Saturday, 21 October 2017

Good bye Scriptures!

Discovering the Silence within...!
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Scriptures are of no use to any-one. They are obsolete, redundant, outdated. The most important factor is dissatisfaction from the life we live. As long as we don't see the way we live, the bare facts of life that is fear, desire, anger, hope, conflict and confusion, anger, sorrow, relationship, through clear eyes, without defining and verbalizing and go through them without resistance, nothing can happen. 'faith', tradition, security, future, past all these are in thought only and thought gives rise to thought and a false world appears before us, to have existence which 'one' takes separate and distinct from oneself. In fact there is no such a world. But when and if the movement of thought is keenly observed, -not because one has to get rid of thought, but just because there is thought playing its role before us, and we are trying to understand what it is all about, just as we try to understand the mechanism of a new device or instrument, just like we try to play a musical instrument and just listen to the 'notes' and try to grasp their relative higher or lower pitch and positions in the scale, in the tune and then the whole scale is understood. Likewise every single thought could be seen carefully without condemning, glorifying or criticizing. Then perhaps we could detect a silence overpowers us. This is really meditation. But one should have interest.
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Friday, 20 October 2017

मर्म का मरहम

पुरुष या प्रकृति की प्रवृत्ति का तो नहीं पता मुझे स्वयं में  पर ज्ञानना की प्रवृत्ति का प्राकट्य हुआ है
मुझे सिर्फ़ बोधि वृक्ष की कामना है
शायद विद्योत्तमा होने की शुरुआत कालिदास हो कर हो।
अर्धनारीश्वर होने का क्या अर्थ है? एक जिज्ञासा है।
"अथातो ब्रह्म जिज्ञासा"
-इस सूत्र से क्या समझना चाहिए ?
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यह ब्रह्म-सूत्र (ग्रंथ) का प्रथम सूत्र है ।
जब मनुष्य को अपने संपूर्ण अर्जित किए हुए ज्ञान की सीमितता, व्यर्थता और अधूरापन अनुभव हो जाता है तब उसमें यह जिज्ञासा पैदा होती है कि क्या ऐसा ज्ञान भी है जो सीमित, व्यर्थ या अधूरा (खंडित) न हो?
इंद्रिय-ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से होता है इसलिए ’परोक्ष’ इन्डायरेक्ट indirect / mediate है ।
अनुभव इंद्रियज्ञान है ।
इंद्रियों का ज्ञान इंद्रियों की ग्रहण-क्षमता तक सीमित और अधूरा होता है । आँखों से देखा गया, कानों से सुना गया ज्ञान भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है और एक के अनुभव / ज्ञान को दूसरे में ’अनुवादित’ नहीं किया जा सकता । आप ’अनुवाद’ के लिए कोई भाषा ईजाद भी कर लें तो भी वह एक ’प्रोग्राम’ होगा और आप ’कोड्स’ / codes और ’कोडिंग’/ coding ही जानते हैं । दृष्टि के अनुभव को श्रवण के अनुभव में रूपांतरित नहीं किया जा सकता और जैसे तैसे कर भी लिया जाए तो ऐसे असंख्य अनुवाद हो सकते हैं जिनमें से कौन सा पूरी तरह सही है इसका प्रमाण नहीं दिया जा सकता ।
बुद्धि के द्वारा इंद्रिय-अनुभव का ऐसा ही एक अनुवाद किया जाता है ।
और बुद्धि तर्क-आश्रित होने से असंख्य प्रकार की है ।
फिर बुद्धि की ही भाषा में कोई शाब्दिक-सिद्धान्त गढ़ लिया जाता है और उस सिद्धान्त को ’प्रमाण’ मान लिया जाता है ।
इस प्रकार बुद्धि भी ’परोक्ष’ इन्डायरेक्ट indirect / mediate है ।
’जिसे’ इंद्रियजन्य या बुद्धिजन्य ज्ञान होता है उसका अस्तित्व स्वयं सिद्ध है और उसे ही मनुष्यमात्र ’मैं’ शब्द से व्यक्त करता है । लेकिन यह ’मैं’ जिसका अर्थ है उसे जाननेवाला दूसरा कोई ’मैं’ नहीं है । जैसे इंद्रियों और बुद्धि से जिसे जाना जाता है, उसे जाननेवाला उनसे पृथक् है, वैसे ’मैं’ को जाननेवाला ’मैं’ से पृथक् नहीं है ।
शायद यह आपको कठिन या निरर्थक श्रम लग रहा हो किंतु इस श्रम से गुज़रने पर ही उस ’ज्ञान’ से परिचय होता है जो ’अपरोक्ष’ (immediate / direct) ज्ञान है । जहाँ ज्ञाता-ज्ञान और ज्ञेय में विभाजन नहीं है । वही वस्तु ज्ञाता है, ज्ञान भी है और ज्ञेय भी है ।
अब इसे दूसरे ढंग से देखें ।
जो भी ज्ञात है वह ’जानकारी’ है और जो अज्ञात जान पड़ता है उसे जानते ही वह ’ज्ञात’ के रूप में ग्रहण कर लिया जाता है ।
इस प्रकार हम बस ’ज्ञात’ से ’ज्ञात’ में ही घूमते रहते हैं और सोचते हैं कि कभी ज्ञात पूर्ण हो सकेगा ।
’पर-ज्ञान’ / ’परम-ज्ञान’ बोधि-वृक्ष मोहक शब्द हैं किंतु जब तक बुद्धि और तर्क की सीमितता, व्यर्थता और अधूरापन हम पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो जाता इन शब्दों का हमें कतई उपयोग नहीं है ।
जब तक  संसार की प्रत्येक वस्तु को ’नित्य-अनित्य’ की कसौटी पर कसते हुए हममें उन सभी वस्तुओं को ’अनित्य’ अनुभव कर उनके प्रति गहरा असंतोष अर्थात् वैराग्य उत्पन्न नहीं हो जाता तब तक हममें उनकी तुलना में ’नित्य’ अर्थात् उन सबके कारणस्वरूप तत्व (ब्रह्म) को जानने की उत्सुकता या कौतूहल तो हो सकता है किंतु गहरी उत्कंठा नहीं होगी ।
शास्त्रों को पढ़ भी लिया तो ज्ञात पर ज्ञात का आवरण चढ़ता रहेगा ब्रह्म को नहीं जाना जा सकेगा ।
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सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इन तथाकथित ज्ञानियों ने हमारे मन में इतनी नई-नई धारणाएँ पैदा कर हमें इतना भ्रमित कर दिया है कि हमारी वास्तविक आवश्यकता क्या है इस पर से हमारा ध्यान हटाकर जो हमें अनावश्यक और क्षतिकारक है उसके प्रति हमारे मन में कृत्रिम लालसा जगा दी है । हमारा चञ्चल मन बस इधर से उधर दौड़ता रहता है और हम दुःखी रहते हैं ।
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’अर्धनारीश्वर’ की गुण-सूत्रात्मक (जीनेटिक) व्याख्या भी की जा सकती है जो शायद विज्ञान के प्रशंसकों को प्रभावित भी करे, लेकिन वह अर्धनारीश्वर के वास्तविक अर्थ का विरूपण भी होगा ।
’अर्धनारीश्वर’ की वैदिक और पौराणिक व्याख्या अधिक व्यापक अर्थयुक्त होगी किंतु किसे चाहिए?
मर्म का मरहम बना सकना मेरे बस में नहीं,
दर्द का मरहम बना सकता हूँ किसको चाहिए?
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विकल्प

