Tuesday, 3 October 2017

मनुष्य कितना ’स्वतंत्र’ है?

मनुष्य कितना ’स्वतंत्र’ है?
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आचार आचरण के लिए आवश्यक प्रमुख तत्व हैं ।
किसी भी प्रकार के आचरण के लिए ये ही तीन तत्व मूलतः और प्रेरक होते हैं ।
इसके ही अन्तर्गत इच्छा, अनिच्छा (स्वतंत्रता) तथा परेच्छा (बाध्यता / परतंत्रता) के अनुसार कर्म का आचरण होता है ।
स्वतंत्रता का अर्थ स्वेच्छाचारिता से बहुत भिन्न है ।
स्वतंत्रता का अर्थ है इच्छा, अनिच्छा या परेच्छा से प्रेरित हुए बिना ही कर्म करने का संकल्प ।
इसमें कर्तृत्व-भावना तो होगी ही ।
अर्थात् ऐसा ’स्व’ जो अपने-आपके कर्म के कर्ता होने की मान्यता से बँधा है ।
स्वेच्छाचारिता का अर्थ है  इच्छा, अनिच्छा या परेच्छा से प्रेरित होकर कर्म करने / न करने का संकल्प ।
अर्थात् ऐसा ’स्व’ जो अपने-आपके कर्म के कर्ता होने की मान्यता से बँधा है ।
किंतु कर्म पुनः नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध इस प्रकार से चार प्रकार के होते हैं ।
इन्हें बुद्धि से भी समझा जा सकता है और आचार्य से आचार की शिक्षा ग्रहण कर, अर्थात् आचार्य के उपदेश से भी ।
बुद्धियाँ अनेक होती हैं जो कुटिल, जटिल, सरल, स्थूल, सूक्ष्म, स्थिर और अस्थिर आदि होती हैं जिनमें से हितप्रद को ही विवेक कहते हैं ।
वस्तु का विवेकपूर्वक निश्चय करना ही स्थितप्रज्ञता है ।
इस विवेक की सिद्धि के लिए अभ्यास आवश्यक है ।
स्वेच्छाचारी अपने-आपको स्वतंत्र समझता है किंतु वह इच्छा के वश में अपने हित-अहित पर ध्यान दिए बिना इच्छा को पूर्ण करने को स्वतंत्रता समझ बैठता है और इसे ’स्वतंत्रता’ कहकर अंततः दुःखी और निराश ही होता है ।
विवेकवान मनुष्य स्त्री हो या पुरुष कार्य / कर्म के शुभ-अशुभ परिणाम को दृष्टि में रखकर ही ऐसा कार्य करने में प्रवृत्त होता है जिसके परिणाम में क्लेश की प्राप्ति न हो । संसार के विषय में इतना ही पर्याप्त है । किंतु जिस विवेकवान को संसार के विषयों और विषय-सुखों की, इन्द्रियों के उपभोग करने की क्षमता की सीमा का, उनकी अनित्यता का स्मरण होता है वह ऐसा कार्य करने में प्रवृत्त होता है जिससे क्लेशमात्र की आत्यन्तिक निवृत्ति हो सके ।
वेद किसी को कर्म करने से न तो रोकते हैं न किसी कर्म को करने का आग्रह करते हैं ।
वेद केवल इतनी शिक्षा देते हैं कि किस कर्म का क्या शुभ, अशुभ और मिश्रित परिणाम होगा ।
तय तो मनुष्य को ही करना है ।
इसे ’स्वतंत्रतापूर्वक’, विवेक से करना है या स्वेच्छाचारिता से ।
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क्या स्त्री-स्वातंत्र्य के पक्ष-विपक्ष पर विचार करनेवाले इस संदर्भ पर ध्यान देते हैं ?

Monday, 2 October 2017

संभ्रम / कविता

संभ्रम / कविता
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मुझमें कोई राम नहीं है,
और नहीं है कोई रावण मुझमें!
मुझमें कोई गाँधी नहीं है,
और नहीं है कोई नाथूराम,
मुझमें कोई औरंगज़ेब नहीं है,
और नहीं है कोई शिवाजी मुझमें,
मुझमें कोई कंस नहीं है,
और नहीं है कोई श्रीकृष्ण मुझमें,
क्योंकि नहीं है कोई प्रतिमा मेरे मन में,
और नहीं है अपनी खुद की ही कोई,
जिससे तुलना और किसी की कर पाऊँ,
मैं नहीं इतिहास-पुरुष,
अतीत का कोई उजला या मैला पन्ना,
मैं हूँ नित्य सनातन शाश्वत्,
सब मुझमें हैं , लेकिन मैं किसी में नहीं ।
क्योंकि नहीं है कोई प्रतिमा मेरे मन में,
और नहीं है अपनी खुद की ही कोई,
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कोई प्रतिमा भी आख़िर क्या होती है?
वह जो तुम आरोपित कर देते हो,
किसी वस्तु पर जो स्थान समय से,
यूँ तो होती है नितांत अछूती,
लेकिन जिसे नाम आकृति में बाँधते हुए,
’पहले’ और ’बाद’ की रचना कर लेते हो ।
तुम दूसरी वस्तुओं की ही नहीं,
तुम दूसरे व्यक्तियों की ही नहीं,
खुद की, अपनी भी प्रतिमा गढ़ लेते हो,
बाँध लेते हो खुद ही खुद को उस कारा में ।
’मैं दुःखी हूँ, या मैं सुखी हूँ,
मैं स्त्री हूँ या कि मैं पुरुष हूँ,
या कभी-कभी नपुंसक भी !
सफल, विफल, या संघर्षरत,
निर्धन, धनिक, कंगाल,
पति, पत्नी, बेटा, बेटी,
पिता, माता, भाई या बहन,
नौकर, स्वामी, नेता, अनुयायी,
क्रांतिकारी, दब्बू, डरपोक, कायर,
वीर, असहाय, धार्मिक, अधार्मिक,
अधर्मी, विधर्मी, धर्मरक्षक,
आस्तिक या नास्तिक,
पापी या पुण्यवान,
शोषक या शोषित, ...'
जबकि ये सब तुम नहीं,
तुम्हारी प्रतिमाएँ होती हैं,
जिन्हें तुमने ही गढ़ा होता है
ये सब तुम नहीं,
तुम्हारे शरीर, मन, बुद्धि, संस्कारों के,
परिस्थितियाँ, और उनसे होनेवाले,
कर्म होते हैं, न कि होते हो तुम!
क्या इस सबसे खुद को जोड़कर ही,
तुम अपनी कोई प्रतिमा नहीं गढ़ लेते?
क्या ऐसे ही तुम राम, रावण,
गाँधी और नाथूराम,
औरंगज़ेब और शिवाजी,
श्रीकृष्ण और कंस,
भारत और जर्मनी,
अमेरिका और फ़्रांस,
गाँधीवाद, साम्यवाद या समाजवाद,
इस्लाम, हिन्दुत्व, क्रिश्चियनिटी,
यहूदी, पारसी या बौद्ध-सिख,
ईश्वर, सत्य, अहिंसा,
की भी प्रतिमा नहीं गढ़ लेते?
तुम इन प्रतिमाओं को जानते हो या उसे,
जिसे तुमने ही प्रमादवश,
अपनी अनवधानपूर्ण मनःस्थिति में,
खुद ही ढाला था,?
तुम चाहो तो अभी ही,
 इन प्रतिमाओं को विसर्जित कर सकते हो,
और इनके ही साथ,
अपनी खुद की प्रतिमा को भी !
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Sunday, 1 October 2017

संवाद के सिकता-सेतु

संवाद के सिकता-सेतु 
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रामचरितमानस / रामायण ग्रंथ के आदर्श-पुरुष (भगवान्) श्रीराम और आदर्श नारी (माता) सीता हैं इस से शायद ही कोई असहमत होगा ।
यदि हम (माता) सीता के आदर्श पर ध्यान दें तो वे पतिव्रता (और सती) भी कही जाती हैं । (माता) पार्वती ने जब प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में जन्म लिया था तो उनका नाम ’सती’ ही था । इसलिए ’सती’ का मूल अर्थ ’सत्’युक्त नारी अर्थात परम शुद्ध, देवी-तुल्य पवित्रतम स्त्री । इस ’सती’ ने ही दक्ष के यज्ञ में शिव को न बुलाये जाने पर ’योगाग्नि’ प्रज्वलित कर उसमें आत्मदाह कर लिया था । बाद में क्षत्रिय राजाओं की स्त्रियों ने भी पति के रण में मारे जाने या मारे जाने की संभावना की स्थिति में ’जौहर’ के रूप में आत्मदाह किया । इसे भी ’सती’ कहा गया । यह स्त्री का अधिकार है या नहीं इस पर तो उसे ही सोचना है (और मुझे लगता है कि सामान्य-बुद्धि से भी यह क्रूरता ही जान पड़ता है), लेकिन आज की स्त्री को भी यदि वह सीता और पार्वती के आदर्श का अनुकरण करना चाहती है, तो आज के समाज में रहते हुए यह कहाँ तक और कितना संभव है? यदि वह ऐसा न कर सके तो इसके लिए भी उसे पूर्ण स्वतंत्रता है और होनी भी चाहिए ।
उपरोक्त चिंतन इसलिए किया क्योंकि कभी-कभी बातचीत के लिए कोई उपयुक्त विषय न होने पर स्त्रियों से बातचीत करना अनावश्यक और व्यर्थ लगता है । तब मैं उनका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूँ कि वेद एवं रामायण आदि के अनुसार स्त्री के लिए पति ही परमेश्वर है और पति की सेवा करना ही उसका सर्वोत्तम धर्म हो सकता है । क्या वे इससे सहमत हैं? यदि हैं तो उन्हें पर-पुरुष से अनावश्यक बातचीत, बौद्धिक विचार-विनिमय भी नहीं करना चाहिए । नम्रता के कारण मैं उन्हें यह नहीं कह पाता कि स्त्री के लिए वेद का अध्ययन निषिद्ध है । क्योंकि तब उनके इससे असहमत होने की स्थिति में भी मैं कुछ नहीं कर सकता । उनकी स्वतंत्रता सर्वोपरि है । यह तो उन्हें ही तय करना है कि वे वेद, रामायण आदि को किस रूप में ग्रहण करती हैं । शास्त्रार्थ या वाद-विवाद तो मैं किसी से भी नहीं करता!
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The sand-bridges of communication.
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I sometimes come across the women who take pride in being a Hindu.
I have no objection but when I point out what duties according to Ramayana and Veda, a Hindu woman is expected to practice and observe, I sense we have lost the thread of communication. Though I can understand by 'Hindu' they might have the same meaning in their mind what I mean by 'Sanatana-dharma'. I fully honor their total and ultimate freedom of thought and the way they want to live their life, but I just feel unable to convey them this unpleasant fact that the duty and religion of a Hindu woman is to serve her husband taking him as the God. I feel this is what Veda and Ramayana too instruct for them. 
This is the virtual sand-bridge between them and me that makes dialogue almost impossible.
And, I never debate with anybody who-so-ever about anything.
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Extensive and Comprehensive.

