Showing posts with label हातिम ताई. Show all posts
Showing posts with label हातिम ताई. Show all posts

Tuesday, 28 September 2021

प्रत्यय और वृत्ति

मां तु वेद न कश्चन ।।

-----------©------------

यह काल्पनिक है या कि सत्य, मैं नहीं कह सकता, लेकिन जब मैं आँखें बन्द किए हुए कुर्सी पर बैठा हुआ था तब, जिसे ध्यान कह सकते हैं, वैसी किसी स्वप्न जैसी मनोदशा में यह मुझे प्राप्त हुआ था। और यह भी सच है कि तब मेरे मन में ध्यान करने का कोई संकल्प, प्रयास करने जैसा भी कुछ नहीं था। 

मैं किसी अन्धकारपूर्ण सुरंग में ऊपर ही ऊपर उठता चला जा रहा था और जैसे जैसे आगे बढ़ रहा था, मुझे ऊपर से आ रहा प्रकाश और भी अधिक तीव्र अनुभव होता जा रहा था। जब मैं उस प्रकाश के स्रोत तक, या उसके समीप तक पहुँचा तो इतना ही जानता था, कि उस तेज को सह न पाने से मेरी आँखें अपने आप ही मुँदने लगी थीं। किन्तु चूँकि चाहते हुए भी मैं नीचे उतर कर लौट नहीं सकता था इसलिए आँखें बन्द किए हुए ही ऊपर उठता रहा। यद्यपि तब मुझे अपने शरीर का, और संसार का भी भान नहीं रहा किन्तु, -- जैसा कि संसार के, और अपने आप के भान के समय हर मनुष्य में होता ही है, अपने अस्तित्व पर कोई सन्देह भी नहीं था --अर्थात् यह अन्तःस्फूर्त निश्चय, कि "मैं हूँ", यह अन्तःस्फूर्त बोध, कि मेरा अस्तित्व है । क्योंकि तर्क की दृष्टि से भी यदि इस बोध पर सन्देह किया जाए तो भी ऐसे सन्देह करने वाले संशयकर्ता के अस्तित्व से इनकार करना असंभव है ही।

जब मैं ऊपर उठता रहा तो एक समय लगा कि अब मैं रुक गया हूँ। इससे पहले कि मेरे मन में कोई विचार आता,  मुझे एक आवाज़ सुनाई दी : 

"तुम बिलकुल सही जगह पर आ चुके हो। मैं तुम्हें दिखलाई नहीं दे सकता क्योंकि मैं दृश्य नहीं, दृष्टामात्र हूँ और समस्त दृश्यमात्र मेरा ही प्रकाश है। फिर भी तुम मुझे जान सकते हो। मुझे जानने के लिए तुम्हें पातञ्जल योग-सूत्र के समाधिपाद के सूत्र १९ को स्मरण करना होगा। इसका अर्थ तो तुम्हें पता ही है! 

यह सूत्र मुझे तत्काल ही याद आ गया :

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ।।१९।।

किन्तु इसे साधनपाद के १६, १७, १८, १९ और २० वें सूत्र के सन्दर्भ में समझो । तुम्हें स्मरण होगा फिर भी मैं इनका उल्लेख कर देता हूँ :

हेयं दुःखमनागतम् ।।१६।।

दृष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ।।१७।।

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ।। ।।१८।।

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ।।१९।।

दृष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ।।२०।।

(यहाँ मुझे याद आया कि 'दृशि' का प्रयोग भ्वादिगणीय अनिट् धातु के अर्थ में है या 'दृङ्' धातु के अर्थ में संज्ञा की तरह दृक् के अर्थ में है।)

पुनः समाधिपाद के इन प्रारम्भिक १६ सूत्रों को स्मरण करो :

अथ योगानुशासनम् ।।१।।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ।।२।।

तदा दृष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ।।३।।

वृत्तिसारूप्यमितरत्र ।।४।।

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ।। ५।।

प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृतयः ।।६।।

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ।।७।।

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ।।८।।

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ।।९।।

अभावप्रत्यालम्बनावृत्तिर्निद्रा ।।१०।।

इसे सुनते सुनते मैं (तन्द्रा से) निद्रा में प्रविष्ट हो गया, और चूँकि निद्रा, --जिसे कि वृत्ति ही कहा गया है, जो स्वयं ही आती और जाती है, इसलिए कुछ समय पश्चात् उसी स्थिति में डूबा रहा।  किसी आहट से निद्रा भंग हुई किन्तु मैं उसी शान्त मनःस्थिति में कुर्सी पर बैठा रहा और उस अवस्था को स्मरण करने लगा कि क्या वह स्वप्न था या मेरे ही अन्तर्मन में घटित प्रसंगमात्र था! तभी पुनः मुझे वह आवाज सुनाई दी और शरीर तथा संसार का भान भी पुनः विलुप्त हो गया। 

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ।।११।।

इस प्रकार उस आवाज से मेरा ध्यान इस अगले सूत्र पर आया।

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ।।१२।।

(अभ्यास और वैराग्य, क्रमशः उन दो प्रकार के साधकों के द्वारा प्रयुक्त किए जानेवाले साधन हैं, जिनकी स्वाभाविक क्रमशः कर्मयोग तथा साँख्यज्ञान के प्रति विशेष निष्ठा होती है। गीता के अध्याय ३ के निम्न श्लोक में इसका ही उल्लेख किया गया है। :

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।

ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ।।३।।

'पुरा' अर्थात् इससे पहले कहे गए, गीता के अध्याय २ में, जहाँ साङ्ख्य के साधन का उल्लेख है। कहना अनुचित न होगा कि गीता की शिक्षा अध्याय २ में ही पूरी हो जाती है किन्तु कर्म के साधन का प्रयोग करनेवाले मुमुक्षुओं के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने अध्याय ३ से अध्याय १८ तक विस्तार से कर्मयोग के साधन को कहा है।)

तत्रस्थितौ यत्नोऽऽभ्यासः ।।१३।।

स तु दीर्घकाल-नैरन्तर्य-सत्कारासेवितो दृढभूमिः ।।१४।।

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ।।१५।।

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ।।१६।।

सुनते सुनते विभोर हो गया था ।

पता नहीं कितने समय उस मुग्ध दशा में निमग्न रहा, क्योंकि वह दशा समय से रहित, काल-निरपेक्ष है। इसलिए समय की प्रतीति तक मिट गई थी। समय प्रतीति ही है और प्रतीति ही समय है। समय इस प्रकार वृत्ति है और चित्तवृत्ति के निरोध में समय का भी विलय हो जाता है। 

याद आया शिव-अथर्वशीर्ष :

अक्षरात्संजायते कालो कालाद्व्यापकः उच्यते...

आज का विज्ञान आगम और प्रमाण के मध्य पेन्डुलम सा झूल रहा है!

फिर मैंने सुना :

"यही ज्ञान पूर्व में मैंने आदित्य को दिया था, और जिस प्रकार से महर्षि भगवान् व्यास ने इसे भगवान् श्रीगणेश से कहा था, और उन्होंने इसे जैसा लिपिबद्ध किया था, वैसे ही इस कलियुग में इस ज्ञान का उपदेश महर्षि जाबाल को प्रदान किया था ।

जाबाल-ऋषि (जिबरील / गैब्रिएल) के माध्यम से क्रमशः यह्वः (यहोवा) के मार्ग से यवनों (यहूदियों) को, कापालिकों और कठोलिकों को भी वही उपदेश दिया गया किन्तु कलि के प्रभाव से यह विकार को प्राप्त होकर अत्यन्त परिवर्तित रूप से आज के समय में व्यक्त हुआ है । इसलिए इस समय में धर्म की ग्लानि और अधर्म का उत्थान हो रहा है :

जन्मकर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।९।।

--

अध्याय ४

श्री भगवान् उवाच --

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।१।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।।२।।

स मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।।३।।

अर्जुन उवाच --

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ।।४।।

श्री भगवान् उवाच --

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ।।५।।

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ।।६।।

(भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्)

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।७।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।।८।।

जन्मकर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।९।।

अध्याय ७

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ।।१९।।

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता: ।

तं तं नियमास्थाय प्रकृत्याः नियताः स्वया  ।।२०।।

(यह्व-धर्म, इल-धर्म, कापालिक और कठोलिक-धर्म)

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ।।२१।।

(faith and religions of faith)

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्या राधनमीहते ।

लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हितान् ।।२२।।

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।

देवान्वदेयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ।।२३।।

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।

परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ।।२४।।

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमाया समावृतः ।

मूढोऽयं नाभिजानाति लोको ममाजमव्ययम् ।।२५

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ।।२६।।

***













Monday, 2 September 2019

कवीनाम् उशना कविः

छन्दांसि यत्र पर्णानि  
--
कठोलिक आचार्य चूँकि उशना (शुक्राचार्य) की परंपरा के थे, इसलिए यह बिलकुल स्वाभाविक था कि वे कभी-कभी काव्य की रूपकात्मक शैली में उपदेश देते।  जिसका गूढ अभिप्राय बहुत ध्यान से सुनने पर ही समझा जा सकता था।  इस प्रकार एक ओर वे काव्याभिव्यक्ति कर रहे होते तो दूसरी ओर आचार्य के रूप में गुरु होने का उत्तरदायित्व भी वहन करते होते।
उस शैली में दिए गए उनके वचनों के सौंदर्य का आस्वाद रसिक सामान्य जन केवल ऊपरी तौर पर ही ले पाते थे। इस प्रकार उपदेश का गूढ़ तात्पर्य केवल कोई पात्र व्यक्ति ही समझ पाता था।
ऐसे ही एक समय हातिम ताई (जिसका लोक में प्रचलित नाम 'आदम' था,) ने उन्हें कहते सुना :
"(विवेकरहित मनुष्य के जीवन में), लोभ के वृक्ष में आशाओं के पुष्प पुष्पित होते हैं, वृत्तियों के पल्लव नित नए पल्लवित होते रहते हैं, और आशंकाओं के कच्चे-पक्के फल भी इसी प्रकार निरंतर फलित होते रहते है।  इस वृक्ष की सुगंध से आकर्षित होकर भयरूपी विषधारी सर्प इससे लिपटे रहते हैं। चन्दन के वृक्ष में फल-फूल तो नहीं, किन्तु शीतलता अवश्य होती है, और वे उस शीतलता के सुख के लोभ से ही उसकी ओर आकर्षित होते हैं, ताकि उनमें विद्यमान गरल की ऊष्णता यत्किञ्चित शान्त हो सके। यद्यपि इससे उन्हें न तो अपने विष और न ही दंशवृत्ति से छुटकारा मिल पाता है। यह भी सच है कि इस विष और दंशवृत्ति तथा विषदन्त के होने से एक ओर तो उन्हें आहार मिलने में सरलता होती है, तो दूसरी ओर यही शत्रुओं से उनकी आत्मरक्षा का एकमात्र उपाय भी होता है, क्योंकि फुफकारने मात्र से भी यदि शत्रु सावधान न हो सके तो अन्य कोई विकल्प उनके पास होता ही कहाँ है?"
हातिम ताई को प्रतीत हुआ कि यह कोरी कविता मात्र नहीं, बल्कि आचार्य के इन शब्दों (उपदेश) में कोई गूढ़ आशय छिपा है। आचार्य प्रायः अपने वचनों में 'ह वा' शब्द का प्रयोग करते थे जो संस्कृत में 'अवश्य' के अर्थ में प्रयुक्त होता है।  वेद और उपनिषद् में यह प्रयोग प्रचुरता से पाया जाता है।  जब जब भी आचार्य इसका प्रयोग करते तो हातिम ताई को अपनी पत्नी का स्मरण होता, क्योंकि किसी संयोग से उसका 'हव-वा' नाम इससे बहुत मिलता-जुलता था। एक ओर तो वह आचार्य के शब्दों के काव्य-रस का आनंद लेता, तो दूसरी ओर मन ही मन पत्नी के बारे में सोचने लगता। किन्तु इन दोनों से अधिक वह उस उपदेश के सार पर चिन्तन करता जो आचार्य की वाणी में लक्षित और इंगित होता था।
उसने शायद ही कभी कल्पना की होगी कि आचार्य का यह रूपकात्मक आख्यान गिरीश (ग्रीस) से बाहर जाकर चतुर्दिक् फैलेगा और उसके अपने देश मिस्र, ईराक, ईरान की सीमाओं तक इसकी ख्याति होगी।  इतना ही नहीं यह किंवदंती भर न रहकर इसका उल्लेख भविष्य में धर्म की किताबों में भी होगा।
 "स्मृति ही इस वृक्ष का बीज है, जो इस प्रकार सतत प्रसारित होता है। यह बीज वृक्ष में वैसे ही व्याप्त होता है जैसे अमरबेल में उसका बीज छिपा होता है।
पहचान ही स्मृति है और स्मृति ही पहचान,
-वह चाहे स्वयं (आत्म) की हो या स्वयं से इतर (अनात्म) की।"
आचार्य ने अपने उपदेश का उपसंहार करते हुए कहा।
हातिम ताई को मानों एक आघात सा लगा किन्तु उस धक्के से उसके मन का वह प्रश्न तत्क्षण ध्वस्त और विलीन हो गया, जो उसे पिछले कई दिनों से व्याकुल कर रहा था :
"क्या दृश्य के अभाव में भी दृश्य से भिन्न और स्वतन्त्र कोई दृष्टा होता है?"
--


      
              

Sunday, 1 September 2019

अवरुद्ध : अन्तरायों का निवारण

नित्य-अनित्य
--
हातिम ताई के आचार्य ने उसकी परीक्षा करने के बाद ही यह तय किया कि वह विवेक-वैराग्य युक्त पात्र अधिकारी है किन्तु उसके अन्तरायों का निवारण नहीं हुआ है। क्योंकि परम्परा के अनुसार तो स्वाभाविक क्रम यही है कि नित्य-अनित्य के पर्याप्त चिंतन से विवेक जागृत होता है, और विवेक जागृत होने पर वैराग्य । विवेक-वैराग्य और वैराग्य के उदय के बाद ही चित्त के अन्तरायों का पूर्ण नाश हो पाता है।  किन्तु मनुष्य मात्र के संस्कारों के अनुसार किसी किसी में अन्तरायों के शेष रहते हुए भी विवेक तथा वैराग्य इतनी पर्याप्त मात्रा में होते हैं कि वह शास्त्र-अध्ययन से इस बाधा का निवारण करने में समर्थ हो जाता है।
व्याधि-स्त्यान-संशय-प्रमाद-आलस्य-विरति-भ्रान्ति-दर्शन-अलब्धभूमिकत्व-अनवस्थितत्वानि
चित्त-विक्षेपा:  ... ते अन्तरायाः।।
(पातञ्जल योगसूत्र समाधिपाद 30)
चित्त से संबंधित चित्त की इन बाधाओं को अन्तराय कहा है।
--
दुःख-दौर्मनस्य-अङ्गम्-एजयत्व-श्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः।।    
(पातञ्जल योगसूत्र समाधिपाद 31)
--
व्याधि - disease,
स्त्यान - idleness , indolence,
संशय - doubt,
प्रमाद - negligence,
आलस्य - laziness,
विरति - lack of interest (in spiritual endeavor),
भ्रान्ति-दर्शन - delusion,
अलब्धभूमिकत्व - not having settled well in practice.
अनवस्थितत्व - instability,
इत्यादि चित्त-विक्षेप distractions of mind,
के प्रकार हैं, जिन्हें अन्तराय कहा जाता है। ये सभी आध्यात्मिक मार्ग में बाधक obstacles, होते हैं।
केवल नित्य-अनित्य के नियमित चिंतन से भी इन अन्तरायों को दूर किया जा सकता है।
आरुरुक्षो, योगारूढ  :
इस प्रकार के अभ्यास से उन संस्कारों को नियंत्रित कर लिया जाता है जिनके कारण योगाभ्यास करनेवाले को समय-समय पर इनसे बाधा होती है।
--
आत्म-चिंतन :
आचार्य ने इसीलिए उसे केवल इसी का अभ्यास करने का निर्देश दिया।
उसके लिए इतना ही आवश्यक और पर्याप्त था।  
वैसे भी कठोलिक आचार्य न तो हठयोग आदि की शिक्षा देते थे, न भक्तिमार्ग की धारा का आग्रह करते थे।
एक दृष्टि से उन्हें कपिल-मुनि के साङ्ख्य-दर्शन का अनुयायी कहा जा सकता है।
किन्तु जैसा गीता में कहा है :
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्या स्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ।। 4
(अध्याय 5)
इसलिए ईश्वर के (अस्तित्व के) बारे में वे मौन ही रहते थे।
ईश्वर और ईशिता परस्पर अभिन्न है। इसलिए साङ्ख्य-दर्शन ईश्वर (के स्वरूप) और उसके कार्य (ईशिता) में भेद नहीं देखता।
--
नित्य-अनित्य का चिंतन करते हुए हातिम ताई इस निश्चय पर पहुँचा कि 'मैं' नित्य है जबकि शेष सब दृश्य प्रतीतियाँ 'अनित्य' हैं। किन्तु क्या दृश्य के अभाव में भी 'मैं' नामक 'दृष्टा' का स्वतंत्र अस्तित्व है?
इस स्थिति को प्राप्त होने पर हातिम ताई का मार्ग मानों अवरुद्ध हो गया।
बहुत समय, दिनों तक वह वहीं अटका रहा।
--        



