Friday, 18 November 2016

प्रेत, पितर और देवता

प्रेत, पितर और देवता
--
"ग़ुरुवर ! क्या यह संभव है कि किसी कारणवश जानते-हुए भी यदि मैं प्रेत के प्रश्न का ठीक उत्तर न दूँ तो भी मेरे सिर के टुकड़े न हों ?"
"हाँ वत्स ! पर ऐसा केवल तभी होगा जब उसने तुमसे प्रश्न करते समय तुम्हें संबोधित न किया हो ।"
"गुरुवर! प्रेत, पितर और देवता के मध्य परस्पर क्या भेद हैं ?"
"वत्स जब किसी मनुष्य का अंतिम संस्कार शास्त्रोक्त रीति से नहीं किया जाता तो मृत्यु के बाद उसे न तो पितृ-लोक प्राप्त होता है और न देव-लोक । तब उसकी प्रेतात्मा प्रलय होने तक अंधकार और भय, चिन्ता और व्याकुलता में भटकती रहती है । ऐसे भी असंख्य लोक (नरक) हैं जो मनुष्य के संस्कारों के क्रम में मृत्यु के बाद उसे प्राप्त होते हैं । इसलिए संतान का यह दायित्व है कि वह माता-पिता आदि का शास्त्रोक्त रीति से तिल तथा जल अर्पित कर, उनके निमित्त अन्न-वस्त्र आदि का दान करते हुए उनकी अंत्येष्टि करे । इस प्रकार की अंत्येष्टि से उनकी गति प्रेतलोक में न होकर पितृलोक में होती है। "
"हे आचार्य ! कृपया मेरी इस शङ्का का समाधान करें कि क्या किसी का भी पुनर्जन्म नहीं होता ?"
"वत्स, केवल उन्हीं का पुनर्जन्म होता है जो पुनर्जन्म की मान्यता को स्वीकार करते हैं । वे ही मृत्यु के बाद पितृ-लोक, देव-लोक या मोक्ष को प्राप्त करते हैं और उस लोक में अपने कर्मों का शुभ-अशुभ फल भोगकर मनुष्य के रूप में मृत्युलोक में पुनः जन्म लेते हैं ।"
--       

सहस्रशः / 19/11/2016

सहस्रशः
--
"पुत्र ! तुममें जो सर्वाधिक प्रखर विशेषता है वह है तुम्हारा प्रमादरहित होना । प्रमाद का अर्थ है मन पर किसी वृत्ति का हावी हो जाना, और प्रमादरहित होने का अर्थ है समस्त वृत्तियों में आधारभूत अहंवृत्ति के उद्भव, विलास और लय का सहज अवधान होना । और इसलिए मैंने तुम्हारी पात्रता देखकर ही तुम्हें शिष्य के रूप में स्वीकार किया है ।"
शतावधानी आचार्य के ये वचन सुनकर राजा विक्रमार्क ने निवेदन किया :
"आचार्यप्रवर! अष्टावधानी और दशावधानी में क्या भेद है?"
"पुत्र अष्टावधानी का अवधान दिक् (दिशाओं) में व्याप्त और उससे सीमित होता है जबकि दशावधानी का अवधान काल (दशा) में व्याप्त, और उससे सीमित होता है । दोनों ही इस तथ्य से अनभिज्ञ होते हैं कि दिक्-काल जिस चेतना में असंख्य देह-रूपों में उनके परिप्रेक्ष्य में व्यक्त अगत् की तरह भासित होते हैं वह चेतना स्वयं वैयक्तिक और समष्टि इन दो रूपों में तथा उन असंख्य देह-रूपों में व्यक्त होते हुए और उनका अधिष्ठान होते हुए भी उनसे विलक्षण है ।"
"गुरुवर! क्या इस प्रकार का बोध वैयक्तिक हो सकता है ?  क्या कोई व्यक्ति-विशेष इस अवधान का विषय हो सकता है? या यह अवधान किसी व्यक्ति-विशेष के द्वारा ग्रहण किया जा सकनेवाला विषय हो सकता है?"
"व्यवहार में जब ऐसा होता है तो वह व्यक्ति इस चेतना के दोनों रूपों को पहचानता है और उस विलक्षण मनःस्थिति में जगत् को जाग्रत्-स्वप्न की तरह अनुभव कर सकता है । इसलिए वह सारा प्रपञ्च उसके लिए केवल औपचारिक होता है ।"
"आचार्य ! जब मैं किसी प्रेत को आपकी आज्ञा होने पर बाँधकर यहाँ लाता हूँ तो वह मेरा ध्यान विचलित करने के लिए मुझसे कोई कथा कहता है जिससे अंत में कोई कठिन प्रश्न मेरे समक्ष प्रस्तुत करता है । पुनः वह कहता है कि यदि मैंने जानते-हुए भी उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तो मेरे सिर के सैकड़ों टुकड़े हो जाएँगे । यद्यपि मुझे उसके शब्दों से भय नहीं लगता किंतु यह कौतूहल अवश्य होता है कि यदि मैंने जानते-हुए भी उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तो क्या सचमुच मेरे सिर के सैकड़ों टुकड़े हो जाएँगे ?"
"हाँ वत्स, यह तो सत्य है । वास्तव में प्रेत, पितर और देवता भूत, भविष्य और वर्तमान को उसी प्रकार देख सकते हैं जैसे किसी स्फटिक-गोल (crystal-ball) से तान्त्रिक भूत, भविष्य और वर्तमान को देख लेते हैं । किंतु यह भूत, भविष्य और वर्तमान ’व्यक्ति’-चेतना के ही परिप्रेक्ष्य में आभासी स्तर पर सत्य प्रतीत होता है । ऐसे असंख्य व्यकि-चेतनाओं के असंख्य भूत, भविष्य और वर्तमान होने से उन सबका कोई सर्वनिष्ठ आश्रय नहीं है, अर्थात् ऐसे किसी स्वतंत्र जगत् का अस्तित्व नहीं है जिसे हर कोई ’संसार’ के रूप में अनुभव करता है ।"
--    

