वाचकः प्रणवः।।

Patanjal Yoga Sutra

Samadhipad 28-29-30-31

पातञ्जल योगसूत्र समाधिपाद २८-२९-३०-३१

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The last Aphorism :

तस्य वाचकः प्रणवः।।२७।।

ॐ has been said to be His name.

Whose name? 

Of The ईश्वर / Ishwara, Who in the Aphorism 24 has been described as :

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः।।२४।।

The Supreme Being Who Alone Is the Master of the Existence and the word : ईश्वर / Ishwara, is not  His name, but His role.

One can't address or approach Him calling by this word. But to address Him one can pronounce this single syllable word ॐ.

Mandukya Upanishad, -a short text points out to the deeper significance of this word, - the single syllable  . The same is known as प्रणव / PraNava.

According to

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ८

Shrimadbhagvadgita Chapter 8 :

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये।।११।।

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।।

मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।१२।।

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।।

यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।।१३।।

This single letter-word is therefore is His name and when this is pronounced, He is invoked. ॐ therefore works as a sacred incantation to call and address Him, Who is ईश्वर / Ishwara as defined in the Aphorism 24 above.

The above-mentioned Stanza 11, 12 and 13 from the श्रीमद्भगवद्गीता / Shrimadbhagvadgita  suggest how one can attain Him at the time of death.

But while alive one can sure meditate upon this प्रणवाक्षर / अक्षर-ब्रह्म / ॐ.

तज्जपस्तदर्थभावनम्।।२८।।

The repetition of this sacred letter with due regard and focused attention is called :

जप / japa. 

How it works has been elaborated in the : 

शिव अथर्वशीर्ष / Shiva Atharva Sheersha --

अथ कस्मादुच्यत ओङ्कारो?

यस्मादुच्चार्यमाण एव प्राणानूर्ध्वमुत्क्रामयति तस्मादुच्यते ओङ्कारः।।

अथ कस्मादुच्यते प्रणवः?

यस्मादुच्चार्यमाण एव ऋग्यजुःसामाथर्वाङ्गिरसं प्रणामयति नामयति च तस्मादुच्यते प्रणवः।।

This is how the जप / japa / repetition of is helpful in The Realization of  ईश्वर / Ishwara.

ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च।।२९।।

ततः प्रत्यक् चेतना-अधिगमः अपि अन्तराय-अभावः च।। 

This results in making the mind introvert and turning the attention focused on the Self / ब्रह्म, that is the source of all consciousness. This again helps in removing the obstacles in the practice. 

What Obstacles? 

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्यविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः।।३०।।

(व्याधि-स्त्यान-संशय-प्रमाद-आलस्य-अविरति-भ्रान्तिदर्शन- अलब्धभूमिकत्व-अनवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपाः ते अन्तरायाः।।

व्याधि - disease, illness,

स्त्यान - √स्त्यै -- 'शब्दसंघातयोः' -- स्त्यायति, स्त्यान,

To become accumulated, thick, collected, coagulated, mental blocks,

संशय - doubt,

प्रमाद - In-attention / carelessness,

आलस्य - laziness,

अविरति - inconsistency 

भ्रान्तिदर्शन - delusion,

अलब्ध-भूमिकत्व- not getting firmly settled,

अनवस्थितत्व - irregularity,

दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः।।३१।।

(दुःख-दौर्मनस्य-अङ्मेजयत्व-श्वासप्रश्वासाः विक्षेपसहभुवः।।)

Not only the above, but other also as the 

दुःख - sadness,

दौर्मनस्य - melancholy,

अङ्गमेजयत्व - trepidation,

श्वासप्रश्वासाः - uneven breathing,

विक्षेपसहभुवः - are the troubles that are some  other obstacles.

All these above are :

अन्तरायाः / obstacles

in the practice of Yoga.

The जप / japa removes all these obstacles and the aspirant is immensely benefitted.

To be continued. 

***



  



Monday, 20 February 2023

कर्म-योग क्या है?

चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये।।

वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किञ्चित्कर्मकोटिभिः।।११।।

(विवेकचूडामणि)

श्री रमण महर्षि कृत उपदेश-सार नामक ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही  कर्म-योग के साधन के महत्व का उल्लेख किया गया है, क्योंकि कर्म यद्यपि जड है, और कर्ता चेतन, किन्तु कर्म के महत्व के बारे में जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ३ में कहा गया है :

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।।

न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।।४।।

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।।

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।५।।

और पुनः अध्याय ४ में :

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।१७।।

इसलिए कर्म, विकर्म और अकर्म स्वरूपतः क्या हैं, इसका बोध होने पर कर्म का अनुष्ठान भी इस प्रकार से किया जा सकता है, कि उससे पूर्व की कर्मश्रँखला का अन्त हो और कर्म नए बन्धन का कारण भी न बन सके।