       

Thursday, 22 August 2019

नए संकेत

ईशिता और आत्मीयता 
--
हातिम ताई को दूर दूर तक इसका आभास तक नहीं था कि आचार्य ने उसे जो नाम प्रदान किया था वह नाम मनुष्यता के ज्ञात इतिहास में भविष्य में वैसा ही अमर हो जाएगा जैसा कि मनु का नाम मनुज से पहले से है।
कापालिकों के नगर में रहने तक वह ईश्वर को एक व्यक्ति-विशेष की तरह जानना-समझना और अनुभव करना चाहता था। किन्तु कठोलिकों के नगर में आने पर उसकी दृष्टि आमूलतः इस प्रकार बदल गयी जिसकी  कि उसे कभी कल्पना तक न थी। उसे स्पष्ट हुआ कि यद्यपि कापालिक-दर्शन किसी को ईश्वर होने के लिए सहायक हो सकता है, किन्तु  ईश्वर-साक्षात्कार के लिए किसी और के लिए, वह एक बहुत बड़ी रुकावट और बाधा भी हो सकता है।
उसे समझ में आया कि ईश्वर को व्यक्ति-विशेष के रूप में स्वीकार करना ही मूलतः भ्रामक और त्रुटिपूर्ण है।  क्योंकि तब यह जानने का प्रश्न उठता है कि 'व्यक्ति क्या है?' क्या इस बारे में हम सुनिश्चित कुछ जानते हैं? किन्तु जब ईश्वर को व्यक्ति-विशेष की तरह संज्ञा या सर्वनाम, क्रिया, विशेषण या क्रिया-विशेषण के रूप में नहीं, बल्कि उस नियामक सत्ता के रूप में समझने का यत्न किया जाता है जो सर्वत्र और सदा विद्यमान है तो उसे ईशिता (Governance), नियंता कहा जा सकता है। इसलिए उसे 'एक' या 'अनेक' कहना भी इसी प्रकार से अधूरा और अपर्याप्त है। क्योंकि वह सत्ता 'एक' तथा 'अनेक' होते हुए भी इन शब्दों (विशेषणों) की आवश्यकता से रहित है। 'एक' अथवा 'अनेक' भी शून्य की तरह संख्या के रूप में विशेषण ही तो हैं ! जो किसी वस्तु की विशेषता का वर्णन न की उसके स्वरूपा का। उस सत्ता को एक, अनेक अथवा शून्य में बाँटना बुद्धि के दायरे में ही संभव होता है, जबकि बुद्धि स्वयं भी हमेशा ही अपने ही दायरे में बँधी होने से कभी मुक्त नहीं हो सकती।
शून्य का एक अर्थ है अभाव।  उस अर्थ में भी वह सत्ता शून्य नहीं है। 
इसलिए बुद्धि की सीमा में ईश्वर या आत्मा की विवेचना कर पाना लगभग असंभव ही है।       
हातिम ताई को यह दृष्टि इसलिए प्राप्त हो सकी, क्योंकि उसने अपने स्वयं को आचार्य द्वारा दिए गए नाम 'आत्मीयता' / 'आत्मतया' (as and like the pure self only) के अर्थ में समझने का प्रयास किया। उसे अनायास स्पष्ट हुआ कि ईशिता या ईश्वर को जानने-समझने से पहले उसे स्वयं अपने-आपको जानना समझना होगा। और तब उसे यह भी स्पष्ट हुआ कि जैसे 'व्यक्ति' एक कल्पना और स्मृति है, उसी तरह व्यक्ति-विशेष के रूप में 'ईश्वर' भी केवल कल्पना और स्मृति है, जबकि सच्चाई यह है कि जैसे 'स्वयं' होना कल्पना और स्मृति नहीं बल्कि ठोस अकाट्य सत्य है, उसी तरह ईशिता भी ऐसा और यही सत्य है। इसलिए बुद्धि की सहायता से ईश्वर या अपने-आपको जानना असंभव न भी हो तो भी कठिन अवश्य है।  वास्तव में ईश्वर या अपने-आप (आत्मा) को जानने-समझने का तात्पर्य है वह होना। और यह तभी संभव है जब बुद्धि निश्चल और जिज्ञासा प्रबल हो। बुद्धि कुण्ठित नहीं बल्कि स्तब्ध हो।
यह आकस्मिक संयोग नहीं था कि हातिम ताई का नाम अदम / आदम (Adam) के रूप में अमर हो गया। यहाँ तक कि उसे 'प्रथम प्रवक्ता' (The First Prophet) भी कहा गया।
--                       

व्यतीत होनेवाला समय

दिवास्वप्न / आकाशकुसुम 
--
किसी भी मनुष्य के लिए समय की पहचान दो प्रकार से होती है :
एक वह, जिसे वह (अनुभवों की) स्मृति के माध्यम से जानता है।
इस स्मृति को अत्यंत विकसित, परिष्कृत और व्यवस्थित, तर्कसंगत बनाकर वह कल्पना से भावी समय का विचार भी कर सकता है जो शुद्ध भौतिक स्तर और वैज्ञानिक धरातल पर भी अचूक, बिलकुल सटीक, सत्य भी सिद्ध हो सकता है। किन्तु जब लोगों, वस्तुओं, स्थितियों एवं घटनाओं के सन्दर्भ में कोई अनुमान लगाया जाता है, तो वह अनुमान स्मृतिजनित होने से व्यतीत होनेवाले समय के अंतर्गत होता है। जबकि ऐसा व्यतीत होने वाला समय अटल अचल समय के उस एक अति अल्प अंश की एक व्यक्तिगत स्मृति से अधिक कुछ नहीं है, जिसकी प्रामाणिकता सदा संदिग्ध रहती है। ऐसे किसी स्मृतिगत समय को सार्वत्रिक और सार्वकालिक सत्य कहना मूलतः त्रुटिपूर्ण है।
हातिम ताई के मन में जब ईश्वर के बारे में कौतूहल उठता था तो उसे बस इतना ही स्पष्ट होता था कि ईश्वर 'वह' है, जिसे जानना या संभव हो तो देखना या किसी प्रकार से जिससे वह संपर्क करना चाहता है। 
जब वह संसार के लोगों के बारे में सोचता था तो उसके सामने ईश्वर, ऋषि, धर्मपिता और आत्मीयता के बारे में प्रश्न उठता था, और उसे लगता था कि ऋषि 'वह' है जिसे ईश्वर-साक्षात्कार हुआ होता है।  किन्तु ऋषि के  बारे में भी इस कल्पना से उसे ईश्वर-साक्षात्कार के लिए कोई मदद कहाँ मिलती थी? धर्मपिता के बारे में  जब वह सोचता था तो उसे लगता था कि वह ईश्वर है किन्तु प्रच्छन्न ईश्वर, जिससे बात तो की जा सकती है, किन्तु वह भी ईश्वर-प्राप्ति के लिए उसे कोई सहायता नहीं दे सकता।  और स्वयं अपने बारे में उसे लगता था कि ईश्वर, ऋषि और धर्मपिता 'आत्मीय' तो हैं, किन्तु बस आत्मा की तरह प्रिय, न कि ईश्वर का परिचय / पहचान । 
व्यतीत हुआ समय उसे आकाशकुसुम सा प्रतीत होता था, जो न व्यतीत होनेवाले आकाश की पृष्ठभूमि में निरंतर खिलता और मुरझाता रहता था।
इस उदाहरण में उसे ईश्वर का एक धुँधला आभास अवश्य होता था।
न व्यतीत होनेवाला समय, जिसे अनादि और अनंत कहा जाता है, वास्तव में वह नहीं है, जिसका आदि / आरम्भ मध्य और अंत न हो, बल्कि वही शायद वह ईश्वर है, जो नित्य और सनातन है, - इसलिए आदि, मध्य और अंत उस पर लागू नहीं होता। आदि, मध्य और अंत तो व्यतीत होनेवाले उस समय पर ही लागू होता है, जो स्मृति का हिस्सा है। और स्मृति की ही तरह भंगुर भी।
तो ईश्वर 'मैं' अथवा 'तुम' से विलक्षण 'वह' है जिसका उल्लेख सदा अन्य-पुरुष एकवचन (third person, singular) के रूप में किया जाता है।  और यदि ऐसा है तो क्या वह कभी 'ज्ञात' का हिस्सा हो सकता है?
जो भी ज्ञात होता है वह कभी अज्ञात था, और जो भी अज्ञात है वह कभी ज्ञात हो सकता है, किन्तु ईश्वर ऐसी कोई वस्तु नहीं है।
फिर ईश्वर / आत्मा क्या है?
क्योंकि ईश्वर यदि सिर्फ उसके लिए है तो क्या वह आत्मा से भिन्न हो सकता है?
और यदि हो सकता है तो ऐसा ईश्वर अनात्म होगा।
फिर 'वह' कौन है?        
--
तद्युष्मदोरस्मदि संप्रतिष्ठा,
तस्मिन् विनष्टेऽस्मदिमूलबोधात् ।
तद्युष्मदस्मन्मतिवर्जितैका,
स्थितिर्ज्वलन्ती सहजात्मनः स्यात् ॥
(महर्षि श्रीरमणरचित सद्दर्शनम् श्लोक १६)
--
तत् (वह) युष्मत् (तुम) दोनों का स्थान अहं (मैं) के अंतर्गत होता है।
किन्तु स्वयं अहं भी अन्य वृत्तियों की तरह आता-जाता होने से स्पष्ट है कि उसका मूलस्थान स्थिर और आने-जाने वाली वस्तु नहीं है। इस प्रकार वह मूल वस्तु तत् (वह) युष्मत् (तुम) और अहं (मैं) से विलक्षण है और इस प्रकार की तत् (वह) युष्मत् (तुम) और अहं (मैं) बुद्धि मन में वहीं से उठती है।  तत् (वह) युष्मत् (तुम) और अहं (मैं) बुद्धि से रहित स्वयं मन ही इस प्रकार वह प्रत्यक्ष आत्मा /ईश्वर है जो नित्य प्रकट और प्रत्यक्ष है।
--

tadyuṣmadorasmadi saṃpratiśṭhā,
tasmin vinaṣṭe:'smadi mūlabodhāt |
tadyuṣmadasmanmativarjitaikā,
sthitirjvalantī sahajātmanaḥ syāt ||
(maharṣi śrīramaṇaracita saddarśanam śloka 16)
--
(for details, you may please see my ramanavinay blog.)
--
          

Wednesday, 21 August 2019

आरुरुक्ष / योगरूढ

स्थितप्रज्ञ-दशा
--
बचपन में ही माता-पिता से बिछुड़कर हातिमताई जब से उनसे दूर हो गया था, और दूसरे अनुभवों की तरह ही यद्यपि यह पहचान भी अनित्य थी, किन्तु मानों उसकी एक अमिट छाप  उसके मन पर थी । दूसरे तमाम अनुभवों, उनकी पहचान और उनकी स्मृति के बनने-मिटते रहने पर भी यह स्मृति उनकी तरह बनती-मिटती नहीं थी । और बचपन की कुछ बहुत छोटी-छोटी वे घटनाएँ थीं, जो किसी भी शिशु-मन में स्वप्न सी अंकित हो जाया करती हैं । वे पुनः पुनः बरसों बाद भी स्वप्न में या अचानक अनायास मन में उभर आती हैं । शायद इसे भावावेग, भावातिरेक या nostalgia कह सकते हैं ।
वह स्थिति,
जब तुम न रुक पाओ, न भाग पाओ,
जब तुम न सो पाओ, न जाग पाओ ।
यह आश्चर्य की बात नहीं थी कि हम सभी की तरह हातिमताई भी अपनी पहचान को भूलकर,
उनकी पहचान में ही अपना अस्तित्व देखता था ।
कठोलिकों के गिरीश (ग्रीस) स्थित) आश्रम में आने से पहले  वह केवल ईश्वर का विचार किया करता था । क्या ईश्वर उसके पिता की तरह है? या ईश्वर उसकी माता की तरह है? अर्थात् ईश्वर पुरुष है, अथवा स्त्री है? हातिम ताई को इस बारे में सन्देह नहीं था, कि वह स्वयं अपने पिता की तरह पुरुष है, किन्तु ईश्वर के बारे में विचार करते समय उसके मन में प्रायः यह प्रश्न उठता था कि कहीं ईश्वर उसकी माता की तरह स्त्री तो नहीं है?
महेश्वर (मिस्र) में ईश्वर को लिङ्ग-स्वरूप में देखकर तो उसे यही लगा था कि ईश्वर पुरुष होगा, और इसी दृष्टि से उसकी पूजा लिङ्ग के रूप में की जाती है । वैसे भी लिङ्ग का अर्थ है लक्षण, संकेत या चिह्न । फिर उसे यह भी लगता था कि ईश्वर किसी माता-पिता की सन्तान नहीं है, क्योंकि तब उसके माता-पिता के भी पूर्वजों के प्रश्न पर विचार करना होगा और इस निरर्थक श्रंखला का प्रारंभ कहाँ है, इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता ।
हातिम ताई बस इतना ही जानता था कि ईश्वर ’वह’ है : अन्य पुरुष ।
जैसे उसे यह भी नहीं पता था कि ’वह’ स्त्री है या ’पुरुष’, वैसे ही हातिम ताई इससे भी अनभिज्ञ था,
कि ईश्वर ’एक’ है या ’अनेक’ ।
हातिम ताई यह अवश्य जानता था कि ईश्वर अद्भुत्, अनिर्वचनीय और अद्वितीय-अप्रतिम (unique) है, और  उसके और समस्त अन्य जीवों की तरह चेतन भी है ।
किन्तु हातिम ताई यह नहीं समझ पाता था कि ईश्वर बुद्धिगम्य है या नहीं, इन्द्रियगम्य है या नहीं, मनोगम्य है या नहीं । यदि ईश्वर ईशिता है तो क्या वही बुद्धि, इन्द्रियों, मन तथा प्राणियों का तथा उनके माध्यम से संपूर्ण जगत का ही नियंता नहीं है? क्योंकि बुद्धि, इन्द्रियाँ, मन तथा प्राण आदि स्वयं चेतन नहीं हैं, तथा किसी अहं-भावना के सक्रिय होने पर ही विषयों की तरह जाने जाते हैं । समस्त विषय दृश्य हैं जबकि अहं-भावना भी इसी प्रकार दृश्य है । किन्तु एक भेद यह है कि अहं-भावना पुनः बुद्धिगम्य है, या बुद्धि से ही ’विषय’ की तरह उसका अनुमान किया जाता है । यही पेंच है जो उसे ईश्वर को प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः (परोक्षतः किसी माध्यम या युक्ति की सहायता से) जानने में बाधक था । अपनी बुद्धि के इस प्रकार से कुंठित हो जाने पर वह ईश्वर के बारे में सोचना बन्द कर देता था, या कहें कि उसे रुक जाना पड़ता था ।
किन्तु कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ भी उसके साथ हुआ करती थीं जब भाव-विभोर अवस्था में वह उस सत्ता से इतना एकीभूत होकर उसमें निमग्न हो जाता था, जब उसे संसार, जगत् और देह-मन-प्राण तथा इन्द्रियों की सुध-बुध नहीं रह जाती थी।  तो उस समय अहं-भावना ही कैसे रह सकती थी ? बुद्धि ठिठक जाती थी, किन्तु चित्त समाहित होकर ’न व्यतीत होनेवाले समय’ में खोया / लीन रहता था ।               
वह स्थिति,
जब तुम न रुक पाओ, न भाग पाओ,
जब तुम न सो पाओ, न जाग पाओ ।
--
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। 
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।52 
(गीता अध्याय 2, 2/52)
--
उस समय उसकी बुद्धि कुण्ठित नहीं, निश्चल और स्तब्ध रहती थी :
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। 
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।53 
(गीता अध्याय 2,  2/53)
तात्पर्य यह कि हातिम ताई योगारूढ स्थिति में था। 
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। 
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।3
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। 
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी  योगरूढस्तदोच्यते।।4 
(गीता अध्याय 6, 6/3, 6/4) 
--
कापालिकों के नगर में हातिम ताई की स्थिति 'आरुरुक्ष' मुनि की थी, 
तो कठोलिकों के नगर में 'योगारूढ' की !
दोनों ही स्थितियाँ शमः / शं शमन-धर्म के दो सोपान थे जिनका स्थान उसके जीवन में था । 
--    
     

