Wednesday, 19 September 2018

आलोक पथ / ध्वनितार्थ

ध्वनितार्थ / पञ्चमहाभूत
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खं ब्रह्म >
’क्’ से वर्णों की अभिव्यक्ति प्रारंभ होती है ।
’क्’ > कण्ठ्य वर्ण क्रमशः
क्, ख्, ग्, घ्, तथा ङ् हैं ।
कोऽयम् आत्मा ?
कः अयम् आत्मा ।
’क’ यह आत्मतत्व है ।
’ख’ ब्रह्म है ।
’क’ पुंल्लिङ्ग है,
’ख’ नपुंसकलिङ्ग है ।
ब्रह्म पुनः कारण-ब्रह्म और कार्यब्रह्म है ।
ध्वनि ब्रह्माणी अर्थात् सरस्वती, वाक् है ।
पञ्चमहाभूत क्रमशः :
भू, भुवः, स्वः, महः, जनः हैं ।
स्थूल जड पञ्चभूत (इन्द्रियगम्य) पृथ्वी, आप, वायु, आकाश और तेज हैं ।
सूक्ष्म चेतन इन्द्रियात्मक / आधिदैविक
गंध, रस, स्पर्श, शब्द तथा आलोक (द्युति) हैं ।
[इन्हें तन्मात्रा भी कहा जाता है ]
ये ही पाँच देवता तत्व हैं जो चर-अचर सृष्टि का जीवन हैं ।
ये पाँच स्थूल और सूक्ष्म, जड तथा चेतन महाभूत समष्टि जीव, जगत तथा देवता हैं ।
चूँकि बुद्धि में वे परस्पर भिन्न प्रतीत होते हैं और बुद्धि स्वयं भी तेज अर्थात् अग्नि तत्व है इसलिए बुद्धि उनमें श्रेष्ठतम है ।
बुद्धि स्वयं भी पुनः यांत्रिक या कृत्रिम प्रकार की होती है जिसका आदान-प्रदान किया जा सकता है ।
दूसरी ओर बुद्धि स्वयं देवता-रूप में अग्नि (द्युति) की तरह स्वयं को अभिव्यक्त करती है जिसका उद्गम कहाँ से होता है और कहाँ वह लौट जाती है इसका अनुमान इस कृत्रिम या यांत्रिक बुद्धि से किया जाना संभव नहीं, इसलिए उसका अधिष्ठान अंतरिक्ष है जो आकाश से भी सूक्ष्मतर तथा अन्तर्बाह्य दोनों स्तरों पर काल-स्थान से अव्याहत है । वह है परब्रह्म ।
किंतु परात्पर ब्रह्म जो स्वरूपतः द्वैतरहित है ब्रह्म तथा परब्रह्म के भेद से भी रहित है ।
ध्वनित अर्थ का प्रयोजन है भाषारहित संवेदन को भाषा में ध्वनि-रूप में कहना ।
इसलिए इस ध्वनि-रूप भाषा के असंख्य रूप और प्रकार होते हैं ।
माध्यम अर्थात् जिस चेतन-तत्व में सूक्ष्म मनोमय इन्द्रिय से उनका उद्गम और अनुभव पाया जाता है, वह स्वयं उपाधिरहित निरपेक्ष चेतना मात्र है । देह-विशेष में सूक्ष्म मनोमय इन्द्रियों की विद्यमानता होने पर उनके समूह को एकत्व प्रदान करनेवाली औपाधिक सत्ता है इन्द्र ।
पञ्च महाभूतों के चेतन स्वरूप की अभिव्यक्ति :
पृथ्वी > ख़ाक > ख़ाकी खं ब्रह्म की शक्ति है ।
आप > आब > आबी जल तत्व की शक्ति है ।
वायु > वात > बाद > बादी वायु तत्व की शक्ति है ।
आकाश > आ समान > आसमान > आकाश तत्व की शक्ति है ।
अग्नि > तेज > आ तेजस् > आतिश अग्नि तत्व की शक्ति है ।
इन सबकी सम्मिलित और समष्टि पुनः ’ख’ > ’खलीय’ ख़लाई आत्म-शक्ति है ।
इसलिए प्राणिमात्र में ये पाँचों मिलकर ही उसके आत्मस्वरूप को निर्धारित करते हैं ।
पुनः यह पूरी प्रक्रिया मूलतः भाषा से रहित है, किंतु इसे व्यक्त करने के लिए तो शब्द ही प्रथम और अंतिम आधार है ।
यह हुआ शब्द-ब्रह्म ।
शब्द-ब्रह्म इस प्रकार प्रक्रिया, उसकी ध्वनि तथा ध्वनि से संबद्ध तात्पर्य इन सब रूपों में ग्राह्य है ।
दूसरी ओर, शब्द-ब्रह्म ही बीजमन्त्रों और प्रार्थनाओं का आधार है ।
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सनातन पथ / आलोक पथ / ध्वनितार्थ 

Tuesday, 18 September 2018

आलोक पथ - वायु

आलोक पथ - वायु
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वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरङ्कृताः ।
तेषां पाहि श्रुधी हवम् ।
वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः ।
सुतसोमा अहर्विदः ।
वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे ।
उरूची सोमपीतये ॥
इन्द्रवायू इमेसुता उप प्रयोभिरा गतम् ।
इन्दवो वामुशन्ति हि ॥
वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू ।
तावा यातमुप द्रवत् ॥
वाय्विन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम् ।
मक्ष्वि१त्था धिया नरा ॥
मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम् ।
धियं घृताची साधन्ता ॥
ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पर्शा ।
क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥
कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया ।
दक्षं दधाते अपसम् ॥
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वायु आ याहि दर्शत इमे सोमाः अरं कृताः ।
तेषां पाहि श्रुधी हवम् ।
वाय उक्थेभिः जरन्ते त्वाम् अच्छा जरितारः ।
सुतसोमाः अहर्विदः ।
वायो तव धेन आ जिगाति दा शुषे ।
(दा > दाने, लवने, अवखंडने > द्यति, शोधने दायति, दानं > शुद्धिः, बन्धने > दामन् > सूत्रं, )
इन्दवः वां उशन्ति हि ॥
वायु-इन्द्रः च चेतथः सुतानां वाजिनी-वसू ।
तौ आ यातम् उप द्रवत् ॥
वाय्-इन्द्रः च सुन्वत आ यातम् उप निष्कृतम् ।
मक्षु-इत्-था धिया नरा ॥
मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम् ।
(रिश् > अद् )
धियं घृताची साधन्ता ॥
ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पर्शा ।
(ऋतेन, ऋतं ...)
क्रतुं बृहन्तं आशाथे ॥
कवी नः मित्रावरुणा तुविजाताः उरुक्षयाः ।
दक्षं दधाते अपसम् ॥
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आलोक पथ - अग्नि

सनातन पथ : आलोक पथ
- अग्नि 
॥ ॐ हरिः ॐ तत्सत् ॥
अग्निमीळे पुरोहितं  ।
होतारं रत्नधातम् ॥
अग्निः पूर्वेभिः ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत ।
स देवाँ एह वक्षति ।
अग्निना रयिमश्नवत्पोषमेव दिवे दिवे ।
यशसं वीरवत्तमम् ॥
अग्ने यं यज्ञध्वरं विश्वतः परिभूरसि ।
स इद्देवेषु गच्छति ॥
अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः ।
देवो देवेभिरा गमत् ॥
यदङ्गदाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि ।
तवेत्तत्सत्यमङ्गिरः ॥
उप त्वाग्ने दिवे दिवे दोषावस्तर्धिया वयम् ।
नमो भरन्त एमसि ॥
राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम् ।
वर्धमानं स्वे दमे ॥
स नः पितेव सूनूनवेऽग्ने सूपायनो भव ।
सचस्वा नः स्वस्तये ॥
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अग्नि न केवल स्वयंभू, विभु, प्रभु, बल्कि परिभू भी है, उसकी मैं आराधना करता हूँ ।
अंधकार में जो रत्न होकर तम को भेदकर उसका नाश करता है ।
अग्नि पूर्व के ऋषियों तथा नवीन से नवीन अधुनातन ऋषियों के लिए पूज्य है ।
वह (अग्नि) देवों का आवाहन करता है :
उनसे कहेगा : यहाँ आओ !
अग्नि के द्वारा रयि को भोजन से दिन-प्रतिदिन पुष्ट किया जाता है ।
यश को, वीरवत्ता को ।
(मैं उस) अग्नि की आराधना करता हूँ जो विश्व में सबके लिए यज्ञ का मार्ग प्रशस्त करता है ।
वह यहाँ से देवताओं में प्रवेश करता है ।
अग्नि होता, कवि, क्रतु, सत्य, चित्र, श्रवस्तम है ।
देवता, जो देवताओं के लिए भीतर बाहर प्रकट है ।
हे अग्नि तुम अपने भीतर प्रसुप्त रहते हुए भी, सबका कल्याण ही करते हो ।
तुमसे ही अङ्गिरा का सत्य वाणी के प्रकट न होते हुए भी  स्थिर है ।
(अङ्गिरा अथर्वा-अङ्गिरसः)
हे अग्नि तुममें ही हमारे नित्यप्रति के दोष अस्त (विलीन) होते रहते हैं ।
तुम्हें नमस्कार है, जो सर्वत्र व्याप्त हो ।
सभी दिशाओं को आलोकित व्यक्त्-अव्यक्त् करते हुए स्वप्रकाशित रहते हो ।
नित्य प्रतिदिन वर्धमान (आयु, विस्तार) रहते हो ।
वही अग्नि हमारे लिए पिता के समान है, ...
वैसे ही जैसा पिता सु-उपाय (भली-भाँति) पुत्रों के हित में संलग्न रहता है ।
वह, वही अग्नि हमारे लिए कल्याणप्रद हो ।
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Monday, 17 September 2018

आलोक-पथ

सनातन पथ 
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आलोक-पथ
जो है, और जो होता है ।
जो होता है, और जो प्रतीत होता है,
जो प्रतीत होता है और जो अनुभव में प्रतीत होता है,
जो अनुभव में प्रतीत होता है और यथावत् सत्य की तरह ग्रहण कर लिया जाता है ।
प्रतीति का संवेदन और संवेदन की प्रतीति ।
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भूलोक
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जो है वह है सत् ।
स्पष्ट है कि अस्तित्व सनातन है ।
सनातन अर्थात् काल के व्यवधान से रहित ।
काल स्वयं भी यदि है, तो होने मात्र से ही सत् में अधिष्ठित और अवस्थित है ।
काल यदि बौद्धिक अनुमान या निष्कर्ष, कल्पना या अवधारणा (concept or hypothesis) भी है तो बुद्धि पर आश्रित है और बुद्धि (intellect) की प्रकृति आने-जाने के स्वभाव की होती हो तो भी उसका एक उससे स्वतंत्र अधिष्ठान तो स्पष्टतः है ही जिसके सन्दर्भ में उसका आगमन और प्रस्थान होता है ।
यह है सत् जो वैसे अति अनिर्देश्य (that, which could not be pointed at) है, किंतु जब इसका वर्णन किया जाता है तो यह लोक तथा लोक की चेतना के रूप में द्वैतयुक्त प्रतीत होता है ।
उस समय इसका वर्णन जिसके सन्दर्भ में है वह चेतना तथा वह लोक भी होने मात्र से सत् की ही दो परस्पर अभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं ।
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सत् ’षद्लृ’ (सद्) धातु से बना पद है जिसका अर्थ है अव्याहत रूप से अवस्थित होना ।
जो अव्याहत रूप से अवस्थित है, अविकारी और अविनाशी तथा इसीलिए अनादि, सतत, अनंत और अजात भी है ही ।
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वही ’सत्’ चेतना और लोक इन दो अभिव्यक्तियों में प्रस्फुटित होकर जीव और उसका जगत् होता है ।
यह है निरपेक्ष सत् का सापेक्ष स्वरूप ग्रहण करना ।
यह ’होना’ स्वरूप से होनेवाला आभासी परिवर्तन (विकार) है ।
प्रथम धातु ’भू’ से समस्त अन्य धातुएँ बाद में प्रकट होती हैं, इसलिए भी धातुपाठ और गणपाठ भ्वादिगण से प्रारंभ होता है ।
क्रियापद धातु से ही बनते हैं जो निरंतर प्रकृति के विभिन्न लकार और अलङ्कार हैं ।
प्रकृति इस प्रकार पुरुष से सतत रास में है ।
रास जो रस से आविर्भूत होता है ।
भू से ही भूलोक आदि सप्तलोक प्रारंभ होते हैं ।
भू अर्थात् पञ्च महाभूत जो जगत् की नींव / बुनियाद (भू-नियातम्) है ।
मनुष्य और सभी जीवों का शरीर इसी भौतिक प्रकार का पाञ्चभौतिक विकार है जो काल में बनता और विनष्ट हो जाता है ।
भू से पुनः विभु, प्रभु और संप्रभु अवतरित होते हैं ।
स्वयंभू पुरुष ही जीव, देवता और ईश्वर के रूप में विभु, प्रभु और संप्रभु भी होता है ।
यह स्वयंभू जीव जब अपने वास्तविक स्वरूप पर मोहित बुद्धि का आवरण पाता है और जब माया की ही विक्षेप-शक्ति उसके प्रति उसे अपने से भिन्न अन्य जगत् की उपस्थिति की तरह स्वयं के उस जगत् से एक भिन्न अस्तित्व होने की प्रतीति पैदा करती है तो वह उस आभासतः भिन्न प्रतीत होनेवाले जगत् में असंख्य विविधताएँ कल्पित कर स्वयं को एक व्यक्ति या जीव-विशेष मान लेता है ।
उसी जीव के द्वारा जब इस जगत् को संचालित करनेवाली शक्तियों को अपने से बड़ी (वरीय) सत्ताओं की तरह कल्पित किया जाता है तो वे सत्ताएँ देवता-तत्व की तरह प्रभुत्वसंपन्न होने से प्रभु होती हैं और उन सबका तथा जीव-सत्ता का नियामक कोई एक ही ही स्वामी है इस कल्पना से जीव ही परमेश्वर को अज्ञात सर्वशक्तिमान सत्ता की तरह मान लेता है । स्पष्ट है कि ये सभी सापेक्ष सत्ताएँ हैं जो जीव-चेतना में ही भासित होती हैं किंतु ’सत्’ इन सबसे अप्रभावित निरपेक्षतः अविकारी एकमेव अधिष्ठान होता है ।
भू से भुवः लोक तक का विकास आधिदैविक का कार्यक्षेत्र है और मनुष्य का मन ही जीव में आधिदैविक सत्य से संपर्क का स्थान है ।
इसलिए मनस्तत्व का एक सिरा जहाँ आधिभौतिक स्वरूप का है, वहीं उसका दूसरा सिरा आधिदैविक स्वरूप का ।
अग्नि जैसे स्थूल रूप से आधिभौतिक का प्रथम साक्षात्कार है, वैसे ही अग्नि ही सूक्ष्म रूप से आधिदैविक का भी प्रथम साक्षात्कार है ।
साक्षात्कार अर्थात् संपर्क-सूत्र ।
"अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् ।"
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Sunday, 16 September 2018