इसी दृष्टि से और चूँकि सामान्य मनुष्य कर्म की ही भाषा मानता और जानता है, इसलिए भी श्री रमण महर्षि ने इस ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है ताकि योग से संबंधित अधिक कठिन तत्वों को क्रमशः समझा जा सके।

यहाँ कुछ श्लोक हैं, अधिक और विस्तृत जानकारी के लिए मेरे श्री रमण वाणी ब्लॉग का अवलोकन कर सकते हैं।

उपदेश-सारः

कर्तुराज्ञया प्राप्यते फलम्।।

कर्म किं परं कर्म तज्जडम्।।१।।

कृति महोदधौ पतनकारणम्।।

फलमशाश्वतं गतिनिरोधकम्।।२।।

ईश्वरार्पितं नेच्छया कृतम्।।

चित्तशोधकं मुक्तिसाधकम्।।३।।

कायवाङ्मनः कार्यमुत्तमम्।।

पूजनं जपश्चिन्तनं क्रमात्।।४।।

जगत ईशधीयुक्तसेवनम्।।

अष्टमूर्तिभृद्देवपूजनम्।।५।।

उत्तमस्तवादुच्चमन्दतः।।

चित्तजं जपध्यानमुत्तमम्।।६।।

आज्यधारया स्रोतसा समम्।।

सरलचिन्तनं विरलतः परम्।।७।।

भेदभावनात्सोऽमित्यसौ।।

भावनाऽभिदा पावनी मता।।८।।

भावशून्य सद्भावसुस्थितिः।।

भावनाबलाद् भक्तिरुत्तमा।।९।।

हृत्स्थले मनःस्वस्थता क्रिया।।

भक्तियोगबोधाश्च निश्चितम्।।१०।।

इसे हम पातञ्जल योग के साधनपाद के प्रथम सूत्र के सन्दर्भ में भी देख सकते हैं :

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः।।१।।

किन्तु भक्ति भी मूलतः चूँकि तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान पर ही आश्रित है, इसलिए यह भक्ति और भक्तियोग तथा बोध अर्थात् ज्ञानयोग भी है।

मन का हृदय में सुस्थिर होना ही लक्ष्य है । इसे ही श्री रमणगीता अध्याय २ में इस प्रकार से व्यक्त किया गया  है :

हृदयकुहरमध्ये केवलं ब्रह्ममात्रम्

ह्यहमहमिति साक्षादात्मरूपेण भाति।।

हृदि विश मनसा स्वं चिन्वता मज्जता वा।।

पवनचलनरोधादात्मनिष्ठो भव त्वम्।।२।। 

दूसरी ओर श्रीमद्भगवदगीता अध्याय २ में भी स्पष्टतः कहा गया है कि कर्म ज्ञान से कम महत्वपूर्ण है :

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।४९।।

जिसका तात्पर्य यही कि जब फल की कामना रखते हुए कोई कर्म किया जाता है, तो ऐसे कर्म की बुद्धियोग से तुलना नहीं की जा सकती। 

और कर्म का इतना महत्व तो है ही, कि वह हमें आध्यात्मिक मार्ग पर चलने में बाधक न होकर अनुकूल हो। 

बुद्धियोग को जानने से पहले "वृत्ति" का क्या है, इसे समझना आवश्यक है। अगले पोस्ट में इसी पर विवेचना की जाएगी ।।

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Tuesday, 24 January 2023

भाग्यं फलति सर्वत्र

न च विद्या न पौरुषम्।। 

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ठीक 20 वर्ष हुए जब मैं उस व्यक्ति से पहली बार मिला था। वह बहुत सक्रिय (dynamic) था, और भाग्य जैसे हर किसी के साथ खेलता रहता है, उसके साथ भी खेलता रहा है।

भाग्य अर्थात् अदृष्टपूर्व। प्रत्यक्ष अनुमान और आगम इन तीनों ही उपायों से उसे देखा या जाना नहीं जा सकता। वह कहानी याद आ रही है, जिसमें एक गरीब मनुष्य का भाग्य उससे खेल रहा होता है, और सोचता है कि उसकी सहायता कैसे कर दूँ । जब वह एक पुल से गुज़रनेवाला होता है, तो उससे दो मिनट पहले ही वह किसी दूसरे आदमी को उस पुल से जाने के लिए प्रेरित करता है। उस दूसरे आदमी की जेब में एक थैली में बहुत रुपये होते हैं, जो कि उस पुल पर गिर जाते हैं। उसके पीछे एक मिनट बाद ही गरीब व्यक्ति उस पुल पर आता है, जिससे चन्द कदम ही दूर रास्ते पर वह थैली पड़ी होती है। गरीब आदमी यह सोचने लगता है कि अगर मैं कभी अन्धा हो गया, तो सड़क पर कैसे चलूँगा! यह सोचकर वह आँखें बन्द कर लेता है और कुछ कदम चलकर देखता है और इसलिए उस थैली पर उसकी नजर ही नहीं जाती। तब तक उस दूसरे आदमी को पता चल जाता है कि उसकी थैली शायद रास्ते पर कहीं गिर गई है, वह तुरंत उसे ढूँढने के लिए पुल पर पीछे की ओर लौट जाता है, जहाँ पुल पर पड़ी उसकी थैली उसे दिखाई देती है। वह भगवान को धन्यवाद देकर उस थैली को उठाकर ठीक से जेब में रख लेता है। 