Marriage, Social Ethics,
Parenting, Companionship, Relationship,
Extensive and Comprehensive.
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The institution of Marriage has origins in Veda.
And though there is a historical way of finding out how old are the Veda in the form of written texts, the Veda as such are the code of creation, preservation and dissolution of the existence where the consciousness is the essential cause that could be attributed to all this manifestation.
There is a creation that is 'done' and there is a creation that 'happens'.
Life as such that emerges in an organism is the creation that happens, and though we can think we have arranged for it's happening, we ourselves as an organism are individually and collectively too such a creation only.
The idea of being and the idea of being oneself as a distinct person, -an individual are again what 'happens' to us. To each of us, though basically at individual level only.
We don't have a collective identity, though this has been made later on and is assumed as our 'being'. And whatever is made has a time-bound existence, including the 'time' itself.
Let us have a quick-glance at the vocabulary needed to understand this better :
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ब्रह्म, brahma > Totality That includes the Creator, the Creation and the inherent knowledge which is not different from them both.
This trinity, this triad is so classified for the sake of simplicity in grasping the principle.
 ब्राह्मण, brāhmaṇa > That which has its origin in ब्रह्म, brahma, though may be strictly in the subtle, gross or the intermediate form.
Thus the humans are but one kind of the multitude of forms (organisms).
Again, in humans there are few who by intuition or tradition, accept and follow the authority of Veda,
and practice the way accordingly as is enjoined upon by Veda.
Then there are others who have not such intuition, tradition or knowledge so for them there is no question of  following this वेद-धर्म / Veda-dharma i.e. ब्राह्मण-धर्म, brāhmaṇa-dharma, again according to their inherent nature-born tendencies within them, that lets them see one of the four major kinds of the classification further made is most convenient for them.
This four-fold classification is called  वर्ण / varṇa. are :
ब्राह्मण, brāhmaṇa, क्षत्रिय, kṣatriya, वैश्य, vaiśya and शूद्र, śūdra respectively.
As Veda proclaim, it is for the good and benefiting for all to live the life in harmony with one's natural tendencies, so there is no strife or conflict in thought and action, it is also important with a view for creating and preserving a cohesive society at the collective level.
Thus follows the 'profession' or the way of 'livelihood'.
And basically this is in the genes, along with the clan, the tradition also enhances the skill of any community, which is but an organ of the society at large.
At the formal level, one could have born in a family of one class, it is possible (and is seen as well) because of one's different inclinations and tendencies (as these vary from person to person) he is a better-fit in some other class.
And no class is superior or inferior, higher or lower, declare the scriptures.
But of course, there is emphasis of keeping the class as much 'pure' as possible.
We have a case Of Lord परशुराम / paraśurāma who was born of the ब्राह्मण-वर्ण / brāhmaṇa-varṇa, but had tendencies of क्षत्रिय-वर्ण, kṣatriya-varṇa.
Going into this here is quite out of subject and unimportant, but this shows, how the mixing-up of  वर्ण / varṇa can disturb the cohesive-balance of harmony of the Society.
The first and the foremost consequence is that whole of सनातन-धर्म, sanātana-dharma, वर्णाश्रम-धर्म, varṇāśrama-dharma, and ब्राह्मण-धर्म, brāhmaṇa-dharma is lost, What happened after the Great war of महाभारत / mahābhārata.
Presently we can't say with confidence how far and to what extent the harm has been done.
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The institution of Marriage as devised by Veda saw to it that purity of the वर्ण / varṇa is preserved at all cost. Because only then the ब्राह्मण-धर्म, brāhmaṇa-dharma could be able to perform the rituals according to the procedures strictly in compliance with the rules dictated by वेद-धर्म / Veda-dharma.
This was / is the fundamental of Marriage.
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These days though the वेद-धर्म / Veda-dharma and ब्राह्मण-धर्म, brāhmaṇa-dharma are still alive and perhaps prospering too, the institution of Marriage has lost this fundamental understanding and no new understanding could  evolve to replace the same.
Whatever be the idea of Marriage, Veda and all common-sense too suggest that Marriage is a social responsibility for every-one. Marriage is though gratification of sex-urge, this urge has implications that cause fragmentation in the society.
Religion of this day, whatever religion one practices enforces upon the followers to follow the ethics as is governed by their books. And the interpretations of the book itself varies so much that the disputes and differences are a common outcome.
At the level of society, how an individual deals with his / her own sex-urge has a great impact upon the society. Given that one can live 'in-relationship' and out of this Marriage-bracket, the question of the off-springs poses another problem.
Though companionship could be a good basis, but with every enjoyment and right the duty and responsibility is invariably associated. There is a 'price', one is expected to pay for, for whatever one gets in exchange from the society.
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Marriage and Religion as tradition have become outdated, obsolete and redundant.
We have to create and sustain a new society where relationship is based upon the relation of the one who for living happily is dependent upon the other. And this is possible only if we have a right understanding of the sexual relationship as well. We can't afford suppressing or glamorizing the sex-urge and seek gratification but take it as a normal urge and force that is at the core of Life and Creation. This is a bit difficult to understand but an important, vital need of our times.
Marriage and Religion as tradition have conditioned our mind in such a way that sex and sexuality, sexual behavior have become a nightmare and a vicious cycle for most of us.
Society or individuals or The Society with individuals need to have a second glance over all this and find out.
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Disclaimer :
As this is my swaadhyaaya-blog, here I note-down what I think.
This is all basically very personal only.
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पुत्तलिका-तन्त्र