आप से कुछ सीखने की लालसा है
सनातन धर्म को जानने का पहला उपाय क्या है?
मैंने आपका ब्लॉग पढ़ा
शायद आप स्त्रियों द्वारा वेदाध्ययन को उचित नहीं मानते
किन्तु अब मेरे पास कोई विकल्प नहीं
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सनातन धर्म को जानने का पहला उपाय क्या है?
इस ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा कि सनातन के साथ धर्म शब्द लगाने का उद्देश्य है यह स्पष्ट करना कि धर्म वह है जो सनातन होता हो ।
शाश्वत, अनित्य, नित्य और सनातन ’काल’ को इन चार रूपों में ग्रहण किया जाता है । ग्रहण करनेवाला पात्र होता है । इसलिए पात्र के गुण-दोष के आधार पर यह सुनिश्चित है कि वह किसी वस्तु (या ज्ञान) को कितना, कैसे ग्रहण और धारण कर सकता है, उसका सही प्रयोग कर दूसरों को प्रदान कर सकता है ।
प्रथमतया पात्र का अर्थ है मनुष्य ।
मनुष्य भी अस्तित्व के मूल कारकों पुरुष और प्रकृति का संयोग है ।
प्रकृति होने का अर्थ है अहंकार को जाने देना ।
पुरुष होने का अर्थ है अहंकार को जान लेना ।
दोनों स्थितियों में मनुष्य आत्मा से अपनी अनन्यता को समझ लेता है ।
शरीर तो बाह्य प्रकृति है, जबकि मन / अन्तःकरण अन्तःप्रकृति है ।
पात्र होने के क्रम में ही वेद के अनुसार चार वर्ण और चार आश्रम मनुष्यमात्र को स्वाभाविक रूप से प्राप्त होनेवाली स्थितियाँ हैं, जिनमें बाह्य-प्रकृति की प्रमुखता से वह स्त्री या पुरुष शरीर धारण करता है ।
इस प्रकार बाह्य लक्षण (स्त्री या पुरुष) होना प्रथमतया इसका सूचक होता है कि उसके लिए जीवन में विकास होने का स्वाभाविक क्रम क्या होगा । इसलिए स्त्री के लिए सेवा ही स्वाभाविक धर्म है क्योंकि प्रकृति सदा देती ही है लेती नहीं कुछ ।
जबकि पुरुष के लिए कर्म / उद्यमशीलता ही स्वाभाविक धर्म है ।
फिर वेदाध्ययन ’कर्म’ है जो पुरुष के लिए तो स्वाभाविक है, स्त्री के लिए कठिन और अस्वाभाविक भी । किसी प्रतिक्रिया के रूप में स्त्री की प्रवृत्ति भले ही कर्म में हो जाए पर वह उसका स्थायी स्वभाव नहीं है । दूसरी ओर ’सृजन’ स्त्री के लिए नितांत स्वाभाविक धर्म है । और उसका गौरव भी है । पुरुष वस्तुतः ’श्रमिक’ है और प्रकृति का दास ।प्रकृति पूर्ण है, पुरुष को पूर्ण होने की कठिन यात्रा करना होती है ।
पुरुषों में ही ब्राह्मण को ही वेदाध्ययन का अधिकार (अर्थात् पात्रता) हो सकती है ।
वेद कोई ग्रंथ नहीं अलिखित सृष्टि-विधान है जिसे ऋषियों ने ’मंत्र-रूप’ में प्राप्त किया अर्थात् आविष्कार किया ।
वेद इसलिए काल के सन्दर्भ में नित्य, शाश्वत और सनातन हैं क्योंकि सृष्टि भी नित्य,  शाश्वत और सनातन है ।
वेदाध्यन ब्राह्मण का न सिर्फ़ अधिकार है बल्कि दायित्व और कर्तव्य भी है ।
इसलिए यज्ञोपवीत संस्कार के बिना मनुष्य द्विज नहीं होता ।
यदि मनुष्य का वर्ण बाधक या विपरीत न हो तो किसी अब्राह्मण को भी संस्कार देकर द्विज बनाया जा सकता है ।
वर्ण को जाति का पर्याय समझ लिया जाता है जबकि जाति एक बाह्य लक्षण है जिसका आधार तो वर्ण ही है ।
बाह्य लक्षण की अनुकूलता या प्रतिकूलता के अनुसार मनुष्य अपने मूल वर्ण को जान समझकर चार में से किसी एक वर्ण को अपने लिए स्वीकार कर सकता है । उस वर्ण के अनुसार ही जीवन में उसे सार्थक कर्म करने के लिए सहायता और प्रेरणा मिलती है । स्त्री का अपने वर्ण के अनुसार परिवार की सेवा करना ही एकमात्र धर्म है । और उसमें भी पति और उसका परिवार प्रमुख है । वेद इसका आग्रह नहीं करता कि मनुष्य वेद-धर्म को स्वीकार करे ही । तब वह अपनी राह चुनने के लिए उसकी प्रकृति के अनुसार स्वतंत्र (होने के भ्रम में रहे) तो वेद बलपूर्वक उसे धर्म का उपदेश नहीं करता ।
चूँकि वेद ग्रंथ नहीं ’मन्त्र-संहिता’ अर्थात् मंत्रों का संकलन मात्र है और वेद-विहित कर्मकाण्ड का अनुष्ठान सुचारु रूप से संभव हो सके इस दृष्टि से उन्हें ग्रंथ-रूप में लिखित स्वरूप में सुरक्षित कर लिया गया है अतः वेद का अनुवाद तक संभव नहीं । वेद छन्द और मंत्र हैं और तन्त्र (साधन) हैं । वेदों का संबंध प्रकृति के अधिष्ठाता ’देवता’ तत्व से है जिन्हें संतुष्ट किए बिना वैदिक कर्मकाण्ड का अनुष्ठान असंभव है । यह तो हुआ वेद का कर्म-काण्ड से संबंधित पक्ष, किंतु वेद स्वयं भी परम सत्य और परमेश्वर भी होने से परम-ज्ञान और परमेश्वर की प्राप्ति में भी सहायक हैं और इसलिए कर्मकाण्ड और देवता आदि को पूरी तरह नकारकर भी मनुष्य केवल भक्ति से भी वेद के सारतत्व को प्राप्त कर सकता है ।
भक्ति का अर्थ है निष्ठा और निष्ठा की प्राप्ति तप और जिज्ञासा से ही होती है न कि किसी दबाव या भय, प्रलोभन से प्रेरित किए जाने से ।
गीता के अनुसार ऐसी जिज्ञासा भी अपनी रुचि के अनुसार ’ज्ञान’ (सांख्य-निष्ठा) और ’कर्म’ (निष्काम कर्मयोग) के रूप में हर किसी के लिए इन दो रूपों में होती है ।
गीता तो अवर्ण या सवर्ण स्त्री-पुरुष सभी के लिए एकमात्र सर्वश्रेष्ठ ’विकल्प’ के रूप में भक्ति को ही सर्वोपरि मानती है ।
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Thursday, 19 October 2017