वर्ष 2019 का आगमन हुआ और सारी दुनिया में बहुत से लोग अपनी जगह अटक गए और बहुत से दूसरे सैकड़ों मील पैदल  चलकर अपने घर या गाँव पहुँच गए। कुछ बेचारे कहीं और ही, जहाँ जाने की उन्होंने कभी स्वप्न में भी कल्पना तक न की थी।

ज्योतिष के नौ ग्रहों में दो ग्रह राहु और केतु भाग्य की ही तरह अदृष्ट हैं। राहु बेचारा कितना भी सोच-विचार कर ले, कहीं आ या जा नहीं सकता जबकि केतु कितना भी भटकते रहे, सोचना उसके लिए संभव ही नहीं होता। वैसे ये दोनों ग्रह एक ही राक्षस के सिर और धड़ हैं, ऐसा कहा जाता है। और ऐसा भी वर्णन है कि जरा नामक राक्षसी के एक पुत्र का जन्म सिर और धड़ इन दो टुकड़ों में मृतक के रूप में हुआ था और उसने उन्हें जोड़कर जीवित कर दिया और उसे वरदान दिया था कि जब तक दोनों टुकड़े अलग न हो जाएँगे तब तक उसकी मृत्यु नहीं होगी। यह मगध का राजा था, इसकी मृत्यु तब तक नहीं हुई जब तक कि भगवान् श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से इसके सिर को काटकर धड़ से अलग नहीं कर दिया।

तो भाग्य के कार्य करने का यही तरीका है। 2019 से अब तक मैं भी इसी भाग्य के फल से एक स्थान पर फँसकर रह गया हूँ और भाग्य से अब जब वह व्यक्ति 20 साल बाद पुनः मिला तो देखता हूँ कि वह चाहकर भी किसी एक जगह शान्तिपूर्वक नहीं टिक पा रहा है।

जरासंध और श्रीकृष्ण से श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक याद आए।

श्रीमद्भगवद्गीता के ये दो श्लोक शायद हर किसी ने पढ़े या सुने तो होंगे ही --

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

दूसरा इससे भी अधिक प्रसिद्ध दूसरा श्लोक इस प्रकार से है :

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफल हेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

फिर :

"विनाशकाले विपरीतबुद्धिः"

यह भी इतना ही प्रसिद्ध है।

मनुष्य भाग्य को बदलना और जानना भी चाहता है। इससे यही लगता है कि वह भाग्य को जानता ही नहीं । और अगर जानता ही नहीं तो उसे बदलने का विचार क्या हास्यास्पद ही नहीं है! 

कोई भी मनुष्य कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो, कार्य-कारण और कर्तृत्व बुद्धि पर उसका विश्वास अटूट होता है। जीवन में वह धन, यश, सफलता और भोग प्राप्त करने के लिए लालायित रहता है। किन्तु उसका ध्यान भूले से भी कभी इस प्रश्न पर नहीं जाता है कि क्या इन सबको प्राप्त कर लेने पर वह सुखी होगा? और सुखी होने पर क्या दूसरी अनेक चिन्ताओं और समस्याओं से उसे छुटकारा मिल जाएगा! तब भी क्या फिर वह शान्ति ही प्राप्त करने का इच्छुक नहीं होगा? किन्तु जब तक भाग्य उसे भटकाता रहता है, शान्तिपूर्वक रह पाना बहुत मुश्किल है।

बीस साल पहले उस व्यक्ति के प्रति मेरी जो सहानुभूति थी वह आज भी वह वैसी ही है, किन्तु क्या मैं उसके भाग्य को बदल सकता हूँ! मैं तो अपने ही भाग्य को भी कहाँ बदल सकता हूँ! और मैं अपने भाग्य को जानता ही कहाँ हूँ, तो उसे बदल पाने के बारे में कुछ सोच पाना भी मेरे लिए कैसे मुमकिन है! तो फिर उसके या और किसी के भाग्य के बारे में कुछ कहने का सवाल ही कहाँ उठता है!

चलते चलते -- 

"तदात्मानं सृजाम्यहम् / तदा आत्मानं सृजामि अहं।"

में 'आत्मानं' और  'अहं' पद का प्रयोग लक्ष्यार्थ और वाच्यार्थ दोनों ही अर्थों में एक साथ हुआ है, इसलिए यह केवल भगवान् श्रीकृष्ण के ही नहीं प्रत्येक ही मनुष्य के संबंध में भी पूरी तरह से सुसंगत है। 

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