Thursday, 15 August 2019

सौभाग्य या दुर्भाग्य?

दर्शन दो !
--
पता नहीं यह उसका सौभाग्य था या दुर्भाग्य कि हातिम ताई को जीवन-दर्शन को दो प्रकार से जानने का अवसर मिला था। कापालिकों के नगर में भोग जीवन का सहज दर्शन था जबकि कठोलिकों के नगर में त्याग ही जीवन का दर्शन था। कापालिक जहाँ भोग को तप का ही एक प्रकार मानकर तदनुसार (धर्म का) आचरण करते थे, वहीं  कठोलिक त्याग को ही तप का एक प्रकार मानते थे। 
आचार्य ने जब हातिम ताई को ईशोपनिषद् का पाठ पढ़ाना प्रारम्भ किया था तो उन्हें कल्पना तक न थी कि उनका शिष्य इतना प्रतिभाशाली होगा, और न हातिम ताई को इसकी कल्पना या अनुमान था कि वह अपनी योग्यता का प्रदर्शन करता।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
के पाठ के उपरान्त आचार्य ने उपनिषद् के प्रथम मन्त्र का उपदेश हातिम ताई (आत्मतया / आत्मीयता) को दिया :
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम्।।
--
हातिम ताई इतना प्रतिभाशाली था कि उसने कापालिकों और कठोलिकों के दो भिन्न, यहाँ तक कि परस्पर विपरीत दिखलाई देनेवाले जीवन-दर्शनों का संतुलित समायोजन इस एक मन्त्र में देख और कर भी लिया।
--
जब उसने ध्यानपूर्वक इन दोनों दर्शनों अर्थात् दृष्टियों की तुलना की तो उसे समझ में आया कि कापालिक जहाँ ईश्वरवादी होकर सम्पूर्ण अस्तित्व को ईश से ओत-प्रोत और ईश को सम्पूर्ण अस्तित्व में समाहित मानते हुए भोग को भी तप जानकर विवेकपूर्वक इस प्रकार जीवन के सुखों दुःखों, सुविधाओं और कष्टों का उपभोग करते थे जिसका केंद्रीय तत्व था प्रेम। इसलिए उनके जीवन में नैतिकता-अनैतिकता का निर्धारण इस विवेक से ही तय होता था।
कठोलिकों की दृष्टि में ईश्वर नामक सत्ता को स्वरूपतः जानने की तुलना में अपने-आपको जानना अधिक सरल और प्रामाणिक भी था।
कठोलिक त्याग करते हुए उपभोग को जीवन की आवश्यकता समझते हुए भोग में प्रवृत्त होते थे, जबकि कापालिक त्याग को भी भोग का ही एक प्रकार मानते हुए जीवन का सहज उल्लास अनुभव करते थे।
दोनों के द्वारा किए जानेवाले (धर्म के) आचरण में स्वरूपतः भेद नहीं था किन्तु इसके मूल में स्थित वह प्रेरणा परस्पर कुछ भिन्न भिन्न थी। 
कापालिक ईश / ईश्वर को सर्वोच्च और एकमेव (Unique Principle) मानते थे जबकि कठोलिक आत्मा को  ही एकमात्र सर्वोच्च और एकमेव (Unique Principle) मानते थे।
इस आभासी भिन्नता के अतिरिक्त न तो दोनों के (धर्म के) आचरण में कोई भिन्नता थी, और न ही कोई भिन्नता उस एकमात्र सर्वोच्च और एकमेव (Unique Principle) को ग्रहण किए जाने की उनकी दृष्टियों में थी, जिसे कापालिक ईसर, इस्र, ईश्वर या महेश्वर कहते थे और कठोलिक जिसे 'आत्मा' कहते थे।
शायद मिस्र (महेश्वर) में जन्म होने से ही हातिम ताई अनायास ही इस सत्य से भलीभाँति परिचित था।
--   
  
       
       

Wednesday, 14 August 2019

रा दाने

त्रैविद्या मां
--
गिरीश स्थित उस आश्रम में जहाँ पूर्वकाल से महर्षि अङ्गिरा का स्थान था अनाहत यज्ञकर्म होता था।
सभी देवता यज्ञ में आमंत्रित किए जाते थे, आवाहनपूर्वक उन्हें आहुति दी जाती थी।  किन्तु यह सतयुग के काल में होता था।
सन्दर्भ के लिए यहाँ यह उल्लेख किया जा सकता है कि सत का अर्थ ही है सनातन; - जो नित्य में अनित्य तथा अनित्य में नित्य की तरह दिखाई देता है। राजा निमि की कथा में बतलाया गया है कि किस प्रकार राजा निमि ने मनुष्य और इतर पलक झपकने वाले प्राणियों की पलकों के बीच अपना स्थान पाया।
सूत्रदृष्टि से यह सूक्ष्म कालखंड जिसे निमिष कहा जाता है वह आधार / कसौटी है जिस पर भौतिक 'व्यतीत होनेवाले समय' का सत्यापन किया जाता है, और जो घटनाओं के क्रम से परिभाषित होता है। घटनामात्र नित्य और अनित्य इन दो प्रकारों से व्यक्त और अव्यक्त होती है, जिन्हें स्मृति में संजो लिया जाता है।
हर प्राणी का अपना स्मृति-जगत होता है, जो उसके जन्म के समय व्यक्त रूप ग्रहण करता है और मृत्यु होने के समय पुनः अव्यक्त स्वरूप में लौट जाता है।  न तो किसी जीव का नाश होता है न पुनः सृजन होता है।
यही नैमिषारण्य है जहाँ किसी समय 88000 ऋषि एकत्र हुए / होते हैं। और ऋषि सूत उन्हें (गरुड़-पुराण) की कथा सुनाते हैं। पृथा (फ़ारस) के समुदाय के लोग उसी गरुड़ को आराध्य मानते हैं।
युग का अर्थ है सन्धि या मिलन, कड़ी।  सतयुग से त्रेता हुआ/ होता है ।  सत निर्विकार होने पर भी उस पर विकार आरोपित किए जाने से उसका विस्तार (सन्तरण) त्रेतायुग के रूप में हुआ / होता है।  त्रेता में राम रावण और राक्षस त्रयी हुई / होती है। त्रेता से द्वापर हुआ  / होता है।  द्वापर अर्थात् द्वा-परक।  जहाँ धर्म-अधर्म, नीति-अनीति, सत्य-असत्य आदि का ध्रुवीकरण हुआ / होता है।  द्वापर पुनः 'कलि' के रूप में प्रकट हुआ / होता है। इस प्रकार चारों युग पलक के झपकने-मात्र में होते रहते हैं।
ऋषि अङ्गी से अङ्गिरा हुए जिन्हें अङ्गिरस् भी कहा जाता है। अङ्गिरस् से Angeles का सादृश्य वैसा ही है जैसा अङ्गिरा से Angel का।  ऋषि-वत्सल से 'रसूल' का भी ऐसा ही सादृश्य है। इसे पुनः 'ऋषिवत्-सल' से भी प्राप्त किया जा सकता है। (स्पष्ट है कि यहाँ केवल भाषा के इतिहास की दृष्टि से विवेचना की जा रही है, न कि किसी धर्म-विशेष के सन्दर्भ में।)
सतयुग का तात्पर्य है विशुद्ध चेतनता का तत्व।  त्रेता का तात्पर्य है सत / सत् / सत्य / चेतना का मन, प्राण तथा जड-जगत के रूप में अभिव्यक्त होना। इसी का रूपान्तर पुनः जड-चेतन है। जड दृश्य है जिसे 'देखा जाता है।' चेतन वह है जिसे दिखाई देता है।  यह द्वापर हुआ।  पुनः इस द्वापर से कलिरूप अहंकार उत्पन्न होता है जो अंधकार और अँधेरे सा अविद्यमान होते हुए भी प्रबल और दुर्धर्ष रूप से मनुष्य की बुद्धि पर हावी हो जाता है और बुद्धि उसी से निर्देशित होकर मनुष्य को शुभ-अशुभ विविध कर्मों में प्रवृत्त करती है। 
इस प्रकार मलिन-बुद्धि के ही कारण मनुष्य अपने-आपको शुभ-अशुभ विविध कर्मों का कर्ता तथा उनका भोग करनेवाला होने की मान्यता से ग्रस्त हो जाता है।
यह बुद्धि ही जो आत्मा के अंग-अंग में व्याप्त है शुद्ध दशा में अङ्गि तथा अङ्गिरा (अंगों में रमनेवाली) है। अर्थात् यही सृष्टिरूपा अखिल विश्व और इस विश्व में जन्म लेनेवाला प्रत्येक प्राणी भी है।
--
पिछले पोस्ट 'ला आदाने' में पाणिनि के अष्टाध्यायी के जिस सूत्र का और जिस पर श्री वरदराज लिखित व्याख्या का उल्लेख किया था, उसी सूत्र की उसी व्याख्या में 'ला आदाने' से पहले 'रा दाने' का वर्णन है।
ऋषि अङ्गिरा इसी का प्रकाश है। अङ्गिरा को 'अङ्गि रा' के रूप में देखने पर अन्य रीति से भी इस शब्द की रूपसिद्धि होती है; -जिसका तात्पर्य है "प्रदान करनेवाला"। वह तत्व, जो मनुष्य को बुद्धि देता है।
जो मनुष्य में मूलतः चेतना की तरह नित्य और सनातन रूप से अवस्थित है।
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।।22
(गीता अध्याय 10)
इस प्रकार वह 'अस्मि-चेतना' जो बुद्धि से पूर्व होती है उसे ही यहाँ मनुष्य में विद्यमान परब्रह्म / ईश्वर कहा गया है। 'अस्मि' का अर्थ है -- 'हूँ'। प्राणिमात्र में यह सहज प्रत्यभिज्ञा (पहचान) कभी अविद्यमान नहीं होती, इसका अभाव किसी तर्क, अनुभव आदि से कभी सिद्ध नहीं किया जा सकता। मूलतः यह दृष्टा-दृश्य से भी स्वतंत्र है जबकि दृष्टा-दृश्य (subject-object) चेतना का बुद्धि द्वारा किया जानेवाला आभासी विभाजन मात्र। 
--              
                                

  