Purity of Speech / वाणी की शुद्धि

वाणी-दीप 
The Lamp of Speech 
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वक्तव्यं किमवक्तव्यं कर्तव्यं किमकर्तव्यं ।
श्रोतव्यं किमश्रोतव्यं दृष्ट्वा वाचां परिमार्जयेत् ॥
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vaktavyaṃ kimavaktavyaṃ kartavyaṃ kimakartavyaṃ |
śrotavyaṃ kimaśrotavyaṃ dṛṣṭvā vācāṃ parimārjayet ||
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अर्थ :
क्या कहना शोभनीय है, और क्या नहीं है,
क्या करना शोभनीय है, और क्या नहीं है,
क्या सुनना श्रवणीय है, और क्या नहीं है,
इसे ध्यान से देखकर वाणी को शुद्ध रखे ।
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Meaning :
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What is auspicious to say through voice, what is not,
What is auspicious to act upon, what is not,
What is auspicious to listen to, what is not,
One should see carefully and keep the Speech pure.
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वाकः तु सेतु एकं अन्तःबहिश्चेतनाभ्याम् ।
ततो परिमार्जिता वाचा चित्तशुद्धिमाप्नुयात् ॥
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vākaḥ tu setu ekaṃ antaḥbahiścetanābhyām |
tato parimārjitā vācā cittaśuddhimāpnuyāt ||
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अर्थ :
वाणी अन्तःचेतना और बहिश्चेतना के मध्य एक प्रत्यक्ष पुल है, इसलिए इस पुल को सुदृढ़ और सुव्यवस्थित रखता हुआ चित्तशुद्धि प्राप्त करे ! 
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Meaning :
The Speech as is uttered and heard / listened to is the only bridge between the consciousness of the mind and the consciousness of the world, so one should purify the Speech and gain the purity of mind.
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वागैकं प्रज्ज्वलितं दीपं देहलीद्वारसंस्थितं ।
आलोकितं तेनैव ध्यायेन्मनः अन्तर्बाह्ययोः ॥
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vāgaikaṃ prajjvalitaṃ dīpaṃ dehalīdvārasaṃsthitaṃ |
ālokitaṃ tenaiva dhyāyenmanaḥ antarbāhyayoḥ ||
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अर्थ :
वाणी  देहली-द्वार पर सुस्थित प्रज्ज्वलित दीपक है जिससे भीतर और बाहर दोनों स्थान आलोकित होते हैं ।
इस दीपक के प्रकाश में मनुष्य ध्यानपूर्वक चित्त की स्पष्टता को  प्राप्त करे !
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Meaning :
Speech is the lighted lamp placed at the threshold at the door that illuminates the inside as well as outside also. Taking care of this lamp, one should attain the clarity of mind.
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एक घटनाक्रम / स्वप्न-संकेत

एक घटनाक्रम / स्वप्न-संकेत
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Monday, 16 October 2017

स्व-प्रतिमा / self-image

स्व-प्रतिमा और स्व का यथार्थ
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आप जैसे हैं,
लोग आपको वैसा
रहने नहीं देंगे ...
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कुछ भी!
आप जो हैं वो बदल नहीं सकता,
आप जैसे हैं ज़रूर बदल जाता है,
पहले तो ये तय हो जाना चाहिए,
कि आप क्या हैं और आप कैसे हैं!
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पहली दृष्टि में हमारा ध्यान इस वक्तव्य की विसंगति पर नहीं जाता, किंतु जब ध्यान देकर इसकी वैधता की जाँच-परख की जाती है तो समझ में आ जाता है कि हम तो हमेशा वही हैं जो कि वस्तुतः हम है / हैं, और वैसे नहीं हैं जैसी अपनी स्वयं की प्रतिमा हमारे मन ने बनाई होती है । क्या यह प्रतिमा वैसे भी नित्य बदलती नहीं रहती? लेकिन अगर हम इस तथ्य पर ध्यान देने से चूक जाते हैं तो अपने-आपको परिस्थितियों और लोगों के हाथ का खिलौना समझ सकते हैं और तब उस प्रतिमा में वैसा हेर-फेर  देख कर दुःखी या ख़ुश होते हैं, चिंतित या प्रसन्न होते हैं, .. आशान्वित या निराश, व्याकुल या निश्चिंत होते हैं !
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और यहीं एक विकल्प यह भी है कि इस ओर ध्यान दें कि हम हमारी स्व-प्रतिमा हैं या शायद हम कुछ भी नहीं हैं, या शायद वह समग्र जीवन ही हम हैं जहाँ हमारी या दूसरों की कोई प्रतिमा बनती ही नहीं !   
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एक मौलिक प्रश्न
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क्या हम बदलते हैं? अगर हम बदलते हैं तो यह किसे पता चलता है कि हम बदल रहे हैं या बदल गए?
स्पष्ट है कि हम (जो कुछ भी हम वस्तुतः हैं), कभी नहीं बदलता, हाँ हमारा मन, बुद्धि, याददाश्त, अनुभव, विचार, भावना, शरीर की स्थिति ज़रूर निरंतर वैसे भी बदलते रहते हैं । हममें कोई ऐसा तत्व है जो केवल बदलाव को जानता है लेकिन यह 'जानना' अनुभव, विचार, भावना, जानकारी या स्मृति नहीं होता । यह 'जानना' हमारा वह अपरिवर्तनशील स्वरूप है जिसमें तमाम बदलाव जाने भर जाते हैं । और उस अपरिवर्तनशीलता को मन, बुद्धि, याददाश्त, अनुभव, विचार, भावना, शरीर की स्थिति नहीं जानते । मन, बुद्धि, याददाश्त, अनुभव, विचार, भावना, आदि में तो बस हमारी एक अस्थायी स्व-प्रतिमा बनती है जो वैसे भी अपने-आप बदलती रहती है और उसे बदलने से रोका भी नहीं जा सकता । ’कौन’ रोकेगा?
यद्यपि इस सबको समझने के लिए बुद्धि तक आवश्यक नहीं क्योंकि बुद्धि का आगमन और प्रस्थान होता रहता है और हमारा स्वरूप निरंतर यथावत रहता है ।
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और यह समझना अत्यंत सरल है कि इस ’जानने’ का ’जन्म’ और ’मृत्यु’ से कोई संबंध नहीं हो सकता । ’जन्म’ और ’मृत्यु’ केवल कल्पना और विचार-मात्र हैं ।
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The English Translation :
Self-image and the truth of the self 
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What-ever you are like; people wouldn’t let you be like that.
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Awkward but not Absurd
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What you are can never change.
What you are like keeps changing.
First let it be very clear to you.
What you are and what you are like!
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At first, we usually fail to note the contradiction in the above statement. 
But when paid due attention, and the validity of the same is checked, one can easily see the inherent discrepancy there-in. We are what we are all the time, irrespective of our own self-image and the way our body, moods, feelings, emotions, memory, experiences, information, and this self-image too keep changing. 
Is not there obviously something unchangeable too which we intuitively know without deliberate effort and spontaneously refer to as ‘me’?
Having keenly discovered what this unchangeable factor in our being is, we at once realize what we are like is but our own image made by oneself. And this keeps changing all the time and no one can stop or interfere with this phenomenon. It is up to oneself what one takes oneself. Assumes oneself as the changing phenomenal things like our body, moods, feelings, emotions, memory, experiences, information, and this self-image that is, -the ‘person’,
Or understands the inherent individuality that is immutable inherent Reality of our very being.
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Thursday, 12 October 2017