~~ सनातन पथ ~~

~~ सनातन पथ ~~
दस वर्ष पहले कंप्यूटर से अभिभूत था।  जानता था कि इसका मुझे बहुत उपयोग हो सकता है, लेकिन यह नहीं पता था कि इसकी मुझे वाक़ई ज़रूरत थी भी या नहीं ! बहरहाल किसी भी कारण से क्यों न हो, मुझे यह प्राप्त हुआ और मेरी उत्सुकता को शांत होने का मौक़ा मिला।
मैं लिखना चाहता था।  खासकर कुछ अद्भुत् जो मैंने जीवन में पढ़ा था।  चाहे भगवद्गीता हो, श्रीनिसर्गदत्त महाराज, जे. कृष्णमूर्ति, श्रीरमण महर्षि का साहित्य हो, या पतञ्जलि का योगशास्त्र, कपिलमुनि का साङ्ख्य, या अद्वैत-दर्शन।
और जब लिखना ही था तो कंप्यूटर पर लिखकर 'सेव' किया जा सकता है, कम से कम 'हार्ड-कॉपी' में प्रिंट-ऑउट' लेकर सुरक्षित रखा जा सकता है।
यह सब मैं बस उत्सुकतावश ही करना चाहता था।  क्योंकि इस बहाने इन सब पुस्तकों का अपने ढंग से स्वाध्याय किया जा सके।  दुनिया के लिए नहीं।  संसार का कल्याण करना है या इससे पैसा, स्टेटस या शोहरत कमाना है यह विचार तक मुझे कलुषित जान पड़ता था।  किसी को 'इम्प्रेस' करने का भोंडा ख़याल कभी-कभी अवश्य आया करता था और इस ख़याल के आते ही मुझे तुरंत हँसी आने लगती थी।
मनुष्य का मन और इन्द्रियों की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वे बहिर्मुख होते हैं।
सद्दर्शनं 24 के अनुसार :
धिये प्रकाशं परमो वितीर्य
स्वयं धियोऽन्तः प्रविभाति गुप्तः ।
धियं परावर्त्य धियोऽन्तरेऽत्र
संयोजनान्नेश्वरदृष्टिरन्या ॥
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The Supreme gives the light to thought.
Within it, Himself hidden, He shines.
Hence to turn in the thought to unite within,
That is to see the Lord.
How else to see?
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इस प्रकार ईश्वर या सत्य को 'अपने' से बाहर खोजने का प्रश्न ही निरर्थक हो गया। फिर किसी को शिक्षा या उपदेश देना तो और भी व्यर्थ लगने लगा। इसलिए 'लिखने' का प्रयोजन सिर्फ़ यह रहा कि यह केवल टाइम-पास का रुचिप्रद काम था।
वेब के बारे में भी इसी प्रकार केवल कौतूहल भर था।  उसका भी मुझे कुछ उपयोग तो है लेकिन यह भी आवश्यक तो क़तई नहीं है।  कुछ संपर्क वेब के माध्यम से बने लेकिन पुनः यह लगा कि संसार में कोई किसी से जुड़ता नहीं केवल किसी उस माध्यम से भर जुड़ता है जिसमें उसकी दिलचस्पी होती है।  हाँ, एक सुख भी इसमें अवश्य होता है और हम उस सुख के अभ्यस्त 'एडिक्ट' हो जाते हैं। तब कोई दूसरा बेहतर दिखाई देनेवाला विकल्प मिलते ही पुराना सुख या वह सुख जिससे शेयर किया जाता था, वह अचानक बोझ लगने लगता है।  कभी-कभी हम उसे ढोते रहते हैं किन्तु उस संबंध की उम्र बीत चुकी होती है और फिर भी उसे बाध्यतावश ढोना हो तो हम उसे गौरवान्वित कर, खुद को ही भ्रमित किए रहते हैं।  कभी-कभी हमें अपराध-बोध भी होता है और हमें भीतर ही भीतर उससे घृणा तक होने लगती है।  नैतिक होने का दंभ और 'लोग क्या कहेंगे' इसकी चिंता हममें आत्म-निंदा का भाव पैदा कर देती है।  किंतु तब भी हम अंत तक नाटक करते रहते हैं।  हम खुद को भी यातना देते रहते हैं और दूसरों को भी।  हम खुद को भी भ्रमित किए रहते हैं और दूसरों को भी।  यह भ्रम केवल स्मृति के कारण ही पैदा होता है।  स्मृति अतीत को परिभाषित करती है और अतीत स्मृति को।  और हम यह नहीं देख पाते कि दोनों एक दूसरे के पर्याय मात्र हैं।  उनमें से कोई भी सत्य नहीं हो सकता।  कोई घटना कभी हुई यह ख़याल ही 'समय' का विचार है।  ऐसा कोई 'समय' न था, न है, न होगा।  उस 'समय' में ही हज़ारों चीज़ों के होने और 'बीतने' का विचार पैदा होता है और 'संसार' एक जीता-जागता जादू जान पड़ने लगता है।
लेकिन जब एक बार उस 'संसार' में सत्यता आरोपित हो जाती है तो उसकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती।  उसका अपमान करने का प्रश्न भी नहीं पैदा होता।  जो जादू अपने सामने प्रकट होता है, वह खुद ही विलुप्त भी होता रहता है।  और फिर वह अपने से जुदा, भिन्न हो यह भी नहीं हो सकता। तब भी उसका औपचारिक अस्तित्व तो मानना ही पड़ेगा - जिस पर चलने के लिए न तो मार्ग है, न मार्ग होना ज़रूरी।
मार्गविहीन एक सनातन-पथ। 
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Saturday, 8 September 2018

मनस्तत्व / The 'Mind'

मनस्तत्व / The 'mind'
विचार, बुद्धि, भावना, मोह, संस्कार और प्रमाद
Thought, intellect, emotion, passion, hidden tendencies and inattention.
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मन अर्थात् अंतःकरण नामक आधिदैविक सत्ता के ये छह तत्व परस्पर एक-दूसरे में व्याप्त होते हैं और इस तरह से एक ही तथ्य के भिन्न-भिन्न दिखलाई पड़नेवाले प्रकार हैं।
The 'mind' / the inner organ / the cosmic mind consists of these 6 elements which are distributed in each-other homogeneously. They though appear of different shades are one single fact only.   
बुद्धि से विचार का और विचार से बुद्धि का आगमन होता है।
Intellect causes thought and thought evokes the Intellect.
मोह से भावना का तथा भावना से मोह का आगमन होता है।
Passion causes the emotion and emotion evokes the Passion.
संस्कार से प्रमाद का तथा प्रमाद से संस्कार का आगमन होता है।
The hidden / latent tendencies cause the inattention and the inattention evokes the hidden / latent tendencies
आगमन अर्थात् उद्भव, प्राकट्य।
'evokes' means brings out...
स्मृति इन सब का संचित परिणाम है।
'memory' is the collective result / effect of all.
राग, द्वेष, काम, क्रोध, भय, लोभ, मत्सर, ईर्ष्या आदि भावना है, जबकि भावना को शाब्दिक आवरण देने से उसे ही विचार या बुद्धि के रूप में देखा जाता है।  प्रमाद अर्थात् विवेक का अभाव जब वृत्ति के औचित्य / अनौचित्य की परीक्षा किए बिना ही या तो मन उस वृत्ति से एक हो जाता है या उस वृत्ति से अन्य कोई भिन्न-प्रकार की वृत्ति उसका स्थान लेती है।
attachment, envy, lust, anger, fear, greed, jealousy, animosity are emotion while the same when given a verbal form are 'thought'. 
विचार और बुद्धि  रजोगुण-प्रधान हैं।
Thought and intellect are of the nature of activity.
भावना और मोह सतोगुण-प्रधान हैं।
Emotion and Passion are of the nature of light (and shadow)
संस्कार और प्रमाद तमोगुण-प्रधान हैं।
Hidden / latent tendencies are of the nature of lethargy / inertia.
ये तीनों गुण त्रिगुणात्मिका प्रकृति के ही तीन अंग हैं, एक ही शक्ति के तीन रूपों में होनेवाले भिन्न भिन्न कार्य।
These 3 attributes (गुण) are the 3 aspects of the three-fold 'Nature' / प्रकृति .
प्रस्तुत पोस्ट का केंद्रीय बिंदु है इस अध्याय 14 का श्लोक क्रमांक 10 . 
इस अर्थ में एक ही तथ्य एक ही समय पर 'अंतःकरण' में आपस में क्रीडारत तीन गुणों में से एक शेष दो पर वर्चस्व रखकर चित्त की वृत्ति को तमोगुण, रजोगुण या सत्त्वगुण की प्रधानता से प्रवृत्त करता है।  इसलिए मन निरंतर गतिशील रहता है।  
सतोगुण की प्रबलता होने पर विधेयात्मक चिंतन (positive thinking)  अनायास संभव हो पाता है, रजोगुण की प्रबलता होने पर नकारात्मक या सकारात्मक विक्षेपयुक्त चिंतन हुआ करता है जब मन आशा-निराशा, भय-लोभ, आदि द्वंद्वयुक्त भावनाओं में डोलता रहता है। तमोगुण की प्रबलता की स्थिति में निद्रा या मूढतायुक्त विचार नकारात्मक चिंतन (negative thinking) और उससे जुड़ी भावना चित्त पर हावी हो जाती है।   
The core-point of this post is the stanza 10 of Chapter 14 of Srimadbhagvadgita) .
At any time, the same 'fact', - The 'mind', governed by the 'Nature' behaves in the influence of one of the three attributes while the other two are in its control. The one that is at the helm becomes prominent and the other 2 the subservient. 
When the 'Light' / सतोगुण is prominent, the mind can see clearly with intelligence and see the prejudice, and the unjust. In other words; 'positive thinking' happens.
When the 'activity' / restlessness (रजोगुण) prevails over the other two attributes, the mind undergoes confusion, doubt, hope, anxiety, and despair at the same time.
When the 'Lethargy' / 'inertia' / तमोगुण prevails over the other two attributes, the mind undergoes sleep and can't see the things correctly and properly. This is when 'Negative Thinking' dominates the mind.
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भगवद्गीता अध्याय 14 के श्लोक क्रमांक 4 से श्लोक क्रमांक 20 तक इसे ही विस्तारपूर्वक स्पष्ट किया गया है।
Chapter 14, stanza 4 onwards 20 of Gita are reproduced here for the sake of a better understanding.
Please check the corresponding link for the English version.
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अध्याय 14, श्लोक 4,
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
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(सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासाम् ब्रह्म महत् योनिः अहम् बीजप्रदः पिता ॥)
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भावार्थ :
हे कौन्तेय (कुन्तीपुत्र अर्जुन)! समस्त योनियों में जितनी भी मूर्तियाँ (अनेक रूपाकृतियाँ) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महत् योनि, सबका आदिकारण प्रकृति अर्थात् महत्-ब्रह्म ही है (जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया था), जिसे मैं ही बीज प्रदान करता हूँ और इस प्रकार से मैं ही उनका पिता हूँ ।
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Chapter 14,  śloka 4