Monday, 12 August 2019

अङ्गिरस्-जाबालऋषि

'जहि' और 'जहाति'
--
हातिम ताई के पूर्व-वृत्तान्त में कहा गया कि किस प्रकार गरुड़ उसे महेश्वर (मिस्र) से कापालिकों के राज्य में ले आया था, और पुनः वहाँ से गिरीश (ग्रीस) स्थित महर्षि भृगु के आश्रम के समीप छोड़ गया।
महर्षि भृगु के आश्रम में प्रधानतः कठोपनिषद् की शिक्षा दी जाती थी, और वहाँ कठोलिकों के साथ-साथ  प्रायः कापालिक व जाबालिक परंपराओं के ऋषियों तथा उनके शिष्यों का आगमन भी होता रहता था। स्वयं महर्षि भृगु के आश्रम से भी ऋषि एवं आचार्य पूरी पृथ्वी पर ब्रह्मकर्म के अनुष्ठान और यज्ञों के निमित्त भ्रमण करते रहते थे। विभिन्न नरेश उनके लिए प्रायः रथों और वाहनों का प्रबंध भी उत्साहपूर्वक करते थे। गज (पीलु) और उष्ट्र तथा रथों में युक्त द्रुतगामी अश्व (अर्व) त्वरापूर्वक उन्हें सुदूर स्थानों तक ले जाते थे। और यह तभी संभव हो पाता था जब कोई नरेश, कोई राजा, नृप या पृथ्वीपति किसी बहुत बड़े यज्ञ का अनुष्ठान कर रहा होता।
ऋषि प्रायः केवल उनके कर्तव्य के निर्वाह हेतु ही ऐसे यज्ञों में सम्मिलित होते थे न कि स्वर्ण, रत्नों या गौ आदि की कामना से। वेद-विधान से किए जानेवाले यज्ञों के अनुष्ठान के लिए उन्हें निमंत्रित किए जाने पर यह उन का दायित्व भी होता था।
ऐसा ही एक स्थान था पीलुस्थान (वर्तमान Palestine / गजा पट्टी ?); -जिसे गज-स्थान भी कहा जाता था क्योंकि वहाँ के उस नरेश के पास असंख्य हाथी (पीलु) और उष्ट्र (ऊँट) एवं अश्व भी थे। हाथियों के साथ रहने से पर्याय से ऊँटों को भी पीलु कहा जाता था जिससे उस स्थान का नाम गजा और पीलु प्रसिद्ध हो गया। शतरंज खेलनेवालों को पता है कि जिस मोहरे को अंग्रेज़ी में rook कहा जाता है, उसे ही हिंदी / उर्दू में 'फ़ील' कहा जाता है, जो 'पीलु' का ही अपभ्रंश (aberration) या सज्ञात (cognate) है।
आज भी गजा-पट्टी उसी जगह का नाम है जो फलस्तीन के नाम से मशहूर है।
आज भी यहूदी अपने 'ईश्वर के स्थान' - अल-इस्र / ईश्वरालय / इसरायल की तलाश में हैं।  
पैग़म्बर मूसा द्वारा मिस्र छोड़कर जाने से बहुत पहले की कथा है यह।
अतिग्रस् (Tigris) और उपरेतस् (Euphrates) नदियों के संगम के स्थान पर उससे उत्तर में 200 योजन दूर महाप्रथमीय (Mesopotamia) क्षेत्र में महर्षि भृगु और अङ्गिरा की परंपरा में 'उणादि-पाठ' पढ़ने अनेक शिष्य चारों ओर से आते थे।
ऐसे ही समय आचार्य धातुपाठ की कक्षा में 'हन्' और 'हा' धातुओं के प्रयोग का वर्णन कर रहे थे।
उत्कर्ष, उच्छेद, उड्डीय, उत्पात, उद्भ्रांत, उन्मूलन, उद्यम, उद्रेक, उल्लास, उद्वमन, उच्छोष, उत्साह, उद्धार, आदि उदाहरण देते हुए उन्होंने शिष्यों को अक्षर समाम्नाय के 14 माहेश्वर-सूत्रों में से प्रथम
 'अ इ उ ण्' को स्मरण करने के लिए कहा।
[संक्षेप में 'अ', 'इ' तथा 'उ' ये तीनों वर्ण परस्पर एक दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त किए जा सकते हैं।
'इल' का 'अल' या 'उल';  'अल' का 'इल' या 'उल'; या 'उल' का 'इल' या 'अल' व्यवहार पर निर्भर है।]     
तब उन्होंने शिष्यों से ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र का उच्चारण कराते हुए 'अग्निमीडे' से 'ईडे' की पुनरुक्ति की।
तब उन्होंने अजा एका लोहितकृष्णशुक्ला से उणादि प्रत्यय द्वारा :
ईद-उत्-अज-हा की सिद्धि की ।
तत्पश्चात् पुनः 'हन्' और 'हा' धातुओं के प्रयोग का वर्णन करते हुए कहा :
"इनमें से प्रथम 'हन्' धातु अदादिगणीय परस्मैपदीय है, जिसका लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन रूप होता है : 'जहि' ... जिसका तात्पर्य है 'मारो'।
इनमें से द्वितीय 'हा' धातु जुहोत्यादिगणीय परस्मैपदीय है, जिसका लट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन रूप होता है 'जहाति' ... जिसका तात्पर्य है 'छोड़ता' या 'त्यागता' है।
[टिप्पणी गीता अध्याय 2 श्लोक 50 में 'जहाति', एवं अध्याय 3 श्लोक 43 तथा अध्याय 11 श्लोक 34 में
'जहि' का प्रयोग इन्हीं अर्थों में है।]
आचार्य ने तब शिष्यों से कहा :
अजा प्रकृति भी अजर अमर और नित्य अवध्य है,
प्रकृति यद्यपि त्रिगुण युक्त सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी भी है,
और अज / पुरुष (आत्मा) भी अजर अमर और निर्गुण अर्थात् गुणमात्र से रहित और प्रकृति की ही तरह नित्य अवध्य है, इस प्रकार जानकर इसे उत्सव (ईद) जानो।
--
मेरे मन में एक सवाल उठा :
अरबी और संस्कृत में बोले जानेवाले ये शब्द यदि एक ही तात्पर्य के द्योतक हैं, तो क्या यह आकस्मिक संयोग, महज़ एक इत्तफ़ाक़ ही है?
या यह इस ओर भी संकेत करता है कि जैसे PIE (Proto-Indo-European) भाषा की कल्पना की गयी उससे अधिक महत्वपूर्ण है यह जानना और इस पर ध्यान देना कि PIA (Proto-Indo-Arabic) उससे भी पहले और उससे भी अधिक प्रामाणिक है।
केवल लिपि की भिन्नता के आधार पर भारतीय भाषाओं को PIE (Proto-Indo-European) से सम्बद्ध करना और इस प्रकार PIA (Proto-Indo-Arabic) की जानबूझकर उपेक्षा करने से हमारा ध्यान ही इस तथ्य पर नहीं जाता कि अंग्रेज़ी और दूसरी यूरोपीय भाषाएँ जिस तरह संस्कृत से व्यत्पन्न (अपभ्रंश या सज्ञात) हैं, अरबी उनकी तुलना में संस्कृत से कहीं अधिक निकट है।
निश्चित ही इस ब्लॉग में लिखे जाने वाले अरबी के उद्धरण धर्म के सन्दर्भ से नहीं बल्कि भाषाशास्त्र के सन्दर्भ से देखे जाने चाहिए।
--       

  
   
  
                
               

Sunday, 11 August 2019

Revelation

तरङ्गबिन्दुन्याय -2 
कुछ दिनों पहले  इसी ब्लॉग में 
Delusion, Illusion, Hallucination and Paradox,
शीर्षक से नर्मदा की कथा लिखी थी। 
गरुड़ की कथा भी हातिम ताई के बहाने लिख चुका हूँ।
लेकिन आज जब गरुड़ेश्वर बाँध और नर्मदा नदी की वर्तमान बाढ़ की स्थिति का समाचार देख रहा हूँ,
तो डर लग रहा है कि उक्त पोस्ट में वर्णित घटना कहीं सत्य सिद्ध होनेवाला पूर्वाभास न हो जाए !
जब मैं वर्ष 1984 में ओंकारेश्वर गया था, तो लोगों से सुना था कि नर्मदा को बाँधा नहीं जा सकता,
और न ऐसा यत्न किया जाना चाहिए।
यहाँ तक कि इसका विचार तक मन में नहीं लाया जाना चाहिए।
किन्तु होनी को कौन टाल सकता है?
--
     

Thursday, 8 August 2019

त्रैविद्या मां

Mesopotamia
महाप्रथमीय (मेसोपोटेमिया)
--
शमन धर्म के मूल पीठ महेश्वर स्थित महाप्रथमीय क्षेत्र में सनातन धर्म का प्रचलन शमन धर्म के रूप में था ।
यह वही महेश्वर (मिस्र) है जहाँ हातिम ताई का जन्म हुआ था और जहाँ वह एक-दो वर्ष की आयु का होने तक माता-पिता के साथ रहा । जहाँ से गरुड़ उसे उठाकर कापालिकों के नगर से कुछ दूर खजूर के एक वृक्ष पर रख गया था । वास्तव में गरुड़ से ही उसे प्रथम दीक्षा प्राप्त हुई थी । कापालिकों के राज्य में कापालिकों के दो समुदाय थे, एक थे प्रधानतः कापालिक दूसरे थे जाबालिक । दोनों ही आर्ष-अङ्गिरा ऋषि Arch-Angel अर्थात् जाबालऋषि (Gabriel) की ही परंपरा को मानते थे जिसका उद्गम्-स्थल महेश्वर (मिस्र) था ।
पात्रता और अधिकारिता के आधार पर महेश्वर (मिस्र) में स्थित प्रधान मठ में जिस त्रैविद्या की शिक्षा दी जाती थी उस आधार पर बाद में परंपरा के विस्मरण (विचार -'Vicar' एवं विशप्त / विशप् - 'Bishop') होने से केवल औपचारिक रूप से ही त्रैविद्या का अनुष्ठान किया जाने लगा और उसका मूल तत्व धेरे-धीरे विलुप्तप्राय हो गया ।
महेश्वर (मिस्र) में भूतभावन भगवान् शंकर के गण श्मशान-साधना में निष्णात और पारंगत थे और प्रेत-विद्या का लौकिक रूप और प्रकार वहीं से प्रारंभ हुआ ।
कापालिकों के राज्य / नगर में भूतभावन भगवान् शंकर (ईश्वर / इस्र)  की आराधना लिङ्ग अर्थात् कपाल के रूप में होती थी :
किरीट, केश, कपाल, कर्ण,
कपोल, केयूर, कर, कफोणि। 
कटि कटिबन्ध च कमण्डलं
क-वाचक काया अंगन्यास ।। 
भृगु जाबालि यः अङ्गिरसः।
उशनाकृत कल्पनाविलास।।   
--
’क’ वर्णमाला में प्रथम वर्ण है जो ’चारों ओर’ का पर्याय है । उपरोक्त श्लोक में इसी रहस्य का वर्णन है ।
त्रैविद्या का वर्णन गीता अध्याय ९ में इस प्रकार प्राप्त होता है :
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥२०
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रैधर्म्यमनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥२१
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥२२
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥२३
अहं हि सर्व यज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥२४
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥२५
--
traividyā māṃ somapāḥ pūtapāpā yajñairiṣṭvā svargatiṃ prārthayante |
te puṇyamāsādya surendralokamaśnanti divyāndivi devabhogān ||20
te taṃ bhuktvā svargalokaṃ viśālaṃ kṣīṇe puṇye martyalokaṃ viśanti |
evaṃ traidharmyamanuprapannā gatāgataṃ kāmakāmā labhante ||21
ananyāścintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate |
teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yogakṣemaṃ vahāmyaham ||22
ye:'pyanyadevatābhaktā yajante śraddhayānvitāḥ |
te:'pi māmeva kaunteya yajantyavidhipūrvakam ||23
ahaṃ hi sarva yajñānāṃ bhoktā ca prabhureva ca |
na tu māmabhijānanti tattvenātaścyavanti te ||24
yānti devavratā devānpitr̥̄nyānti pitṛvratāḥ |
bhūtāni yānti bhūtejyā yānti madyājino:'pi mām ||25
--
इस कथा का नायक हातिम ताई अवश्य ही महाभारत युद्ध होने से पूर्व से ही हुआ था, क्योंकि मिस्र के पिरामिड्स का निर्माण महाभारत युद्ध के बहुत बाद में हुआ था | श्री नागेश नीलकण्ठ ओक के अनुसार महाभारत का युद्ध ईसा से 5661 वर्ष पहले हुआ था।  जबकि पिरामिडों का निर्माण ईसा से 3000 वर्ष पहले।
यह उल्लेख इसलिए भी ज़रूरी है ताकि पश्चिम के तीन religions के सन्दर्भ से इसे न जोड़ा जाए।
--
इस कथा को और आगे लिखने से पहले हमें तीन ऐतिहासिक प्रसंगों पर विचार करना होगा :
1 पिरामिडों का निर्माण जिस प्रेत-विद्या के आधार पर किया गया, वह 'शमन धर्म' ।
2 कापालिकों / जाबालिकों का 'शमन-धर्म'
3 कठोलिकों का 'शमन-धर्म'
--
इसी 'त्रैविद्या' को 'शमन-धर्म' के सन्दर्भ से और भिन्न तरीके से समझा जा सकता है।
यद्यपि यहाँ यह देखा जाना भी उतना ही ज़रूरी है कि भगवान् श्री आदि शंकराचार्य ने अपने गीता-भाष्य में  इसका अर्थ 'ऋक् -यजु -साम' किया है। किन्तु 'शमन-धर्म' के सन्दर्भ में इसे उपरोक्त 3 रूपों में देखा जा सकता है। मां / mām से 'mummy' का सादृश्य उल्लेखनीय है। पिरामिडों में जिन राजा-रानियों को दफ़्नाया जाता था, उनके शरीर को 'मोम' (a preservative used in embalming) के लेप और मसालों के प्रयोग से सुरक्षित रखा जाता था।
'मिस्र' से mason / mission / मिस्री / मिशनरी की उत्पत्ति तो स्पष्ट ही है, इसे संस्कृत शब्द श्मशान के भी सज्ञात / सजात / cognate शब्द की तरह देखा जा सकता है।
संक्षेप में पश्चिम के तीनों religions में अंतिम संस्कार के रूप में दफ़न किया जाना प्रचलित है ही, जबकि पूर्व की परंपराओं में किसी विशेष स्थिति में ही मृतक को दफ़्नाया जाता या समाधि दी जाती है।
यहाँ यह स्पष्ट किया जाना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि संस्कृत भाषा में 'शव' को ही 'प्रेत' कहा जाता है न कि मृतक की रूह, soul या जीव को। इसलिए 'प्रेत्य' का अर्थ हुआ -मरणोत्तर होनेवाला, किया जानेवाला कार्य।
यहाँ गीता से जो श्लोक उद्धृत किए गए हैं उनकी विस्तार से विवेचना मेरे गीता से संबंधित ब्लॉग में हिंदी तथा अंग्रेज़ी में देखी जा सकती है।
--
इसलिए इस कथा में आगे चलकर जाबाल्युपनिषद् तथा कठोपनिषद् के माध्यम से कापालिकों / जाबालिकों एवं कठोलिकों के 'शमन-धर्म' की परंपरा का वर्णन करने का विचार है।
--                    