From : श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् / śrīdakṣiṇāmūrtistotram -

From :
श्रीदक्षिणामूर्तिस्तोत्रम् / śrīdakṣiṇāmūrtistotram
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वटविटपसमीपे भूमिभागे निषण्णम्
सकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात् ।
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं
जननमरणदुःखच्छेददक्षं नमामि ॥
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Beneath the vat-tree, Seated on the ground,
The One who Bestows the wisdom,
Upon the Sages gathered around,
The Preceptor Supreme,
the Lord of the 3 worlds,
dakṣiṇāmūrtideva,
The One who is Expert in severing,
The bondage of the sorrow,
Of repeated births, deaths and rebirths,
To Him I offer obeisances.
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vaṭaviṭapasamīpe bhūmibhāge niṣaṇṇam
sakalamunijanānāṃ jñānadātāramārāt |
tribhuvanagurumīśaṃ dakṣiṇāmūrtidevaṃ
jananamaraṇaduḥkhacchedadakṣaṃ namāmi ||
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अर्थ :
जो वटवृक्ष के तले भूमि पर विराजित हैं,
जो शरण में आए सकलमुनिजनों के लिए ज्ञानदाता हैं,
तीनों लोकों के परमेश्वर श्रीदक्षिणामूर्ति देव,
जन्ममरण के क्लेश का नाश करने में दक्ष हैं,
श्रीदक्षिणामूर्ति को मेरा प्रणाम !!
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वैदिक या वैज्ञानिक

वैदिक या वैज्ञानिक
"मैं कार्य-कारण पर विश्वास नहीं करता
"क्यों?"
वैसे तो ’क्यों?" यह प्रश्न ही असंगत (invalid) है किंतु तर्क की सीमा में इसका उत्तर यह होगा कि चूँकि तर्क ’ज्ञात’ अर्थात् विचार और बुद्धि के अन्तर्गत कार्य करता है और विचार तथा बुद्धि उसे नहीं ग्रहण कर पाते जहाँ से उनका उद्भव होता है । शरीर के स्थूल या सूक्ष्म भौतिक अंग की दृष्टि से उसे ’मस्तिष्क’ कहा जा सकता है, किंतु विचार और बुद्धि इन्द्रिय-ज्ञान पर आधारित होने से उस सीमा के भीतर ’अधिकतम’, निकटतम सत्य को ग्रहण करने की चेष्टा करते हैं जिसे विज्ञान कहा जाता है । विचार और बुद्धि के आधार पर उपजी ’परिकल्पना’ (hypotheses) का विकास ही ’विज्ञान’ है । तथाकथित वैज्ञानिक भी विचार और बुद्धि से ’सत्य’ को पाने का प्रयास करता है और विचार और बुद्धि पर आश्रित होता है । वह विचार और बुद्धि को ’प्रमाण’ मानता है और भूल से या प्रमादवश मान बैठता है कि ’अज्ञात’ को उस कसौटी (criteria) से जाना जा सकता है । विचार और बुद्धि ’ज्ञात’ के क्षेत्र में कार्य-कारण को अटल सत्य मानकर ’निष्कर्ष’ प्राप्त करते हैं जो उनके ’ज्ञात’ की परिधि से बाहर महीं ले जा सकता । संक्षेप में ’विज्ञान’ का ’सत्य’ अपने संदर्भों तक सीमित है ।
उस परिधि में ही वह ’प्रयोग-सिद्ध’ भी अवश्य है ।
विज्ञान विचार और बुद्धि अर्थात् तर्क पर आश्रित है जबकि स्वयं तर्क विचार और धारणाओं का विस्तार जो बेतरतीब हो सकता है या ’ज्ञात’ के किसी ’विशेष’ क्षेत्र तक सीमित । ’निष्कर्ष’ के रूप में ऐसे अनेक क्षेत्र निरंतर स्थापित किए जा सकते हैं और इतिहास भी बन जाते हैं । इसलिए एक ही विज्ञान की अनेक शाखाएँ हो जाती हैं, जिनकी पुनः और भी अनेक होती रहती हैं । लेकिन उनकी सत्यता काल से सीमित होती है, जबकि काल स्वयं ’धारणा’ / ’कलन’ / कल्पन और कल्पना मात्र है । गणितज्ञ और वैज्ञानिक भी काल के स्वरूप पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके हैं ।
वेद कहता है :
अक्षरात् संजायते कालं कालाद्व्यापक उच्यते । व्यापको ही भगवान् रुद्रो, भोगायमानो यदा शेते रुद्रस्तदा संहार्यते प्रजाः ।
उच्छ्वसिते तमो भवति ....।
इसी के अन्तर्गत ’क्लामयति’ का उल्लेख भी है ।
क्लामयति ’रुद्र’ अर्थात् ’सत्य’ के अक्षर-स्वरूप का ’देवी-रूप’ है
यहाँ विस्तार में जाना अनावश्यक है । ’देवी-रूप’ का संदर्भ इसलिए प्रस्तुत किया गया कि ’अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्सुवन्तः समुद्रे ।’ से इसकी तुलना की जा सके ।
क्या वेद ’विज्ञानसम्मत हैं? इस प्रश्न की त्रुटि यहीं समझली जा सकती है ।
बुद्धि और विचार का आगमन होने के बाद ही ’शून्य’ और ’एक’ की धारणा अस्तित्व में आती है और ’गणित’ इस प्रकार की धारणाओं का सुनियोजित विस्तार है ।
देवी कहती हैं :
"अहं ब्रह्मस्वरूपिणि । मत्तः प्रकृति-पुरुषात्मकं जगत् । शून्यं चाशून्यं च ॥"
"... एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका ।
एकैव विश्वरूपिणी तस्मादुच्यते नैकेति ॥"
यह विद्या ब्राह्मणों के ही लिए है । किंतु ब्राह्मण (द्विज) भी विधि से संस्कारित होने पर ही होता है । प्रश्न है ’पात्र’ होने का । (व्याख्या की दृष्टि से) कार्य-कारण की युक्ति (tool) का प्रयोग करें तो कहा जा सकता है कि पारिस्थितिकी-विज्ञान / ( environment-science ) के अनुसार शरीर-विशेष की अन्तःपारिस्थिकी और बाह्य-पारिस्थितिकी विचारणीय है । और इस आधार पर किसी भी प्रणाली (वैदिक या वैज्ञानिक) का औचित्य उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए ।
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Wednesday, 11 October 2017