Monday, 14 November 2016

Tantra : theory, practice and essence.


तंत्र : सिद्धांत, अभ्यास और सार
... yes My dear Amma! That is the very point I should have told you, but I didn't know how to come to  that point. I never want to hurt 'religious' sentiments of any-one. So I just don't know how you look at 'tantra'. The practical tantra is so easy to follow and every-one knowingly or unknowings follows also according to संस्कार / 'sanskara', but there could be no 'वैचारिक चिंतन' /' philosophy' or 'thought' about the procedure. There is authentic 'उलूक-तंत्र ' / 'Ulooka-tantra' > the tantra followed by the owls (birds), 'विडाल-तंत्र ' / 'vidAla-tantra' > the tantra followed by the cat, There is like-wise 'काक-तंत्र' / 'kAka-tantra', > that is followed by the crow, 'कोकिला-तंत्र ' / 'kokila-tantra', followed by the cuckoo. The evolution of tantra as 'philosophy' has resulted in things that only discuss tantra in intellectual way, but rarely touch the core. The शैव-तंत्र / shaiva-tantra, काली-तंत्र  / kAlI-tantra, 'योगिनी-तंत्र' / yoginI-tantra on the other hand teach about the core of 'देवता-तंत्र / 'devatA-tntra'. That could be also true about the 'प्रेत-तंत्र' / preta-tantra' > the tantra of the departed souls both good / bad / human or others. voodoo / black magic is but one form of this.
In fact, like the six major 'darshana-s' of the sanAtana-dharma there is an independent 'tantra-darshan' as well.
This Vedika-rituals / वैदिक अनुष्ठान / vaidikanushThAna is but the implementation of the practice of 'धर्म' / 'dharma'. This is also 'religion' (संस्कृत > प-रि-लग्न), that which is in relation to tradition.
So there is a tradition of 'tantra' as well which is also धर्म / अधर्म, auspicious or inauspicious.
Like-wise पुराण / purANa and all this system that the followers of sanAtana-dharma follow - like 'श्रीयंत्र' / Shree-yantra,  'मेरु-यंत्र' / 'meru-yantra', are the most simple examples through which a layman could learn and follow about even without elaborate 'knowledge' of the essence'. Or, without having a scholarly / intellectual skill.
I just wanted to hint : one has to be careful while understanding tantra in its all various aspects शुभ / auspicious as well as अशुभ / inauspicious too.
Love and Regards Amma!
--

Sunday, 13 November 2016

विस्मृत-कथा - 2.