पुत्तलिका-तन्त्र
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प्रत्येक वर्ण देवता है अर्थात् प्राण और चेतना का एक युग्म जो एक ओर तो एक सुनिश्चित ध्वनि-कंपन है तो दूसरी ओर वह चेतना है जो उस कंपन से युक्त वह वैश्विक चेतना है जो व्यक्ति-सत्ता के रूप में उस कंपन की अभिमानी देवता है । यह इस अर्थ में व्यावहारिक सत्य है कि वर्णों के सुनिश्चित संयोग से ऐसी चेतन-सत्ताएँ पाई जाती हैं जिनका अस्तित्व वेद से प्रमाणित तो है ही, वैदिक कर्मों के सुनिश्चित अनुष्ठान से उनसे संपर्क भी किया जा सकता है और चूँकि वर्ण नित्य और सनातन अर्थात् अमर है, इसलिए जैसे भौतिक विज्ञान में अनेक भिन्न-भिन्न तत्वों अर्थात् प्रकृति  के गुणों को परिभाषित कर उस आधार पर उन तत्वों का चरित्र तय किया जाता है वैसे ही अध्यात्म-विद्या में असंख्य देवताओं की सृष्टि की जा सकती है और उनसे किसी प्रयोजन की सिद्धि भी की जा सकती है । ये असंख्य देवता भी मूलतः मनुष्य के द्वारा उच्चारित किए जा सकनेवाले वर्णों की समष्टि है इसलिए कुछ ऐसे वर्ग (मातृकाएँ / Matrix) हैं जिनमें से प्रत्येक में भिन्न-भिन्न देवताओं का समुच्चय (Set) होता है । इसलिए ऐसा प्रत्येक देवता एक या एक से अधिक वर्ग में भिन्न-भिन्न उपाधि-सहित भिन्न-भिन्न लक्षणों और गुणों से युक्त एक तत्व / element / member होता है । ऐसे कुछ सीमित तत्वों से बने वर्ग / matrix उस बड़े वर्ग के उपसमुच्चय subset होते हैं। इस पूरे देवता-तंत्र को आज के गणित 'Topology' और modern algebra की भाषा में बहुत सटीक तरीके से समझा / समझाया जा सकता है।
किसी भी देवता की एक प्रतिमा होती है जो इन लक्षणों और गुणों के आधार पर निर्मित की गई होती है जिसमें प्राण की प्रतिष्ठा किए जाते ही वह देवता जागृत हो जाता है । यह सारा प्रयोग इनके ज्ञान-सहित भी किया जा सकता है और संयोगवश, अज्ञान-सहित भी होता रहता है जिससे प्रकृति में असंख्य जीव-चेतनाएँ स्थूल, सूक्ष्म या कारण-मात्र देह-धारी के रूप में व्यक्त होती हैं ।
इस प्रकार ’प्’ वर्ण, जो किसी देवता का लक्षण है, स्वतंत्र रूप से तथा अन्य किन्हीं एक अथवा अनेक वर्णों से युक्त होकर भिन्न-भिन्न रूप लेता है, एक सुनिश्चित अर्थ और कार्य का द्योतक है । यहाँ उदाहरण के रूप में इस वर्ण को प्रस्तुत करने का ध्येय यह है कि इसके कुछ रूपों का अध्ययन किया जाए ।
प् + अ, प् + आ, प् + इ, प् + ई, प् + उ, प् + ऊ, प् + ऋ, प् + ॠ, प् + ए, प् + ऐ, प्  + ओ, प् + औ, आदि ।
पुनः इन स्वरों से युक्त होने पर ’प्’ का एक विशिष्ट रूप प्राप्त होता है जो ’प’ ’पा’ ’पि’, ’पी’, ’पु’, ’पू’, ’पृ’, ’पॄ’, ’पे’, ’पै’, ’पो’, ’पौ’, इतादि रूप लेते हैं ।
विसर्ग और अनुस्वार भी ऐसे ही वर्ण और देवता हैं  जो उपरोक्त प्रत्येक संयुक्त वर्ण से जुड़ने पर ’पः’, ’पाः’ इत्यादि बनते हैं ।
इस प्रकार एक सुनिश्चित क्रम में वर्णों को रखकर संयुक्त-रूप में प्राप्त होनेवाले परिणाम उनके कार्य को फलित और इंगित करते हैं । इस प्रकार एक ही वर्ण ’प्’ के असंख्य संयोजन हो सकते हैं और मूलतः केवल एक पूर्ण वर्ण से भी उससे जुड़े दूसरे पूर्ण या अपूर्ण वर्ण से ’धातु’ घटित होती है ।
इस प्रकार धातु के अतिरिक्त भिन्न-भिन्न प्रत्यय भी अस्तित्व में पाए जाते हैं और यह तो स्पष्ट ही है कि इस प्रकार के अध्ययन से हम केवल उनका आविष्कार कर रहे हैं न कि सृष्टि या निर्माण । क्योंकि वे तो पहले से ही अस्तित्व में हैं, हम अपना ध्यान उन पर एकाग्र कर उन्हें अपनी चेतना में स्थापित कर शक्ति अर्थात् प्राण देते हैं ।
प् से जैसे ’पत्’ और ’पत्र’ की ’सृष्टि’ होती है, वैसे ही प् से ही ’पु’ तथा ’पु’ से ’पुत्’ एवं ’पुत्र’ / ’पुत्री’ की भी सृष्टि होती है ।
पु से ही ’पुर’ और ’पुरुष’ की भी सृष्टि होती है ।
यद्यपि अवांतर दृष्टि से,
’पृ’ से भी पुर् / पुर / ’पुरुष’ की सृष्टि दृष्टव्य है ही ।
उपनिषद् कहते हैं :
यो वै तत् पुरुषो ...
यह सब व्याप्ति एक ही पुरुष (साङ्ख्य) का विस्तार है ।
पुत् से ही पुत्तलिका की सृष्टि होती है जो ’प्रतिमा’ होती है अर्थात् विशिष्ट रूपाकार ।
इसलिए संसार में पाई जानेवाली या मन में निर्मित सभी प्रतिमाएँ पुत्र / पुत्री या पुत्तलकः / पुत्तलकं / पुत्तलिका हैं ।
किसी मनुष्य की मृत्यु हो जाने पर उसे जल, वायु, अथवा अग्नि को समर्पित कर दिए जाने पर वह मनुष्य इस जीवन की कल्पना से मुक्त नहीं हो पाता क्योंकि यह कल्पना उसके जीवन में उसके मन में बनी संसार की कल्पना / संसार की प्रतिमा थी ।
अग्नि को समर्पित कर दिए जाने पर उसकी वह कल्पनाऔर कल्प-बंध टूट जाता है ।
हाँ यदि वह मनुष्य जीते-जी ही अपने कल्पित संसार को ज्ञानाग्नि में समर्पित कर भस्म कर मुक्त हो चुका हो तो ऐसे ज्ञानी की देह शिव की भस्म होती है जिसे यूँ तो जल, भूमि, वायु या अग्नि को समर्पित किए जाने से उसे कोई अंतर नहीं पड़ता किंतु भूमि में समर्पित कर समाधि देना संसार के लिए सर्वाधिक शुभ है ।
किंतु जिन अन्य मनुष्यों को भूमि में उतार दिया जाता है वे और उनका कल्पित संसार ’महाप्रलय’ तक उसी स्थान पर बद्ध रहता है ।
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मरणोत्तर-धर्म
ऐसे मनुष्य की आत्मा का मरणोत्तर धर्म उसके ’संसार’ का ही फैलाव है, और प्रत्येक मनुष्य चाहे तो जीते-जी ही उस संसार की अन्त्येष्टि अर्थात् अग्नि-संस्कार कर सकता है या उसके परिजनों से आशा कर सकता है कि उसकी मृत्यु होने पर वे उसका अंतिम-संस्कार उसे अग्नि में समर्पित कर करें ।
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श्रीवत्स-स्वस्तिक

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श्रीवत्स श्री-वत्-स ...
श्री : लक्ष्मी, विष्णु की माया,
स > सः जैसे ’श्रीवत्स’ में,
यह नियति-चक्र,
जिसका एक अन्य रूप है स्वस्तिक,
किंतु स्वस्तिक वामावर्त या दक्षिणावर्त होने से खंडित है,
इसलिए हमें ’आर्य’ स्वस्तिक के दो प्रकार प्राप्त होते हैं ।
एक सृजनोन्मुख दक्षिणावर्त,
दूसरा विनाशोन्मुख वामावर्त
पहला वैदिक है,
दूसरा अवैदिक या वेद से भिन्न,
जिसे विपरीत भी कह सकते हैं,
दूसरा ’हिटलर’ का प्रिय चिह्न था सभी जानते हैं ।
हिटलर का इतिहास भी सभी को पता है ।
किंतु श्रीवत्स जिसे वामावर्त या दक्षिणावर्त,
दोनों रूपों में देखा जा सकता है,
संतुलित और सम है ।
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Friday, 29 September 2017

The Dream of Ravan - A Mystery / रावण का स्वप्न - एक रहस्य

रावण का स्वप्न
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आजकल ’रावण का स्वप्न’ नामक पुस्तक पढ़ रहा हूँ । अभी ३ अध्याय पढ़े हैं किसी भी किताब को पूरी तरह पढ़े बिना उस के बारे कोई राय नहीं बनाता, लेकिन इतना कह सकता हूँ कि किसी हद तक यह रोचक और ज्ञानवर्धक तो है ही । ज्ञान के अपने ख़तरे होते ही हैं ज्ञान ’शक्ति’ है और शक्ति का प्रयोग खुद किया जाये या खुद पर हो, शक्ति के रूप में ज्ञान का अधूरा ज्ञान होना, लाभ के बजाय हानि भी पहुँचा सकता है । किसी भी प्रकार के ज्ञान के बारे में यह सत्य है । क्योंकि किसी भी प्रकार का ज्ञान सदा अधूरा ही होता है । हाँ ’जिसे’ ज्ञान अथवा अज्ञान है ’वह’ क्या है इसे जब जान लिया जाता है तो ऐसा ज्ञान शाब्दिक या अनुभवपरक न होकर यथार्थपरक होता है और उस पर पूर्ण-अपूर्ण का प्रयोग लागू नहीं होता । वह अखंडित, नित्य और शाश्वत है किंतु ’नया’ भी नहीं होता । ’नया’ और ’पुराना’ तो वह ’ज्ञान’ है जो आता-जाता रहता है ।
शायद ’रावण का स्वप्न’ की यही 'फलश्रुति' होगी, ऐसा अनुमान है ।
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The Dream of Ravan - A Mystery. 
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So far got through the 3 chapters. Started reading the next, which may be the last.
As I don't form an opinion about any book before reading up-to the end, just now unable to say confidently about this book also.
No doubt this one is quite interesting, fascinating and in terms of 'knowledge' informative as well.
The Seriousness of the subject could look somewhat boring for those who could skip a few lines and carry on.
As for as 'knowledge' is concerned, All 'knowledge' is dangerous, because 'knowledge' is Power, used upon oneself or upon other if done so without the perfect knowledge of 'knowledge', as Power can be a risky deal. Can harm or benefit according to the way it has been applied.
As is said 'Half-knowledge' is a dangerous thing, it is true for any knowledge that is acquired / remembered and is lost / forgotten in 'Time'.
All such knowledge is ever so incomplete and imperfect.
This 'knowledge' that keeps arriving and departing is always old though appears new also.
But the 'knowledge' or rather the 'wisdom' is the understanding of the 'One' who possesses and discards, remembers or forgets this acquired or discarded 'knowledge'.
This 'wisdom' is neither 'new' nor 'old' but ever-existent and independent of 'Time'.
Presently I can say this book deals with about giving this message.
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A Dream of Ravan - A Mystery
The Theosophical Publishing Society,
7, Duke Street, Adelphi, London, W.C.
1895
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144, Madison Avenue, New York, U.S.A.
(The Theosophist Office, Adyar, Madras / Chennai, India)
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Wednesday, 27 September 2017

A story in 3 words!