ज्ञात से मुक्ति / Freedom from the known

अध्यात्म और आत्म-ज्ञान
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वर्ष 1986 में राजकोट में नौकरी कर रहा था । स्वयं ही ऑप्शन से इस शहर को चुना थाताकि ’घर’ से कुछ समय के लिए दूर रहा जा सके । तब दो-चार महीने बाद ’घर’ लौटना, एक-दो दिन रहकर वापस ड्यूटी पर चले जाना अच्छा लगता था । राजकोट में ’बस-स्टैंड’ से मेरे ’घर’ का रास्ता मुश्किल से दस मिनट का था । सामने से ’भक्तिनगर’ स्टेशन से गुज़रनेवाली मीटर-गेज़ लाइन थी ।
’घर’ और दफ़्तर के बीच एक रास्ता ’रामकृष्ण-मठ / आश्रम’ से गुज़रता था ।
सुबह और शाम क़रीब एक-घंटे प्रतिदिन वहाँ ’ध्यान’ करता था ।
रविवार को तो शायद और अच्छी तरह ।
जब दिसंबर 16, 1985 को राजकोट पहुँचा था तो एक हफ़्ते ’होटल’ / ’गेस्ट-हॉउस’ में बिताने के बाद यह घर मुश्किल से मिला था ।
रोज़ की तरह 18 फ़रवरी (1986) की सुबह चाय पीने के लिए पास के चौराहे तक गया, जहाँ उस समय ’रामनाथ-टी-स्टॉल’ हुआ करता था, लेकिन मैं सड़क पर खड़े रेकड़ीवाले से दूध लेने जाता था जो चाय भी बनाता था, इसलिए वहीं चाय पी लेता था, जबकि दूध एक-दो दिन तक के लिए पर्याप्त होता था ।
उस दिन सुबह सवा सात बजे होंगे जब अपनी कलाई-घड़ी बाँध रहा था कि वह हाथ से छूट गई और बिलकुल बंद हो गई ।
मैंने उसे दो चार बार ठकठकाया लेकिन वह बस अड़ ही गई थी ।
मुझे किसी अनहोनी की आशंका ने जकड़ लिया । उद्विग्न-चित्त जब चौराहे पर पहुँचा तो ’चाय’ बन रही थी, चायवाले को दूध का हैंडलवाला डिब्बा दिया और लोकल गुजराती अख़बार ’फूलछाब’ / ફૂલછાબ देखने लगा । मुखपृष्ठ पर ही दाँयी ओर नज़र गई तो दिल धक् से रह गया :
’जे कृष्णमूर्ति नो बुझायेलो जीवन-दीप’
 'જે.કૃષ્ણમૂર્તિ નો બુઝાયેલો જીવન-દીપ'
उसके बाद जैसे-तैसे चाय ख़त्म की, ’घर’ लौटा और दो-दिन कैसे गुज़रे कुछ कह नहीं सकता ।
दफ़्तर में दूसरे-तीसरे दिन ’मैनेजर’ ने पूछा : ’वैद्यजी! सब-ठीक तो है?’
’जी’
’ऐसे ही लगा कि आप दो-दिनों से बहुत गंभीर और चुप-चुप नज़र आरहे हैं इसलिए पूछ लिया ।’
बातों-बातों में एक-दो-दिन बाद उन्हें बताया कि मेरे गुरु का देहावसान हो गया है, इसलिए थोड़ा उद्विग्न था ।
बात आई-गई हो गई ।

इसके कुछ महीनों बाद उज्जैन जाना हुआ तो एक परिचित से मिलना हुआ । उनकी पत्नी का कोई ऑपरेशन हुआ था । वे घर में पिछले कमरे में बिस्तर पर लेटीं थी और उनके पति भीतर थे । उन्हें आवाज़ लगाई तो वे प्रसन्न-मन बाहर आए । आते ही उन्होंने पूछा :
"ज्ञात से मुक्ति?"
"जी नहीं, अज्ञात से मुक्ति"
मैंने बिना एक सेकंड देर किए ज़वाब दिया ।
वे चौंक गए फिर अपनी पत्नी के पास मुझे ले जाकर कहने लगे :
कुछ दिनों पहले हमने (वे ’मैं’ के स्थान पर हम कहते थे) सपने में देखा कि हम आपसे पूछ रहे थे ’ज्ञात से मुक्ति?’, और आपने हमारे उस सपने में भी हमें बिलकुल यही ज़वाब दिया था और हमने आपकी ऑन्टी से भी इसका ज़िक्र किया था !
ऑन्टी ने बहुत कमज़ोर आवाज़ में उनकी बात की तसदीक़ की ।
जे.कृष्णमूर्ति की एक सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक है ’फ़्रीडम फ़्रॉम् द नोन’/ Freedom from the known  जिसके हिंदी अनुवाद का शीर्षक है "ज्ञात से मुक्ति"
और उन दिनों वे यही किताब पढ़ रहे थे जिसे मैं काफ़ी पहले पढ़ चुका था और श्री जे.कृष्णमूर्ति की बात को अपने ढंग से यही समझता था कि जिसे वे ’ज्ञात’ कह रहे हैं उसे वास्तव में कभी ’जाना’ ही नहीं जाता, इसलिए उससे मुक्ति का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है? दूसरी ओर क्या कोई ऐसा है जो स्वयं से अनभिज्ञ हो या हो सके?
इसलिए ’अज्ञात से मुक्ति’ मुझे अधिक ग्राह्य लगता था ।
इसका एक कारण यह भी था कि मेरी आध्यात्मिक-दीक्षा भगवान् श्रीरमण की शिक्षाओं से हुई थी, इसलिए भी समस्त ’प्राप्त होनेवाला ज्ञान’ मेरी दृष्टि में अज्ञान का ही पर्याय था । अर्थात् यह मेरा ओरिएन्टेशन था । जे.कृष्णमूर्ति की शिक्षाओं से इसका अत्यन्त गहरा सामञ्जस्य था और मुझे उनकी शिक्षाओं में कहीं कोई विसंगति  नहीं दिखलाई देती थी ।
वर्षों बाद 1987-88  में श्री निसर्गदत्त महाराज के प्रसिद्धतम ग्रन्थ 'I AM THAT' में पढ़ा :
’ऑल नॉलेज इज़ इग्नरेन्स’/ 'All knowledge is ignorance'
तो मुझे यह बात एकदम गले उतर गई ।
सचमुच अध्यात्म की दृष्टि से यही सत्य है कि समस्त लौकिक-ज्ञान, यहाँ तक-कि ’ब्रह्म-ज्ञान’ भी, आत्म-ज्ञान के सन्दर्भ में अज्ञान मात्र है ।
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टिप्पणी :
'I AM THAT' और मेरे द्वारा किया गया उसका हिंदी अनुवाद 'अहं ब्रह्मास्मि' से चेतना, मुंबई  प्राप्य है । 