sarvayoniṣu kaunteya
mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ |
tāsāṃ brahma mahadyonir-
ahaṃ bījapradaḥ pitā ||
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(sarvayoniṣu kaunteya
mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ |
tāsām brahma mahat yoniḥ
aham bījapradaḥ pitā ||)
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Meaning :
This prakṛti / mahat-brahma is the mahat yoni  -Great mother, that conceives the seed of All the beings that are born in innumerable different body-forms. And I AM The Father, That provides the seed.
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अध्याय 14, श्लोक 5,
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
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(सत्त्वम् रजः तमः इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनम् अव्ययम् ॥)
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भावार्थ :
हे महाबाहु (अर्जुन)! सत्त्वगुण, रजोगुण, एवं तमोगुण प्रकृति से उत्पन्न ये तीनों गुण अविनाशी स्वरूप वाले देही (चेतन-तत्त्व) को देह में बाँधते हैं ।
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Chapter 14, śloka 5,

sattvaṃ rajastama iti
guṇāḥ prakṛtisambhavāḥ |
nibadhnanti mahābāho
dehe dehinamavyayam ||
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(sattvam rajaḥ tamaḥ iti
guṇāḥ prakṛtisambhavāḥ |
nibadhnanti mahā bāho
dehe dehinam avyayam ||)
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Meaning :
sattva, raja and tama,  these three attributes (guṇa) of manifestation (prakṛti) bind him to the body, to the one (the consciousness associated with the body), who takes himself as the body.
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अध्याय 14, श्लोक 6,

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयं ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥
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(तत्र सत्त्वम् निर्मलत्वात् प्रकाशकम् अनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन च अनघ ॥)
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भावार्थ :
हे अनघ (अर्जुन) ! (प्रकृति से उद्भूत तीन गुणों में से) सत्त्व उसमें निहित निर्मलत्व, प्रकाशकत्व, और शुचिता के कारण मनुष्य को सुख की भावना से बाँध देता है,  ।
अर्थात् ’मैं सुखी रहूँ, -हो जाऊँ’ इस विचार अथवा कामना के रूप में बंधन बन जाता है ।
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Chapter 14, śloka 6,

tatra sattvaṃ nirmalatvāt-
prakāśakamanāmayaṃ |
sukhasaṅgena badhnāti
jñānasaṅgena cānagha ||
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(tatra sattvam nirmalatvāt
prakāśakam anāmayam |
sukhasaṅgena badhnāti
jñānasaṅgena ca anagha ||)
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Meaning :
There, O stainless / sinless (arjuna)! Because of the clarity, intelligence, and purity inherent in 'sattvam', this aspect of 'prakṛti' binds one with the 'sense of happiness'.
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अध्याय 14, श्लोक 7,

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥
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(रजः रागात्मकम् विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तत् निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥)
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भावार्थ :
हे कौन्तेय (अर्जुन)! रागके स्वरूपवाले  रजोगुण को कामना (लालसा) तथा आसक्ति (लिप्तता) से उत्पन्न हुआ जानो, जो (रजोगुण) देह के स्वामी (जीव) को कर्म तथा उसके फल की आशा से बाँधता है ।
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Chapter 14, śloka 7,

rajo rāgātmakaṃ viddhi
tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam |
tannibadhnāti kaunteya
karmasaṅgena dehinam ||
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(rajaḥ rāgātmakam viddhi
tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam |
tat nibadhnāti kaunteya
karmasaṅgena dehinam ||)
--
Meaning :
Know the rajo-guṇa (passion), that is of the nature of identification, is born of desire and longings for pleasures. And the same (rajo-guṇa) binds the embodied being (soul / jīva) with the action (karma) and the hope of the fruits (karmaphala) of that action (karma)
--
अध्याय 14, श्लोक 8,

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥
--
(तमः तु अज्ञानजम् विद्धि मोहनम् सर्वदेहिनाम् ।
प्रमाद आलस्यनिद्राभिः तत् निबध्नाति भारत ॥)
--
भावार्थ :
हे भारत (अर्जुन)! तमोगुण को, जो समस्त देहधारियों के चित्त को मोहित करता है, उसे तो अज्ञान से उत्पन्न जानो । और वह (तमोगुण) उन्हें प्रमाद, आलस्य एवं निद्रा जैसी वृत्तियों से बाँधता है ।
--
Chapter 14, śloka 8,

tamastvajñānajaṃ viddhi
mohanaṃ sarvadehinām |
pramādālasyanidrābhis-
tannibadhnāti bhārata ||
--
( tamaḥ tu ajñānajam viddhi
mohanam sarvadehinām |
pramāda-ālasya-nidrābhiḥ
tat nibadhnāti bhārata ||)
--
Meaning :
O bhārata (arjuna)! Know well that tamoguṇa, (the attribute of inertia) in all the creatures, is caused by the (inherent) ignorance. And binds the mind through the tendencies (vṛtti-s) of distraction, indolence and drowsiness.
--
अध्याय 14, श्लोक 9,

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्त्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥
--
(सत्त्वम् सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयति उत ॥)
--
भावार्थ :
(आत्मा के स्वाभाविक स्वरूप को आवृत्त कर) सत्त्वगुण तो चित्त को सुख में प्रवृत्त करता है, रजोगुण कर्म में प्रवृत्त करता है, तथा हे भारत (अर्जुन)! तमोगुण ज्ञान को ढाँककर चित्त को प्रमाद में प्रवृत्त करता है ।)
टिप्पणी : इस प्रकार तीनों गुण आत्मा के स्वरूप को आवरित रखते हैं ।
--
Chapter 14, śloka 9,

sattvaṃ sukhe sañjayati
rajaḥ karmaṇi bhārata |
jñānamāvṛttya tu tamaḥ
pramāde sañjayatyuta ||
--
(sattvam sukhe sañjayati
rajaḥ karmaṇi bhārata |
jñānamāvṛtya tu tamaḥ
pramāde sañjayati uta ||)
--
Meaning :
bhArata (arjuna)! Driven by the attribute of harmony (sattvaṃ), the mind ( citta ) gets identified with joy and peace, driven by the attribute of passion (rajaḥ / rajas), the mind gets identified with  action, and driven by the attribute of inertia (tamaḥ / tamas) the mind gets identified with sloth, idleness.
--
अध्याय 14, श्लोक 10,

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥
--
(रजः तमः च अभिभूय सत्त्वम् भवति भारत ।
रजः सत्त्वम् तमः च एव तमः सत्त्वम् रजः तथा ॥)
--
भावार्थ :
रजोगुण एवं तमोगुण को दबाकर सतोगुण प्रबल हो उठता है, और रजोगुण भी सतोगुण एवं तमोगुण को दबाकर प्रबल हो उठता है । इसी तरह से तमोगुण भी सतोगुण एवं रजोगुण को दबाकर प्रबल हो उठता है । संक्षेप में एक समय में इनमें से कोई एक सर्वाधिक प्रबल, शेष दो पर हावी हो जाता है ।
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Chapter 14, śloka 10,

rajastamaścābhibhūya
sattvaṃ bhavati bhārata |
rajaḥ sattvaṃ tamaścaiva
tamaḥ sattvaṃ rajastathā ||
--
(rajaḥ tamaḥ ca abhibhūya
sattvam bhavati bhārata |
rajaḥ sattvam tamaḥ ca eva
tamaḥ sattvam rajaḥ tathā ||)
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Meaning : Overpowering rajoguṇa and tamoguṇa, satoguṇa prevails. Overpowering satoguṇa and tamoguṇa, rajoguṇa prevails. Overpowering satoguṇa and rajoguṇa tamoguṇa prevails.
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अध्याय 14, श्लोक 11,

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥
--
(सर्वद्वारेषु देहे अस्मिन् प्रकाशः उपजायते ।
ज्ञानम् यदा तदा विद्यात् विवृद्धम् सत्त्वम् इति उत ॥)
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भावार्थ : मन पर तीनों गुणों का प्रभाव निरन्तर पड़ता रहता है । पिछले श्लोक 10 में बतलाया गया कि किस प्रकार एक समय पर एक ही गुण शेष दो गुणों को दबाकर मन पर आधिपत्य कर लेता है । इस क्रम में जिस समय सत्त्वगुण प्रबल होता है देह के सभी द्वारों (मन तथा इन्द्रियों में) चेतनता, निर्मलता तथा नीरोगता (स्वास्थ्य, आरोग्य) का विस्तार होता है, क्योंकि जैसा इसी अध्याय के पूर्व श्लोक क्रमांक 6 में कहा गया, सत्त्वगुण जो कि सुख से बाँधता है, इन्हीं का कारक है । और चूँकि ये तीनों दशाएँ आत्मा की सहज स्वाभाविक अवस्था है, इसलिए मनुष्य को इनमें सुख की प्रतीति तथा फलस्वरूप तज्जनित सुख का आभास भी होता है । यह अवस्था सत्त्व की प्रबलता और प्रचुरता की द्योतक है ।
--
Chapter 14, śloka 11,

sarvadvāreṣu dehe:'smin-
prakāśa upajāyate |
jñānaṃ yadā tadā vidyād-
vivṛddhaṃ sattvamityuta ||
--
(sarvadvāreṣu dehe asmin
prakāśaḥ upajāyate |
jñānam yadā tadā vidyāt
vivṛddham sattvam iti uta ||)
--
Meaning :
Mind functions by the force, and under the influence of the three attributes (guṇa-s) of manifestation (prakṛti). As explained in the śloka 6 of this Chapter, 'sattvaguṇa' has the qualities of  consciousness, harmony, joy, intelligence, clarity, purity and cleanliness, and absence of ill, when 'sattvaguṇa' predominates over the other two attributes (namely rajoguṇa and tamoguṇa,)  one feels just happy and peaceful, content, which are the revelations of the nature of the essential Reality / Self. This further becomes 'experience' and the 'memory'. Thus 'sattvaguṇa' causes the sense of happiness. And as a consequence binds with 'pleasure'. This is again a bondage only, -not the freedom. When this happens, it is the indication of the preponderance of  'sattvaguṇa'.
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अध्याय 14, श्लोक 12,

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥
--
(लोभः प्रवृत्तिः आरम्भः कर्मणाम् अशमः स्पृहा ।
रजसि    एतानि    जायन्ते    विवृद्धे    भरतर्षभ ॥)
--
भावार्थ :
हे भरतर्षभ (अर्जुन)! लोभ, प्रवृत्ति (रुचि) कर्मों का आरम्भ, अशान्ति, और लालसा, रजोगुण के बढ़ जाने पर चित्त में ये सभी जन्म लेते हैं ।
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Chapter 14, śloka 12,

lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ
karmaṇāmaśamaḥ spṛhā |
rajasyetāni jāyante
vivṛddhe bharatarṣabha ||
--
(lobhaḥ pravṛttiḥ ārambhaḥ
karmaṇām aśamaḥ spṛhā |
rajasi    etāni    jāyante   
vivṛddhe    bharatarṣabha ||)
--
Meaning :
O bharatarṣabha  (arjuna)! When the mode of passion (rajoguṇa) predominates (in the mind, -over satoguṇa  and tamoajoguṇa), one is overtaken by greed, activity, urge for the activity, restlessness and cravings for enjoyment.
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अध्याय 14, श्लोक 13,

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥
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(अप्रकाशः अप्रवृत्तिः च प्रमादः मोहः एव च ।
तमसि एतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥)
--
भावार्थ :
हे कुरुनन्दन (अर्जुन)! तमोगुण के बढ़ जाने पर अप्रकाश (अन्धकार, जडता), अप्रवृत्ति (उत्साह का न होना), प्रमाद (व्यर्थ चेष्टा), मोह (निद्रा तथा मद का प्रभाव) भी, ये सब उत्पन्न होते हैं । 
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Chapter 14, śloka 13,

aprakāśo:'pravṛttiśca
pramādo moha eva ca |
tamasyetāni jāyante
vivṛddhe kurunandana ||
--
(aprakāśaḥ apravṛttiḥ ca
pramādaḥ mohaḥ eva ca |
tamasi etāni jāyante
vivṛddhe kurunandana ||)
--
Meaning :
O kurunandana(arjuna)! When the tamoguṇa (inertia) predominates (in the mind, - over satoguṇa  and rajoguṇa), one comes under the spell of lack of insight (aprakāśa), laziness, in-attention, delusion, and the indulgence in stupor-like states of the mind.
--
Note :
1.The 3 attributes (guṇa) of manifestation (prakṛti) have a parallel in This day Physics.