Write a happy story in 3 words Please!
Can't wait to read them!!
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There are a plenty!
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सत्-चित्-आनंद / sat-cit-ānaṃda
सत्यम्-शिवम् सुन्दरम् / satyam-śivam-sundaram
तत्-त्वम्-असि / tat-tvam-asi
अहं ब्रह्मास्मि / ahaṃ brahmāsmi
असतो-मा सद्-गमय / asato mā sadgamaya
अथातो ब्रह्म जिज्ञासा / athāto brahma jijñāsā
मृत्योः माम् अमृतं गमय / mṛtyoḥ mām amṛtaṃ gamaya
बुद्धं सरणं गच्छामि / buddhaṃ saraṇaṃ gacchāmi
धम्मम् सरणम् गच्छामि / dhammam saraṇaṃ gacchāmi
संघं सरणम् गच्छामि / saṃghaṃ saraṇam gacchāmi
एष धर्मः सनातनः / eṣa dharmaḥ sanātanaḥ 
एस धम्म सनंतनो / esa dhamma sanaṃtano / एक ओंकार सतनाम / eka oṃkāra satanāma
ईशावास्यम् इदम् सर्वम् / īśāvāsyam idam sarvam
ॐ मणि पद्मे हुम् / om̐ maṇi padme hum
ॐ नमः शिवाय / om̐ namaḥ śivāya
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ईश्वरोगुरुरात्मेति / īśvarogururātmeti

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ईश्वरोगुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने ।
व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः ॥

अर्थ :
एक ही परम सत्ता ईश्वर, गुरु तथा आत्मा (जीव) की तीन मूर्तियों के विभाजन की दृष्टि से तीन रूपों में देखी जाती है । किंतु वस्तुतः जैसे आकाश देह में (भीतर-बाहर) व्याप्त है, वैसी ही वह एक ही सत्ता इन तीनों में अविभाज्यतः ओत-प्रोत है । जब ’जीव’ परिपक्व होकर अनुसंधान से  युक्त होता है तो उत्साहपूर्वक जान लेता है कि वह परम पावन सत्ता श्रीदक्षिणामूर्ति ही इस प्रकार इन तीन रूपों में प्रकट और प्रच्छन्न हैं । श्रीदक्षिणामूर्ति को प्रणाम ! 
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ईश्वरोगुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने ।
व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः ॥
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īśvarogururātmeti mūrtibhedavibhāgine |
vyomavadvyāptadehāya dakṣiṇāmūrtaye namaḥ ||
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Meaning :
One and the only Reality pervades in three forms as God, Guru and the 'self'.
Obeisances to Lord दक्षिणामूर्ति / dakṣiṇāmūrti  Who assumes these 3 forms and the individual soul, when full of vigor and urge to find out discovers this.
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Saturday, 23 September 2017

Being a Hindu in Bharata

This article appeared in The Hindu in the 1940's..... when late Mr Kasturi (N Ram's father) was the editor.....can such an article be published now !!!!!!do zoom and read

Wish Politicians stop dividing people 
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Being a Hindu in Bharata
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Sir, -- I am a Hindu and have been a Hindu since my birth. As I call myself a Hindu, the Indian Government will look on me as a communalist. A Hindu in India is expected to be ashamed of his religion and not talk bout it in public. He must proclaim that he is secular. He must be tolerant when Hindus are attacked and Hinduism is ridiculed. Hindus believe that all religions lead to the same truth. Some other religions proclaim their uniqueness and feel that there can be salvation only through their religion. They want us to embrace their religion out of concern for the pagan Hindus. Hindus accept the right to convert others. Some ridicule Hindu gods and goddesses at street-corner meetings and Hindus do not protest. Hindus accept other’s right to propagate their faith by fair or foul means.
Governments manage Hindu temples. They do not interfere in the administration of the religious places of other religions as they belong to minority religious groups. Governments enact laws governing the life of Hindus but minority groups are given freedom to do what they want to.
Sri Rama’s birthday and Sri Krishna’s birthday are not national holiday. The Hindus do not mind as they are a tolerant people. They recite “Ishwar Allah tere nam” and no one else does.
Ambedkar ridiculed and abused Hindus and Hinduism. As tolerant Hindus we love him, adore him. Alladi Krishnaswami Iyer, B.N.Rao, and others also contributed a great deal towards the drafting of the Indian Constitution. We have forgotten them as they were foolish enough not to criticize Hindus and Hinduism.
Hindus adore Max Mueller for his translation of Hindu religious works into English. Some call him a Rishi. We forgive him for his views on Hindus and Hinduism. He translated Hindu religious works to prove that Christianity is superior to Hinduism. In 1886, Max Mueller wrote to his wife:    
I hope I shall finish the work, and I feel convinced though I shall not live to see it, yet this edition of mine and the translation of the Veda will hereafter tell to a great extent on the fate of India and on the growth of millions of souls in that country. It is the root of their religion and to show them what the root is, I feel sure is the only way of uprooting all that has sprung from it during the last three thousand years.
He wrote to the Secretary of State for India that
The ancient religion of India is doomed and if Christianity does not step in, whose fault will it be?
As true Hindus we forget his motives and value him for his work,
I am distressed at the way Hindus are treated by every government. Our governments are more interested in the minorities than in the majority community. Hindus are taken for granted. Their tolerance is mistaken for weakness.
In the name of secularism, governments trample on the feelings of Hindus. The present tensions in the country are due to the one-sided policy of the governments. Governments are united in dividing people on the basis of their religion. The British divided and ruled. The British have left us, their legacy remains.
K.Subramanian, Secundarabad.
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The Hindi Translation of the above :
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प्रस्तुत लेख वर्ष 1940 में, The Hindu में प्रकाशित हुआ था,
जब स्वर्गीय श्री कस्तूरी (श्री एन. राम / N. Ram के पिता), The Hindu के संपादक थे।
भारत में हिन्दू होने का तात्पर्य
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महोदय,
मैं एक हिन्दू हूँ और वह भी जन्म से ही -न कि किसी दूसरे समुदाय से धर्मान्तरित । चूँकि मैं अपने-आपको हिन्दू कहता हूँ इसलिए सरकार मुझे संप्रदायवादी की दृष्टि से देखेगी । भारत में हिन्दू होने के नाते आपसे अपेक्षा की जाती है कि आपको अपने धर्म (हिन्दू होने) के लिए शर्मिन्दा होना चाहिए, और इस बारे में सार्वजनिक रूप से बात नहीं करना चाहिए । आपको यह घोषित करना चाहिए कि आप ’धर्मनिरपेक्ष' अर्थात् secular हैं । जब भी हिन्दुओं पर हमला किया जाता है और हिन्दुत्व का उपहास किया जाता है तब आपको सहिष्णुता प्रदर्शित करना चाहिए । हिन्दू विश्वास करते हैं कि सभी धर्म एक ही सत्य तक ले जाते हैं । (जबकि) कुछ अन्य धर्म उनके अपने धर्म को इस बारे में एकमात्र और अद्वितीय घोषित करते हैं और समझते हैं कि केवल उनके ही धर्म को अपनाने, उसे सत्य मानने तथा उस पर चलने से ही मनुष्य की मुक्ति हो सकती है, अन्यथा नहीं । इसलिए वे हमारे प्रति सहानुभूति रखते हुए चाहते हैं कि हम pagan / पगन् हिन्दू उनके धर्म को अङ्गीकार करें । दूसरे के धर्मान्तरण किए जाने के अधिकार को हिन्दू मान्य करते हैं । कुछ लोग नुक्कड़-चौराहों पर एकत्रित होकर हिन्दू देवी-देवताओं का मज़ाक उड़ाते हैं और हिन्दू इसका विरोध नहीं करते ।
हिन्दू, भले-बुरे किसी भी तरीके से अपने धर्म का प्रचार करने के उनके अधिकार का विरोध नहीं करते ।
सरकार हिन्दू धर्मस्थलों की देख-रेख करती है । सरकार दूसरे धार्मिक समुदायों के धर्मस्थलों की व्यवस्था में दखल नहीं देती क्योंकि वे अल्पसंख्यक हैं । सरकार हिन्दुओं के जीवन को नियंत्रित करनेवाले क़ानूनों  बनाती और लागू करती है, लेकिन अल्पसंख्यक वर्गों को यह स्वतंत्रता है कि वे जो चाहें करें ।
श्रीराम का जन्मदिन और श्रीकृष्ण का जन्मदिन राष्ट्रीय अवकाश नहीं होता । हिन्दू इससे उद्विग्न नहीं होते क्योंकि वे सहिष्णु हैं । केवल वे ही "ईश्वर अल्ला तेरे नाम" गाते हैं, जिसे उनके सिवा दूसरा कोई नहीं गाता ।
अम्बेडकर ने हिन्दुत्व का उपहास किया और उसे गालियाँ दीं । (लेकिन) सहिष्णु हिन्दू होने के नाते हम उनका सम्मान और आदर करते हैं । (अम्बेडकर के अलावा) अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, बी.एन. राव, और दूसरे कुछ लोगों ने भी संविधान-निर्माण में अपना इतना ही या इससे भी कुछ अधिक और अमूल्य योगदान दिया । उन सबको हमने इसलिए भुला दिया क्योंकि मूर्खतावश उन्होंने हिन्दुओं और हिन्दुत्व की पर्याप्त निन्दा-भर्त्सना नहीं की ।
हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के लिए हिन्दू मॅक्स-मूलर का आदर कारते हैं । कुछ लोग तो उसे ऋषि कहते हैं । हिन्दुओं और हिन्दुत्व के प्रति उसके दृष्टिकोण के लिए हम उसे क्षमा कर देते हैं । उसने हिन्दू धर्मग्रंथों को अंग्रेज़ी में इसलिए अनुवादित किया ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि क्रिश्चियनिटी हिन्दुत्व से श्रेष्ठ है । 1986 में उसने अपनी पत्नी को पत्र लिखा था :
" इस बारे में मुझे कोई संशय नहीं है और मुझे आशा है कि मेरा कार्य पूरा हो जाएगा, और यद्यपि उसे देख पाने के लिए, तब तक शायद ही मैं जीवित रहूँगा, लेकिन मेरे वेद के इस संस्करण / अनुवाद का कार्य भारत और इस राष्ट्र में रहनेवाले करोड़ों मनुष्यों के, आज के बाद के आनेवाले भविष्य को बहुत गहराई तक प्रभावित करेगा । यह (वेद), उनके धर्म का आधारभूत मूल तत्व है, और मेरा यह कार्य अर्थात् उन्हें यह दिखलाना कि उनके धर्म का आधारभूत मूल तत्व क्या है, उनके उस धर्म के आधारभूत मूल तत्व को, जो पिछले तीन हज़ार वर्षों से पनपा-बढ़ा है, जड से उखाड़ने, उस पर कुठाराघात करने का एकमात्र उपाय है ।"
और, भारत के लिए सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट (Secretary of Sṭaṭe for India) को उसने पत्र लिखा :
"भारत का प्राचीन धर्म मरणासन्न स्थिति में है और अगर इस समय क्रिश्चियनिटी आगे आकर इस मौके का फ़ायदा नहीं उठाता तो यह किसका दोष होगा?"
सच्चे हिन्दू होने के कारण हमने उसके ध्येयों को क्षमा कर दिया और उसके कार्य के लिए उसका सम्मान करते हैं ।
प्रत्येक सरकार हिन्दुओं से जैसा व्यवहार करती चली आ रही है, उससे मैं बहुत निराश (और उद्विग्न) हूँ । हमारी सरकारों की रुचि (और चिन्ता) बहुसंख्यकों के बजाय अल्पसंख्यकों के लिए अधिक है । हिन्दुओं की उपेक्षा कर दी जाती है । उनकी सहिष्णुता को उनकी कमज़ोरी समझ लिया गया है ।
’धर्म-निरपेक्षता’ (secularism) के नाम पर सरकारें हिन्दुओं की भावनाओं को कुचलती रही हैं । देश में मौजूदा वर्तमान तनाव सरकारों की इसी पक्षपातपूर्ण नीति के कारण है । लोगों के धर्म के आधार पर उनमें भेदभाव पैदा करने के लिए सरकारें पूरी तरह से एकमत हैं । अंग्रेज़ यहाँ से चले गए, उनकी विरासत बाक़ी है ।
के.सुब्रमणियन, सिकन्दराबाद  
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Friday, 22 September 2017