विस्मृत-कथा - 2.
अष्टावधानी और शतावधानी
--
(सिंहासन-बत्तीसी की कथा से प्रेरित, कल्पित और आधारित)
राजा विक्रमादित्य की सभा में दो पंडितों के बीच बड़ी स्पर्धा थी और दोनों ही राजा को प्रभावित करने के लिए हर संभव प्रयत्न करते थे ।
किंतु महाकवि कालिदास बिना किसी यत्न के ही राजा के प्रिय सभासद थे यह भी उन्हें अच्छी तरह ज्ञात था । इसका एक कारण यह भी था कि राजा और महाकवि दोनों माँ काली के भक्त थे ।
अष्टावधानी पंडित चौंसठ योगिनी की आराधना करता था जबकि दशावधानी शतयोगिनी की ।
अष्टावधानी पंडित ने आज सभा में एक नया कौतुक प्रस्तुत किया था ।
चतुःषष्टिवर्गरंजन नामक परंपरागत क्रीडा के नाम से प्रसिद्ध खेल को नए रूप में प्रस्तुत कर पाने के लिए वह राजा से न केवल पुरस्कार, बल्कि उसके मित्रवर्ग में सम्मिलित होने का सम्मान भी पाने की आशा रखता था ।
इस नए खेल की प्रेरणा उसे योगिनी-तंत्र के मण्डल की रचना से मिली थी ।
रचना-मण्डल के माध्यम से उसे योगिनी-तन्त्र के मूल-तत्वों का अनायास प्राकट्य हुआ ।
चार प्रमुख दिशाओं और उनके मध्य की दूसरी चार दिशाओं का ज्ञान तो प्रायः सभी वेदविदों और विद्वानों को होता ही है किंतु मातृका-सूत्र पर ध्यान करते हुए उसके समक्ष 64 दिशाओं की अधिष्ठात्री शक्तियों (योगिनियों) के बीजाक्षर जब प्रकट हुए तब वह विस्मय-विभोर और बहुत हर्षित हुआ । वे (बीजाक्षर) तत्काल ही उसे स्मरण भी हो गए क्योंकि वे मातृका के बीजाक्षरों से बने मंत्रों का विस्तार थे । इसे वह विशाला देवी कहता था । विशाला देवी का स्वरूप जब पुनः उसके स्वरूप प्रकट हुआ तो उसे अपने दर्शन की सत्यता पर संदेह करने का कारण भी न रहा ।
तब उसके चित्त में प्रचलित परंपरा के अनुसार उन 64 योगिनियों की आराधना करने का भाव जागृत हुआ और इस हेतु वह राजा विक्रम से आर्थिक सहायता पाने का अभिलाषी था ।
उसे नहीं पता था कि राजा को स्वयं भी उसके स्वप्न में उसकी इष्ट अधिष्ठात्री से इस ओर स्पष्ट संकेत प्राप्त हो चुका था किंतु वह उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था ।
अष्टावधानी और दशावधानी दोनों ही इस बारे में अनभिज्ञ थे कि राजा विक्रम के गुरु और काली-तन्त्र के आचार्य यद्यपि शतावधानी थे किंतु उन्होंने कभी इस रहस्य को किसी के समक्ष प्रकट नहीं होने दिया था ।
जिस समय अष्टावधानी अपनी सामग्री को लेकर सभा में आया और उसके प्रदर्शन के लिए राजा से अनुमति चाही तो राजा को वह स्वप्न स्मरण हो आया जिसमें उसने चारों दिशाओं में फैले उसके साम्राज्य के खण्डों (बलकों) को चतुःसृ फलकों के रूप में और अपने महल को उनके मध्य अवस्थित देखा था । राजा ने स्वयं ही चतुःसृ-यंत्र की योजना की और हर खण्ड (विशाल / वसाल / vassal) के विशपों पर उनके संचालन और परिरक्षण का दायित्व सौंपा । कालांतर में राजा ने इस यंत्र को कौतुकवश क्रीड़ा का रूप दिया जिससे चौसर का उद्भव हुआ ।
इस क्रीड़ा में सभी विशपों की रुचि थी क्योंकि वह राज्य के संचालन के लिए एक समग्र दृष्टिकोण सामने रखता था । विशपों को अपने अधिकार-क्षेत्र का स्वयं ही आकलन और निर्धारण करना होता था और एक खण्ड के विशप की मृत्यु हो जाने पर कोई अन्य योग्य विशप उसके पद पर नियुक्त किया जाता था । इस प्रकार विशपों की प्रोन्नति और उनके रिक्त पदों को सुनियोजित रीति से समझने में चतुःसृ-यंत्र राजा को बहुत उपयोगी था ।
यद्यपि राजा को स्वयं भी यह विदित न था कि इस यंत्र के सम्यक् स्थापना और पूजन से उसे पूरी पृथ्वी के साम्राज्य की भी प्राप्ति हो सकती थी किंतु राजा के शतावधानी गुरु से यह सच्चाई छिपी न थी ।
जब राजा ने अष्टावधानी पंडित की सामग्री और अनुष्ठान-विधि का अवलोकन किया तो उसे समझते देर न लगी कि अष्टावधानी के यंत्र-अनुष्ठान में और उसके चतुःसृ-यंत्र के मूल में एक ही प्रेरणा थी । इसलिए राजा ने हर्ष प्रकट करते हुए अष्टावधानी की प्रशंसा करते हुए उससे पूछा :
"मैं स्थूल स्वरूप में योगिनी-यंत्र की स्थापना और उसकी आराधना का अनुष्ठान करना चाहता हूँ । क्या तुम इसका पौरोहित्य करोगे?"
अष्टावधानी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने राजा से आज्ञा लेकर महाकाल-वन क्षेत्र से बहुत दूर एक टीले (उत्तल) को इसके लिए उपयुक्त अनुभव किया और राजा से उस स्थल का निरीक्षण करने हेतु कहा ।
इस सारी गतिविधि पर दशावधानी की भी सूक्ष्म-दृष्टि थी और उसने विचार किया कि वह इसी तरह का एक उपक्रम रचेगा । संयोगवश राजा के सेनापति से उसकी निकटता थी और उसने अपने इस पूरे उपक्रम की योजना पर युद्ध-कौशल और रणनीति के संदर्भ में चिंतन किया । दशावधानी यद्यपि क्रमभंग का रूप था (क्योंकि ’9’ के अंक के पश्चात् अगला अंक 10 (1+9) एक क्रांति होता है जबकि ’आठ’ (2 x 2 x 2) का अंक पूर्ण होता है ।) किंतु उसकी दृष्टि अष्टावधानी के द्वारा प्रस्तावित मंडल-विधान से भिन्न थी । अष्ट-योगिनियों की मंडल-रचना का प्रयोजन उसके उद्देश्य के लिए पर्याप्त न था । वह ज्योतिष-योग के आधार पर 'काल' के सन्दर्भ में योगिनी-दशा की दृष्टि से योगिनी-तंत्र का प्रयोग करना चाहता था । इसलिए उसने तदनुसार शत -योगिनी मंडल का विधान योजित किया और उचित अवसर आने पर उसे राजा के समक्ष अवलोकन हेतु प्रस्तुत किया ।
राजा स्वयं भी ज्यौतिष का अभ्यास करता था और उसे अष्टावधानी के रचना-विधान और दशावधानी के रचना-विधान के बीच के अंतर और समानताओं को देखकर कौतूहल हुआ । जब उसने अपने आचार्य से इस बारे में निवेदन किया तो वे बोले :
विक्रम! दोनों के दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न सन्दर्भों में ग्राह्य हैं ।  तुम्हारा कार्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य और प्रजा के हित के लिए कहाँ कौन सा उपयोगी है ।
तब राजा ने दोनों को पर्याप्त पुरस्कार दिया और दोनों को अपने-अपने तरीके से तंत्र-प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया ।
--
पुत्तलिका ने राजा भोज से इतना कहकर प्रश्न किया :
"हे राजा ! क्या तुम्हारे लिए यह संभव होता कि तुम राजा विक्रम की तरह अपने दो परस्पर प्रतिस्पर्धी सभासदों के प्रति ऐसा निष्पक्ष न्याय कर पाते?"
पुत्तलिका के ये वचन सुनकर राजा भोज ने अपना पग पीछे खींच लिया और पुत्तलिका पुनः पूर्ववत काष्ठ-प्रतिमा सी निश्छल हो गयी ।
--
(विशप > बिशप (bishop), बलक > बल-कः > bulk / block, कनिष्ठ > knight, वज्रीय > vizier , वज़ीर
राजा > इंद्र > वज्र > पायिक > pawn , रोध > rook >  A rook (♖ ♜ borrowed from Persian رخ, rokh),
The pieces in the play of chess.)
--      