satoguṇa is synonymous to light,
rajoguṇa is synonymous to inertia of momentum (as in Dynamics),
tamoguṇa  is synonymous to inertia at rest (as in statics).
But we may also note that the light that is seen (in whatever form from a source, or as a reflection) is a physical object and the one 'who' sees this light is again a kind of awareness that is consciousness, or an entity / sentient being endowed with consciousness.
--
अध्याय 14, श्लोक 14,

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥
--
(यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयम् याति देहभृत् ।
तदा उत्तमविदाम् लोकान् अमलान् प्रतिपद्यते ॥)
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भावार्थ :
जब मनुष्य के मन में सत्वगुण प्रबल होता है और तब उसकी मृत्यु होती है, तब देह के स्वामी (चेतना, जीव) को उत्तम कर्मोंवाले निर्मल लोकों की प्राप्ति होती है ।
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Chapter 14, śloka 14,

yadā sattve pravṛddhe tu
pralayaṃ yāti dehabhṛt |
tadottamavidāṃ lokān-
amalānpratipadyate ||
--
(yadā sattve pravṛddhe tu
pralayam yāti dehabhṛt |
tadā uttamavidām lokān
amalān pratipadyate ||)
--
Meaning :
When a soul (consciousness associated with the body) leaves the body, and satvaguṇa (harmony - clarity, light, peace, of mind) prevails at that time, one attains the stainless ethereal places of noble and auspicious deeds.
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अध्याय 14, श्लोक 15,

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥
--
(रजसि प्रलयम् गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनः तमसि मूढयोनिषु जायते ॥)
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भावार्थ :
रजोगुण जब चित्त में प्रबल होता है, उस अवस्था में मृत्यु को प्राप्त होनेवाले कर्मों में आसक्ति रखनेवालों में उत्पन्न होते हैं । और तमोगुण जब चित्त में प्रबल होता है, उस अवस्था में मृत्यु को प्राप्त होनेवाले मूढयोनि में उत्पन्न होते हैं ।
--
Chapter 14, śloka 15,

rajasi pralayaṃ gatvā
karmasaṅgiṣu jāyate |
tathā pralīnastamasi
mūḍhayoniṣu jāyate ||
--
(rajasi pralayam gatvā
karmasaṅgiṣu jāyate |
tathā pralīnaḥ tamasi
mūḍhayoniṣu jāyate ||)
--
Meaning :
One, who dies in a state of mind, when the passion (rajoguṇa) is prevailing, he attains the next birth among the people who are obsessed with activity. And one, who dies in a state of mind, when the sloth (tamoguṇa) is prevailing, he attains the next birth in the wombs of impure, dull and animal tendencies
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अध्याय 14, श्लोक 16,

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥
--
(कर्मणः सुकृतस्य आहुः सात्त्विकम् निर्मलम् फलम् ।
रजसः तु फलम् दुःखम् अज्ञानम् तमसः फलम् ॥)
--
भावार्थ :
श्रेष्ठ (सात्त्विक) कर्म का फल तो सात्त्विक अर्थात् क्लेश-निवारण, निर्मल, ज्ञान तथा वैराग्य प्रदायक कहा गया है, जबकि राजस कर्म का फल दुःख और तामस का फल अज्ञान कहा गया है ।
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Chapter 14, śloka 16,

karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ
sāttvikaṃ nirmalaṃ phalam |
rajasastu phalaṃ duḥkham-
ajñānaṃ tamasaḥ phalam ||
--
(karmaṇaḥ sukṛtasya āhuḥ
sāttvikam nirmalam phalam |
rajasaḥ tu phalam duḥkham
ajñānam tamasaḥ phalam ||)
--
Meaning :
Clarity, peace and happiness, is said the fruit of a noble action (sāttvika-karma), while misery and sorrow is said the fruit of the action done in confusion (rajoguṇa), and ignorance and delusion is said the fruit of the action done without care .
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अध्याय 14, श्लोक 17,

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥
--
(सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानम् रजसः लोभः एव च ।
प्रमादमोहौ तमसः भवतः अज्ञानम् एव च ॥)
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भावार्थ :
सत्त्व (सत्त्वगुण) से ज्ञान का उद्भव होता है, रज (रजोगुण) से लोभ का, और तम (तमोगुण) से प्रमाद एवं मोह तथा अज्ञान का भी उद्भव होता है ।
--
Chapter 14, śloka 17,

sattvātsañjāyate jñānaṃ
rajaso lobha eva ca |
pramādamohau tamaso
bhavato:'jñānameva ca ||
--
(sattvāt sañjāyate jñānam
rajasaḥ lobhaḥ eva ca |
pramādamohau tamasaḥ
bhavataḥ ajñānam eva ca ||)
--
Meaning :
From  (sattva-guṇa) / attribute of harmony, comes the knowledge, from  (rajoguṇa) / attribute of passion, comes the greed, while from tamoguṇa / the attribute of inertia,  come the pramāda, / idleness, and moha / distraction, and ajñāna / ignorance as well.
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अध्याय 14, श्लोक 18,

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थाः मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥
--
(ऊर्ध्वम् गच्छन्ति सत्त्वस्थाः मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्थाः अधः गच्छन्ति तामसाः ॥)
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भावार्थ :
सत्त्वगुण (की वृत्ति) में स्थित रहनेवाला चेतना की उच्चतर स्थितियों की ओर गतिशील होता है, रजोगुण (की वृत्ति) में स्थित रहनेवाला जहाँ का तहाँ रहता है, और जघन्यगुण (निन्दनीय) वृत्ति में स्थित रहनेवाला अधोगति की ओर गतिशील होता है ।
--
Chapter 14, śloka 18,

ūrdhvaṃ gacchanti sattvasthāḥ
madhye tiṣṭhanti rājasāḥ |
jaghanyaguṇavṛttisthā
adho gacchanti tāmasāḥ ||
--
(ūrdhvam gacchanti sattvasthāḥ
madhye tiṣṭhanti rājasāḥ |
jaghanyaguṇavṛttisthāḥ
adhaḥ gacchanti tāmasāḥ ||)
--
Meaning :
Those who try to stay in the purity of consciousness, (in the state of mind where one is aware of just being only), attain the elevated state, those who remain as they are and are lead by their modes (vṛtti) of mind keep stagnant, while those who indulge in the evil tendencies of delusion and ignorance keep falling.
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अध्याय 14, श्लोक 19,

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
--
(न अन्यम् गुणेभ्यः कर्तारम् यदा द्रष्ट अनुपश्यति ।
गुणेभ्यः च परं वेत्ति मद्भावम् सः अधिगच्छति ॥)
--
भावार्थ :
जब मनुष्य समष्टि चेतन में एकीभाव से स्थित हो जाता है, अर्थात् मन, बुद्धि, स्मृति और ’मैं’-भावना से नितांत अछूता होकर देखता है कि गुणों के सिवा दूसरा कुछ नहीं है जिसे ’कर्ता’ कहा जा सके, तब वह उन गुणों से परे अवस्थित मेरे (अपने-आपके) स्वरूप को जान लेता है और उसमें अधिष्ठित हो जाता है ।
--
Chapter 14, śloka 19,

nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ
yadā draṣṭānupaśyati |
guṇebhyaśca paraṃ vetti
madbhāvaṃ so:'dhigacchati ||
--
(na anyam guṇebhyaḥ kartāram
yadā draṣṭa anupaśyati |
guṇebhyaḥ ca paraṃ vetti
madbhāvam saḥ adhigacchati ||)
--
Meaning :
When one is able to see that there are these three guṇa only and nothing else that could be termed the agent (responsible for all actions), and then looks beyond them and finds out and knows the Supreme, he knows Me and attains to Me, My Real Form.
--
अध्याय 14, श्लोक 20,

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥
--
(गुणान् एतान् अतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् ।
जन्म-मृत्यु-जरा-दुःखैः विमुक्तः अमृतम् अश्नुते ॥)
--
भावार्थ :
(प्रकृति के सत्व, रज तथा तम) इन तीनों गुणों से निर्मित इस देह का स्वामी (शुद्ध चेतनता) इनसे छूटकर, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था (और व्याधि / रोग) जैसे समस्त दुःखों से छुटकारा पाकर शाश्वत सत्ता को पा लेता है ।
--
टिप्पणी :
वह जीव-चेतना जो शरीर पर अपना स्वामित्व अनुभव करती है, मन-मस्तिष्क पर पड़नेवाला शुद्ध चैतन्यरूपी प्रकाश मात्र होती है, और प्रकृति-प्रदत्त शरीर का उस प्रकाश से संयोग ही  बुद्धि में अहं-रूपी विशिष्ट व्यक्ति होने का भ्रम उत्पन्न करता है ।
जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया था, जब द्रष्टा (अर्थात् वह चेतना जो व्यक्तित्व तथा परब्रह्म का समान उभयनिष्ठ तत्व है) यह देख लेता है कि उपरोक्त तीन गुणों से भिन्न कोई कर्ता नहीं होता, तब यह यथार्थ स्पष्ट हो जाता है ।     
 --
Chapter 14, śloka  20,

guṇānetānatītya trīndehī
dehasamudbhavān |
janmamṛtyujarāduḥkhair-
vimukto:'mṛtamaśnute ||
--
(guṇān etān atītya trīn
dehī dehasamudbhavān |
janma-mṛtyu-jarā-duḥkhaiḥ
vimuktaḥ amṛtam aśnute ||)
--
Meaning :
Having transcended these 3 attributes (guṇa-s) of manifestation / phenomenon / prakṛti, that bring about this physical existence in the form of the body and its world, the individual consciousness is freed from the miseries like the birth, death, old-age, and diseases, and gets immense peace and bliss time-less and eternal.
Note:
In the last śloka 19 we saw, knowing the fact that except these 3 attributes (guṇa-s) of manifestation / phenomenon / prakṛti, there is no such an entity that could be termed as the agent (kartā) for happening of a karma / bringing out an action (karma) / result, one stands aloof as the pure consciousness, as the only witness of this phenomena, and at once realizes the witness aspect of this consciousness, that is common to the individual soul and the Consciousness in totality (Brahman).   
--
Here I took the pleasure of copying-pasting from my another blogspot-blog on Gita.
This is rather a repetition though. .... So ...that is that.... ! 
The above references are from my own blog .
For details please check the blog.
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Friday, 7 September 2018