’मन, ’संबंध', 'पहचान और याददाश्त'

’मन, ’संबंध', 'पहचान और याददाश्त'
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पहचान याददाश्त पर निर्भर होती है और याददाश्त पहचान पर । यह एक ऐसा सत्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता । अर्थात् जिसे गलत सिद्ध नहीं किया जा सकता । इस प्रकार हमारा जानकारी-रूपी संपूर्ण ज्ञान केवल इन दो रूपों में मस्तिष्क में अंकित होता है । यदि आप किसी चीज़ को याद रखते हैं तो ही उसे पहचान सकते हैं और विलोम-क्रम में यदि आप किसी चीज़ को पहचान सकते हैं तो वह अवश्य ही आपकी याद का हिस्सा  है । विचार केवल शब्द-समूह होता है जिसमें किसी कल्पना का चित्रांकन हुआ होता है । और जिस कल्पना का चित्रांकन हुआ होता है उसका कोई स्थिर चित्र कहीं होता ही नहीं । मस्तिष्क इसी अल्पप्राय सूचना पर एक सीमित धारणा बनाता है । ऐसी कोई भी धारणा सत्य नहीं बल्कि सत्य का एक विरूपण मात्र होती है । इसी प्रकार प्रत्येक मस्तिष्क में उससे संबंधित जानकारी का एक संग्रह होता है जो यूँ तो पहचान अर्थात् याददाश्त के अंतर्गत सीमित किंतु बहुत विस्तीर्ण होता है । ’समय’ का अतीत, वर्तमान और भविष्य नामक विभाजन उसी याददाश्त अर्थात् पहचान में स्थित संग्रह के वर्गीकरण का एक प्रकार है, जिसमें ’ज्ञात’ से अतीत का तथा उस अतीत पर आधारित अनुमान से कल्पित भविष्य का सृजन मस्तिष्क द्वारा कर लिया जाता है । अतीत को जहाँ एक ठोस अपरिवर्तनीय वास्तविकता समझा जाता है वहीं भविष्य को एक लचीले अनुमान के रूप में देखा जाता है । यह अतीत और भविष्य भी पुनः भिन्न-भिन्न सन्दर्भों में भिन्न-भिन्न रूप बनाते हैं और उनमें से कोई भी वैसा नहीं होता जैसा कि समझा जाता है । इस प्रकार मन नामक चेतन सत्ता द्वारा अतीत और भविष्य की बनाई गई प्रतिमा, और मस्तिष्क द्वारा की गई उसकी पहचान, -अर्थात् याददाश्त भी एक अस्थिर संरचना होती है ।
शुद्धतः ठोस इन्द्रियगम्य ’अनुभवों’ से ’प्रमाणित’ तथाकथित ’विज्ञान’ और ’गणित’ की मूल आधारभूत कल्पनाएँ केवल अनुमानित धारणाएँ होती हैं, इसलिए उनके निष्कर्ष भी ऐसे ही उनके भंगुर विकल्प मात्र होते हैं । इसलिए अनुभवों को नए-पुराने कहकर उनकी तुलना से जो ठोस प्रतीत होनेवाले ’नियम’ और ’सिद्धांत’ गढ़े जाते हैं उनकी सत्यता सदा संदिग्ध ही रहती है ।
संपूर्ण ’सूचना-तंत्र’ घटनाओं की जानकारी, और स्मृति पर अवलंबित उनकी व्याख्याओं का जोड़ भर होता है जो भिन्न-भिन्न मनुष्यों के मस्तिष्क में ’वर्तमान’ का एक पृथक चित्र बनाता है जिसकी सबके लिए कोई समान सत्यता नहीं हो सकती । इसे हम ’माया’ भी कह सकते हैं जो वास्तविकता को आवरित कर उसका एक नितांत भिन्न चित्र हमारे समक्ष रखती है और हम ’संसार’ के बारे में अपनी एक से दूसरी कल्पना पर पहुँचते हुए एक ऐसे ’संसार’ की वास्तविकता को ठोस यथार्थ समझने की भूल कर बैठते हैं जिसमें हम हैं । यह ’हम’ भी जो मूलतः ’मैं’ का ही समूहात्मक रूप होता है इसी प्रकार की ’संसार’ जैसी ही एक स्मृतिजनित और पहचान-आधारित कल्पना है जो इस संसार को इतना विविध और समृद्ध बनाती प्रतीत होती है ।
’संबंध’ किन्हीं भी दो चीज़ों या दो चेतन-सत्ताओं अर्थात् मनुष्यों या जीवित कही जानेवाली वस्तुओं के बीच की पहचान (अर्थात् पहचान की स्मृति) और स्मृति (अर्थात् स्मृति की पहचान) रूपी ’धारणा’ मात्र है । भले ही उसे कितना भी ठोस सत्य माना जाए, वह मूलतः साररहित विचार और कल्पना मात्र है ।
इस प्रकार ’संबंध’ का तत्व (निस्सारता) समझ लिये जाने पर उनके निर्वाह का, उनके बनने-मिटने का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है?
क्या स्मृति और पहचान अर्थात् याददाश्त और इस पर अवलंबित ’मन’ को बीच में लाए बिना भी जीवन निरंतर अज्ञात से अज्ञात में ही गतिशील नहीं है?    
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Thursday, 21 September 2017

ज्ञान की प्राप्ति स्वतः क्यों नहीं हो जाती?