Friday, 11 November 2016

आत्मानम् विद्धि !

कविता / आत्मानम् विद्धि !
--
आत्मा के कोटिशः जगत्
अभिव्यक्त मन (आत्मा) में,
आत्मा के असंख्य वर्तुल,
आत्मा के अनंत विस्तार,
आत्मा के असंख्य वृत्तान्त,
आत्मलीन मन (आत्मा) में !
--

Monday, 7 November 2016

पञ्च-पटलं

पञ्च-पटलं 
अद्यरचितं मया
पञ्च-पटलं पाटलदलपुष्पं
संवृत्तम् स्ववृन्तमभिकेन्द्रितं
सुमुखमूर्ध्वमुन्मुखीभूत्वा
विकसति प्रहर्षेण शुभ्रम् ॥
--
pañca-paṭalaṃ pāṭaladalapuṣpaṃ
saṃvṛttam svavṛntamabhikendritaṃ 
sumukhamūrdhvamunmukhībhūtvā 
vikasati praharṣeṇa śubhram ||
--
Five-petaled flower.
--
Penta-petal pink-leaf flower,
Encircling concentric paths,
Benign-faced looking up to heavens,
Prospers delightedly in own Glory.
--

इल आख्यानः / ila ākhyānaḥ

This reminds me of the इल आख्यानः (वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्डम् सप्ताशीतितम सर्गम्)
ila ākhyānaḥ (vālmīki rāmāyaṇa uttarakāṇḍam saptāśītitama sargam) ... chapter 87 of this Text which is as much important as महाभारतम् / mahābhāratam.
Gives a clue of the whole past when भृगु / bhṛgu (Venus) had a daughter (virgo) and a king, a disciple of भृगु / bhṛgu ... There is also the story of Mercury (budha) and the King ila, this is very beautiful description of the incidences of the Astronomical significance. This whole story is a parallel to passing of the 'Solar Year'.... How ila was transformed into a man and kept transforming from male to female body every month till 12 months. ila and budha (Mercury) gave birth to Chandra (Moon) who at once attained the age of 16. Vedika Jyotish deals with these things in minute details.....
पाणिनेः अष्टाध्याय्याम् > pāṇineḥ aṣṭādhyāyyām ;
In the aṣṭādhyāyī Text by pāṇinī :
इल् > स्वप्नक्षेपणयोः , तुदादि /  tudādi
 il > svapnakṣepaṇayoḥ
1357 -
इल् > प्रेरणे > , चुरादि, /  curādi
il > preraṇe
1660
As 'अव्यय', this '-il' is a term (पद) that does not undergo change in form (declension), and as suffix belongs  as 'प्रत्यय' / suffix belongs to a set of words that alter the meaning of a term associated /with it.
There is another letter (वर्ण / varṇa) 'ख्' / 'kh'  (pronounced like خِ  in Arabic / Persian / Urdu) .
Like all other letters (वर्ण / varṇa), this √'ख्' / '√kh' in संस्कृत saṃskṛta is a vector because like all other such letters (वर्ण / varṇa), this is uttered by animate entity, by some-one, a conscious living alive entity and therefore the elements प्राण / prāṇa and चेतना / cetanā  are the cosmic (ब्रह्माण्डीय / brahmāṇḍīya) essential factors that provide its expression / manifestation in terms of strength, meaning and purpose.
Thus, whenever, wherever and in whatever language this letters (वर्ण / varṇa) is uttered, this at once invokes the अधिकारी-देवता / adhikārī-devatā (The Presiding Lord, The cosmic power associated with the individual consciousness and Governs the behavior of the 'subjects') though formless, has essence.
This is how  संस्कृत saṃskṛta Matrix of Letters has been discovered by ancient sages (ऋषि / ṛṣi).
Thus √'ख्' / '√kh' + इल् / 'il' (as described in the beginning of this post), when joined give us the 'term' 'खिल् / khil' that has numerous meanings and could be further developed to give a large number of other terms. All are expressive of the same  अधिकारी-देवता / adhikārī-devatā (The Presiding Lord, The cosmic power associated with the individual consciousness and Governs the behavior of the 'subjects').
But the ordinary man, who speaks his mother-tongue, is totally unaware of this secret.