Thursday, 1 August 2019

यकीन की सच्चाई

आत्मतया : आत्मीयता,
--
कापालिकों ने हातिम ताई का नाम बदलकर उसे ’आत्मतया’ कर दिया था । उसके धर्मपिता कहते थे कि सब कुछ आत्मतया है । उसे यद्यपि यह सब समझ में नहीं आता था, पर वह सोचता था कि यदि सब कुछ आत्मतया है तो क्या ईश्वर और महेश्वर भी आत्मतया है?  तब धर्मपिता कहते थे :
"जो महेश्वर है, वही ईश्वर है, जो ईश्वर है, वही महेश्वर है ।
आत्मतया का अर्थ है दोनों एक दूसरे के ही दो रूप हैं ।"
शायद उस समय हातिम ताई इतनी परिपक्व बुद्धि का नहीं था, कि इन बातों का गूढ किंतु प्रकट तात्पर्य ग्रहण कर सके ।
तब उसके धर्मपिता ने उससे प्रश्न किया :
’क्या हर व्यक्ति अपने-आपको ’मैं’ के रूप में ही नहीं जानता है?
और क्या हर व्यक्ति अपने-आपको ’मैं’ कहकर ही अपना परिचय दूसरों को नहीं देता ?"
हातिम ताई चुपचाप सुनता रहा ।
"अब मान लो, महेश्वर या ईश्वर तुम्हारे समक्ष प्रकट हुए,
तो क्या वे भी अपने-आपको ’मैं’ ही कहकर अपना परिचय नहीं देंगे ?"
"हाँ, मुझे गरुड़ ने जब खजूर के पेड़ पर ला छोड़ा था तो उसने भी स्वयं को ’मैं’ ही कहा था ।
लेकिन इसके बाद पता नहीं कैसे और कितने समय में मैं दो-तीन साल की आयु से बढ़कर सत्रह-अठारह साल का हो गया, लेकिन इस बीच उसी पेड़ पर जब मुझे भूख-प्यास लग रही थी, और मुझे मेरे माता-पिता की याद आ रही थी, और मैं रो रहा था, जब मैंने ईश्वर या परमेश्वर दोनों से प्रार्थना की थी कि मुझे बचाओ; मेरी रक्षा करो, तो मुझसे किसी आवाज ने कहा था :
"अगर तुम्हारा यकीन सच्चा है तो 'मैं' तुम्हारी रक्षा करूँगा ।"
और तभी उस खजूर पर बेमौसम ही फल आ गये थे । और फिर जब मैंने उन्हें तोड़ने के लिए हाथ आगे बढ़ाया तो वे अचानक अदृश्य हो गये थे । तब मैंने ईश्वर / महेश्वर / परमेश्वर से कहा था :
"जैसी तुम्हारी मरजी !"
और तभी वे फल पुनः दिखलाए दिये,
और जब मैंने उन्हें तोड़ा, तो मुझे अपने यकीन की सच्चाई पर भरोसा हुआ ।
--
जब गरुड़ ने दूसरी बार हातिम ताई को कापालिकों के नगर से उठाकर कठोलिकों के बीच छोड़ दिया था, तो हातिम ताई को न तो डर लगा था, न चिन्ता हुई थी । उसे कुछ वैसा ही लगा था, -जैसे कोई बिल्ली अपने किसी बच्चे को मुँह में दबाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है ।
जब कठोलिकों (कठोलिक आचार्यों) ने उससे उसका नाम पूछा था, तो उसने उन्हें कभी तो अपना नाम 'हातिम ताई' बतलाया था, और कभी-कभी ’आत्मतया’ भी ।
जब उसे यज्ञोपवीत और दीक्षा दी गई थी, और जब पुनः उसके आचार्यों ने उसका नाम बदलकर ’आत्मीयता’ कर दिया था तो उसे आश्चर्य हुआ था कि क्या मेरे नाम के इतने प्रकार हो सकते हैं ?
तब आचार्य ने उसे स्पष्ट किया था :
"सभी का एक ही नाम है : ’मैं’ । यह नाम सबका होने से हर कोई इससे अपने-आपको तो जानता है किन्तु अपने-आपका नाम दूसरों के लिए कुछ और होना ज़रूरी है, ताकि सब एक-दूसरे को पहचान सकें । हर पहचान हमेशा बनती-मिटती रहती है, जबकि ’मैं’ की पहचान बनती-मिटती नहीं । इसलिए अपने को जाना जाता है, दूसरों को पहचाना जाता है।
इसलिए (दूसरों की) पहचान तात्कालिक होती है, जबकि ’मैं’ को जानना; - 'मैं' की पहचान बिना नाम के भी स्थायी, हमेशा बनी रहती है । फिर एक ही मनुष्य में क्या ऐसे दो ’मैं’ होते हैं ? अगर दो ’मैं’ नहीं होते, तो एक भी अपने-आपको कैसे पहचान सकेगा ? इसलिए ’मैं’ न तो एक है, न दो या अनेक । फिर यह ’नहीं है’ ऐसा कहना भी गलत होगा ।
इसलिए ’मैं’, ’ईश्वर, ’महेश्वर’ ’परमेश्वर’ 'सच्चाई', 'यकीन'  एक-दूसरे के ही अलग-अलग नाम हैं ।" 
"और हातिम ताई ? ... ’आत्मतया’? ... ’आत्मीयता’, ...'यकीन', ...'सच्चाई'?"
"सभी नाम हैं भाई ! नाम न हो तो क्या तुम नहीं होते?"
हातिम ताई को फिर भी अपना यह नया नाम ’आत्मीयता’, -’आत्मतया’से अधिक अच्छा लगा था ।
इसकी एक वजह यह भी थी कि इससे उसे अपने माता-पिता याद आते थे,
जिन्होंने उसका नाम हातिम (ताई) रखा था।  
--     

Tuesday, 23 July 2019

प्रवृत्ति मार्ग / निवृत्ति मार्ग

श्रीभृगु-संहिता (मूल)
आत्मतया तदा गुरोः भृगोः वा इत्युक्तवान् ।
प्रभो ब्रूहि कथां बलेः वामनस्य ममश्रुणुवे ॥
--
तब आत्मतया (हातिम ताई) ने आचार्य भृगु से कहा :
"हे प्रभो ! मुझसे कृपया राजा बलि तथा वामन की कथा कहें । मैं आपके मुख से इस कथा का श्रवण करना चाहता हूँ ।"
ऋषि भृगु ने तब कहना प्रारंभ किया :
पुराकल्प में किसी समय दैत्यराज बलि ने अत्यन्त पराक्रम से तीनों लोकों को युद्ध में परास्त कर सम्पूर्ण पृथ्वी सहित सर्वस्व दान कर दिया ।
किन्तु दान देने के गर्व से उसका अहंकार और भी अत्यन्त दृढ तथा प्रबल हो उठा ।
तब भगवान् नारायण ब्राह्मण बटुक (वामन) वेश धारण कर उसके समक्ष आ खड़े हुए ।
उस समय हमारे पूर्वकुल में हुए आचार्य भृगु जो उस काल में राजा बलि के राजपुरोहित एवं भी राजगुरु भी थे,
ने बलि को चेताते हुए कहा :
"यह बटुक ब्राह्मण कोई और नहीं, ब्राह्मण के वेश में साक्षात् भगवान् हरि श्रीमन्नारायण स्वयं हैं ।
तुम इनके धोखे में मत आओ ।"
जब राजा बलि ने उनसे दान ग्रहण करने की प्रार्थना की, और उन्हें दान में कौन सी वस्तु चाहिए,
यह प्रश्न किया तो ब्राह्मण वेश में अवस्थित बटुक बोला :
"मुझे केवल साढ़े तीन पग भूमि चाहिए ।"
जब राजा बलि ने हठपूर्वक गुरु की चेतावनी को अनसुना कर दिया, तो भार्गव उस पात्र के जल-मार्ग में जाकर बैठ गए, (जहाँ से दान के संकल्प के लिए शास्त्रोक्त रीति से जल हथेली पर छोड़ा जाता है ।)  ताकि जल न छोड़ा जा सके और राजा का संकल्प तथा दान पूर्ण न हो सके । तब बटुकवेशधारी वामन बोले :
"राजन् ! लगता है जल-पात्र की नली (चञ्चु / बिल) में कुछ कचरा आ जाने से जल का मार्ग अवरुद्ध हो गया है । तुम इस सींक से उस बाधा को दूर कर दो ।"
तब राजा बलि ने उस सींक से चञ्चु में स्थित बाधा को हटाने का यत्न किया ।
चूँकि वहाँ आचार्य भृगु बैठे हुए थे और उस सींक से उनका दक्षिण नेत्र बिंध गया (विद्ध हो गया), इसलिए वे बिलबिलाकर उस बिल से बाहर आ गए ।
(तब से हमारे कुल तथा सम्प्रदाय में कृष्ण यजुर्वेद की परंपरा चल पड़ी ।)
आत्मतया ! (हातिम ताई !) तत्पश्चात् संकल्प पूरा हो जाने पर राजा ने बटुकवेशधारी बटुकेश्वर वामन से कहा कि वे साढ़े तीन पग चलें, - जितनी भूमि उनके पग के तले आ जाए, उसे दान में ग्रहण कर लें । तब वामन ने एक पग में मृत्युलोक को, दूसरे में स्वर्ग को तथा तीसरे में अंतरिक्ष को माप लिया और राजा से पूछा :
"आधा पग कहाँ रखूँ ?"
"प्रभो ! अब तो मेरा मस्तक (अहंकार) ही वह शेष स्थान है जिस पर आप अपना पावन चरण रखकर मुझे धन्य करें ।"
इस प्रकार आधे पग में, अर्थात् बाँए (तीसरे) पग में अन्तरिक्ष को माप चुके तीसरे पग पर खड़े वामन ने दाहिने घुटने (आधा पग) से बलि के मस्तक को दबाकर उसे पाताल भेज दिया अर्थात् पाताल का राज्य प्रदान किया ।
--
तब हातिम ताई अत्यन्त चकित हुआ  । उसने आचार्य से प्रार्थना की कि इस कथा का गूढ तात्पर्य भी उसे समझाएँ ।
उसके इस निवेदन पर आचार्य (भृगु) पुनः बोले :
"प्रकृति से उत्पन्न शरीर ही नारायण का पहला पग है जिस पर सबसे पहले अहंकार अपना आधिपत्य और स्वामित्व मान लेता है । यह मान्यता ही मन है । अहंकार के विकास और विस्तार के साथ वह बलवान् (बली) होकर मन रूपी साम्राज्य का स्वामी बन बैठता है और अपने आपको एक स्वतंत्र एकछत्र राजा घोषित करता है ।
तीसरे पग में वह मन से संयुक्त अहंकार / मन; - अन्तरिक्ष (मन के गूढ रहस्य) में विचरता रहता है । चूँकि अन्तरिक्ष असीम और अनन्त है इसलिए वह उसका अतिक्रमण नहीं कर पाता ।
पहले पग की भूमि (जन्म), दूसरे पग की भूमि (शरीर) का अतिक्रमण तो मन / अहंकार अनायास ही कर लेता है किन्तु मन से पूर्व (जो तत्व है उस तत्व) का अतिक्रमण करना उसके लिए संभव नहीं ।
वह भूमि नारायण की है । वह भूमि नारायण को समर्पित कर दिए जाने के बाद भी मन / अहंकार दान के उद्धत मस्तक गर्व से भरा खड़ा रहता है । जब उस गर्व को वामन अपने दाहिने घुटने से कुचलकर नष्टप्राय कर देता है, तब वह मन / अहंकार पाताल में जाकर छिप जाता है किन्तु फिर भी नष्ट नहीं होता क्योंकि वह आत्मा का अंश है, जबकि नारायण सम्पूर्ण आत्मतत्व है ।
कठोलिक परंपरा में इसे ही जानने की दूसरी प्रक्रिया है जिसकी शिक्षा कठोनिषद् और तैत्तिरीय उपनिषद् आदि से प्राप्त होती है ।
कापालिक परंपरा में इतनी कठिनता नहीं है ।
कापालिक परंपरा प्रवृत्ति-मार्ग है, कठोलिक परंपरा निवृत्ति मार्ग है ।
प्रवृत्ति मार्ग से वृत्ति परमेश्वर में लीन हो जाती है, निवृत्ति-मार्ग में अन्ततः अहंकार शेष रह जाता है जो परमेश्वर की कृपा से ही विलीन होता है ।
--
इति श्री भृगु-संहिता
--
(कल्पित)
--
[इस पोस्ट को लिखते समय ध्यान आया की इसी तिथि (24 जुलाई 1997) को पूज्य पिताजी का देहावसान हुआ था।  इसलिए यह पोस्ट उन्हीं की स्मृति को समर्पित है। ] 
-- 

Monday, 22 July 2019

The Semitic.

While writing the last post I suddenly knew that the word 'Semitic' is closely connected with this aspect of
'शमन-धर्म'
We can conveniently and convincingly arrive at the conclusion that the Sanskrit Language and the word 'Sanskrit' संस्कृत itself is a derivative of the word
'शं';
Though another way of elucidating could be by splitting the word as :
'सं' -स्कृत / सं कृत,
where the letter / वर्ण स् creeps in between  सं and कृत .
This also clarifies that संस्कृत is not संकृत (which means hybrid or admixture). 
संकृत is a word used in a derogatory sense, while संस्कृत is treated in the sense of 'refined'/ 'chaste' /शुद्ध / परिमार्जित .
Whatever be the truth, the word 'Semitic' could be interpreted in both ways.
There is the Language that is what we know 'Semitic' and the tradition as well that is thought of as 'Semitic'.
--
जब हातिम ताई ने आचार्य के मुख से 'ईश्वर' और 'परमेश्वर' सुना तो उनसे जिज्ञासावश पूछा :
"क्या ये दोनों एक ही नहीं हैं ?"
"एक हैं, और अनेक भी हैं, - और एक अथवा अनेक से विलक्षण भी हैं।  इसलिए ये एकवचन, द्विवचन और बहुवचन भी हैं।"
हातिम ताई को कुछ स्पष्ट नहीं हुआ।
"अभी इसे समझने की जल्दी मत करो ।"
हातिम ताई को वे दिन याद आए जब कापालिकों के नगर में विष्णु-प्रतिमा के सामने स्थित दो गरुड-स्तंभों में से एक पर स्थित गरुड-प्रतिमा और दूसरे पर बैठे वास्तविक गरुड़ के बारे में उसे यही संशय हुआ था :
"क्या ये दोनों एक ही नहीं हैं ?"
तब आसपास खड़े लोगों ने उसे अचरजभरी निगाहों से देखा था क्योंकि उनमें से किसी को इस बात की कल्पना तक नहीं थी कि हातिम ताई का आगमन उनके बीच क्यों और कैसे हुआ था। क्योंकि वास्तव में उन दोनों में से किसी ने उसे उसके घर से अपहृत कर वहाँ से कुछ दूर एक ख़जूर के पेड़ पर ला रखा था।
हातिम ताई ने भी फिर और आग्रह नहीं किया।
बहुत दिनों तक नित्य शान्ति-पाठ करते करते उसे कौंधा कि जैसे 'शं' ही मित्र है और 'शं' ही वरुण है; जैसे 'शं' ही अर्यमा (होता) है और  'शं' ही इन्द्र तथा बृहस्पति है, ... और जैसे 'शं' ही विष्णु उरुक्रम भी है, ठीक उसी तरह वे दोनों एक हैं, अनेक हैं तथा एक और अनेक से विलक्षण भी हैं।
विस्मय से भर गया था वह।
आचार्य ने जब उसे विस्मय-चकित देखा तो पूछा :
"क्या हुआ ?"
कुछ पल तक तो वह कुछ बोल ही न सका।
फिर उसने कहा :
"आचार्यजी ! मैं जिस स्थान से आया हूँ उस कापालिकों के नगर में एक बड़ा मंदिर है जहाँ 360 प्रतिमाएँ ईश्वर की हैं, किन्तु परमेश्वर की कोई प्रतिमा नहीं हैं। 'कठोलिक' सम्प्रदाय के भृगु अङ्गिरा परंपरा के आचार्य समझ गए कि हातिम ताई कहाँ से आया था।
उन्होंने कहा :
"वे प्रतिमाएँ 24 तत्वों की हैं और प्रत्येक प्रतिमा एक ही आदित्य की है।
इस तरह आदित्य 12 होकर भी प्रतिमा के रूप में 24 तत्व भी हैं। और प्रत्येक तत्व पुनः कृष्ण-पक्ष तथा शुक्ल पक्ष  के पंद्रह पंद्रह दिनों का होता है। इस प्रकार वे 360 प्रतिमाएँ, वर्ष की 360 तिथियों के रूप में संवत्सर की ही प्रतिमाएँ हैं जिनमें से प्रत्येक ही संवत्सर है।"
हातिम ताई का विस्मय तब और भी बढ़ गया था।
बहुत दिनों बाद उसे याद आया कि कापालिकों के उस मंदिर में एक भव्य स्वर्ण तथा रत्न-जटित शिव-लिङ्ग भी था जिसे वे लोग 'परमेश्वर' या 'ईश्वर' भी कहते थे।
तब उसने एक दिन आचार्य से  प्रश्न किया कि क्या 'ईश्वर', 'परमेश्वर' तथा 'महेश्वर' एक ही हैं ?
तब आचार्य बोले :
"हाँ ! उन्हें ही 24 तत्वों के रूप में भी देखा जाता है, जिसकी चर्चा मैंने तुमसे पहले भी की थी। "
आचार्य को भी यह जानकर आश्चर्य हुआ कि हातिम ताई को 'महेश्वर' के बारे में कैसे पता चला ?
वैसे आचार्य को यह भी ज्ञात था कि साङ्ख्य के आचार्य कपिल, भगवान् कपालीश्वर के भक्त भी थे, और उन्हें उनका ही अवतार भी कहा जाता है। आचार्य ने इसी आधार पर 24 तत्वों के उल्लेख से हातिम ताई को इसका संकेत भी दिया। 
तब उन्होंने उसे बताया :
"इस पूरे क्षेत्र की लोकभाषा में ईश्वर को ईसर या इस्र तथा महेश्वर को महेसर या मिस्र कहा जाता है। मिस्र उस स्थान का नाम है जो यहाँ से बहुत दूर है।"
तब हातिम ताई को याद आया कि वास्तव में गरुड़ ने उसे उसी 'मिस्र' में स्थित उसके घर से पहली बार तब उठाया था, जब वह दो-तीन साल की आयु का था और अपने घर के बाहर अकेला ही खेल रहा था।  वह प्रायः किसी अज्ञात प्रेरणा से उस रेगिस्तान की रेत से शिव-लिङ्ग बनाकर उसे ईश्वर मानकर, शीश झुकाकर, दोनों  हाथ जोड़कर उसके सामने कुछ बुदबुदाता रहता था। हाँ उसने एक या दो बार माता-पिता के साथ 'मिस्र' के दर्शन भी किए थे।
हातिम ताई बहुत देर तक देह-भान भूलकर आनंदमग्न दशा में बैठा रहा।
--
(24 तत्वों और 3 गुणों से ही 72000 नाड़ियों में;
- प्राणों की गति परिभाषित, प्रकाशित और व्यक्त होती है। )
--            
         