ज्ञान की प्राप्ति स्वतः क्यों नहीं हो जाती? 
क्या बिना किसी 'माध्यम' के मनुष्य को ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है?
श्रीमद्भग्वद्गीता :
अध्याय 3 श्लोक 38,
अध्याय 5 श्लोक 15, 
अध्याय 7 श्लोक 27,
में अज्ञान का निवारण होने के बाद ज्ञान कैसे प्रस्फुटित और स्पष्ट होता है इसे कहा गया है ।
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जीवन स्वयं ही हमें शिक्षा देता है या तो हम बिना किसी माध्यम को बीच में लाए जीवन का अवलोकन करें या जीवन से गुज़रते हुए ’अनुभवों’ का परीक्षण करते हुए उनकी अनित्यता को समझ सकें । यदि हम ’मन’ के ’माध्यम’ को भी बीच में नहीं लाते हैं तो ज्ञान का आविष्कार अपेक्षतया सरल है । किंतु यह ’मन’ और इसे ’अपना’ कहनेवाला विचार इतने गड्ड-मड्ड हैं कि ’मन’ के अभाव में जीवन क्या है, इस प्रश्न पर ध्यान तक नहीं जा पाता । विचार रूपी ’मन’ ही स्वयं ’मन’ नामक चेतना को आवरित कर स्वयं को सतत भ्रमित करता रहता है और इसे समझने के लिए बहुत धैर्य और शान्ति तथा गहरी रुचि होना ज़रूरी है । चेतना विचार के अभाव में भी अबाध और अखंडित स्वरूप से सक्रिय होती है और विचार के आगमन से आच्छन्न होकर विचारकर्ता के भ्रम के उत्पन्न होने के लिए आधार बन जाती है । चेतना की इस भूमि पर टिका हुआ विचार और आभासी विचारकर्ता आते-जाते रहते हैं जबकि चेतना आने-जानेवाली वस्तु नहीं । चेतना में विचार को जाना जाता है और विचारों का एक केन्द्र होने की कल्पना उठती है । इस केन्द्र को भूलवश / प्रमादवश, विचारों से स्वतंत्र उनका नियामक और सृजनकर्ता मान लिया जाता है । यह द्वन्द्व एक दुष्चक्र है जिसे तोड़ने के लिए यह ज़रूरी है कि उनसे निर्लिप्त, उदासीन रहा जए । जब तक किसी विचार से मोहित और इसलिए उसमें लिप्त होना बना रहता है, यह दुष्चक्र जारी रहता है । किंतु धैर्यपूर्वक विचार की अस्थिर गतिविधि का अवलोकन किया जाए तो चेतनारूपी उसकी पृष्ठभूमि सदा स्थिर और अचल है यह स्पष्ट हो जाता है । दूसरी ओर जो इसमें समर्थ नहीं होता और ’संसार’ में सुख प्राप्त करते रहना और कष्टों से दूर रहना चाहता है उसे जीवन स्वयं ही अनुभवों के माध्यम से सिखाता है कि ’संसार दुःख स्वरूप है’ और इसमें सुख की प्राप्ति होगी यह सोचना दिवास्वप्न या मृग-मरीचिका मात्र है । यह स्थिति सामान्यतः तब आती है जब बहुत ठोकरें खाने के बाद मनुष्य ’संसार दुःख स्वरूप है’ इस नतीज़े पर पहुँच पाता है । इससे पहले तक उसे संसार से बहुत आशा-अपेक्षाएँ होती हैं । इसलिए किन्हीं शास्त्रों या गुरुओं को बिना बीच में लाए भी ज्ञान स्वतः अवश्य प्राप्त हो सकता है, बशर्ते यह ’मन’ नामक माध्यम भी हमारे और जीवन के बीच में न हो, या हो भी तो इतना शुद्ध और निर्मल हो मानों शीशे की दीवार हो ।
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यदि ज्ञान सत्य है तो सतह पर भी क्यों नहीं पाया जा सकता, गहराई में जाना क्यों ज़रूरी है?
वास्तव में तो प्राप्त हुए सतही अज्ञान का निवारण करना है और यदि बिना गहराई में उतरे हो जाता है तो वेद या किसी शास्त्र की ज़रूरत ही कहाँ है? किंतु यदि सतह पर ऐसा नहीं हो रहा तो गहराई में जाने से शायद हो जाए? या फिर इस सब में दिलचस्पी ही न हो...!
बूँद को डर लग रहा था सागर से,
क्या मैं खो जाऊँगी, मिट जाऊँगी?
फिर हिम्मत कर वह सागर में उतरी,
लहर लहर लहराती फिर छलकी,
उसने खुद को पाया देखा फिर वहीं,
हाँ वह बूँद अभी थी पहले जैसी ही,
तब जाकर कहीं उसे यह पता चला,
वह पानी ही थी सागर भी पानी है,
दूर हो गया डर वहम उसका सारा,
क्या थी वही बूँद जो पहले उतरी थी?
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भाषा-व्यवहार

वर्तनी और उच्चारण 
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खुशी की बात है कि कुछ भाषाशास्त्री अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि किसी भी भाषा के लिखे जानेवाले और बोले जानेवाले रूप अर्थात् शब्दों की वर्तनी और उच्चारण में समानता होनी चाहिए । जिन्होंने संस्कृत का आविष्कार किया क्या वे इसकी आवश्यकता से अनभिज्ञ थे? संस्कृत का एक एक शब्द (पद) यहाँ तक कि प्रत्येक वर्ण (स्वर, व्यञ्जन, मात्रा - दीर्घ, अर्ध आदि) कंप्यूटरीय / गणितीय सूक्ष्मता से नियोजित किया जाना यही दर्शाता है कि उपरोक्त तथ्य / निष्कर्ष तक वे बहुत पहले पहुँच चुके थे ।
और कमोबेश यह बात दूसरी भी प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में भी देखी जा सकती है । हिंदी से अधिक प्रशंसा करना चाहूँगा तमिऴ् भाषा की, और संभवतः तेलुगु, कन्नड तथा मलयालम की भी, क्योंकि उन भाषाओं में ए ऎ और ऐ, ओ ऒ तथा औ के लिए तथा व्यञ्जनों के साथ उन मात्राओं के लिए विशेष चिह्न हैं ।  
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ए ऎ ऐ ओ ऒ औ
ஏ எ ஐ ஓ ஒ ஔ
ఏ ఎ ఐ ఓ ఒ ఔ
ಏ ಎ ಐ ಓ ಒ ಔ
ഏ എ ഐ ഓ ഒ ഔ
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के कॆ कै को कॊ कौ
கே கெ கை கோ கொ கௌ
కే కె కై కో కొ కౌ
ಕೇ ಕೆ ಕೈ ಕೋ ಕೊ ಕೌ
കേ കെ കൈ കോ കൊ കൗ
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भाषा-व्यवहार  

Wednesday, 20 September 2017

राघवयादवीयम् और वेदभाषा

राघवयादवीयम् और वेदभाषा
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प्रथम श्लोक में पहली पंक्ति का अंतिम शब्द भारामोराः जिसका विलोम > रामोराभा होगा,
त्रुटिपूर्ण जान पड़ता है क्योंकि विलोम श्लोक में दूसरी पंक्ति के प्रथम दो शब्द मिलकर रामारामाधीराप्यागो बनते हैं ....
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कहा जाता है कि ऐसा ही एक ग्रंथ और भी है जिसके श्लोकों को अनुलोम-विलोम रीति से पढ़ने पर एक प्रकार से तो रामायण की कथा तो दूसरे प्रकार से महाभारत की कथा का वर्णन होता है । इस बारे में सुना-पढ़ा तो है, लेकिन अभी तक कहीं प्राप्त नहीं हुआ ।
ऐसी जानकारी का अवश्य ही बहुत महत्व है, किंतु ऐसे कोरे कौतूहल से क्या लाभ कि जो उपलब्ध है उसकी पर्याप्त गहराई में जाने के बारे में विचार तक न करते हुए जो अनुपलब्ध है उसके बारे में जान लिया जाए? कौतूहल संतुष्ट भी हो जाए तो क्या? क्या हम तर्क-कुतर्कयुक्त विवादों में उलझने से या मन को व्यस्त रखने के लिए मनोरंजन में लिप्त होना बंद कर देंगे?
शायद इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि क्या नित्य है और क्या अनित्य है? इस पर ध्यान से विचार करनेवाले को ही विवेक प्राप्त होता है, विवेक के परिपक्व होने पर समस्त अनित्य समझी जानेवाली वस्तुओं से वैराग्य (राग-द्वेष दोनों का अभाव) हो जाता है । तब नित्य तत्व की ओर मनुष्य का ध्यान आकर्षित होता है और उसे वह एकमात्र चैतन्यतत्व के रूप में ’ईश्वर’ की तरह ग्रहण कर उसकी भक्ति कैसे हो इस ओर ध्यान देता है । या फिर उसके मन में ’मैं कौन?’ अर्थात् वह कौन है जो ईश्वर की भक्ति करना चाहता है, जो असंतुष्ट है, जो भ्रमित है जिसे पता नहीं कि मृत्यु के बाद उसका क्या होगा, इसलिए वह परस्पर विपरीत धारणाओं की शरण लेता है.... इस प्रकार की गहरी जिज्ञासा को स्वाभाविक ’निष्ठा’ कहा जाता है । स्वाभाविक निष्ठा का एक रूप वह भी है जिसे श्रीमद्भग्वद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अध्याय ३, श्लोक ३ में योगनिष्ठा और ज्ञाननिष्ठा के रूप में वर्णित किया है और जो क्रमश योगियों (अर्थात् कर्मयोग पर आस्था रखने और उस पर चलनेवालों में) और ज्ञानियों (अर्थात् साङ्ख्य के अनुसार स्थितप्रज्ञ) के सन्दर्भ में होती है । पुनः जो इनमें से किसी भी स्थिति में नहीं है अभी जिज्ञासु मात्र है और या तो किसी दिव्य अलौकिक ईश्वरीय सत्ता को सबका नियन्ता स्वीकार कर किसी नाम-रूप से उसकी उपासना करता है या सीधे ही ’मैं’ शब्द के तात्पर्य को समझने के लिए प्रवृत्त होता है, और जिसे ऐसे व्यक्ति को प्रचलित पारंपरिक अर्थ में नास्तिक भी कहा जा सकता है क्योंकि वह ईश्वर के बारे में जानने का दावा तो नहीं करता और इसलिए ईश्वर की अवहेलना भी नहीं करता किंतु वह अपने-आप के अस्तित्व को अनायास जानता है (और प्रत्येक  ही जानता है) इसलिए ’अपने होने’ के तात्पर्य को समझना उसे अधिक आवश्यक और संभव जान पड़ता है । दूसरी ओर, जो जीवन को दुःखस्वरूप जानने से ’अपने’ को दुःख-निरोध के उपाय को खोजने मे प्रवृत्त पाता है, वह भी ’आत्म-जिज्ञासा’ से अंततः परम सत्य को अवश्य ही जान लेता है । जिन खोजाँ तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ, मैं अभागन रोती रही, रही किनारे बैठ ...    
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यह ग्रंथ इस ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है कि संस्कृत मूलतः मंत्रमयी भाषा है क्योंकि विलोमक्रम से श्लोकों की रचना किए जाने में छन्द की दृष्टि से तो वर्णों की मात्रा काव्य-सिद्धान्त के अनुरूप है किंतु वर्णों के स्वरूप में भेद आ गया है । इसे और स्पष्ट समझने के लिए उन दोनों श्लोकों का संधि-विग्रह किया जाना पर्याप्त होगा जो परस्पर विलोम-क्रम से ये दो रूप लेते हैं ।
इससे यह भी समझना सरल होगा कि कि वेदों का अर्थ / अनुवाद करने का विचार न केवल व्यर्थ है बल्कि ऐसा करना महाअनिष्टकारी भी है ।
यह स्मरण रखना आवश्यक है कि वेद का प्रयोजन भी है और अर्थ भी है।  किसी उपयोगी वस्तु का प्रयोजन होता है किंतु 'अर्थ' होना आवश्यक नहीं।  वैसे ही किसी विचार का अर्थ हो सकता है किंतु 'प्रयोजन' हो यह आवश्यक नहीं। जब किसी शब्द-समूह को मन्त्र की तरह प्रयोग में लाया जाता है तब उसका सुनिश्चित अर्थ भी होता है और प्रयोजन भी।  इसलिए ग्रंथ के रूप में 'वेद' का अनुवाद करना निहायत जोखिम भरा प्रयास है।  हाँ, यदि वेद के संबंध में जानकारी के लिए औपचारिक प्रस्तावना की दृष्टि से कोई ऐसा प्रयास करता है तो लिए तो वह स्वतंत्र है ही।
यहाँ यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि वेदाध्ययन केवल 'अधिकारी' अर्थात् योग्य पात्र व्यक्ति के द्वारा किया और कराया जा सकता है । इसलिए वेद 'श्रुति' भी कहा जाता है।  तात्पर्य यह कि वेद का शुद्ध स्वरूप 'श्रव्य' है और इसी परंपरा के अनुसार इस सनातन धर्म को भावी पीढ़ियों तक सम्प्रेषित किया जाता है । किंतु इस प्रकार प्राप्त वेदरूपी विद्या को लिखे जाने की आवश्यकता भी निःसंदेह है। लिखे जाने के लिए दो लिपियाँ वेदविदों द्वारा उद्घाटित की गईं, जो वेद के श्रव्य रूप को शुद्धतम रूप में अभिव्यक्त कर सकें।  एक है ब्राह्मी दूसरी है नागरी।  यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ब्राह्मी (ब्रह्मा की) की तमिऴ् / தமிழ் लिपि के प्रयोग से उसका श्रव्य रूप केवल अनुमानित होता है और किसी आचार्य से ही उसके वास्तविक रूप को जाना जा सकता है, वहीं नागरी / देवनागरी में श्रव्य-रूप को अधिक शुद्ध रखा जा सकता है।  पुनः लिखे गए ग्रंथ में भी प्रमादवश या परिस्थितियों के कारण वर्तनी की भूल न होना असंभव तो नहीं है। इसलिए तमिऴ् / தமிழ்
हो या नागरी वेदपठन और पाठन श्रव्य-रूप में होना / किया जाना ही प्रामाणिक है।                
क्योंकि वेद (जिसका एक अर्थ छंद भी है) मूलतः ध्वनि-शास्त्र है । ध्वनि का अर्थ है phoneme और न केवल वर्णात्मक बल्कि प्राणात्मक रूप से भी अर्थात् स्वनिम् (phonetic) एवं रूपिम् (figurative) इन दोनों रूपों में ।
यह ग्रंथ इस ओर भी संकेत करता है कि ’ईश्वर’ जिसने श्रीराम और श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया एक ही तत्व है और पुराणों को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए ।
वैसे इस ग्रंथ को पूर्व में देखा था तो इस बारे में लिखने का विचार आया था ।
आज पुनः देखा तो स्मरण हुआ ।
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Sunday, 17 September 2017