Those (ऋषि / ṛṣi) who could 'discover' and were granted this by the Grace of Lord शिव / śiva through His own sounds emanating from His drum डमरू / ḍamarū / ढक्का / ḍhakkā, recorded this मातृका / mātṛkā. This is precisely the Fundamental अक्षर-समाम्नाय / akṣara-samāmnāya where-from the sages / ऋषि / ṛṣi कात्यायन, यास्क, पाणिनी, पतञ्जलि / kātyāyana, yāska, pāṇinī, patañjali developed their own specific systems.
As The Whole Cosmos  ब्रह्माण्ड / brahmāṇḍa is but a tiny droplet of waters (Life) in the जटा / jaṭā
of The Lord Supreme, namely, शिव / śiva The same अक्षर-समाम्नाय / akṣara-samāmnāya was revealed to an ordinary mortal as the astro-sphere where one looks the amazing expanse of the sky, confined within the horizons.   
--
Next > Follows 







    

Saturday, 5 November 2016

संवेदनशील और असंवेदनशील मन

संवेदनशील और असंवेदनशील मन
--
"मन सवाल करता है और मन ही उत्तर गढ़ लेता है !"
यह विचार किसका है? क्या विचार मन का ही नहीं होता? और, क्या विचार भी मन ही नहीं होता? या शायद विचार से भिन्न कोई और तत्व भी है मन का? स्पष्ट है कि ’मन’ नामक वस्तु में दो गतिविधियाँ संयुक्त होती हैं : एक तो होती है विचार की गतिविधि, दूसरी होती है ध्यान (अटेंशन) नामक गतिविधि । इस ध्यान / अटेंशन को गतिविधि कहना कहाँ तक सही है इस पर भी दृष्टि डालना महत्वपूर्ण है । क्योंकि कभी-कभी ’मन’ ’बँटा’ भी होता है, जब हम / मन किसी कार्य में लगे होने पर भी विचार की गतिविधि जारी रहती है । जैसे ड्राइविंग करते समय या कोई ऐसा कार्य करते समय जिसे याँत्रिक ढंग से किया जा सकता है, और जिस पर निरंतर ध्यान दिया जाना आवश्यक नहीं होता, हमारा ध्यान बँट जाता है किंतु हमें इस बारे में कभी-कभी तो पता होता है, पर प्रायः तो हम इस ओर से लापरवाह / असावधान हो जाते हैं, क्योंकि किसी याँत्रिक कार्य को अतिरिक्त ध्यान दिया जाना आवश्यक भी नहीं होता । किंतु जब हम किसी ऐसे नए कार्य को करना सीखते हैं जो किसी हद तक याँत्रिक भी होता है, तो यद्यपि शुरू में उस पर अतिरिक्त ध्यान लगाया जाना आवश्यक प्रतीत होता है, और यदि किसी कारण से, - रुचि, बाध्यता, लोभ, भय आदि से हम इस प्रकार इस कार्य को करना सीख लेते हैं और जब संतोषजनक ढंग से उसे करना हमारे लिए स्वाभाविक हो जाता है, तो हमारा ’मन’ उस अतिरिक्त ध्यान को उस कार्य से हटाकर किसी दूसरे कार्य में लगाने लगता है । इसलिए जिस / जब किसी कार्य में एकरसता या ऊब होने लगती है तो हमारे ’मन’ की प्रवृत्ति या तो किसी अतिरिक्त कार्य को करने की ओर, या ’सो’ जाने की होने लगती है । ऐसी स्थिति में अपने को जगाए रखने के लिए हमें या तो मनोरंजन अथवा किसी नशे की आवश्यकता अनुभव होने लगती है । ’मन’ की एक अद्भुत क्षमता यह भी है कि वह सुख-दुख का केवल काल्पनिक भोग भी कर सकता है और यह तथ्य संभवतः मनुष्य, और वह भी तथाकथित ’सभ्य’ कहे जानेवाले मनुष्य पर ही अधिक लागू होता है । क्योंकि मनुष्य का मन कल्पना से ही किसी ’अतीत’ और किसी ’भविष्य’ का सृजन कर लेता है, और यह ’कला’ उसने अपने समाज और परिवेश से ही सीखी होती है । इसलिए किसी ऐसे कार्य को करते समय जिसमें करने के लिए ’नया’ कुछ नहीं होता, मन या तो ऊबने लगता है, या किसी काल्पनिक वस्तु जैसे अतीत / भविष्य / स्थान / / व्यक्ति / स्मृति / स्थिति / घटना आदि के ’विचार’ में लिप्त होकर अनायास स्वप्न जैसी स्थिति में चला जाता है । इस स्थिति में कभी-कभी मनुष्य यद्यपि ऐसी आश्चर्यकारी वस्तुओं की रचना भी कर सकता है जिन्हें ’कला’, ’साहित्य’, ’आदर्श’, ’विज्ञान’ और ’प्रतिभा’ कहकर गौरवान्वित भी किया जाता है किंतु वह रचनात्मकता उस सृजनशीलता से बिलकुल भिन्न है जिससे / जिसमें मनुष्य अपने (?) मन की सावधानता / अनवधानता के प्रति सजग होता है । मन के स-अवधान और / अन्-अवधानपूर्ण होने के प्रति सजगता में मन में उठे इस सवाल का कोई उत्तर गढ़े जाने की आवश्यकता और मन द्वारा ऐसा उत्त्तर गढ़े जाने की उसकी क्षमता दोनों ही शेष नहीं रह जाते । जब तक ’मन’ इस तथ्य के प्रति असंवेदनशील रहता है तभी तक मन सवाल करता है और उत्तर गढ़ लेता है ! किंतु जब / जो मन इस तथ्य के प्रति संवेदनशील होता है वह हर क्षण ही नितांत नया, ऊर्जा और ताज़गी भरा जीवंत और प्राणवान होता है ।
--                         