     
    

Thursday, 11 July 2019

अधिकारी और पात्र

कापालिक
--
हातिम ताई का अधिकांश बचपन और कैशोर्य कापालिकों के देश में व्यतीत हुआ था ।
बचपन से वह इस अर्थ में ब्रह्मचारी था कि उसकी सभ्यता और संस्कृति में काम-भावना का संबंध दैहिक वृत्ति तक सीमित था । इस अर्थ में विवाह के बाद उसकी पत्नी ने उसके पुत्र-पुत्रियों को जन्म दिया किन्तु उसने कभी काम-भावना को मन का विषय नहीं बनाया । न तो वह काम-अनुभव को स्मृति का और न कल्पना का साधन बनाता था । हमें यह शायद असंभव जान पड़े किन्तु इसका एक कारण यह भी था कि कापालिकों की सभ्यता-संस्कृति में ईश्वर की पूजा भी लिंग-स्वरूप में की जाती थी इसलिए इसे उपहास, निन्दा या मनोरंजन की दृष्टि से देखने की कल्पना तक कर पाना उनके लिए असंभव था ।
वे सभी पुरुष एवं स्त्रियाँ इस दृष्टि से वैसे भी एक-पत्नीव्रत या एक-पतिव्रत का पालन करते थे कि पति या पत्नी वंशवृद्धि का साधन है, और भले ही एक पुरुष की एक से अधिक पत्नियाँ हों या एक स्त्री के एक से अधिक पति हों, विवाहेतर काम-संबंध रखना उनके लिए अकल्पनीय ही था ।
इस प्रकार कामवृत्ति का ऐसा संस्कार उनके लिए वैसा ही साधारण था जैसे भूख-प्यास, शीत-उष्ण, पीड़ा अथवा सुख के इन्द्रिय-भोग आदि से गुज़रना और निवृत्त होने के बाद मनोवृत्ति के रूप में उस बारे में कोई कल्पना या स्मृति तक न पैदा हो । हम कह सकते हैं कि यद्यपि उनका शैक्षिक विकास अल्पप्राय था, वे न तो पढ़े लिखे थे, न साहित्य या कलाओं में दक्ष थे, वे तो बस प्रकृति-प्रदत्त आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनायास उस कर्म में प्रवृत्त होते थे जिसकी प्रवृत्ति उस समय उनके शरीर में सक्रिय होती थी ।
एक दृष्टि से वे गीता के उस श्लोक की शिक्षा पर आचरण करते थे, जिसमें कहा गया है :
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥२२
(अध्याय १४)
इसलिए यद्यपि विवाह नामक संस्था उनके समाज में अवश्य थी किन्तु यह नैतिक-अनैतिक के कठोर नियमों से बँधी नहीं थी ।
शायद ही कोई पुरुष किसी अपनी या पराई स्त्री को भोग की वस्तु की तरह देखता, ऐसा विचार, कल्पना करता था, और न ही कोई स्त्री किसी अपने या पर-पुरुष को इस प्रकार देखती, ऐसा विचार या कल्पना करती थी ।
बहुत संक्षेप में वे काम के मानसिक-स्वरूप से जकड़े हुए न थे । शायद कभी दुर्घटनावश ऐसी स्थिति बन जाती जब इस प्रकार के संयोग घटित हो भी जाते थे तो वे दुःस्वप्न समझकर उसे बस हृदय से भूल जाते थे । न उसकी चर्चा करते, न निन्दा, न उसमें किसी प्रकार का गौरव अनुभव करते, न उसे महिमामण्डित करते, न किसी से ईर्ष्या, प्रतिशोध या अपराध या अपमान अनुभव करते ।
आज के युग में यह कुछ अटपटा और शायद असंभव भी लग सकता है किन्तु जब हम हातिम ताई के उन अनुभवों के बारे में जानेंगे जो उसे कठोलिकों की सभ्यता और संस्कृति में रहते हुए प्राप्त हुए तो हमें स्पष्ट हो जाएगा कि कठोलिकों की सभ्यता और संस्कृति की प्रेरणाएँ किस प्रकार कापालिकों की प्रेरणाओं से कुछ भिन्न थीं ।
कठोलिक
--
जैसा कि गिरीश (ग्रीस) देश में ऋषि आचार्य शुक्र के कुल (भृगु-कुल) के प्रभाव में समाज और सभ्यता तथा संस्कृति अपने विकास के चरम पर थी, यह समझना कठिन न होगा कि कठोलिक मनोवृत्ति से उसी प्रकार का व्यवहार करते थे जैसा कि कापालिक शारीरिक वृत्तियों के संबंध में करते थे । उनका भी अलिखित विधान यही था जिसका प्रयोग वे मन पर करते थे । बिल्कुल वही प्रेरणा, जिससे कापालिक देह के स्तर पर भी आचरण करने मात्र से धर्म के अनुकूल चलते हुए परम श्रेयस् (पुरुषार्थ) सिद्ध करते थे । वही प्रेरणा जो मानों उन्हें गीता के इसी श्लोक से मिलती हो ।
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥२२
(अध्याय १४)
इस प्रकार देह की वृत्तियों को मन का विषय न बनाते हुए, उन वृत्तियों की निन्दा या प्रशंसा न करते हुए, उनका उपहास, अपराध या गौरव-बोध अनुभव न करते हुए, शरीरधर्म की और मनोधर्म की बाध्यताओं तथा मर्यादाओं को समझकर विवेकपूर्वक वे समस्त मनोवृत्तियों से उदासीन रहते हुए आत्मधर्म की जिज्ञासा और अनुसंधान करते थे ।
इस प्रकार शरीरधर्म और मनोधर्म के मध्य किसी प्रकार की टकराहट प्रायः नहीं होती थी ।
गीता के अध्याय् १४ के उपरोक्त उल्लिखित श्लोक २२ के तुरंत बाद का ही श्लोक इस प्रकार है :
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥२३
जिसकी भूमिका इस अध्याय से पूर्व के अध्याय ९ के निम्नलिखित श्लोक में भी दृष्टव्य है:
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं  तेषु कर्मसु ॥९ 
(अध्याय ९)
--
किन्तु कठोलिकों की परंपरा इस दृष्टि से कापालिकों से भिन्न थी कि वे उस निवृत्ति-मार्ग पर चलते हुए आत्मानुसन्धान करते थे जिससे उनके पूर्व-पुरुष आचार्य
उशना वा वाजश्रवा (उशन् ह वाजश्रवसः सर्ववचसं ददौ -कठोपनिषद्)
 ने अपना सब कुछ विश्वजित यज्ञ के अनुष्ठान के समय दान कर दिया था । और तब उनके पुत्र नचिकेता ने प्रश्न किया था :
"फिर तो आप मेरा भी दान कर देंगे?"
उसके पिता जानते थे कि नचिकेता ने उसके पुत्र के रूप में इस मृत्युलोक में जन्म लिया और जिस दिन भी विधाता ने लिखा होगा, वह उससे पूर्व या वह स्वयं उसके बाद मृत्यु के अधिष्ठाता देवता यम के लोक को प्राप्त होगा । इस अटल सत्य को जानते हुए ही उसने पुत्र से कहा :
"मृत्यवे त्वा ददामीति ॥"
(मृत्युवे त्वा ददामि इति) 
तात्पर्य यह कि ’यह घर, स्त्री, पुत्र, धन, ज्ञान, इत्यादि ’मेरा है’, इस प्रकार का ज्ञान प्रथमतः ’मेरे द्वारा अपने-आपके ज्ञान’ के होने के उपरान्त ही घटित होता है ...’ इस सरल तथ्य के प्रति जागृत होकर विवेकपूर्वक उसने यमराज को वह (पुत्र) दान कर दिया अर्थात् लौटा दिया ।
कापालिक केवल ईश्वर-समर्पण बुद्धि से ’प्रवृत्ति-मार्ग’ पर चलते हुए, सहज और अनायास जीते हुए परम-श्रेयस् की सिद्धि कर लेते थे, जबकि कठोलिक अपेक्षाकृत भिन्न रीति से निवृत्ति-मार्ग (नेति-नेति) पर चलते हुए आत्मानुसन्धान करते थे ।
कठोपनिषद् अवश्य ही उनके सिद्धान्त का आधारभूत ग्रन्थ था ।
--
गरुड़ ने हातिम ताई को इस प्रकार इसीलिए चुना कि हातिम ताई दोनों प्रकार की शिक्षाओं के लिए पूर्ण अधिकारी और पात्र था ।
--                             

Tuesday, 9 July 2019

वैनतेयश्च पक्षिणाम्

श्रीमद्भग्वद्गीता (śrīmadbhagvadgītā )
अध्याय 10
प्रह्लादस्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥30
--
उपरोक्त श्लोक का अंग्रेज़ी लिप्यंतरण, और हिंदी तथा अंग्रेज़ी अर्थ,
मेरे गीता-सन्दर्भ ब्लॉग में देखा जा सकता है।
हातिम ताई ने स्मरणपूर्वक 'नाम' अर्थात् 'देवता' अर्थात् 'मन्त्र' अर्थात् 'प्रतिमा' का शुद्ध रूप इस प्रकार समझ लिया और उसका जप करने लगा कि कापालिकों की परंपरा का उच्चारण उसे विस्मृतप्राय हो गया ।
इसी बीच एक दिन उसे पुनः स्वप्न में गरुड़ के दर्शन हुए जिसने उसे मानवोचित वाणी में सूचना दी कि अब पुनः एक बार मैं तुम्हें लेने आया हूँ ।
इस बार गरुड़ अत्यन्त तेजस्वी आकृति में दिखाई दे रहा था ।
"वैनतेयोऽस्मि"
कहकर गरुड़ उड़ गया और उसी समय हातिम ताई की नींद भी खुल गई किन्तु वह स्वप्न भला वह कैसे भूल सकता था ।
दूसरे दिन उसने आचार्य से स्वप्न कह सुनाया ।
तब आचार्य ने उससे कहा :
"पूर्व-जन्म में अरजा का नाम विनता था जिसका पुत्र था गरुड़ । विनता का पुत्र होने से उसे वैसे ही ’वैनतेय’ नाम प्राप्त हुआ, जैसे इतरा के पुत्र को ’ऐतरेय’ नाम प्राप्त हुआ था । जैसे ऐतरेय में अत्यन्त वैराग्य और मुमुक्षा थे, वैसे ही वैनतेय भी अत्यन्त वैराग्य और मुमुक्षा से युक्त था ।
विनता और दोनों ही को प्रारब्धवश पक्षी-योनि में जन्म लेना पड़ा क्योंकि दोनों में प्राणत्व (वायु) प्रधान था ।
विनता किसी पूर्व-जन्म में हमारे (भृगु) वंश में ही अरजा के नाम से उत्पन्न हुई थी और बाद में उसकी प्रतिष्ठा नभ की तारका के रूप में आचार्य शुक्र के लोक में हुई ।
[इस प्रकार विनता और वीनस (Venus) का, तथा वैनतेय और फ़ीनिक्स (Phoenix) का साम्य दृष्टव्य है।]
प्राण-तत्व होने से उनका संपूर्ण नाश नहीं होता किन्तु प्रकृति और आकृति अवश्य बदलती रहती है ।
वही वैनतेय तुम्हें स्वप्न में दिखाई दिया । इसका फल यह है कि मृत्युलोक में तुम्हारी आयु हो जाने पर तुम्हें शेषशायी भगवान् विष्णु का लोक प्राप्त होगा । वही तुम्हें वहाँ ले जाएगा ।
वैसे भी संसार के अनित्य सुखों से हातिम ताई का मन भर चुका था इसलिए यह सुनकर वह और अधिक ईश्वर-स्मरण (नाम-स्मरण) करने लगा ।
एक दिन इसी प्रकार नाम-स्मरण करते हुए वह इतना तन्मय हो गया कि उसे देह और संसार का भान तक न रहा तभी उसे देह और संसार के भान से रहित लोक में गरुड़ की आकृति का एक तेज-पुञ्ज दूर से अपनी ओर आता दिखलाई दिया । हातिम ताई उस तेजपुञ्ज में समाकर इस लोक से विदा हो गया ।
तब आचार्य ने उसे समाधि दी, क्योंकि उसे जलाया नहीं जा सकता था और ऐसा करना शास्त्र का भी उल्लंघन होता ।
--
हातिम ताई का वैदिक देवता, नाम, मन्त्र, प्रतिमा का वैदिक रूप :
अल् आ ह ।
था, जो वैदिक ऋचा भी हो सकता है । यह वैदिक मन्त्र भी है, और उस ’वैदिक-देवता’ का नाम भी जिसकी प्रतिमा का वर्णन वैसे तो किया जा सकता है किन्तु वह प्रतिमा स्थूल रूप से दृश्य नहीं हो सकती । यद्यपि सूक्ष्म-स्तर पर वह इन्द्रियगम्य, मनोगम्य और बुद्धिगम्य भी अवश्य है । जिसे कापालिकों ने किन्हीं कारणों से बदलकार ’अल् आ ह’ तथा ’अल् आ ह उ’ कर दिया था, कठोलिक आचार्य की परंपरा में जिसका विधान और प्रयोजन कापालिकों के विधान और प्रयोजन से भिन्न है ।
’अल्’[अलोऽन्त्यस्य १/१/५२]
वैसे भी प्रत्याहार है जो ’अ’ से ’ह’ तक संपूर्ण वर्णों का संक्षेप है ।
पुनः उ वर्ण जो उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित तीनों प्रकार से उच्चारणीय है इसलिए भी इसका यहाँ सम्यक् प्रकार क्या होगा यह संशय भी है ही ।
ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः
(पाणिनीय -१/२/२७)
उपरोक्त मन्त्र भी यहाँ केवल वर्णों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है और इसे पढ़ने मात्र से इसका वास्तविक ध्वन्यात्मक  वैदिक उच्चारण क्या है
यह जान पाना या वैसा प्रयास करना भी मेरे अधिकार से परे है - यद्यपि मैंने इसे सुना अवश्य है ।
इसलिए भी वेद का अध्ययन और अध्यापन अधिकारी / पात्र द्वारा ही किया जाना चाहिए, न कि अनधिकारी / अपात्र द्वारा ।
--
टिप्पणी :
यह कथा  बाइबिल और क़ुरान के समय से पूर्ववर्ती काल की है और उस परिप्रेक्ष्य में नहीं है ।
कृपया इसे बाइबिल और क़ुरान से जोड़कर न देखें।
--                     