विचार, ईश्वर और आत्म-साक्षात्कार

विचार, ईश्वर और आत्म-साक्षात्कार
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर शायद परिस्थितियाँ, संदर्भ, सरकार या मज़बूरियाँ रोक लगा सकती हैं, लेकिन सोचने-विचारने की स्वतंत्रता पर कोई रोक कैसे लगा सकता है! लेकिन यह भी आश्चर्य है कि कैसे हमारा सोच परिस्थितियों के अनुसार पल भर में भी एकदम बदल जाता है । कभी कभी तो एकदम ऐसा ’यू-टर्न’ भी ले लेता है जिसका हमें खुद को भी पल भर पहले तक भी अनुमान तक न था । क्या यही जीवन का जीवंत प्रवाह नहीं है? लेकिन जब जब हम कुछ ’तय’ कर लेते हैं तो जाने-अनजाने इस प्रवाह को प्रभावित करने की कोशिश करने लगते हैं, और तब जीवन में सफलता-असफलता, आशा-निराशा, अवसाद-उत्साह होते हैं । इन्हें भी हम प्रवाह का ही हिस्सा समझ लें तो शायद सही तरीके से सोच सकेंगे ....! सवाल यह भी है कि हम किसी भी मुद्दे पर अंतिम सिरे तक क्यों नहीं सोचते? जैसे धर्म के मामले पर, नैतिकता के मामले पर, सामाजिक प्रश्नों पर, क्या ’मुक्त-चिंतन’ इतना कठिन है? इसका एक कारण शायद यह है कि हम किसी भी मुद्दे के लाभ तो उठाना चाहते हैं लेकिन उसकी कीमत चुकाना नहीं चाहते । हम चाहते हैं कि सब-कुछ हमें मुफ़्त मिल जाए, तब असंतोष पैदा होता है । तब ’भ्रष्टाचार’ पैदा होता है । हम रिश्वत लेना तो अधिकार समझते हैं और उसके लिए तमाम दलीलें भी हमारे पास होती हैं, ऐसे रिश्वत देने में भी हमें संकोच नहीं होता जब कोई ख़तरा न हो और मज़बूरी हो या पैसा हमारे हाथ का मैल हो, या हमारे पास काला धन हो, जिसे ठिकाने लगाने का एक अच्छा रास्ता हमें मिल गया हो, लेकिन हम दूसरों के अधिकार का हनन करते समय शायद ही सोचते हों ।’आरक्षण’ जैसे मुद्दे पर हो या कावेरी या सतलज-रावी नदी-जल के विवाद पर, भाषाई विवाद हों या ऐसे ही कितने ही मुद्दे हैं जिन पर हम तभी सोचते हैं जब हमारा उनसे पाला पड़ता हो, और तब हमारे पूर्वाग्रह ही तय करते हैं कि हम किस दिशा में, किस दृष्टिकोण से सोचेंगे !
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इस बारे में सोचने लायक बात यह है कि हम सोचने की ज़हमत तभी उठाते हैं जब वह हमारे गले पड़ जाता है । अकसर तो हम सोचने से बचना ही चाहते हैं । यह भी इतना ही सच है कि एक ओर तो हम जो भी सोचते हैं आदतन सोचते हैं, तो दूसरी ओर सोचने से ही सोचना हमारी आदत बन जाता है । इस प्रश्न के पुनः दो पहलू हैं पहला दुनिया में हमारे व्यवहार से जुड़ा है तो दूसरा बिलकुल आध्यात्मिक । दुनिया से हमारे व्यवहार में सोचने का जो स्थान और महत्व है उस पर असंख्य विचारकों ने अनगिनत तरीकों से सोचा होगा ।
यहाँ सिर्फ़ आध्यात्मिक संदर्भ में देखें तो एक प्रश्न यह है कि हम क्यों सोचते हैं?
दूसरा इतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हम सोचते हैं?
पहले प्रश्न की विस्तार से व्याख्या करने के लिए हमें यह समझना होगा कि सोचने की प्रक्रिया कैसे होती है । यदि हम समझने की कोशिश करें तो सोचना कम होने लगता है यहाँ तक कि लगभग समाप्त भी हो जाता है । जैसे किसी आकस्मिक अज्ञात परिस्थिति में जहाँ हम वस्तुस्थिति से अनभिज्ञ होते हैं । जैसे ऊँची घास के बीच से या पानी से भरे गड्ढोंवाली सड़क से गुज़रते समय । तब हम अनुमान तो लगा सकते हैं कि घास में साँप या ऐसा कोई जानवर तो नहीं है, या घास कँटीली तो नहीं है, लेकिन अप्रत्याशित ख़तरों के बारे में विचार करने की संभावना समाप्त हो जाती है इसलिए हम उम्मीद तो कर सकते हैं लेकिन सोच नहीं सकते । कौन सा गड्ढा कितना गहरा और छोटा या बड़ा होगा इसे समझने के लिए ’सोचने’ की ज़रूरत कम, समझने की, सावधानी की ज़रूरत अधिक होती है । इस दृष्टि से ’सोचना’ और ’सावधानी’ क्या दो भिन्न तरह की मानसिक गतिविधियाँ नहीं होतीं? जैसे ही ख़तरा समाप्त हो जाता है, जब हम खुली साफ़-सुथरी पक्की चिकनी सपाट सड़क पर आ जाते हैं, ’सावधानी’ पीछे रह जाती है और ’सोचना’ शुरु हो जाता है । इस प्रकार एक सोचना हमारी असावधानी या प्रमाद की स्थिति में होता है जो लगभग आदतन होता है तो दूसरा तब होता है जब सावधानी रखते हुए हम किसी नई स्थिति से रूबरू होते हैं । जैसे आपको सड़क पर कुछ दिखलाई दिया और आपने उसे पत्थर समझा और हटाने के लिए गाड़ी से उतरे, पास पहुँचने पर पता चला कि वह कोई जानवर है तो सोचना एक अलग दिशा ले लेता है यदि आपको पता चलता है कि वह साँप है तो आप सोचने लगते हैं कि ज़िंदा है या मरा, या घायल! यदि आपको  पताचलता है कि वह दुर्लभ जाति का एक कछुआ है तो आप उसके लिए चिंता या उत्सुकता से सोचने लगते हैं । यह भी हो सकता है कि आप् आदतन उसे नज़रन्दाज़ कर सीधे आगे निकल जाएँ ।
क्या ऐसी ही स्थितियाँ हममें सोचने की आदत नहीं बनातीं ।
फिर हमारा समाज, हमारा परिवेश, शिक्षा भी हमें सोचने के तरीकों के विशिष्ट प्रारूपों में नहीं ढाल देतीं?
क्या हम इस सबके (ख़तरे) के प्रति सावधान हैं? या क्या हम असावधानी से ही इन तरीकों को आदत में नहीं ढाल लेते?
’ईश्वर’ है या नहीं, एक है या अनेक, ऐसे प्रश्नों को हम सावधानी से नहीं समझते क्योंकि वह हमारे लिए जीवन-मरण का प्रश्न नहीं होता ।
दूसरी ओर ’ईश्वर’ से हमारा क्या अभिप्राय है इस बारे में भी हमें कुछ स्पष्ट नहीं होता । तब हम कहते हैं : "वह अदृश्य शक्ति जिसने दुनिया बनाई ..." या हम कहते हैं "जब हमें संकट की घड़ी में कोई अदृश्य सहायता प्राप्त होती है तो वह ईश्वर है ।"
इतना तो स्पष्ट है कि इस प्रकार से हम किसी अज्ञात वस्तु की कल्पना कर लेते हैं और उसे ’ईश्वर’ कहते हैं । या दूसरा तरीका है किसी किताब या परंपरा को आधार कहकर हम कहते हैं "शास्त्र भी मानते हैं ...बहुत लोगों ने ईश्वर को जाना है, पाया है ...।"