 

Tuesday, 10 October 2017

अन्वयव्यतिरेकाभ्याम् / anvayavyatirekābhyām

अन्वयव्यतिरेकाभ्याम् 
--विकारी/अविकारी--
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क्या यह बूढ़ा आदमी मैं हूँ ?
तो वह जवान आदमी कौन था?
क्या मैं ’तब’ कुछ था,
’अब’ कुछ और हूँ?
तो क्या ’मैं’ वही हूँ?
तो क्या ’मैं’ वही नहीं हूँ ?
यह जो बदल रहा है,
क्या ’मैं’ वह हूँ ?
या जो इस बीच नहीं बदल रहा है,
क्या ’मैं’ वह हूँ ?
क्या जो जानता है बदलाव को,
क्या ’मैं’ वह हूँ ?
क्या ’जो’ जानता है बदलाव को,
क्या ’वह’ बदलता है?
तो, क्या जो बूढ़ा है वह जवान था?
तो, क्या जो जवान था वह बूढ़ा है?
क्या ’जानना’ बदलता है?
क्या ’जानना’ नहीं बदलता?
जो ’जानना’ / ’ज्ञाता’ बदलता है,
वह है बदलनेवाला ’मैं’, -विकारी, 
जो ’जानना’/ ’ज्ञाता’  नहीं बदलता,
वह है न-बदलनेवाला ’मैं’, -अविकारी, 
लेकिन इसे ’कौन’’मैं’ जानता है?
विकारी ’मैं’  या अविकारी  ’मैं’
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anvayavyatirekābhyām
-vikārī / avikārī-
-Mutable/Immutable-
Am I this old man?
So, who was that young one?
Was then ‘I’ something else?
Am ‘I’ now something other?
So, am ‘I’ the same now?
So, am ‘I’ not the same now?
The one that changes,
Am ‘I’ that?
And that what changes not,
Am ‘I’ that?
The 'one' that perceives the change,
Am ‘I’ that?
The 'one' that perceives the change,
Does that 'one' change?
So, the 'one' that is old, was young?
So, the 'one' that was young, is old?
Does the 'perception' change?
Does not the perception change?
The perception that changes,
Is the 'I' changeable, that changes, -the Mutable,
The perception that does not change,
Is the 'I' the unchangeable, the -Immutable.
But exactly 'Who' is the 'one',
That knows the 'perception'?
Is that 'I' the 'known'?
Is that 'I' the 'one 'Who' knows?
'Who' knows?
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पञ्चमृत्यु और पञ्चामृत / pañcamṛtyu and pañcāmṛta

आज की संस्कृत रचना
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ततो पृष्टो देव्या उवाच तदा मदनान्तकः ।
आशाचिन्ताप्रमादभयलोभापञ्चमृत्युवः ॥
विवेकवैराग्यमुमुक्षा अवधानमनुसन्धानम् ।
पञ्चैते समाहारेण पञ्चामृतान्युदीर्यन्ते ॥
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अर्थ :
तब देवी पार्वती के द्वारा पृच्छा किए जाने पर भगवान् शिव ने कहा :
आशा, चिन्ता, प्रमाद, भय और लोभ ये पाँच मृत्यु हैं ।
विवेक, वैराग्य, मुमुक्षा, अवधान और अनुसंधान इन पाँचों को संक्षेप में पञ्चमृत्यु कहा जाता है ॥
मनुष्य के द्वारा होनेवाला कर्म यदि प्रथम पाँच से प्रेरित होकर प्रारंभ होता है तो वह कर्म कर्म-श्रँखला को बनाए रखता है, जबकि अन्य पाँच से प्रेरित हुआ कर्म कर्म-बंधन को नष्ट कर (अमृतत्व की प्राप्ति करा) देता है इसलिए उन्हें पञ्चामृत कहा जाता है ।
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 2 संस्कृत / saṃskṛta couplets,
 composed today 
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tato pṛṣṭo devyā uvāca madanāntakaḥ |
āśācintāpramādabhayalobhāpañcamṛtyuvaḥ ||
vivekavairāgyamumukṣā avadhānamanusandhānam |
pañcaite samāhāreṇa pañcāmṛtānyudīryante ||
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Meaning :
Then questioned earnestly by देवी पार्वती / devī pārvatī , Lord   भगवान् शङ्कर / bhagavān śaṅkara answered thus :
hope, worry, inattention, fear, and greed these 5 are the death,
while discrimination, dispassion, longing for emancipation, attention and self-enquiry these 5 are  the way to the deathless.
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Saturday, 7 October 2017