An year ago... / Stray Lines.

An year ago...
--
An year ago I had scribbled down these lines and couldn't know what they are about.
So just 'posted' on my face-book page as 'status'.
Today reminded by the Face-book  came to see this.
Sharing here, just for the joy of the same.
--
धर्मैव मनुष्याणां मित्रो शाश्वत्सनातनः ।
यतो धर्म ततो तोषं तस्माच्छान्तिरनंतरम् ॥
--
dharmaiva manuṣyāṇāṃ mitro śāśvatsanātanaḥ |
yato dharma tato toṣaṃ tasmācchāntiranaṃtaram ||
--
1. 'dharma' (one of the 4 purusharth that takes one to the Supreme goal and meaning of life, namely, dharma, artha, kAma and mokSha) that is discrimination between the lasting and the temporary nature of things and following that stays for ever, is the only true friend of humans that keeps company always. When one sticks to 'dharma' one finds satisfaction and solace, and then ultimately the peace unending.
पवन पावन अग्नि पावक नीर शीतल पवित्र
भूमि सुरभि गगन ज्योतिर्मय नीलगहन ।
लोक रम्य जगत् पुण्य प्रीतियुक्त जनगणमनस्
उदधि शान्त गिरि अचञ्चल चञ्चल सरितानिर्झर ॥
--
pavana pāvana agni pāvaka nīra śītala pavitra
bhūmi surabhi gagana jyotirmaya nīlagahana |
loka ramya jagat puṇya prītiyukta janagaṇamanas
udadhi śānta giri acañcala cañcala saritānirjhara ||
--
2.पवन (Air) पावन (that purifies) अग्नि (Fire) पावक (That makes pure) नीर (Water, that keeps leading) शीतल (cool) पवित्र (sacred) भूमि ( Earth) सुरभि (scent) गगन (Sky, the space infinite) ज्योतिर्मय (Full of Light) नीलगहन (The Sky, Deep blue, Azure)।
लोक (the place where one lives, the world) रम्य (full of beauty) जगत् (Existence) पुण्य (virtuous) प्रीतियुक्त (Full of affection) जनगणमनस् (The heart of the people all)
उदधि (Ocean) शान्त (Pacific) गिरि (Mountain) अचञ्चल (un-moving) चञ्चल (ever-moving) सरितानिर्झर (The brook, the rivulet, the river and the fountain)....
--

Thursday, 3 November 2016

About God.