मृत्यु के बाद

संत ज्ञानेश्वर रचित excel-chart देखते हुए अपनी एक  लंबी कविता  नागलोक याद हो आई। जिसे मैंने मेरे हिंदी-का-ब्लॉग में 11 अगस्त 2013 को तथा  बाद में पुनः 27 नवंबर 2015 को पोस्ट किया था।
मृत्यु के बाद का जैसा वर्णन पुराणों और उपनिषदों में किया गया है वह अक्षरशः सत्य है।
यहाँ तक कि वर्तमान जन्म की प्राप्ति होने से पूर्व जीव जिस लोक में रहता है और मृत्यु के पश्चात् जिस लोक में उसकी गति होती है उसका भी समान्तर वर्णन पुराणों और उपनिषदों में तो है ही, प्रस्तुत ब्लॉग में मेरी उपरोक्त दो कविताओं में भी अनायास मैंने व्यक्त किया है, इस ओर बस अभी आधा घंटे पहले मेरा ध्यान गया।
मनुष्य का मन एक-पहिएवाली  साइकिल जैसा होता है, जबकि मन की वृत्ति दो पहियोंवाली साइकिल जैसी  तथा विचार तीन पहियोंवाली साइकिल जैसा, और इसी तरह (इन्द्रियों के) विषय चार पहियोंवाले वाहन जैसे होते हैं।  एक पहिएवाली साइकिल केवल स्टेटिक इक्विलिब्रियम की अवस्था में स्थिर रहती है, दो पहियोंवाली स्टेटिक तथा डायनेमिक इक्विलिब्रियम की स्थिति में कुछ प्रयास से स्थिर रखी जा सकती है, जबकि तीन पहियोंवाली आसानी से स्टेटिक या डायनेमिक दोनों स्थितियों में इक्विलिब्रियम की स्थिति में रखी जा सकती है।  चार पहियोंवाली अपेक्षाकृत और अधिक सरलता से सुस्थिर रखी जा सकती है।
तीन पहिएवाली साइकिल इस दृष्टि से एक, दो या तीन से अधिक पहियोंवाले वाहन से अधिक स्थिर इसलिए भी होती है क्योंकि तीनों आधार-बिंदु एक और केवल एक समतल  (PLANE)  में स्थित होने से सुपरिभाषित होते हैं जबकि एक या दो पहिएवाली साइकिल के आधार-बिंदु ऐसा कोई सुनिश्चित समतल परिभाषित नहीं कर सकते।  दूसरी ओर तीन से अधिक आधार-बिंदु वाले वाहनों के पहिए ऐसे चार या अधिक समतल बनाते हैं जो परस्पर एक-दूसरे को काटते हों इसलिए .... यह स्टेटिक्स, डायनेमिक्स और मेकेनिक्स का विषय हुआ।
मन की स्थिति में इसी प्रकार मन निर्विषय, निर्विचार और वृत्तिशून्य हो तो निद्रारूपी अपेक्षाकृत स्थिरता अर्थात् निष्क्रिय जडता में चला जाता है।  एक वृत्ति होने की स्थिति में स्वप्न जैसी तंद्रालुता में होता है, जबकि वृत्ति के विषय से जुड़कर विचार से युक्त होने पर गतिशील संतुलन की स्थिति में होता है।
इन सभी स्थितियों में यदि जीव-चेतना की तुलना 'चालक' से करें तो यह चेतना निद्रा की स्थिति में जड  निष्क्रिय निश्चलता की अज्ञान-वृत्ति से तादात्म्य में होती है, जबकि स्वप्न तथा जागृति में क्रमशः वृत्ति तथा विचार से तथा किसी प्रत्यक्ष या परोक्ष बाह्य विषय से इसका (चेतना का) तादात्म्य रहता है।  इस प्रकार तादात्म्य का सतत बने रहना चेतना की दिशा (अवधान अर्थात् ध्यान) को अपने उस स्रोत / उद्गम  की ओर कभी नहीं ले जा पाता जहाँ से उसका आगमन हुआ।
ध्यान की गति ही चित्त है, ध्यान की स्थिरता निद्रा या लय है जिसमें 'विषय' तिरोहित हो जाते हैं जो चित्त के सक्रिय होते ही पुनः चित्त के समक्ष प्रकट हो उठते हैं।  चित्त का तात्पर्य है किसी विशिष्ट नाडी में प्राण की गति।  इस प्रकार प्राण चित्त का अनुगमन करते हैं और इन्द्रियाँ प्राण का।  प्राण एक अथवा अनेक हो सकते हैं किन्तु व्यावहारिक अर्थ में  प्राण जिस नाडी से गुजरते हैं चित्त उसी लोक को अनुभव करता है।
मृत्यु होने के समय भी अंततः प्राण किसी न किसी नाडी के पथ को ग्रहण कर शरीर से बाहर निकल जाते हैं।  यदि मरनेवाले का ध्यान किसी विषय में अटका होता है तो वह उस विषय का चिंतन करते हुए देह को त्यागता है।  इसलिए नाम-स्मरण एक ऐसा सरल साधन है जिससे कोई भी यह प्रयास अवश्य कर सकता है कि मृत्यु के समय उस नाम को स्मरण करता हुआ उस नाम से संबद्ध देवता का चिंतन करते हुए चित्त को उस दिशा में ले जाए। अगर कोई ऐसा करता है तो मृत्यु के उपरांत उसके प्राण उसके चित्त के द्वारा खींचे जाकर उसे उस देवता के लोक में ले जाते हैं, यह है पुराणों और वेद-उपनिषद् की शिक्षा।
 ॐ के उच्चारण से जहाँ मन ब्रह्म-चिंतन में प्रवृत्त होता है, वहीं विशिष्ट देवता के स्मरण से, उस देवता के स्वरूप और चिंतन में।  पिछली पोस्ट्स में इस बारे में विस्तार से लिख चुका हूँ अतः पुनरावृत्ति करना अनावश्यक है।
प्राणों के 'यहीं' अर्थात् हृदय में लीन होने की स्थिति में मरनेवाले के प्राण ब्रह्मलोक में भी नहीं जाते और न ही अन्य किसी नाड़ी से देह से बाहर जाते हैं।
वेद, उपनिषदों में तथा पुराणों में भी मृत्यु के बाद जीव के भिन्न-भिन्न अनुभवों को इसी आधार पर समझा जा सकता है।  इसी प्रकार पुनर्जन्म या मुक्ति को भी।  भ्रू तथा भ्रूमध्य के बारे में भी इसी प्रकार क्रमिक जन्मों के दौरान स्मृति के सातत्य को भी।  
बुद्धिजीवी मनुष्यों के प्राण अंततः उनकी उस आत्यंतिक निष्ठा के मार्ग से प्रेरित होते हैं जिससे उनकी बुद्धि प्रेरित हुई होती है। और तदनुसार वे किसी भावी जीवन और लोक के भागी होते हैं।
नागलोक कविता मूलतः ऐसी असंख्य बुद्धियों की सर्प-रूपी विविधता के प्रतीक को ध्यान में रखकर लिखी गयी थी।
संत ज्ञानेश्वर रचित excel-chart में जिन सर्पों को दर्शाया गया है वे आध्यात्मिक पतन के मार्ग के प्रतीक हैं, जबकि सीढ़ियाँ आध्यात्मिक उन्नति की।
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Thursday, 6 September 2018

पुरुष, धर्म, वर्ण और संन्यास

सन्दर्भ और तात्पर्य
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पुरुष, धर्म, वर्ण और संन्यास ये तीनों शब्द दो प्रकार से प्रयुक्त किए जाते हैं और सन्दर्भ के अनुसार उनका तात्पर्य भिन्न भिन्न होता है।  संदर्भों की भिन्नता पर ध्यान न देने से अनावश्यक भ्रम और विवाद पैदा होता है।
गीता में अध्याय 15 श्लोक 16 में कहा गया है :
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द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ।
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(द्वौ इमौ पुरुषौ लोके क्षरः च अक्षरः एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थः अक्षरः उच्यते ॥)
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भावार्थ :
इस संसार में नाशवान तथा अविनाशी ऐसे दो प्रकार के ये दो पुरुष हैं । सम्पूर्ण भूत प्राणियों के (उत्पन्न होनेवाले तथा नष्ट हो जानेवाले भौतिक देह-पिण्ड रूपी) शरीर तो नाशवान हैं, जबकि उनमें अवस्थित कूटस्थ (जीवात्मा) को अविनाशी कहा जाता है ।
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Chapter 15, śloka 16,

dvāvimau puruṣau loke
kṣaraścākṣara eva ca |
kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni
kūṭastho:'kṣara ucyate |
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(dvau imau puruṣau loke
kṣaraḥ ca akṣaraḥ eva ca |
kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni
kūṭasthaḥ akṣaraḥ ucyate ||)
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Meaning :
My two forms on the earthly level are of two kinds. The Perishable and the imperishable. Though the physical gross body of all beings is perishable, the 'self' or the soul situated at the core of heart (kūṭastha), is the imperishable one.
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इस अध्याय 15 में संसार की तुलना अश्वत्थ से करने के उपरांत पुरुष अर्थात् संसार का अनुभव जिस चेतना / चेतन अस्तित्व के सन्दर्भ से होता है वह चेतना जीव के रूप में असंख्य भौतिक शरीरों के रूप में इन्द्रियगम्य भौतिक जगत में व्यक्त होती है।  इस चेतना को ही पुरुष कहा जाता है।  वह जो पुर्यष्टक अर्थात् पुरी या पुर रूपी आठ स्थानों में वास करता है वह जीव पुरुष है।  ये आठ स्थान ही समष्टितः 'वासव' अर्थात् इंद्र है।  इंद्र ही इन्द्रियों का शासक है और उस रूप में इंद्र आधिदैविक 'पुरुष' है। वह जिस इन्द्रिय से जुड़कर जगत का अनुभव करता है वह इन्द्रिय ही उस काल में उसका रूप ग्रहण कर लेती है। इस प्रकार आठ 'वसु' समस्त जगत का कार्य-व्यापार संपन्न करते हैं।
पुरी-अष्टक स्थूल शरीर के रूप में भौतिक रूप में जीव का भौतिक अस्तित्व है।
पुरी-अष्टक सूक्ष्म शरीर के रूप में, आधिदैविक 'मन' नामक चेतन तत्व है।
पुरी-अष्टक कारण शरीर के रूप में उपरोक्त स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर का मूल कारण है।
यह जगत भी जिसे जीव के सन्दर्भ में उसका 'लोक' कहा जाता है पाँच तत्वों और तीन गुणों से प्रकृति द्वारा निर्मित एक समष्टि-सत्ता है जो जड की तरह ग्रहण किए जाने पर प्रकृति तथा चेतन की तरह ग्रहण किए जाने पर पुरुष के नाम से जानी जाती है।
इस प्रकार जीव को जगतस्थ पुरुष तथा समष्टि-चेतन को पुरुषोत्तम कहा जाता है।
यहाँ यह ध्यान दिया जाना आवश्यक है कि प्रकृति में उत्पन्न असंख्य  जीव भी भौतिक शारीरिक दृष्टि से पुरुष-लिंगीय, स्त्री-लिंगीय, नपुंसक अथवा द्विलिंगीय (androgynous) हो सकते हैं।
andro शब्द इंद्र का तथा gynous जन्यस् / जन्यः का cognate है।
इस दृष्टि से जाया स्त्रीलिंग और जनक पुंलिंग है।
प्रकृति जड होने की दृष्टि से कृति है जो प्रसंगवश विकृति या संस्कृति का रूप लेती है।
प्रकृति शक्ति होने की दृष्टि से त्रिगुणात्मिका है।
पुरुष चेतन होने से किसी कर्म का करनेवाला अर्थात् कर्ता नहीं हो सकता इसलिए प्रकृति और पुरुष के सान्निध्य से ही कर्म होता हुआ प्रतीत भर होता है।
प्रकृति स्वभाव है जो शुभ-अशुभ से परे है किन्तु जीव (शरीर से संबद्ध चेतन) अपने आपको प्रकृतिजनित सुख-दुःख का अनुकूल-प्रतिकूल का भोक्ता मान लेता है।  यही पुरुष संस्कृति अथवा विकृति का आधार है।  दूसरी ओर समष्टि-चेतन भी यद्यपि कर्ता न होकर दृष्टा मात्र है, क्योंकि प्रत्येक जीव की बुद्धि में यह अविच्छिन्न रूप से सदा दृष्टा की तरह जाना भी जाता है और बुद्धि में अपने कर्ता होने का त्रुटिपूर्ण ज्ञान ही उस दृष्टा पर जीव-बुद्धि आरोपित कर देता है।
यह जीव-भाव भी प्रकृति का स्वभाव ही है और यही भ्रमवश संस्कृति या विकृति के अनुसार शुभ अथवा अशुभ कर्मों को करने में स्वयं को स्वतंत्र अनुभव करता है।  'कार्य-कारण' की धारणा बुद्धि पर इस तरह हावी हो जाती है की जीव यह नहीं देख पाता कि किसी भी कार्य के हो पाने के असंख्य कारण होते हैं जिनमें से कुछ से ही वह अवगत होता है।
इस प्रकार उसका स्वभाव प्राकृतिक, आनुवांशिक, वातावरण आदि से पाया होता है।
इसे ही वर्ण कहा गया है। यह वर्ण मोटे तौर पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र इन चार में वर्गीकृत किया जाता है। भौतिक अर्थात् शरीर और वंश की दृष्टि से मनुष्य (यहां तक कि स्थावर-जंगम प्राणीमात्र ही) इनमें से प्रधानतः किसी एक वर्ण-विशेष से संबद्ध होता है जो जाति से बहुत भिन्न है।  जाति का अर्थ है वंशानुगत और परिस्थितियों के अनुसार प्राप्त वंश-परम्परा।
दूसरी ओर बहुत से जीव अवर्ण या ऐसे वंश में उत्पन्न होते हैं जिनकी कोई सुनिश्चित या ज्ञात वर्ण-परंपरा नहीं होती।  फिर भी गुण तथा कर्म के आधार पर उनका कोई सुनिश्चित वर्ण अवश्य ही होता है। 
गीता अध्याय 4, श्लोक 13 इस बारे में दृष्टव्य है :
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विध्यकर्तारमव्ययम् ॥
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(चातुर्वर्ण्यम् मया सृष्टम् गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारं अपि माम् विद्धि अकर्तारम्-अव्ययम् ॥)
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भावार्थ :
गुण तथा कर्म के विभाजन के अनुसार चार प्रकार की मूल प्रवृत्तियों का समूह (वर्ण्य), जिनसे समस्त भूत अनायास परिचालित होते हैं, मेरे ही द्वारा रचा गया है । उस समूह का रचनाकार (स्वरूपतः) अकर्ता तथा अव्यय मुझको ही जानो ।
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Chapter 4, śloka 13,