Monday, 8 July 2019

Last days of Hatim Tai

हातिम ताई : अन्तिम समय
--
ग्रीस (गिरीश) देश में रहते हुए हातिम ताई ने उतनी ही संस्कृत सीखी जितने से वह दूसरे लोगों से अच्छी तरह से बातचीत कर सकता था । वास्तव में उसने स्थानीय प्राकृत भाषा भर सीखी थी जो संस्कृत की सज्ञात -cognate मात्र थी । उसमें जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता था उनकी उत्पत्ति संस्कृत के मूल शब्दों से हुई थी ऐसा लग सकता है, किन्तु यह सही नहीं है ।
क्योंकि पूरी धरती पर ही मनुष्य द्वारा बोली जानेवाली सभी भाषाएँ वाणी के व्याकरण का पालन करती हैं, -न कि संस्कृत के व्याकरण का । किसी भी भाषा का व्याकरण चूँकि ’पौरुषेय’ (मनुष्य-निर्मित) होता है, इसलिए उस भाषा के पर्याप्त विकसित हो जाने के बाद ही प्रचलित रूप से सर्वसामान्य नियमों और रूढ़ियों के आधार पर सुनिश्चित किया जाता है । दूसरी ओर संस्कृत का व्याकरण वेद की ही तरह ’अपौरुषेय’ (ईश्वर-रचित) होने से ईश्वर की ही तरह नित्य और सनातन, शाश्वत और अमर है ।
संस्कृत के इस व्याकरण को यद्यपि इन्द्र, चन्द्र, काशकृत्स्न, कुमार (स्कन्द), शाकटायन, सारस्वत, अपिशल एवं शकल ने अपने-अपने नियमों से अभिव्यक्त किया किन्तु मनुष्य लोक में उनका स्वरूप क्रमशः भौतिक स्थूल और सूक्ष्म विज्ञान (Physical Science- Physics), रसायन स्थूल और सूक्ष्म विज्ञान (Chemistry) इन दो रूपों में इन्द्र द्वारा ही प्रकाशित किया गया । यदु अर्थात् चन्द्र ने स्मृति के आधार पर इसका संकलन किया जो इन्द्रकृत ऐन्द्र-व्याकरण से नितान्त भिन्न रीति से हुआ । इस व्याकरण का ज्ञान सर्वप्रथम देवलोक में बृहस्पति से इन्द्र को प्राप्त हुआ, जबकि (मनुष्य के) मृत्युलोक में चन्द्र को यही ज्ञान सूर्य से प्राप्त हुआ । यद्यपि इन्द्र को अमर कहा जाता है किन्तु ऐसा कहना औपचारिक है । इन्द्र की आयु यद्यपि मनुष्य की आयु से कोटिगुनी अधिक है, किन्तु वह भी अन्ततः परमात्मा में एकीभूत हो जाता है, या पुण्यों के भोग के उपरान्त पुनः मनुष्य की तरह जन्म लेता है । चन्द्र का जन्म उसी तरह पृथ्वी से हुआ जैसे कुमार अर्थात् भौम का हुआ । मृत्युलोक में सूर्य ही इन्द्र है जबकि चन्द्र सूर्य से प्रकाश प्राप्त करता है और भौम स्व-ज्योतित है ।
शाकटायन उन राजाओं, व्यापारियों की भाषा का व्याकरण हुआ जो अनेक रथों से आवागमन अथवा बड़े-बड़े वाहनों / नौकाओं से वस्तुओं आदि का परिवहन (नौवहन -नौका से आना जाना, वहन -- बहना, जिससे अंग्रेज़ी के नेवी, नवल, नेविगेशन -Navy, naval, navigation, nautical आदि शब्द बनते हैं ।) करते हैं ।
सारस्वत ब्राह्मी तथा शारदा लिपियों में लिखी जानेवाली भाषाओं का व्याकरण है जिसका प्रयोग प्रायः उन सभी भाषाओं पर लागू होता है जिन्हें बाँए से दाईं ओर लिखा जाता है । इनमें से कुछ केवल स्वनिक (स्वर-आधारित अर्थात् Phonetic फ़ोनेटिक) तो शेष स्वरलिपि-आधारित (फ़ोनेटिक एवं रूपिम figurative) होती हैं ।
हातिम ताई का भाषा-ज्ञान केवल वाणी (के प्रयोग) -बोलने तक सीमित था ।
यद्यपि उस आश्रम में ताल-पत्र, भोज-पत्र और वस्त्र पर लिखे जानेवाले संस्कृत के अनेक ग्रंथ थे और ब्राह्मी लिपि में लिखी गई अनेक मृत्तिकामुद्राएँ (tablets, टेब्लेट्स) भी थीं, किन्तु वे सब हातिम ताई के लिए किसी उपयोग की नहीं थी । ब्राह्मी में लिखी चित्रलिपि के कुछ संकेतों को वह अवश्य समझ सकता था पर उससे अधिक कुछ नहीं । (इन्हीं वर्णों से बाद में भाषा लिखने की कोणीय-प्रणाली --कोनिकल-क्यूनिक- cuneiform  स्क्रिप्ट--बनी जिसका और विकास होकर फिनीशियन Phoenician-लिपि अस्तित्व में आई । ’अरजा’ के वीनस के रूप में हुए पुनर्जन्म से फ़ीनिक्स -- वीनस - सरस्वती - ब्राह्मी - शारदा -- विनीशियन - फिनीशियन / Phoenician से ही सुमेरियन Sumerian ही उन सारी लिपियों का आधार थी जो प्रागैतिहासिक काल में प्रयुक्त होती थीं और प्रायः सभी को दाएँ से बाएँ लिखा जाता था ।  फ़ीनिक्स (Phoenix) वही गरुड़ है जो मरकर अग्नि में जलकर भस्म होकर पुनः अग्नि से ही जन्म लेता है । संगीत की स्वरलिपि भी इसी लिपि और वर्णों / स्वरों के संकेत पर निर्धारित की गई जिसे ग्रथित / ’गोठिक’ Gothic रूप प्राप्त हुआ । यद्यपि  ग्रथित / ’गोठिक’ Gothic रूप में भाषा को बाएँ से दाएँ लिखा जाता रहा, क्योंकि वही वेद के लिखने की रीति है । वेद का ही एक प्रकार है ’साम’ जो ’सं’ से व्युत्पन्न है और इसी प्रकार संगीत का पर्याय है । इसी ’साम’ की वर्तनी spelling को कठोलिकों ने अपने प्रयोजन से परिवर्तित कर ’Psalm’ के रूप में लिखना प्रारंभ किया किन्तु इससे उच्चारण तथा अर्थ अपरिवर्तित ही रहा । यदि इस समय का युक्तपश्य-न्याय -- juxtapose-- कर काल-निर्धारण करें, तो वह संभवतः महाभारत युद्ध के कुछ सौ वर्षों के बाद का रहा होगा ।)
किन्तु इस बीच हातिम ताई के लिए सर्वाधिक रोमाञ्चक यदि कुछ था तो वह था उसका यज्ञोपवीत-संस्कार जिसमें आचार्य ने उसे एक साथ नाम-दीक्षा तथा मन्त्र-दीक्षा दी थी । जैसा कि किसी भी वैदिक देवता का स्वरूप नाम, मन्त्र, वर्ण (प्राण) और प्रतिमा इन चार प्रकारों में होता है, उसे जो नाम / मन्त्र दिया गया था यद्यपि वह कठोलिक संप्रदाय से उसे प्राप्त हुआ था किन्तु उसे बहुत आश्चर्य तब हुआ था जब उसे स्मरण हुआ कि इसे तो वह कापालिकों के बीच रहते हुए प्रायः सुना करता था । उसे स्मरण करते हुए और उसका उच्च्चारण करते हुए उसने आचार्य से जब प्रश्न किया कि जिसे उसने कापालिकों के बीच प्रायः सुना था क्या यह वही मन्त्र है?
जब उसने इस प्रकार कहते हुए आचार्य से इस मन्त्र के तात्पर्य की जिज्ञासा की तो उन्होंने उससे कहा :
"किसी भी मन्त्र के अर्थ की जिज्ञासा कभी मत करो । तन्त्र, मन्त्र और यन्त्र का विधान और प्रयोजन होता है । यही उनका महत्व है ।"
तब हातिम ताई ने पूछा :
"मुझे दिए गए मन्त्र का विधान और प्रयोजन क्या है?"
तब आचार्य ने हातिम ताई से मन्त्र का पुनः वैसा ही शुद्ध उच्चारण करने के लिए कहा जैसा कि उनके मुख से इसे उसने सुना था ।
हातिम ताई ने इसे निर्दोष रीति से यथावत् पुनः सुना दिया ।
अब तुम उस मन्त्र को भूल जाओ और पुनः कभी उसका उच्चारण भी मत करना ।
हातिम ताई को तुरंत ही स्पष्ट हुआ कि कापालिकों द्वारा प्रयुक्त किया जानेवाला उच्चार इस मन्त्र से बहुत कुछ मिलता जुलता है, फिर भी थोड़ा सा अलग भी अवश्य है ।
क्या था वह नाम, मन्त्र, देवता और देवता की प्रतिमा?
--
--क्रमशः--             

Saturday, 6 July 2019

भृगु-जाबालि ऋषि

भृगु-वल्ली
--
गिरीश (ग्रीस) नामक जिस देश में गरुड़ ने हातिम ताई को ला छोड़ा था वहाँ वह पूरे जीवन भर रहा ऐसा कह सकते हैं ।
उसने संस्कृत भाषा उतनी ही सीखी, जितनी उसे सिखाई गई थी ।
जैसा कि पूर्व में लिख चुका हूँ उशना (शुक्राचार्य), भृगु तथा भार्गव अर्थात् परशुराम तथा जाबालि ऋषि एक ही परंपरा अर्थात् वैदिक ऋषि-सम्प्रदाय के भिन्न-भिन्न कुलनाम हैं, जिनमें उत्पन्न हुआ या दीक्षित हुआ, इनमें से प्रत्येक होता है । फिर भी उनके कार्य-विशेष से उन्हें भिन्न-भिन्न रूपों में जाना जाता है ।
जैसा कि पूर्व में लिख चुका हूँ वन-मण्डल में अवस्थित उस भूमि पर महर्षि भृगु का आश्रम एवं गुरुकुल था जहाँ वे तैत्तिरीय-आरण्यक के उपनिषद् का अध्यापन करते थे ।
इसी उपनिषद् का उपसंहार ’भुगुवल्ली’ कहा जाता है ।
बहुत समय (सहस्रों वर्षों) तक इस आश्रम की परंपरा काष्ठवत् कठोर रीति से प्रचलित रही इसलिए संभवतः इसे ’कठोलीक’ या ’कठोलिक’ नाम प्राप्त हुआ ।
इसके बाद कालक्रम से इसमें ऋषि-परंपरा के अनुसार विभिन्न ऋषियों ने पात्रता की मर्यादा के अनुसार ’कठोपनिषद्’ का अध्ययन और अध्यापन भी किया होगा ऐसा अनुमान है ।
हातिम ताई के अवसान के बहुत बाद प्रचलित लोकभाषा में इस स्थान का नाम भृगु-वल्ली से बदलकर ’ब्रिज-वैली’ हो गया ।
समुद्र पार से दितिऋक्ष / Dietrich (यह भी शर्मन् / German राजाओं का कुलनाम है) के आक्रमण और आगमन के बाद धीरे-धीरे यह पूरा आश्रम और इसकी परंपरा विलुप्तप्राय हो गई ।
यहाँ उल्लेख्य यह है कि राजा दण्ड के राज्य में स्थित इसी आश्रम में कभी रघुवंश में उत्पन्न राजा ’दण्ड’ का आगमन हुआ जो इस आश्रम का शिष्य था और उसे आचार्य केवल धनुर्वेद की शिक्षा देते थे, न कि अन्य वेदों या वेदाङ्गों की । उसके आगमन के समय भार्गव ऋषि नित्य किए जानेवाले सन्ध्योपासन इत्यादि तथा दूसरे कार्यों से आश्रम में उपस्थित नहीं थे । आश्रम में उनकी परम सुन्दरी कन्या जिसका नाम ’अरजा’ था, के रूप-सौन्दर्य से प्रभावित होकर वह राजा कामावेग से व्याकुल हो उठा और उसने उसकी इच्छा के विरुद्ध उस पर बलात्कार किया । फिर वह वहाँ से चला गया ।
जब ऋषि आश्रम पर आये और उन्होंने ’अरजा’ को मलिन-मुख रोते हुए पाया तो उससे इसका कारण पूछा ।
तब उसने पूरा वृत्तान्त पिता को कह सुनाया ।
(सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड, सर्ग ८०, ८१)
पिता को यह सुनकर क्रोध हुआ और उन्होंने  राजा दण्ड को शाप दिया कि यहाँ अब सतत सात दिनों तक धूलिवर्षा होगी, जिसमें सम्पूर्ण राज्य दबकर भूमि से नीचे चला जाएगा । तब उन्होंने अपनी पुत्री से कहा :
तुम्हारे लिए यहाँ एक सुन्दर सरोवर है जिसके तट पर रहते हुए तुम इस पाप का प्रायश्चित् करो ।
(प्रश्न उठ सकता है कि अरजा ने ऐसा कौन सा पाप किया ?
इसका उत्तर यही हो सकता है कि विधाता समस्त प्राणियों को उनके पाप और पुण्य का फल प्रदान करता है किन्तु वह उचित समय आने पर ही उसे प्राप्त होता है ।)
उसके द्वारा प्रायश्चित् कर लिए जाने के बाद वह पुनः पितृगृह (नभोमण्डल स्थित शुक्र ग्रह) को प्राप्त हुई और अपने वंश में जाने पर उसे 'वंशी'/ 'वीणा'  नाम प्राप्त हुआ । उसे देवी सरस्वती ने कला और संगीत की शिक्षा दी और लोक में लोकभाषा (ग्रीक) में उसे ’वीनस’ नाम प्राप्त हुआ । 
तब अरजा को ऋषि ने आकाश में अपने ही स्थान पर प्रकाशित तारका की तरह अङ्गीकृत किया जो आज भी प्रातः व सन्ध्या समय दृष्टिगोचर होती है ।
यद्यपि विभिन्न कारणों से इस कथा की कल्पना ग्रीस देश से संबद्ध है, और 'वेनिस' / Venice शहर इटली में है, कथासूत्र से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह कथा इटली से संबद्ध है (क्योंकि Venice इटली का शहर है जहाँ इतना बड़ा जल-क्षेत्र है कि नावों से आवागमन होता है ।)
... दूसरी ओर Venus; जिसे ग्रीक भाषा में Aphrodite कहा जाता है,  भृगु या प्रीति से 'फ्रीड' 'प्रीतिं  / Friend और Fri, शुक्र के ही पर्याय / सज्ञात / cognate हो सकते हैं।   
भृगु-जाबाल-ऋषि
Compare : Brigitte - Gabriel 
--