About 'God'
--
My facebook -note.
-- 

विवेकचूडामणि / श्रीमद्भग्वद्गीता

विवेकचूडामणि
इत्याचार्यस्य शिष्यस्य संवादेनात्मलक्षणम् ।
निरूपितं मुमुक्षूणां सुखबोधोपपत्तये ॥578॥
vivekacūḍāmaṇi
ityācāryasya śiṣyasya saṃvādenātmalakṣaṇam |
nirūpitaṃ mumukṣūṇāṃ sukhabodhopapattaye ||
॥578॥
Meaning :
Thus, by way of a dialogue between the Teacher and the disciple, has the nature of the आत्मन् / ātman been ascertained for the easy comprehension of seekers after liberation.
(verbatim from the translation of विवेकचूडामणि / vivekacūḍāmaṇi by स्वामी  माधवानन्द  / swāmī mādhavānanda, - advaita-Ashrama - Calcutta  )


There is a similar end-note in श्लोक 18, अध्याय 18, / śloka
Chapter 18, #17 Of श्रीमद्भग्वद्गीता / śrīmadbhagvadgītā.
अध्याय 18, श्लोक 70,
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥
(अध्येष्यते च यः इमम् धर्म्यम् संवादम्-आवयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेन-अहम् इष्टः स्याम्-इति मे मतिः ॥)
भावार्थ :
हमारे मध्य हुए इस संवादरूपी धर्मप्रेरक गीताशास्त्र का जो भी मनुष्य अध्ययन करेगा, उसके द्वारा किए जानेवाले इस ’ज्ञानयज्ञ’ से वह मेरी अभीष्ट पूजा करेगा, ऐसा मेरा मत है ।
श्रीमद्भग्वद्गीता / śrīmadbhagvadgītā.
Chapter 18,  śloka 70
adhyeShyate cha ya imaM
dharmyaM saMvAdamAvayoH |
jnAnayajnena tenAhaM-
iShTaH syAm-iti me matiH ||
Meaning :
Whosoever shall study this sacred dialogue of ours shall be worshiping Me, by means of the sacrifice known as 'ज्ञान-यज्ञ / jñāna-yajña' (-the way of Intelligence).
--

Wednesday, 2 November 2016

from my other blog-post

from my other blog-post
--
I found such a big page-views today of this one that wanted to share on this blog.
Please check.
Just hope the readers of this blog would find :
The life returns unto the Life equally interesting.
 I usually classify my posts according to genres / languages of my blogs.
So may be if you search my other blogs (all on Google only) you may discover many others such.
I would suggest you to please check my full profile also.
Thanks!

Tuesday, 1 November 2016

Notes to self : ब्रह्म > परब्रह्म > परात्परब्रह्म : brahma > parabrahma > parātparabrahma .

Notes to self.
--
ब्रह्म > परब्रह्म > परात्परब्रह्म : brahma > parabrahma > parātparabrahma .
--
Whatever is perceived through senses is ब्रह्म / brahma = Totality, Objective Existence.
Who-so-ever 'perceives' is परब्रह्म / parabrahma, though misunderstood as 'me' / self, The Subjective Existence as person,  though is not really a person as such.
The State beyond and prior to both these apparent Realities is the परात्परब्रह्म / parātparabrahma / 'Self', The Ultimate Reality where the distinction between the 'knower', the 'known' and the 'knowing' is just no more.
--

Sunday, 30 October 2016

वामावर्त-स्वस्तिक -2.