हम कुछ भी क्यों न मान लें वह हमारी मान्यता ही होता है और मान्यता को गलत सिद्ध नहीं किया जा सकता क्योंकि उस पर प्रयोग नहीं किया जा सकता, जैसा कि तथ्य के साथ संभव है । और मान्यताएँ परस्पर भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं । हम सोचने-समझने की ज़हमत न उठाने के लिए इस या उस मान्यता को स्वीकार कर लेते हैं और आग्रह करते हैं कि दूसरे भी उसे ही सत्य मानें । यदि हमारे पास किसी क़िस्म की ताकत है, सत्ता की, धन की या बाहु-बल की तो उसे दूसरों पर लादने में भी संकोच नहीं गर्व अनुभव होता है और इसे हम परोपकार तक कहते और मानने लगते हैं ।
क्या इस दायरे में सोचना हमारी आदत ही नहीं हो जाता?
अब एक और प्रश्न यह है कि सोचना एक स्वैच्छिक गतिविधि है या अनैच्छिक गतिविधि है? जैसे साँस लेना यूँ तो शरीर की स्वचालित गतिविधि है लेकिन हम किसी हद तक स्वेच्छा से भी उसे नियंत्रित कर सकते हैं । फिर यह भी स्पष्ट है कि साँस लेना एक स्वाभाविक, प्राकृतिक गतिविधि भी है जिस पर हमें ध्यान तभी देना पड़ता है जब इसके होने में कोई बाधा उत्पन्न हो जाए । दूसरी ओर हमारे शरीर की अन्य गतिविधियाँ  जैसे नसों में रक्त का परिभ्रमण, पसीना आना, भूख-प्यास लगना, नींद आना भी बहुत हद तक ऐसी ही स्वाभाविक गतिविधियाँ है, जिन पर ज़रूरत होने पर ही हमारा ध्यान जाता है ।
क्या सोचना भी ऐसी कोई गतिविधि है? साँस का चलना और दूसरे अन्य शारीरिक कार्य जिनके बारे में कहा गया जैसे अनायास होते रहते हैं क्या सोचना भी वैसा ही एक कार्य है? या, क्या हम सोचने को नियंत्रित कर उसे किसी निश्चित ढंग से भी कर सकते हैं?
यहाँ यह देखना ज़रूरी है कि सोचना अर्थात् ’विचार’ हम हैं या हमसे भिन्न है? जब आप कहते हैं "मैं सोचता हूँ..." क्या तब आपमें यह विचार ही नहीं होता जिसे शब्दों द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है? जैसे आप दौड़ते हैं, या बैठे हैं, या खड़े हैं तो आपका अपनी इस क्रिया पर जैसा नियंत्रण होता है, क्या वैसा ही नियंत्रण आपका ’विचार’ पर भी होता है?
आप जब कहते हैं ’मेरा विचार’? तो यह आपसे किस रूप में संबद्ध होता है कि इसे आप ’मेरा’ कह सकें?
स्पष्ट है कि मस्तिष्क में चल रहे अनेक विचारों में से जो आपको अच्छा लगता हो, उपयोगी प्रतीत होता हो उसे तो ’मेरा’ कहा जाता है जबकि जो प्रतिकूल होता है उसे ’मेरा नही’ कहा जाता है ।
विचार को ’मेरा’ या ’मेरा नहीं’ कहनेवाले क्या आप हैं या यह ’मैं’ भी मूलतः एक विचार ही है जो कभी होता है, तो कभी कभी अनुपस्थित भी होता है?
तो फिर आप विचार नहीं केवल वह चेतन अस्तित्व है जिसमें विचार आता-जाता या आते-जाते हैं ।
उस स्थिति में भी क्या विचार पर आपका नियंत्रण संभव है? स्पष्ट है कि विचार से वस्तुतः आपका कोई संबंध न कभी था, न हो सकता है, फिर ’मेरा विचार’ तो क्या नितांत भ्रांत कल्पना ही नहीं है?
यह हुआ विचार का दुनिया से जुड़ा पहलू ।
अब दूसरे प्रश्न पर आएँ । वह चेतन अस्तित्व ही जिसमें विचार आते-जाते हैं, क्या ’हम’ नहीं हैं, व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से नहीं, बल्कि बुनियादी रूप से और समष्टि-रूप से भी?
यूँ कहें कि जैसे पाँच तत्वों से बने हमारे शरीर व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से एक दूसरे से अलग-अलग दिखाई देते हैं और जिनके आधार पर हमारी व्यक्तिगत या सामूहिक पहचान बनाई जाती है, विचार के रूप में ही ऐसे हैं न? यदि विचार नहीं तो भिन्नता कहाँ? तब क्या समष्टि रूप में जो हम हैं वह कुछ बदल जाता है? स्पष्ट है कि विचार के न होने पर भी वही समष्टि एक ही चेतन सत्ता है जिसमें असंख्य भिन्न-भिन्न व्यक्तिगत और सामूहिक शरीरों में भिन्न-भिन्न विचार आते-जाते रहते हैं । इस समष्टि चेतन अस्तित्व का विचार से क्या कोई संबंध हो सकता है?
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’विचार’ के दो आयाम क्रमशः शाब्दिक / शब्दगत और काल्पनिक / कल्पनागत हो सकते हैं । शाब्दिक तो हम जानते ही हैं, काल्पनिक किसी अनुभव या अनुभव की कल्पना / भावना की तरह होता है । जैसे ’मिठास’, जिसका एक तो शाब्दिक अर्थ होता है ’स्वीटनेस’ दूसरा भावनात्मक, तीसरा काल्पनिक । शाब्दिक अर्थ शब्द को दूसरे शब्द से बदलने पर प्राप्त हो जाता है । भावनात्मक पुनः वस्तुवाची या अनुभवपरक हो सकता है । जैसे ’मिठाई’ । कल्पनात्मक इन दोनों जैसा या कभी-कभी दोनों से बिलकुल भिन्न भी हो सकता है । जैसे पत्थर या मिट्टी का स्वाद, जो न तो कोई भाव जगाता है, न अनुभव लेकिन उसकी कल्पना की जा सकती है । ’ईश्वर’ और ’मैं’ भी ऐसे ही दो शब्द हैं । तीसरा शब्द है ’आत्म-ज्ञान’ अर्थात् ईश्वर का साक्षात्कार या दर्शन । ’ईश्वर’ शब्द के अनेक शाब्दिक अर्थ हो सकते हैं जो भिन्न-भिन्न लोगों में भिन्न-भिन्न भाव, और स्वकल्पित रहस्यमय / चमत्कारिक अनुभव (जैसे भविष्य में होनेवाली घटना को देख लेना) भी जगा सकते हैं, लेकिन उनकी ’अनित्यता’ ही ’ईश्वर-दर्शन’ से उनके भिन्न होने का यथेष्ट प्रमाण है । 'मैं' 'ईश्वर' से इस अर्थ में भिन्न है कि 'मैं' के अस्तित्व को हर कोई अनायास प्रत्यक्षतः जानता ही है यद्यपि इसका गूढ़तम तात्पर्य उसे स्पष्ट नहीं होता।  फिर भी कोई न तो तर्क से, न अनुभव से और न ही व्यावहारिक रूप में इसके अस्तित्व पर न तो संदेह कर सकता है न इसे असिद्ध कर सकता है। लेकिन चूँकि यह स्वयं (अहम्-पदार्थ) अपने को विचारक और विचार के रूपों में व्यक्त करता है इसलिए इसे इन दोनों में विद्यमान उभयनिष्ठ अस्तित्व और चेतना की तरह अवश्य इंगित किया जा सकता है और तब विचार तथा विचारक का द्वंद्व विलीन हो जाता है।  अब रही बात आत्म-साक्षात्कार की, तो इस प्रकार से विचार तथा विचारक जो प्रकट और अप्रकट होते रहते हैं जब पूर्णतः विलीन हो जाते हैं तो जिस तत्व का बोध होता है वह नित्य की तरह स्पष्ट हो जाता है।  इसका अर्थ यही कि जन्म-मृत्यु कल्पना थी और वह चक्र भी विचार ही था।       
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