Saturday, 29 June 2019

In Greece and Iraq

उपसंहार
--
गिरीश (ग्रीस) देश में भृगु शुक्राचार्य, उशना के उस वन-मंडल में स्थित ऋषि अंगिरा के गुरुकुल में जब वह पहुँचा तो अनेक पक्षियों की चहचहाहट उसके कानों पर पड़ी । भ्रमरों की गुंजार और वेदमन्त्रों के उच्चार के बीच उसकी मनःस्थिति इतनी ताजा हो गई कि वह विस्मित हो उठा ।
तभी दो तीन बालक सामने से आते हुए उसे दिखाई पड़े ।
वे परस्पर उसकी ओर इशारा करते हुए एक-दूसरे से कुछ कह रहे थे ।
जब वे निकट पहुँचे तो उन्होंने हाथ जोड़कर उसे प्रणाम किया और आश्रम की ओर संकेत किया । उन्होंने अपनी तरफ़ भी इंगित किया और पुनः उस आश्रम की ओर भी । उनका अनुमान था कि आगन्तुक उनकी भाषा नहीं समझ सकेगा और न वे उसकी भाषा समझ सकेंगे । अतः वे संकेत से काम चला रहे थे ।
वह उनके साथ आगे गया तो कुछ व्यक्ति जो दालान में बैठे थे उसकी ओर देखकर मुस्कुराने लगे ।
उन्हें वैसे उसकी भाषा आती थी परन्तु जब वह उनके सामने ही आसन पर आराम से बैठ चुका, तो पहले उन्होंने उससे संस्कृत में एक प्रश्न पूछा :
"ईराकोऽसि"
हातिम ताई चौंक उठा । वह अचंभित होकर कुछ कहता उससे पूर्व ही वे एक-दूसरे को देखकर हँसने लगे ।
"मुझे बहुत दिनों बाद किसी ने इस नाम से बुलाया है कापालिकों के शहर में कभी किसी ने मुझे इस नाम से नहीं बुलाया था ।"
कापालिक भाषा में ही हातिम ताई बोला, क्योंकि उसे पता नहीं था कि वे कौन सी भाषा बोलते थे ।
वैसे वे परस्पर व्यवहार में प्रायः संस्कृत या अन्य देशीय लोगों से प्राकृत भाषा में भी बोलते थे किन्तु हातिम ताई को देखकर उन्हें उसकी वेशभूषा से भी पता था कि वह कापालिक होगा । सबसे बड़ी बात यह कि गरुड़ पहले ही उनसे सब कह चुका था और वही उनके आदेश से उस देश से हातिम ताई को अपहृत कर वहाँ छोड़ गया था । अलबत्ता (अल् बत् आ) हातिम ताई इस सबसे बिल्कुल अनभिज्ञ था ।
ऋषि भृगु के उस गुरुकुल में उसे अभी कुछ दिन ही बीते थे किन्तु इस बीच सभी उससे अच्छी तरह घुल-मिल गए थे ।
प्रायः ऋषिगण प्रतिदिन सुबह दोपहर तथा सन्ध्या के समय प्रातः माध्यन्दिन और आह्निक होम हवन तथा वेदविहित ब्राह्मकर्म किया करते थे ।
उसके लिए यह सब बहुत रोचक और आश्चर्यपूर्ण भी था ।
तब उसने आचार्य से प्रार्थना की कि वे उसे भी इन अनुष्ठानों में शामिल करें ।
तब ऋषियों ने परस्पर मन्त्रणा कि की और एक उचित तथा शुभ मुहूर्त में उसे यज्ञोपवीत प्रदान किया ।
उसके सिर को इस प्रकार मुण्डित किया गया ताकि शिखा के केश बने रहें ।
वे लगभग आठ अंगुल लम्बाई के थे किन्तु उन्हें थोड़ा छोटा कर दिया गया फिर भी वे इतने लंबे थे कि शिखा को आसानी से छोटी में बाँधा जा सके ।
"इसे शिखाग्रन्थि कहते हैं । अब तुम द्विज हो ।"                               "
- आचार्य ने उससे कहा ।
आचार्य ने उससे उसके पूर्व जीवन के बारे में कभी कुछ नहीं पूछा यह सोचकर उसे थोड़ा आश्चर्य हुआ ।
त्रिकाल सन्ध्या सीखने के बाद जब उसे रुद्र सिखाया जाने लगा तो तुरंत ही उसे स्पष्ट हुआ कि यह तो वही है जिसे कापालिक भी करते थे !
कापालिकों के साथ रहते हुए उसने कभी यह सीखने का यत्न नहीं किया था ।
ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ ।
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥१॥
तम् ह कुमारम् सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाऽऽविवेश सोऽअमन्यत् ॥२॥
पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरीन्द्रियाः।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत्।।३।।   
स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यमिति।
द्वितीयं तृतीयं तं होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥४॥
(कठोपनिषद् १/१/१-४)
ऋषि उशन् (उशा अथवा उषा) वाजश्रवा के पुत्र थे । उनका एक पुत्र था जिसका नाम नचिकेता था । अभी वह १२-१३ वर्ष की आयु का बालक ही था कि उसने उन गौओं को दान के लिए ले जाते हुए देखा जो बूढ़ी हो चुकी थीं, न तो बछड़े दे सकती थीं न दूध, जो इतनी दुर्बल थीं कि उन्होंने चारा पानी इत्यादि का सेवन भी बहुत कम कर दिया था।  तब उसने मन में प्रश्न उठा कि जो ऐसी गायें दान करता है उसे आनंदशून्य जीवन की प्राप्ति होती है। (चूँकि इस यज्ञ में सर्वस्व दिया जाता है तब तो आप मुझे भी दान में दे देंगे, यह सोचते हुए) उसने पिता से प्रश्न किया :
"... तो आप मेरा दान किसे करेंगे?"
दूसरी बार, और तीसरी बार भी जब उसने पिता से पूछा तो वे क्रुद्ध हुए और बोले :
"तुझे मैं मृत्यु को दान में देता हूँ।"
ऋषि उशन् वही हैं जिनके बारे में गीता अध्याय १० में कहा है :
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः।
मुनिनामप्यहं व्यासः कवीनामुशनाकविः।।३७।।
--
उक्त श्लोक की व्याख्या अनेक प्रकार से की जा सकती है 'अहं / अहम्' नाम चूँकि उसी परमेश्वर का है जो जगत तथा समस्त भूतमात्र के रूप में सनातन रूप से व्यक्त है, इसलिए वे ही ऋषि उशन् के रूप में कवि हैं, और वे ही वासुदेव श्रीकृष्ण, धनञ्जय (अर्जुन) महर्षि वेदव्यास हैं।
इस प्रकार उशना कवि जो भृगु अर्थात् शुक्राचार्य हैं का ही उल्लेख यहाँ है।
--
कठोलिकों की साम्प्रदायिक परम्परा इन्हीं उशना कवि से शुरू होती है इसलिए 'कथोपनिषद्' उनका मूल ग्रन्थ अर्थात् वेद है। इसलिए वेद के अंतर्गत 'यह्व' भी समझा जाना चाहिए।  जाबालि ऋषि यद्यपि वैदिक ऋषि हैं किन्तु वे शैव मत के ऋषि होने से कापालिक भी हैं।  इसी प्रकार ऋषि भृगु कठोलिक भी हैं।
उपरोक्त विवेचना इसलिए की जा रही है कि ग्रीस (गिरीश) के इतिहास को तारतम्य से समझा जा सके।
सारे कथासूत्र इस तथा हातिम ताई के माध्यम से यहाँ संकेत रूप में प्रस्तुत किए जा चुके हैं।
अलं विस्तरेण ।
(यह 'अलं' अरबी 'ल' या 'ला' की तरह नकारार्थक या 'बिना' के  प्रयुक्त होता है। यही 'ल' या 'ला' 'lest', 'less' तथा 'les' के रूप में तमाम यूरोपीय भाषाओं में प्राप्त होता है। अलं से उद्भूत 'अल्' जो all का व्यञ्जक भी है अरबी और दूसरी भाषाओं में बहुतायत से पाया जाता है।  संस्कृत में इसका तुल्य शब्द है 'पूर्ण' अर्थात् समष्टि)
--
हातिम ताई का क़िस्सा भी यहाँ पूरा होता है। इसमें जिन पात्रों / चरित्रों का उल्लेख है उनके बारे में इसी ब्लॉग की अन्य पोस्ट्स में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। इसलिए पाठक उन सूत्रों को अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार क्रमबद्ध कर सकता है।   
--       
 हातिम ताई का क़िस्सा भी यहाँ पूरा होता है। 
 ।। इति शं ।।      
 
       

             


Tuesday, 25 June 2019

ऐन्द्र और चान्द्र

कितने लोक?
--
हातिम ताई को उसी अचेत सी स्थिति में गरुड़ की वाणी पुनः पुनः सुनाई दे रही थी ।
"मैं समय को भी वैसे ही अपने पंजों में दबाकर यहाँ से वहाँ ले जा सकता हूँ जैसे तुम्हें उस दिन तुम्हारे घर से दबोचकर उठा लाया था और खजूर के उस पेड़ पर लाकर छोड़ दिया था । ..."
बीच-बीच में वह कहीं उसी तन्द्रा में अनेक तलों से गुज़रता रहा जिनका कोई तय धरातल नहीं था ।
"क्या गरुड़ यही वायु है जो तमाम चीजों को बिखेर देता है?"   
उसका चिन्तन भी बदस्तूर जारी था ।
तब उसकी चेतना में देवलोक की संरचना के बारे में ख़याल आने लगे ।
उसे लगने लगा कि अस्तित्व का संपूर्ण ज्ञान उसमें मानों बीजरूप में अव्यक्त अप्रकट है जो समय समय पर अभिव्यक्त और पुनः अव्यक्त होता रहता है, और उसी समय को गरुड़ ने अपने पंजों में दबोच रखा है ।
क्या ऐसे अनेक समय होते हैं ?
परस्पर नितान्त अछूते किंतु फिर भी सर्वथा अपृथक् भी?
क्या समय को परिभाषित किया जा सकता है?
क्या समय एक ऐसा लोक नहीं है जिसे स्वतंत्र रूप में तो नहीं पाया जाता फिर भी सभी घटनाएँ उसी के अन्तर्गत हुआ करती हैं?
और जब मैं (?) ’इस’ लोक में होता हूँ तो शेष सब घटनाएँ कहाँ, किस लोक में होती होंगी?
हातिम ताई स्वयं किसी स्वप्न जैसे एक तन्द्रालोक में था जहाँ उसे अपने उस शरीर का भान नहीं था जिससे संसार में वह वैसे ही जागता-सोता, उठता-बैठता, खाता-पीता और तमाम वह सब किया करता है जिसे उसके जैसे असंख्य शरीर / लोग (लोक) पृथ्वीलोक में किया करते हैं ।
अवश्य ही गरुड़ वायुलोक का देवता है और वही पृथ्वीलोक में हमें गरुड़ की तरह दिखाई देता है ।
तब उसे पहली बार यह समझ में आया कि वह (गरुड़) कैसे अतीत और भविष्य को भी अपने पंजों में जकड़कर उड़ सकता है !
साथ ही हातिम ताई को यह भी समझ में आया कि कैसे हर आत्मा (मनुष्य) का अतीत और भविष्य यद्यपि पत्थर की लकीर की तरह अचल-अटल होता है फिर भी वह उनसे बँधा नहीं होता ।
तब हातिम ताई चन्द्रलोक में प्रविष्ट हुआ ।
उसे अनायास ही चान्द्र व्याकरण स्पष्ट होने लगा ।
उसे अत्यन्त कौतूहल, जिज्ञासा और आश्चर्य हुआ कि यह सारा ज्ञान अब तक कहाँ विलुप्त था और अब अचानक ही क्यों उसे सब कुछ ऐसा साफ़ दिखाई दे रहा है जैसे जमीन को खोदते समय धरती में दबा कोई स्वर्ण-मुद्राओं से भरा घड़ा बाहर निकल आए जिसमें सौ-पचास सोने की मुहरें हों, जिन्हें वह दिन की रौशनी में देख रहा हो ।
तब उसे समझ में आया कि चान्द्र व्याकरण विभिन्न वर्णों के समास और समुच्चय और वर्गीकरण का एक तरीका है और यह वैसा ही एक लोक है जैसा इन्द्र का लोक अर्थात् ऐन्द्र व्याकरण होता है ।
अब उसमें यह कौतूहल जागृत हुआ कि ऐन्द्र-व्याकरण और चान्द्र व्याकरण में क्या भिन्नता है?
और उसे ऐन्द्र-व्याकरण की बनावट भी तुरंत स्पष्ट हुई ।
यह सब सिद्धान्ततः भी सत्य था और विस्तृत प्रकट रूप से भी उतना ही सत्य था ।
जैसे उसके हाथ केवल कुञ्जी ही नहीं, कुञ्जियों की पुञ्जीभूत पूञ्जी ही लग गई हो ।
तब उसका ध्यान पुनः चान्द्र-व्याकरण की ओर गया, क्योंकि चन्द्रलोक में होने पर उसके लिए यही सर्वाधिक संभव और उचित भी था ।
तब उसे चन्द्र का रहस्य स्पष्ट हुआ ।
जैसे इन्द्र ’इ न् द् र’ इन चार वर्णों का संयोग है वैसे ही चन्द्र ’च् न् द् र’ इन चार वर्णों का ।
ये चारों वर्ण भी जब उनका उच्चारण किया जाता है, प्राणयुक्त ’देवता’ होते हैं जो समस्त लोकों रूपी भवनों / भुवनों की ईंटें (इष्टियाँ) हैं जिनका ज्ञान काल और जीवन-मृत्यु के देवता यमराज ने कठोपनिषद् में नचिकेता को दिया था ।
किन्तु इसी पृथ्वीलोक अर्थात् मृत्युलोक में तो वर्ण ’च्’ का स्वतन्त्र अर्थ यद्यपि अत्यन्त गूढ और विशद है (जैसा कि दूसरे भी प्रत्येक वर्ण और उसके देवता का होता है) तात्कालिक अर्थ तो यही है कि वह ऐसा विस्तार / आधार है, जिससे ’चम्’ (चमत्), ’चिन्’ (चित् / चिनोति), चुम्ब् (ईषत्-स्पर्श) जैसी अनेक धातुएँ बनती हैं ।
उसे ध्यान आया कि यहाँ उसे इन्हीं तीन धातुओं का विस्तार से अवलोकन करना है ।
सृष्टि और लोकसृष्टि एक चमत्कार ही है जिससे अनायास और अकारण ही एकमेव चित्-तत्व पर द्वैत आरोपित हो जाता है ।
यह वैसा ही है जैसा कि ऐन्द्र व्याकरण (स्थूल भौतिक विज्ञान) में किसी चुम्बत्व-प्रवण धातु (magnetic-metal)  के एक पिण्ड (mass / body)  में प्रत्येक अणुमात्र में ही उत्तरी (N) और दक्षिणी (S) ध्रुव होते हैं, किन्तु उनकी सम्पूर्ण राशि बिखरी होती है और जैसे ही वह पिण्ड किसी चुम्बकीय क्षेत्र (magnetic field) में प्रविष्ट होता है, ये सभी अणु अनायास स्वतःसमायोजित होकर उस पिण्ड को एक पूर्ण चुम्बक (magnet) बना देते हैं । ठीक इसी प्रकार प्रकृति और पुरुष दो ध्रुव हैं जो वैसे तो अस्त-व्यस्त दशा में सर्वत्र होते हैं किन्तु जब कोई जड पिण्ड किसी चेतन-क्षेत्र में प्रविष्ट होता है तो तुरंत ही परस्पर समायोजित होकर उस पिण्ड में एक पृथक् जीव-चेतना की तरह व्यक्त हो उठते हैं ।
किन्तु हातिम ताई इससे आगे कुछ सोचता इससे पहले ही उसके समय की दशा बदल गई और वह पुनः तन्द्राविष्ट हो गया ।
--             
             
व्याकरण, ऐन्द्र और चान्द्र,