cāturvarṇyaṃ mayā sṛṣṭaṃ
guṇakarmavibhāgaśaḥ|
tasya kartāramapi māṃ
vidhyakartāramavyayam ||
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(cāturvarṇyam mayā sṛṣṭam
guṇakarmavibhāgaśaḥ |
tasya kartāraṃ api mām
viddhi akartāram-avyayam ||)
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Meaning :
According to the innate nature and tendencies for action of man, I have created the four-fold order in this world. Even though I AM the Imperishable, and the Creator of them, know for certain I AM as such ever, the non-doer. 
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इससे स्पष्ट है कि वर्ण का आधार गुण तथा कर्म हैं जिनके अनुसार ही मनुष्य-मात्र के संस्कार, वृत्तियाँ और बुद्धि, यहाँ तक की आजीविका / व्यवसाय / परिस्थितियाँ  आदि उसके लिए अनुकूल और प्रतिकूल होते हैं। जातियों का उद्भव मुख्यतः इन्हीं कारणों से हुआ न कि वर्ण-विशेष में जन्म लेने मात्र से।
और स्पष्ट है कि (अनुवांशिक आधार पर) वर्ण का चुनाव कर पाना भले ही मनुष्य के अपने हाथ में न हो, व्यवसाय तथा कर्म को चुनने के लिए वह अपने गुणों तथा स्वभाव के अनुसार किसी हद तक स्वतंत्र है ऐसा कहा जा सकता है। .
इसलिए ब्राह्मणत्व या अन्य वर्ण भी मनुष्य की जाति न होकर उसका अपना चुनाव है।
अब एक प्रश्न संन्यास के और इस बारे में कि क्या स्त्री को संन्यास लेने का अधिकार है?
श्री रमण महर्षि के श्री रमण-गीता में दिए गए वचनों के आधार पर तो यह स्पष्ट ही है कि संन्यास में स्त्री-पुरुष का समान अधिकार है :
अध्याय 13 श्लोक 8 में कहा गया है :
स्वरूपे वर्तमानानां पक्वानाम योषितामपि  |
निवृत्तत्वात् निषेधस्य हंसीत्वं नैव दुष्यति ||
वर्णाश्रम व्यवस्था न केवल धर्म-संगत है, बल्कि स्वाभाविक और प्राकृतिक भी है।
मनुष्य-मात्र को वर्ण एवं आश्रम जन्म से ही प्राप्त होता है और उसके अनुसार आचरण करने पर उसे अधिकतम सुख और न्यूनतम दुःख प्राप्त होते हैं, किंतु विवेक या उचित मार्गदर्शन के अभाव में, वह इस सरल तथ्य से अनभिज्ञ होता है। इसलिए आयु के प्रथम चतुर्थांश में ब्रह्मचर्य, द्वितीय में गृहस्थ, तृतीय में वानप्रस्थ तथा चतुर्थ में संन्यास आश्रम शरीर को तो अनायास और अपरिहार्यतः प्राप्त होता ही है यद्यपि मन-बुद्धि-परिस्थिति, आदि के प्रभाव से मनुष्य इसे नहीं समझता।
इसलिए संन्यास 'लेने' या न-लेने का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है ?
हाँ अगर कोई संन्यास का औचित्य जानकर भी अभ्यास की दृष्टि से संन्यास लेता है तो इसके लिए वह स्वतंत्र क्यों न हो?
वैसे संन्यास क्या है इस बारे में गीता अध्याय 6 के प्रथम श्लोक में ही कहा गया है :
अध्याय 6, श्लोक 1,

श्रीभगवानुवाच :
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
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(अनाश्रितः कर्मफलम् कार्यम् कर्म करोति यः ।
सः सन्न्यासी च योगी च न निरग्निः न च अक्रियः ॥)
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भावार्थ :
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं  - वह नहीं, जो कि  हठपूर्वक अग्नि को नहीं छूता, या दूसरे सारे कर्मों को त्याग देता है, बल्कि वह पुरुष जो कि कर्म के फल पर आश्रित नहीं होता, अर्थात् फल अनुकूल या प्रतिकूल क्या होता है इस विषय में जिसका कोई आग्रह नहीं होता, और जो अपने लिए निर्धारित कर्तव्य को पूर्ण करने के ध्येय से किसी कर्म में संलग्न होता है, वास्तविक अर्थों में संन्यासी (जिसने कर्म को त्याग दिया है) और वही कर्मयोगी अर्थात् कर्म करते हुए भी उसे मोक्ष का साधन बना लेनेवाला कुशल योगी होता है ।
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शंकराचार्य ने भी विवेक-चूड़ामणि तथा अपरोक्षानुभूति में यही कहा है।
'भज गोविन्दं' में :
जटिलो मुण्डी कुञ्चित केशः
काषायाम्बर बहुकृत वेशः ...
से भी यही प्रकट होता है कि संन्यास एक तो साधन-संन्यास के रूप में होता है, जो किसी के लिए स्वाभाविक हो सकता है, दूसरी ओर केवल किसी अन्य कारण से 'लिया' जाता है, 'होता' नहीं है ...
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Wednesday, 5 September 2018

संत ज्ञानेश्वर

सप्तलोकाः / saptalokāḥ
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संत ज्ञानेश्वर कृत इस excel-chart में कॉलम 5 में सात लोकों का स्थान नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः
भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, एवं सत्यम् है।
स्पष्ट है कि यहाँ नभोलोक को तप के स्थान पर रखा गया है।
वास्तव में इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि तप का प्रकार चेतन-सत्ता अर्थात् 'पुरुष-तत्व' या 'प्राकृति-तत्त्व' की प्रधानता या अनुपात के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है।  यद्यपि एक ही चैतन्य सत्ता जड, चेतन एवं चैतन्य के तीन प्रकारों में अव्यक्त-व्यक्त है , इस अनभिव्यक्ति / अभिव्यक्ति का आधार (अधिष्ठान नहीं) 'लोक' ही है, जो सर्वोच्च स्तर पर  क्रम (row) में  सत्यम्  अर्थात् सतोलोक के ठीक ऊपर ब्रह्मलोक, वैकुण्ठलोक तथा शिवलोक के रूप में भी अनुभव किया जाता है और तीनों सतोगुण तथा आनंदलोक के मध्य स्थित हैं।
संत ज्ञानेश्वर की शिक्षा के प्रकाश में ये पाँचों ही मनुष्य की परम सद्गति, पूर्णता के पर्याय हैं।
chart का प्रथम वर्ग inertia / प्रगाढ़ तमोगुण से ढँका है जो नासदीय-सूक्त (ऋग्वेद मंडल 10 , सूक्त 129) का द्योतक है।  chart का द्वितीय वर्ग रजोगुण (स्फुरण) का द्योतक  है।  जीव, ब्रह्म / ब्रह्मा, शिव, विष्णु, इस 'स्फुरण' से ही लोकवत् भासते हैं।  तीनों 'गुण' त्रिगुणात्मिका 'प्रकृति' है। 
इस प्रकार 'पुरुष' और 'प्रकृति' एकमेव सत्ता हैं तथापि अभिव्यक्ति के रूप में विविध और भिन्न भिन्न हैं।
'स्फुरण' पुनः प्रथमतः 'अहं' और बाद में 'इदं' के रूप में स्वयं को विभाजित कर लेता प्रतीत होता है।  
गीता  अध्याय 7 श्लोक 14 में भगवान श्रीकृष्ण इसी सत्य को इंगित करते हुए अर्जुन से कहते हैं :
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते  ॥
भगवान विष्णु का नीलवर्ण नभोलोक का रंग है।
नि + इल से बना नील पृथिवीतत्त्व के अत्यंत अभाव का सूचक है, वहीं न + भ  से बना 'नभ' विष्णु की नाभि है जिससे ब्रह्मा का आविर्भाव (manifestation)  होता है।
पुनः एक बार देखें :
 


Wednesday, 29 August 2018

मोक्षपथम् / सर्पश्रेणी-सोपानम्

मोक्षपथम्
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सुना है 'साँप-सीढ़ी' खेल का अविष्कार संत ज्ञानेश्वर ने किया था |
नेट पर देखे एक चित्र से उसकी एक अनुकृति बनाई है।
अगर ये संत ज्ञानेश्वर वही हैं जिन्होंने ज्ञानेश्वरी और अमृतानुभव / अनुभवामृत की रचना की हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं।  इस खेल में 72 खाने हैं।
उपनिषदों के अनुसार 'हृदय' अर्थात् 'आध्यात्मिक-हृदय' से जहाँ से 72,000 नाड़ियाँ निकलती हैं, एक नाड़ी मस्तिष्क की ओर जाती है  . दूसरी ओर गर्भ में 'जीवात्मा' ब्रह्मरंध्र से सूक्ष्मशरीर के रूप में स्थूल-देह में प्रविष्ट होता है (गर्भोपनिषद में) , जो भी हो ब्रह्म की उपासना करनेवाले मनुष्य के प्राण उसकी मृत्यु के समय ब्रह्म-नाड़ी से होकर ब्रह्मरंध्र से ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं जिसके बाद भी यदि उसे आत्म-साक्षात्कार न हुआ हो तो उसे नया शरीर धारण करना पड़ सकता है।
गीता अध्याय ८ श्लोक १६ में भी वर्णन है :
अध्याय 8, श्लोक 16,
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥
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(आब्रह्म-भुवनात् लोकाः पुनरावर्तिनः अर्जुन ।
माम् उपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥)
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भावार्थ :
हे अर्जुन! ब्रह्म सहित, समस्त ही लोक (अर्थात् छोटे-बड़े सभी) बारम्बार प्रकट और अप्रकट हुआ करते हैं, किन्तु हे कौन्तेय (अर्जुन)! मुझे प्राप्त हो जाने के बाद ऐसा पुनः पुनः आवागमन फिर नहीं होता । 
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श्रीरमणगीता में कहा है :
स्वात्मभूतं यदि ब्रह्म ज्ञातुं वृत्तिः प्रवर्तते।
स्वात्माकारा तदा भूत्वा न पृथक्प्रतितिष्ठति । ।
(अध्याय 4, श्लोक 8 )
निर्गच्छन्ति यतः सर्वा वृत्तयो देहधारिणाम्।
हृदयं तत्समाख्यातं भावना कृति वर्णनम् । ।
(अध्याय 5 , श्लोक 2 )
हृदयस्य यदि स्थानं भवेच्चक्रमनाहतम्।
मूलाधारं समारभ्य योगस्योपक्रमः कुतः । ।
(अध्याय 5, श्लोक 4 )
तात्पर्य यह कि आत्मज्ञान होने की स्थिति में प्राण अंततः हृदय में ही प्रलीन हो जाते हैं।
उपरोक्त प्रसंग को संत ज्ञानेश्वर महाराज ने रोचक स्वरूप देकर खेल के रूप में प्रस्तुत किया है।
72000 अर्थात् प्रमुख 72 नाड़ियों के द्वारा चित्त आत्मा से बाहर जगत में विचरण करता है, ब्रह्म-नाड़ी से ब्रह्मरंध्र के द्वारा मृत्यु के बाद ब्रह्मलोक में जाता है और वहाँ से सीधे आत्मा में अर्थात् 'हृदय' में प्रविष्ट होता है, या जीते-जी भी ऐसा हो सकता है, जब प्राण (और चित्त) ब्रह्मनाड़ी का मार्ग न लेकर, ब्रह्मरंध्र से गुज़रे बिना 'यहीं' हृदय में ही प्रलीन हो जाते हैं (अत्रैव प्रलीयन्ते )।  
जो मनुष्य किसी और नाड़ी के मार्ग से देहत्याग करते हैं वे या तो इष्ट का (नाम-)स्मरण करते हुए उसके लोक को प्राप्त होते हैं। गीता अध्याय 9 श्लोक 25 में कहा है :
 यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।
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(यान्ति देवव्रताः देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनः अपि माम् ॥)
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भावार्थ :
देवताओं की उपासना / पूजा करनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं ( अर्थात् मृत्यु के बाद उनके लोक में स्थान पाते हैं), पितरों की उपासना / पूजा करनेवाले पितृलोक में, तथा भूतों की उपासना / पूजा करनेवाले भूतलोक अर्थात् मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं, जबकि मेरा यजन अर्थात् भक्ति / उपासना, पूजन, आदि करनेवाला मुझे / मेरे ही लोक (धाम) को प्राप्त होता है  ।
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टिप्पणी :
स्पष्ट है कि मृत्यु के अनन्तर किसी मनुष्य की क्या गति होती है, इस बारे में इस श्लोक के आधार से अनुमान लगाया जा सकता है ।
भगवान् श्रीकृष्ण के धाम का वर्णन संक्षेप में अध्याय 8, श्लोक 21 में इस प्रकार से वर्णित किया गया है :
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अध्याय 8, श्लोक 21,