वामावर्त-स्वस्तिक -2.
--
दक्षिण और वाम मार्ग
--
विक्रमार्क ने हठ नहीं त्यागा । वह श्मशान की ओर चल पड़ा । निर्जन अंधकारपूर्ण वन में तारों का प्रकाश ही उसका मार्ग आलोकित कर रहा था और वह निर्भयचित्त पग-पग धैर्यपूर्वक चला जा रहा था । उल्लुओं की हू-हू, चर्मगात्रों (चमगादड़ों) की उड़ान उसे रोमांचित तो करते थे किंतु वह इनका अभ्यस्त था । कहीं दूर सिंह या व्याघ्र की दहाड़ या हाथियों की चिंघाड़ उसे क्षण भर को विचलित कर देते थे किंतु वह सतर्क भी था ।
जब वह पेड़ के समीप पहुँचा तो उसने वेताल को और उस शव को देखा, और बिना कोई प्रतिक्रिया किए शव को कंधे पर लादकर लौट पड़ा ।
--
दो-चार कदम चलने बाद शव में स्थित बेताल का कंठस्वर फूटा :
"राजन् !! पिछले दिनों में तुमने मिलने का अवसर नहीं दिया ठीक ही तो है! तुम राज्य के संचालन में इतने व्यस्त रहते हो किंतु मैं तो प्रायः हवा के साथ मरुद्गणों सा उड़ता रहता हूँ । कभी किसी वृक्ष पर तो कभी किसी सुनसान स्थान पर । महल या कुटिया, उजाड़ स्थान मुझे शान्ति हैं और कोलाहल से मुझे कष्ट होने लगता है । श्मशान का सन्नाटा मुझे सर्वाधिक प्रिय है किंतु वहाँ प्रतिदिन कुछ चिताएँ जलती हैं और उन ज्वालाओं के आसपास जब मृतक के परिजन प्यासे होते हैं तो भी मुझे बहुत वेदना होती है । और मैं चाहकर भी उनके मुख से पानी नहीं पी सकता । और वे कभी कभी उनकी परंपरा के अनुसार उनके मृतक के बहाने अनजाने ही मुझे भी जल अर्पित कर देते हैं तो मुझे अथाह तृप्ति अनुभव होती है । यह उनका स्नेह ही होता है जो तिल के माध्यम से जल के साथ मृतक की दिवंगत आत्मा को प्राप्त होता है किंतु मैं भी अनायास उस स्नेह का भागी हो हूँ और उन्हें आशीष हूँ । पर ऐसा बहुत कम ही होता है । मेरे दुर्भाग्य से मेरे राज्य में वैसे भी जल के स्रोत कम ही थे कुभा के जल पर गंधर्वों का आधिपत्य था और हम उन्हें कभी देख तक नहीं पाते थे । शायद इसीलिए हमारे राज्य की एक राजकुमारी ने हस्तिनापुर के कुरु राजकुमार से विवाह हो जाने पर आँखों पर सदा के लिए पट्टी बांधने का व्रत ले लिया था ।
बौद्ध-भिक्षुओं आगमन बाद मेरे दोनों राजकुमारों ने भी बौद्ध-धर्म स्वीकार कर लिया किंतु उन्होंने प्रव्रज्या  हुए भगवान के अनुयायियों की सेवा करने का व्रत लिया । पाटलिपुत्र, श्रावस्ती, कौशल से कारीगर, मूर्तिकार  शिल्पियों को निमंत्रित किया जिन्होंने भगवान (बुद्ध) की अनेक प्रतिमाएँ बनाईं । यहाँ आनेवाले पारिव्राजक भिक्षुओं ने भी पर्वत की भित्तियों पर चित्र उकेरे किंतु मुझे यह सोचकर पीड़ा होती है कि कालक्रम में वे सब ध्वस्त हो जानेवाले हैं । मरुद्गण उन्हें तोड़ देंगे । गंधर्व भी उन्हें ऐसा करने से नहीं रोक सकेंगे ।
तुम्हें लग रहा होगा कि बौद्ध-धर्म के अनुयायी हो जाने के कारण मैं पलायनवादी गया हूँ, किंतु ऐसा नहीं है । मेरे इस विचार के मूल में दो कारण हैं । हमने अपने अति-उत्साह में वेदविहित स्वस्तिक को विपरीत रूप देकर दक्षिणावर्त से वामावर्त कर दिया, जो संभवतः हमारी संस्कृति, सभ्यता साथ-साथ पूरे विश्व ही के विनाश का कारण बनेगा । भगवान (बुद्ध) के पादतल पर देखे गए दशलक्षणों में से एक दक्षिणावर्ती और संभवतः दूसरा वामावर्त था इस तथ्य की ओर ध्यान न देते हुए, परीक्षा किए बिना ही हमारे मूर्तिकारों ने भगवान की प्रतिमाओं के वक्ष पर विपरीत स्वस्तिक अंकित कर दिया, जो आध्यात्मिक दृष्टि से तो आत्माभिमुखी वृत्ति का संकेतक है किन्तु लौकिक दृष्टि से यह वेद-विरोधी होने से धर्म की हानि का भी द्योतक है ।
राजन् ! वैसे तो यह वैदिक-तंत्र का विषय है और मैंने इसका प्रयोग भी किया है इसलिए इस बारे में अधिकारपूर्वक कह सकता हूँ । मुझे अपनी मुक्ति या निर्वाण की इतनी चिंता नहीं है जितनी कि आनेवाले समय में मेरे तथा मनुष्य के वंशजों की मुक्ति और सुखद जीवन जी सकने की चिंता है । "
एक साँस में इतना कहकर वेताल तेजी से राजा के कंधे को छुड़ाकर उड़ गया ।
--                 

अनुग्रह, अवग्रह(ऽ), संग्रह / परिग्रह (∫)

अनुग्रह, अवग्रह(ऽ), संग्रह / परिग्रह (∫)
--
(short-key 222B, Alt+X)
--
जब संस्कृत-प्रेमी गणितज्ञ ने संधि-प्रकरण में अवग्रह का चिह्न (ऽ) देखा तो उसे स्पष्ट हुआ कि समेकन / इन्टिग्रेशन / अन्तःग्रसन / integration (in Calculus) की गणितीय धारणा और अभिव्यक्ति वैदिक ऋषियों को प्राप्त थी इसलिए उसने समेकन / इन्टिग्रेशन / अन्तःग्रसन (integration in Calculus) के संकेतक के रूप में अपने गणितीय शोध में उसे यथावत् अपना लिया जो अंग्रेज़ी के अवलंबित - (एलॉङ्गेटेड्) एस्  ∫ के रूप में पहले से ही उसे उसकी भाषा में उपलब्ध था ।
संस्कृत (saṃskṛta) के प्रति यह उसके अनुग्रह का द्योतक भी था ।
--