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Friday, 29 January 2021

उपमाण्डूक्योपनिषद्

 श्री शङ्कराचार्यकृत पञ्चीकरणम्

पूज्य भगवत्पाद आदि शंकराचार्य द्वारा








की गई एक छोटे से ग्रन्थ "पञ्चीकरणम्" की रचना, जिस पर श्री सुरेश्वराचार्य ने वार्तिका लिखी, विभिन्न उपनिषदों में से महत्वपूर्ण किन्तु कुछ कठिन, दुरूह तथा क्लिष्ट भी समझे जानेवाले माण्डूक्य उपनिषद् के अध्ययन में अत्यंत सहायक और उपयोगी है। 

ऐसा भी कहा सा सकता है कि श्री आचार्य शंकर द्वारा यह ग्रन्थ इसी उपनिषद् को सरलता से ग्रहण करने के लिए वेदान्त के अध्येताओं और मुमुक्षुओं की सहायता के लिए लिखा गया होगा। 

यही ग्रन्थ यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। 

आशा है साधकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। 

कृपया पृष्ठ क्रमांक के अनुसार 1,2,3,4,5,6 एवं 7 पृष्ठ समायोजित कर लें। 

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Thursday, 16 January 2020

अंतःप्रज्ञः-बहिष्प्रज्ञः / Extrovert-Introvert

बहिष्प्रज्ञ-अंतःप्रज्ञः-चेतोप्रज्ञः-उभयतःप्रज्ञः 
(बहिर्मुख-अन्तर्मुख-चेतोमुखः / प्राज्ञः / उभयतःप्रज्ञः)
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शैत्ये चैत्ये उत्तरायणम्
दक्षिणायनं तद्गतम्।
विस्मृतं तत्पूर्वायनम्।
पश्चिम्यां यद्भूतम्।।
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इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। 
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।
(गीता अध्याय 3)
पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। 
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छत्।।१ 
(मुण्डकोपनिषद् द्वितीय अध्याय, प्रथम वल्ली)
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प्रकृति स्वभाव से बहिर्मुखी है।
पुरुष स्वभाव से अंतर्मुखी।
मन पुरुष-प्रकृति का युग्म।
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आर्य जब भारत-भूमि से बाहर गए तो सर्वत्र उनकी अपनी भाषा, संस्कृति और दर्शन ने विश्व को गहराई से प्रभावित और प्रेरित किया। वे ही विदेशी जब पुनः भारत आए तो उन्होंने भारत की भाषा, संस्कृति और दर्शन का अध्ययन किया और अपनी बहिर्मुखी बुद्धि तथा दृष्टि से उनकी व्याख्या करने का उपक्रम किया।
फ़्रेंच भाषा में एक शब्द है chateau जिसका ध्वनि-साम्य और अर्थ-साम्य चैत्य से होने से कहा जा सकता है कि chateau चैत्य (बौद्ध विहार) का सज्ञात / अपभ्रंश cognate है। हो सकता है कि यह शैत्य का सज्ञात / अपभ्रंश cognate हो। यूरोप में शीत / शैत्य का प्रकोप तो सर्वविदित ही है।
यहाँ तक कि यह भी हो सकता है, 'शैतान' इसी शैत्य से व्युत्पन्न हुआ हो।
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ओमित्येतदक्षरमिदं-सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव ।
यच्चान्यत्-त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव।।१
सर्वंह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात्।।२ 
जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः।।३
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः।।४
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् , सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः।।५
एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्।।६
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय।।७
सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।।८
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राप्तेरादिमत्त्वाद्वाप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति
य एवं वेद।।९
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्वोत्कर्षयति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्या ब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद।।१०
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ।।११
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं
य एवं वेद।।११
      
               

 
     
     
माण्डूक्योपनिषद्