अव्यक्तोऽक्षर इत्याहुस्तमाहुः परमां गतिं ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
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(अव्यक्तः अक्षरः इति उक्तः तम् आहुः परमाम् गतिम् ।
यम् प्राप्य न निवर्तन्ते तत् धाम परमम् मम ॥)
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भावार्थ :
अव्यक्त (अर्थात् जिसे इन्द्रिय, मन, बुद्धि, स्मृति आदि से किसी व्यक्त विषय की भाँति ग्रहण नहीं किया जा सकता, किन्तु इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, स्मृति आदि जो उसके ही व्यक्त रूप हैं और उसके ही द्वारा प्रेरित किए जाने पर अपना अपना कार्य करते हैं), अक्षर अर्थात् अविनाशी, इस प्रकार से (जिस) उस परम गति का वर्णन किया जाता है, जिसे प्राप्त होने के बाद कोई पुनः संसार रूपी दुःख में नहीं जन्म लेता, वह मेरा परम धाम है ।
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शिव-अथर्वशीर्ष में भी स्पष्ट किया गया है :
या सा प्रथमा मात्रा ब्रह्मदेवत्या रक्ता वर्णेन यस्तां  ध्यायते नित्यं स गच्छेद्ब्रह्मपदं।
या सा द्वितीया मात्रा विष्णुदेवत्या कृष्णावर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्वैष्णवं पदम् ।
या सा तृतीया मात्रा ईशानदेवत्या कपिला वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेदैशानं पदम् ।
या सार्धचतुर्थीमात्रा सर्वदेवत्याSव्यक्तीभूता खं विचरति शुद्धस्फटिकसन्निभा वर्णेन यस्तां  ध्यायते नित्यं स
गच्छेत्पदमनामयाम्।
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ये 72 मार्ग पुनः साँख्य के 24 तत्वों का त्रिगुणात्मक रूप हैं ...
इस बारे में अगली किसी पोस्ट में।
फिलहाल यही कि इस खेल के माध्यम से गूढ कठिन आध्यात्मिक तत्व का विवेचन किया गया है।
सीढ़ियाँ आध्यात्मिक उन्नति, और सर्प आध्यात्मिक अवनति के द्योतक हैं।
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Monday, 27 August 2018

मदालसा : मार्कन्डेय पुराण

 संस्कृत दिवस
शुद्धोऽसि रे तात न तेऽस्ति नाम
कृतं हि ते कल्पनयाधुनैव ।
पञ्चात्मकं देहमिदं न तेऽस्ति
नैवास्य त्वं रोदिषि कस्य हेतोः ॥
न वा भवान् रोदिति वै स्वजन्मा
शब्दोऽयमासाद्य महीश सूनुम् ।
विकल्प्यमाना विविधा गुणास्ते-
ऽगुणाश्च भौताः सकलेन्द्रियेषु ॥
भूतानि भूतैः परि दुर्बलानि
वृद्धिं समायान्ति यथेह पुंसः ।
अन्नाम्बुदानादिभिरेव कस्य
 न तेऽस्ति वृद्धिर्न च तेऽस्ति हानिः ॥
त्वं कञ्चुके शौर्यमाणे निजेऽस्मि
स्तस्मिंश्च देहे मूढतां मा व्रजेथाः ।
शुभाशुभैः कर्मभिर्दहमेत-
न्मदादि मूढैः कञ्चुकस्ते पिनद्धः ॥
तातेति किञ्चित् तनयेति किञ्चि-
दम्बेति किञ्चिद्दवितेति किञ्चित्
ममेति किञ्चिन्न ममेति किँचित्
त्वं भूतसंघ बहु मानयेथाः ॥
दुःखानि दुःखापगमाय भोगान्
सुखाय जानाति विमूढचेताः ।
तान्येव दुःखानि पुनः सुखानि
जानाति विद्वान्विमूढचेता ॥
हासोऽस्थिर्सदर्शनमक्षि युग्म-
मत्युज्ज्वलं यत्कलुषम् वसायाः ।
कुचादि पीनं पिशितं पनं तत्
स्थानं रतेः किं नरकं न योषित ॥
यानं क्षितौ यानगतश्च देहो
देहेऽपि चान्यः पुरुषो निविष्टः ।
ममत्वमुर्व्यां न यथा तथा स्वे
देहेऽतिमात्रं च विमूढतैषा ॥
धन्योऽसि रे यो वसुधामशत्रु-
रेकश्चिरं पालयितासि पुत्र ।
तत्पालनादस्तु सुखोपभोगो
धर्मात्फलं प्राप्स्यसि चामरत्वम् ॥
धरामरान् पर्वसु तर्पयेथाः
समीहितम् बंधुषु पूरयेथाः ।
हितं परस्मै हृदि चिन्तयेथाः
मनः परस्त्रीषु निवर्तयेथाः ॥
सदा मुरारिं हृदि चिन्तयेथा-
स्तद्ध्यानतोऽन्तःषडरीञ्जयेथाः ।
मायां प्रबोधेन निवारयेथाः
यशोऽर्जनायार्थमपि व्ययेथाः ।
परोपवादश्रवणाद्विभीथाः
विपद्समुद्राज्जनमुद्धरेथाः ॥
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आज संस्कृत दिवस पर यह सुना !

Saturday, 25 August 2018

JnAna-nADI and brahma-nADI

ऐसा लगता है कि अब नेट से जल्दी ही विदा होना है।
हिंदी में लिखी पोस्ट्स में टेक्स्ट के अलावा सभी (लेबल, शीर्षक आदि) को गूगल सपोर्ट नहीं करता और लिप्यंतरण व्यर्थ हो जाता है।  हैरत सिर्फ इस बात की है कि मेरे इस ब्लॉग की पाठक-संख्या प्रतिदिन तीन अंकों में हो गयी है, इसलिए लिखना जारी है।
अगर किसी दिन आपको यह ब्लॉग देखने को न मिले तो हो सकता है कि मैंने गूगल खाता डिलीट कर दिया हो। वैसे अभी तो पक्का कुछ नहीं, लेकिन किसी भी दिन यह हो सकता है।  सो, प्लीज़ टेक केयर। इस संसार में कुछ भी नित्य कहाँ है? केवल प्रतिदिन जागने पर कोई संसार प्रतीत होता है तो संसार का एक प्रतिबिम्ब 'मन' पर पड़ता है और ऐसे असंख्य प्रतिबिम्बों को स्मृति संजो कर संसार पर सातत्य continuity आरोपित कर देती है, जो निद्रा में पुनः खंडित हो जाती है। इसी प्रकार स्मृति ही संसार के सापेक्ष एक 'मैं' को भी आरोपित करती है, जो अपनी असत्यता के कारण और आश्रय न होने से शरीर और उसकी गतिविधियों तथा स्मृति को ही अपनी सच्चाई स्थापित कर लेता है।  यह दुष्चक्र ही व्यक्तिगत अस्तित्व है।  इस दुष्चक्र में कोई फँसा है यह कल्पना ही भ्रामक है जो नित्य-वास्तविकता को ढँक लेती है।
इसी दुष्चक्र को तोड़ने के लिए शास्त्र बनाए गए जो 'व्यक़्ति' को स्वतंत्र सत्ता माननेवालों को 'विधि' तथा प्रक्रिया देते हैं।  नाड़ियों में प्राणों के संचार और संचालन की इस गतिविधि को 'ब्रह्म-नाड़ी' की गतिविधि का नाम दिया जाता है जो औपचारिक है।  दूसरी ओर, जो किसी के और अपने भी व्यक्तिगत स्वतंत्र अस्तित्व होने की संभावना को ही असत्य जान लेते हैं वे इस मिथ्या ज्ञान से मुक्त हो जाते हैं।  संक्षेप में, उनके लिए यह दुष्चक्र टूट जाता है।  उनका शरीर-मन यद्यपि दुष्चक्र में फँसे दूसरों को एक व्यक्ति-विशेष मानता है, लेकिन यह समस्या उसकी नहीं, उनकी है।
इस मिथ्या-सांसारिक ज्ञान, और संसार में अपने कोई विशिष्ट होने के ज्ञान का निवारण होने पर जिस आध्यात्मिक ज्ञान की ओर ध्यान जाता है, वह नित्य है, किन्तु संसार और संसार में अपने व्यक्ति होने के ज्ञान  / स्मृति / information से ढँका होता है इसलिए शास्त्र 'अपने को जानो' -'आत्मानम् विद्धि' की शिक्षा देते हैं।  जो इस बाह्य ज्ञान के अधिष्ठान-रूपी नित्य ज्ञान के प्रति जागृत हो जाते हैं उनके लिए संसार और 'मैं' एक ही सत्य / सत् की दो अभिव्यक्तियाँ / पहलू होते हैं।  यह जागृति ही 'ज्ञान-नाडी' का कार्य है।
इस प्रकार ज्ञान-नाडी तथा ब्रह्म-नाडी का औपचारिक वर्गीकरण / formal classification किया जाता है।
अंततः शास्त्र-ज्ञान को त्यागना ही है तो अगर प्रारम्भ में त्याग सकें तो शास्त्रीय भूलभुलैया से बचना आसान हो जाता है। नाड़ी-ज्ञान नाड़ियों के सक्रिय होने पर होता है और नाड़ियों में प्राणों की गति ही भिन्न-भिन्न 'अनुभव' तथा बाह्य-ज्ञान का आधार है।
आध्यात्मिक ज्ञान के लिए पुनः ब्रह्म-नाड़ी का सक्रिय होना प्राथमिक आवश्यकता है, किन्तु वह अपरिहार्य आवश्यकता नहीं है।  फिर भी नाड़ी-शुद्धि होने पर ही प्राणों का नाड़ियों में ऊर्ध्वगमन होने पर 'अनुभव'रूपी  ज्ञान आता है जिसमें अंततः यह 'अनुभव' होता है कि  सब-कुछ एकमेव तत्व है।  किन्तु तब भी 'सब-कुछ' और 'मैं' के बीच भेद की कल्पना और विचार भी अज्ञान ही है।  जब यह अज्ञान भी नष्ट हो जाता है तो नित्य-ज्ञान स्फुरित होता है। प्राणों के ऊर्ध्वगमन (ऊर्ध्वरेता होने) की प्रक्रिया का सरल उपाय है 'ॐ' का उच्चारण जिसके बारे में  गीता अध्याय 8 श्लोक 13  में कहा गया है :
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। 
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।
वैसे इस प्रकार का नाम-स्मरण सर्वसुलभ है ही! आप गाय, बकरी, भेड़, हाथी आदि प्राणियों के स्वर में भी इसे सुन सकते हैं।
किन्तु जिन्हें यह व्यर्थ प्रतीत होता है वे नाम-स्मरण के माध्यम से इष्ट के उन्हें अनुकूल प्रतीत होनेवाले नाम का स्मरण कर सकते हैं जो इसी प्रकार विशिष्ट नाड़ी में प्राणों की गति सक्रिय करता है।
नाड़ी-विज्ञान और योगशास्त्र में विभिन्न देवताओं को इस प्रकार शरीर में ही स्थित और प्राप्य कहा जाता है।
वस्तुतः तो देव तथा देह एक ही मूल धातु 'दा' -- दीयते -- 'देना' से व्युत्पन्न हैं।
इसमें पुनः यह भी ध्यान से देखना होगा कि मनुष्य जिस भी देवता की जिस भी रूप  में उपासना और उसका स्मरण करता है, और मृत्यु आने पर उसे याद करता है तो वह उसी देवता और उसके लोक को मृत्यु के बाद प्राप्त होता है।  ब्रह्म का नाम ॐ  है इसलिए मृत्यु के समय ॐ का उच्चारण ब्रह्मलोक की प्राप्ति करने में सहायक है। ब्रह्मलोक को भी पुनः अनित्य कहा गया है।
गीता अध्याय 8 के ही श्लोक 16 में कहा गया है :
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोsर्जुन  ....
इसी प्रकार राम, कृष्ण, हरि, आदि का महत्त्व है।
ये यथा माम् प्रपद्यन्ते तांस्तथैव  भजाम्यहम्।
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Thursday, 23 August 2018