Solitaire


Solitaire
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Last night, I was waiting for a friend who usually comes to see me in between every few days. But as I was overcome by sleep so much, let the lights stay on and I myself went to the bed.
This was about 9:50.
Woke-up after about 2 hours (precisely at 11:42 p.m) and put the lights off and returned to bed.
At about 2:30, I might have had this dream.
In the dream, I was playing ‘patience’ / ‘solitaire’,
(So far I have played exactly 1600 times this on my computer.
I checked this just now.)
And in the dream I somehow sensed, it was not for the real, but in the dream only. So as I usually do when such a thing happens, I tried to ‘manipulate’ the things because ‘if this was a dream’ I could do this easily. I do this often even while something like this happens with me which looks like a ‘dream’ but almost usually an impossibility. I could see the columns suited well soon and in a jiffy, ‘I won’ and saw out of 1600 games, so far I had won 6 times. I was going to shut-down the system and laughed away about the whole thing.
Just then there was a ‘knock’ at the door.
At this hour? In my dream I checked ‘time’ in my system which was 2:56 a.m. date was 08/10/2017. ‘So it’s a dream only don’t worry!’ –I said to myself.
“No one is going to shoot you, and even if this happens you will not die, but will just wake-up from your dream in your sleep.”- I was convinced.
But the door was already open and I saw them sitting on the sofa in my drawing room. I had no reason and time to wonder who opened the door! We wanted to talk about with you, something about the ‘social ethics’.
She was a girl / lady about 30-35.
He was her brother, as she told me.
He could be younger or elder to her, I couldn’t say.
I thought for a moment:
Could I ‘shut-down’ this dream? Having in the ‘reins’, I could do this, but was interested in seeing what happens next, so let it ‘continue’.
Just then the street-dog, who often screams at this hour every night, started barking.
“Well, you know we are siblings, and we just knew about a friend who has incestuous feelings with her brother. And no doubt, she has a guilt-sense too for her feelings. As she could not deal with the situation well and is facing many mental problems, like depression, anxiety, and the many related symptoms ….”
At the very moment I knew perfectly well and was 'aware' that my own mind was ‘creating’ the dream, and all that was happening was like writing-down a screen-play, and getting played the same in an instant.
And as the ‘time’ had lost all its validity, it mattered not.
The street-dog started barking again rather in a shrilly voice, but mercifully could not disturb my dream and sleep.
“Why he is barking at this odd hour continuously, unstopped?”
-Her brother asked.
“Oh! It’s but his nature.”
“Nature? He exclaimed.
“Don’t they have something like ‘social-ethics’…?
-She chuckled.
“No, he doesn’t have a ‘nature’, Rather, he is ‘nature’ itself, - in the form of a body and actions done through that body.”
I tried to explain.
“What about us?”
-He asked.
“Well ethics is the learning and acquiring the so-called rights and wrongs dictated and imposed upon us by the society, - I think”.
So, shouldn’t she have the guilt-sense?
“Who are we to decide?”
"Are we also not 'nature' only?"
The brother asked.
"Yes, but we tend to think and start believing: we have 'a nature'. Your's and mine and theirs. And we treat the nature in terms of character and take pride in or feel guilt for that, ..."
"Or just stay confused all the time."
She said as if concluding the topic.
And this very moment, approaching my ears, I heard the loudest bark of the dog, and could not stay dreaming any more.
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एक कविता अधूरी सी

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एक कविता अधूरी सी
( जब ’मन’ नहीं होता!)
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क्या कोई कभी ’मन’ से थक पाता है?
क्या किसी का ’मन’ उससे थक जाता है?
क्या शायद तब, उसे नींद आ जाती है?
क्या नींद आने पर ’मन’ थक जाता है?
’कौन’ ढूँढता, खोजता है इसका उत्तर?
’जो’ खोजता है, क्या है ’मन’ से भिन्न?
फिर कोई क्यों कहता है : ’मैं’, मेरा ’मन’?
क्या ’मन’ ही कहता है ’मैं’, ’मेरा मन’?
जब हो जाती है बुद्धि किसी की कुंठित,
क्या तब थक जाता है  उसका ’मन’?
बुद्धि किसी की जब हो जाती है कुंठित,
क्या तब ’वह’ ’मन’ से थक जाता है?
’वह’ है कौन जो कि थक जाता है ’मन’ से?
’वह’ है कौन कि जिससे ’मन’ थक जाता है?
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Wednesday, 4 October 2017