Valmiki Ramayana and Gita,

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(The English translation is given at the end of the Hindi text.)
वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 64, 65, 70, 71 में भगवान् श्रीराम तथा श्रीसीता के कुल का विशेष वर्णन किया गया है ।
प्रसंगवश इसमें सृष्टि के प्रारंभ से आदित्य (सूर्य), मनु, तथा इक्ष्वाकु का तथा इक्ष्वाकु के बाद दिलीप, रघु, अज, दशरथ, इस क्रम से इस कुल में उत्पन्न राजाओं का वर्णन है ।
इस वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि ’काल’ के जिस भौतिक-क्रम का उल्लेख रामायण में वाल्मीकि ने किया है, ’काल’ का उससे भिन्न एक अन्य रूप / प्रकार / आयाम भी है, जिसका वर्णन श्रीमद्भग्वद्गीता अध्याय 4 के श्लोक 1 में इस प्रकार से है :
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
संक्षेप में, वैसे भी युगक्रम में भगवान् श्रीकृष्ण का आविर्भाव द्वापर में और भगवान् श्रीराम का उनसे पहले त्रेता में हुआ था, इसलिए महाभारत तथा उसके अन्तर्गत श्रीमद्भग्वद्गीता कालक्रम से वाल्मीकि-रामायण के बाद में लिखे गए ।
पुनः युद्धकाण्ड में रावण पर विजय पाने के लिए अगस्त्य मुनि द्वारा भगवान् श्रीराम को ’आदित्यहृदयम्’-स्तोत्र का पाठ करने का उपदेश भी दृष्टव्य है ।
भगवान् सूर्य जहाँ विवस्वान् / वैवस्वत् के रूप में अदिति के पुत्र, ’आदित्य’ हैं, वहीं वैवस्वत् (मनु) उनके वंशोत्पन्न हैं जिन्होंने ’मनुस्मृति’ की रचना की ।
राजा जनक के कुल का वर्णन अगली पोस्ट में !
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Valmiki Ramayana Balakandam, chapter (sarga) 64, 65, 70, 71 narrate the details about the clan of Raghu / Suryavansha / SriRama and of Sri Sita also.
This gives a reference to the beginning of Srishti (manifestation) from the Supreme Principle (Parabrahma, The Reality Potential, latent, but not manifest).
As the Sun (in 12 forms of aditya) is son of  Aditi (the Mother-Principle at the Cosmic-sphere),
The manifest form of Sun happens at the beginning of Kalpa, thus the Clan of Sri Rama is traced to the birth of Sun.
Aditi and Diti are the spouse of Rishi Kashyapa,
Aditi is the mother of 'Devas' while Diti of 'Daityas'.
Here we can see how Deity must have come from Diti).
Thus the clan of Sun (Suryavansha) begins with the emergence of the Sun.
The Sun as seen in the sky is the physical form of Aditya, while Aditya is the Cosmic form of this Sun.
Here a reference to Srimadbhagvadgita is worth mentioning.
In Chapter 4, stanza 1, Lord Srikrishna tells Arjuna :
"I had explained this 'Yoga' to Aditya the Vivasvana, then Vivasvan taught the same to Manu, Manu to Ikshvaku and then for a long time-period (millenia), this Yoga had been lost to obscurity.
The samr Yoga - 'Raja-vidya' , 'Raja-yoga' is now taught to you by me.
We know in our physical time-scale (of mortals). The Treta-yuga was the earlier one and the Dwapar the next.
Lord Sri Rama were born as a human being during the Treta-yuga, and Lord Srikrishna in the Dwapara-yuga.
Accordingly the Ramayana was written by Rishi Valmiki long before Vedavyas wrote-down Mahabharata.
Gita (Srimadbhagvadgita) is a part of Mahabharata.
Manu wrote 'Manusmriti' a treatise about practicing the 'dharma' according to Varna-Asrama.
Varna-Asrama is the 4 fold classification of the stage of all humans and is basically has foundation in 'Guna-Karma' or tendiencies inborn and the actions one is attracted to do in life.
This has nothing to do with 'caste' as some might think / believe.
So we see there are Brahmin (Like Ravana) in Rakshasa-clan, Prahlad in Daitya-clan.
Lord Shukra is the Guru of Daitya and Valmiki Ramayana tells us that in ancient times, the Earth belonged to Daitya-s and later on kshatriya defeated the earth from them.
That is yet another topic.
Here the important point is :
Lord SriKrisna tells Arjun that The Yoga as taught by Aditya to Ikshvaku and onwards, was first of all enunciated to Aditya by 'ME'. The Supreme Principle.
The same yoga was lost in the course of time, which Sri Krishna again rejuvenated for Arjuna.
The Upanishad and related Vedanta texts though follow a different way of attaining the 'Brahman' by means of attaining the 'Brahma-loka' while alive or after the physical body is discarded.
Yet there is a secret way for the deserving.
Patanjali has another model that again needs maintaining 'I am' and only after attaining maturity one automatically comes upon the quest "Who (am) I?"
But for the beginners the whole exercise is indeed very helpful to understand the importance of the 'quest'. 
While the details about the 'Nadi' / nerves(?) and the chakra have been discussed in detail so that one can attempt to develop a spiritual attitude, there is also a 'direct-way' which again bifurcates in the form of 'Brahmanubhava' (sarvam khalvidam brahma) -experience, and Realization that 'I am' 'Brahman',
But as has been explained in the earlier posts of this blog ; -swaadhyaaya, in realization of the 'observer is the observed', the 'I am' (which is but reflection and a subsequent memory of 'I' only and is dissolved in the Realization of the Self, as Self as Brahman) is a temporary mile-stone in this process.
To the earnest, understanding this whole process is what constitutes Raja-yoga' or 'Raja-vidya'.
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Rajayoga, Rajavidya,

वाल्मीकि रामायण / Valmiki Ramayana, and गीता / Gita,
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 Some months ago I read this whole Sanskrit text . A beautiful and honest work by Maharshi Valmiki. Then I read 4 chapters of Raghuvansham which narrates the whole history of 'Raghukul'. Again, though Valmiki Ramayana briefly tells the history of the clan of Rama when Rishi Vasishtha describes how from the beginning The Sun (Vivasvana) gave the spiritual wisdom to Manu, Then Manu gave the same to Ikshvaku, and then so on this Rajavidya Rajayoga was again expounded in dwapara to Arjuna by Srikrishna. Though Valmiki Ramayana tells about the story of Raghukul from Aditya to Manu, Manu to Ikshvaku, and then upto Lord Rama only. Thereafter this Rajavidya was lost in the coming times, which was again told by Srikrishna to Arjuna. This is a different approach to Spiritual quest, in that Though Patanjali named His work as Rajayoga, Patanjali follows another regime (discipline). What is taught by Srikrishna to Arjun is far more the same as what Sri Ramana taught to us. The Upanishadik Truth may be the same, but Upanishad and ShankarAcharya only briefly hint at the way Sri Ramana and Srikrishna taught. Sri Raman's approach is far more practical. Yet the Reality is for the deserving only. Sri Nisargadatta and Sri Ramana taught the 'direct approach', while Shankaracharya taught 'aparokshanubhuti' > direct experience. Sri Raman's 'Hridaya-Vidya' is the crest of the Vedanta.in summary, Sri Shankaracharya and Upanishad take the aspirant to 'brahma-loka' ('sarvaM khalvidaM brahma' -knowledge) only and then in some next birth, one becomes aware of the fact 'ahaM brahmAsmi'. In essence though the two dictum are same, attaining the second is the final in practice.
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dharma, adharma, and humanity.

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धर्मेण हन्यते व्याधिः धर्मेण हन्यन्ते ग्रहाः ।
धर्मेण हन्यते शत्रुः यतो धर्म ततो जयः ॥
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'dharma' is the 'nature' 'adharma' is what is against nature. When human beings follow 'adharma' the result is troubles, calamities, ....And we can't compensate the losses incurred because of the consequences that follow 'adharma'... Prevention is better than cure. And 'dharma' alone is as much prevention as it is the cure. Truly, humanity is one, so there are not some who do 'adharma' and some others who suffer the consequences. The best way is to shun 'adharma' and follow 'dharma'. That needs discovering what is 'adharma' and what is 'dharma'. As 'dharma' is the very 'nature' itself', it surfaces on its own when we stop practicing 'adharma'... There is no other relief.
धर्म, अधर्म और मानवता
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पहले कुछ 'शब्द' ...
'नृ'  प्रातिपदिक (stem) से नृप, नर, नल, नारी, नारायण, नारा (पानी) आदि अनेक शब्द बनते हैं।
अंग्रेज़ी में 'natal', 'nation', native, nepotism, nature, natzion (German) आदि अनेक शब्द बनते हैं।
यहाँ तक कि तमिळनाडु या वायनाड, रामनाड आदि में यही 'nat' विद्यमान है (यह मेरा अनुमान है )
'नु' 'नव' से नौका, नाव, नौ, navy, nautical,  आदि अनेक शब्द बनते हैं।
अब उपरोक्त श्लोक :
धर्मेण हन्यते व्याधिः धर्मेण हन्यन्ते ग्रहाः ।
धर्मेण हन्यते शत्रुः यतो धर्म ततो जयः ॥
अर्थ :
धर्म से व्याधि (रोग) का निवारण होता है,
धर्म से ग्रहों से उत्पन्न पीड़ा का नाश होता है,
धर्म से शत्रु का नाश होता है ठाठ,
जहाँ धर्म है वहाँ जय है ...
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प्राकृतिक आपदाएँ मनुष्य के द्वारा 'अधर्म का आचरण करने से पैदा होती हैं , और चूँकि मानवता एक है इसलिए किसी भी समुदाय या मनुष्य के द्वारा किए  जानेवाले अधार्मिक आचरण  के अशुभ परिणाम सभी मनुष्यों को भुगतने होते हैं।
हमें लगता है कि प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित लोगों की सहायता की जाना मानवता-धर्म है, जो अवश्य ही सत्य है, लेकिन एक ओर तो  हम लोभ और भय की कसौटी पर प्रगति और विकास के स्वप्न देखते हैं, दूसरी ओर सामूहिक स्तर पर ऐसे कार्य करते हैं जिनसे प्रकृति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं।  अपनी तत्कालिक ज़रूरत के पूरा होने को हम सफलता समझकर प्रसन्न होते हैं किन्तु प्रकृति के विरोध से अंततः हमें मुँह की खानी पड़ती है और तब हम सोचते हैं कि आपदा-पीड़ित मनुष्यों की सहायता करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
धर्म और परंपरा / रूढि में भेद है जबकि हमने परम्पराओं को 'धर्म' का नाम देकर इस्लाम, हिंदुत्व, ईसाई, यहूदी आदि परंपराओं को धर्म समझ लिया है।  हर परंपरा में धर्म किसी अंश में हो सकता है और परंपरा को अंधे की तरह धर्म समझ लिए जाने से उनके परस्पर मतभेद हमें कट्टर मतावलंबी बना देते हैं और सम्पूर्ण मनुष्यता के लिए क्या शुभ और अशुभ है इस ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता।
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केरल की बाढ़ हो या किसी जगह आनेवाले भूकंप जो एक हद तक मानव-निर्मित हैं तो प्राकृतिक कारण भी उनके लिए होते हैं।  युद्ध तो मनुष्य की नासमझी का ही परिणाम है और भले ही ही हम 'आत्मरक्षा' के लिए 'युद्ध हम पर थोपा गया है' यह कहकर अपने 'राष्ट्र' के लिए बलिदान होने में गौरव अनुभव करें, वस्तुतः दुर्भाग्यपूर्ण है।
जब हम विकास या तथाकथित वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर प्रकृति के विरुद्ध चलते हुए प्रकृति का संतुलन बिगाड़ते हैं तब अपने अनिष्ट का सृजन करने लगते हैं।  सबसे बड़ा उदाहरण है मनुष्य द्वारा अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण न करना।  और जब हम स्वास्थ्य की बात करते हैं तब भी देख सकते हैं की अगर हम अपनी औसत आयु को बढ़ा भी लें तो प्राकृतिक कारण या युद्ध, नई नई बीमारियाँ, अकस्मात् होनेवाली दुर्घटनाओं आदि से हम न जानते हुए भी मृत्यु के मुख में जा सकते हैं।  प्रकृति इसमें बच्चे, बूढ़े, युवा, स्त्री, पुरुष, गरीब, अमीर, हिन्दू, मुसलमान, यहूदी, पारसी, चीनी, रूसी, आदि का भेद नहीं करती।  फिर हम धर्मों के बीच भेद कैसे कर सकते हैं? हमारी जो भी आस्थाएँ हैं वे सबकी आस्थाएँ कैसे हो सकती हैं? किन्तु हम इस सरल तथ्य को देख नहीं पाते और न देखना चाहती हैं क्योंकि हमारे लोभ और भय समुदायगत स्वार्थ हमें ऐसा नहीं करने देते।
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