रावण और रामायण

रावण :
एक विचार / एक चमत्कार 
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"रावण की मृत्यु एवं अंतिम संस्कार (पूजन-सहित) भी श्रीराम के कर-कमलों से हुआ था ।
इससे प्रारंभ हुआ रावण-दहन परंपरा के रूप में स्थापित हुआ लेकिन इस परंपरा के साथ रावण का पूजन किया जाना तो बंद हो गया, उसे अपमानित करने और उसके दहन को ’उत्सव’ का रूप दिया जाना निश्चित ही सभी के लिए अत्यन्त अनिष्टप्रद है यह तो वैदिक-तन्त्र के विद्वान भी आपको बता देंगे ।"
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एक प्रतिक्रिया :
प्रियवर ..  जी,
माननीय पं. विनय कुमार वैद्यजी का कथन निराधार है। श्रीराम ने न तो रावण का कभी पूजन-अर्चन किया और न अंतिम संस्कार। यह कर्म विभीषण जी के कर कमलों से संपन्न हुआ था। श्रीराम या लक्ष्मण जी ने कभी रावण से कोई उपदेश ग्रहण नहीं किया और न उससे शिक्षा प्राप्त की। रावण को कभी भगवान ने अपना पुरोहित बनाकर रामेश्वरम् शिवलिंग की स्थाना* भी नहीं कराई। यह सब तथाकथित पंडितों के वाग्जाल और जल्पनाएँ हैं। किसी रामायण में इन तथ्यों का कोई समर्थन नहीं मिलता।
लंकेश्वर रावण का वध भगवान ने चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को किया। तदुपरांत विभीषण जी का राज्याभिषेक, सीताजी की अग्निपरीक्षा, वानरसेना के मृत सेनानियों पर अमृतवर्षा और उनका लंकेश्वर द्वारा सम्मान के अनंतर प्रभु चैत्र शुक्ल चतुर्थी को विमान से भरद्वाज ऋषि के आश्रम पहुँचे तथा पंचमी को उनका पुष्य नक्षत्र में राज्यारोहण हुआ। दशहरे या दीवाली का रामकथासे कोई संबंध नहीं है। आज भी अयोध्या जी में प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल पंचमी को श्रीराम का राज्याभिषेक उत्सव मनाया जाता है। हाँ, रावण के पुतलादहन से मैं सहमत नहीं हूँ। यह सनातन धर्म के प्रतिकूल है। तुलसीदास जी के समय तक यह प्रथा नहीं थी।
*संशोधनः स्थापना
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मेरा प्रत्युत्तर :
मैं न तो व्यवसाय या कर्मकाण्ड से पंडित हूँ न श्रीरामचरित्र की कथा का ज्ञाता,
और कथावाचक तो कदापि नहीं हूँ ।
अध्यात्मरामायण युद्धकाण्ड सर्ग १२, श्लोक ३३ में भगवान् राम से विभीषण कहते हैं :
रामस्यैवानुवृत्त्यर्थमुत्तरं पर्यभाषत ।
नृशंसमनृतं क्रूरं त्यक्तधर्मव्रतं प्रभो ॥३१
नार्होऽस्मि देव संस्कर्तुं परदाराभिमर्शिनम् ।
जिसके प्रत्युत्तर में भगवान् राम विभीषण से कहते हैं :
श्रुत्वा तद्वचनं प्रीतो रामो वचनमब्रवीत ॥३२
मरणान्तानि वैराणि निवृत्तं नः प्रयोजनम् ।
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥३२
जिसकी मृत्यु हो चुकी है, उससे वैरभाव भी समाप्त हो जाता है,
इसलिये उसका इष्ट-संस्कार (अंत्येष्टि) करना जैसा तुम्हारे लिए कर्तव्य है वैसे ही मेरे लिए भी (कर्तव्य) है ।
अपनी अल्प-बुद्धि से मैंने इसका यही तात्पर्य ग्रहण किया कि भगवान् श्रीराम ने रावण की अंत्येष्टि के लिए विभीषण को आज्ञा दी ।
उन्होंने स्वयं रावण का ’पार्थिव’ पूजन किया है या नहीं इस पर मेरा कोई आग्रह नहीं है ।
न इस सब विवेचना में मेरी कोई रुचि है ।
रामायण का एक ऐतिहासिक पक्ष है, एक पौराणिक और एक लोककथात्मक भी ।
इनमें परस्पर विरोधाभास होने संभव हैं । सत्य क्या है, कितना है इसे तो राम जानें ...!
मेरा कोई दावा नहीं है न कोई ’मत’ ...
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एक आलोचनात्मक प्रत्युत्तर :
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण एकमात्र प्रामाणिक रामकथा है। इसे स्वयं ब्रह्मदेव ने प्रमाणित किया है। शेष रामकथाएँ काव्य रचनाएँ हैं, जिनमें नवीन उद्भावनाएँ, प्रक्षिप्तांशों और सामयिक रूढ़ियों को अंतर्निविष्ट किया गया है।
दूसरी प्रतिक्रिया :
क्या श्रीमद्वाल्मिकीय रामायण के प्रामाणिक होने से रामकथा की अन्य रचनाएँ अप्रामाणिक सिद्ध हो जाती हैं?
अध्यात्मरामायण भी ब्रह्माण्डपुराण के अन्तर्गत एक आख्यान है । यदि इस पर भी संशय किया जा सके तो श्रीमद्वाल्मिकीय रामायण के ही अन्तर्गत युद्धकाण्ड १०९वें सर्ग के अंतिम श्लोक में भगवान् श्रीराम द्वारा कहा गया प्रस्तुत श्लोक अवश्य दृष्टव्य है :
मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम् ।
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥२५ 
क्या यह केवल संयोग ही है कि अध्यात्मरामायण के जिस श्लोक को मैंने पहले उद्धृत किया था और जिस पर अप्रामाणिक होने का संदेह किया जा रहा है उसे महर्षि भगवान् वेदव्यास ने ही श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण से ही अक्षरशः यथावत् अपने ’अध्यात्मरामायण’ में उद्धृत किया है?
मैं इससे अधिक आगे और कुछ नहीं कहूँगा ।
सादर!
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टिप्पणी : जब एक 'विचार' प्रस्तुत किया था, उस समय मेरे मन में वह स्मृति थी जो क़रीब तीन-चार वर्षों पहले 'अध्यात्म-रामायण' पढ़ते समय विचार के रूप में मन में आई थी।  इस पर प्राप्त प्रतिक्रिया की सत्यता का अन्वेषण करने के लिए और संभवतः मुझसे हुई त्रुटि का शोधन करने के उद्देश्य से जब मैंने श्रीमद्वाल्मिकीय रामायण में इस प्रसंग में क्या कहा गया है इस उत्सुकता और जिज्ञासा से प्रेरित होकर उसे पढ़ा तो बस चकित होकर रह गया।  मेरे लिए तो यह चमत्कार ही था !
जब एक पाठक को मेरा उल्लेख अच्छा लगा और उसने प्रशंसा की, तो मैंने उन्हें लिखा :
"आशा है वाल्मीकि रामायण पर विमल किशोर जी के प्रश्न के मेरे उत्तरों से आपको संतोष हुआ होगा । मेरे लिए तो यह चमत्कार था कि मेरे प्रमाण की स्वयं उन्होंने ही पुष्टि कर दी! उनका ही उत्तर देने के लिए मैंने वाल्मीकि रामायण में संबंधित प्रसंग देखा तो वहाँ मेरा उद्धृत श्लोक जैसे मुझे आशीर्वाद दे रहा था ।
जा पर कृपा राम की होई, ... "
मुझे अपने 'विचार' पर इसलिए भी भरोसा था, क्योंकि अध्यात्म-रामायण में ही मैंने यह उल्लेख भी पढ़ा था कि भगवान श्रीराम ने जटायु का  'श्राद्ध-कर्म' भी अपने 'कर-कमलों' किया था | अब फिर से उस जटायु-प्रसंग का अवलोकन किया तो पाया कि 'कर-कमलों' का विवरण मेरी स्मृति में वहीं से था, क्योंकि गीताप्रेस की जिस प्रति से मैंने 'अध्यात्म-रामायण' को पिछली बार पढ़ा था उसमें उसके हिंदी अनुवाद में 'कर-कमलों' का प्रयोग दृष्टव्य है और वही मुझे स्मरण रह गया होगा । (मूल संस्कृत श्लोक में केवल 'हस्ताभ्यां' का प्रयोग है।) 
संदर्भ :
जटायु कहते हैं :
अन्तकालेऽपि दृष्ट्वा त्वां मुक्तोऽहं रघुसत्तम ।
हस्ताभ्यां स्पृश मां राम पुनर्यास्यामि ते पदम् ॥३५
(अरण्यकाण्ड, सर्ग ८) 
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Tuesday, 3 October 2017

नित्य-अनित्य-अभ्यास / विवेक discrimination in Self-Enquiry.

नित्य-अनित्य-अभ्यास / विवेक
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When an aspirant takes up the practice of नित्य-अनित्य-अभ्यास seriously and regularly ponders over this question some-day eventually he starts to 'see' what is transient and what is permanent. Bringing attention from outward world and its things, one begins to see the 'me' is comparatively stable and permanent. But proceeding further on, he realizes that 'me' as thought , though forms the support of whole 'experience' this too appears and disappears as in the 3 states of mind, namely the waking, dream and deep sleep. One then realizes with full conviction the consciousness without even a trace of 'me' is the Reality unchangeable, immutable, अविकारी, while everything other than this is विकारी > always keeps undergoing change. (Because you wanted to stay in association with me, so I dared to write this.
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जब 'सत्य' का जिज्ञासु ध्यान से 'नित्य क्या है और अनित्य क्या है?' इसका गंभीरता से विचार करता है तो उसे पहले तो संसार और इसके समस्त 'विषय', सुख-दुःख 'अनुभव-मात्र' 'अनित्य' जाना पड़ते हैं, जबकि 'मैं' तुलनात्मक रूप से स्थिर और 'नित्य' जान पड़ता है।  और आगे खोजने का प्रयास करते हुए उसे समझ में आता है कि यह 'मैं' भी 'विचार-रूप' में आता-जाता रहता है, और सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत अवस्था में ही होता है।स्पष्ट है कि इस 'मैं-विचार' का आधार कोई अविकारी तत्व है जिसमें 'मैं' का नितांत अभाव है।
इस अधिष्ठान की पहचान ही विवेक का चरम है।
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