Tuesday, 24 January 2023

भाग्यं फलति सर्वत्र

न च विद्या न पौरुषम्।। 

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ठीक 20 वर्ष हुए जब मैं उस व्यक्ति से पहली बार मिला था। वह बहुत सक्रिय (dynamic) था, और भाग्य जैसे हर किसी के साथ खेलता रहता है, उसके साथ भी खेलता रहा है।

भाग्य अर्थात् अदृष्टपूर्व। प्रत्यक्ष अनुमान और आगम इन तीनों ही उपायों से उसे देखा या जाना नहीं जा सकता। वह कहानी याद आ रही है, जिसमें एक गरीब मनुष्य का भाग्य उससे खेल रहा होता है, और सोचता है कि उसकी सहायता कैसे कर दूँ । जब वह एक पुल से गुज़रनेवाला होता है, तो उससे दो मिनट पहले ही वह किसी दूसरे आदमी को उस पुल से जाने के लिए प्रेरित करता है। उस दूसरे आदमी की जेब में एक थैली में बहुत रुपये होते हैं, जो कि उस पुल पर गिर जाते हैं। उसके पीछे एक मिनट बाद ही गरीब व्यक्ति उस पुल पर आता है, जिससे चन्द कदम ही दूर रास्ते पर वह थैली पड़ी होती है। गरीब आदमी यह सोचने लगता है कि अगर मैं कभी अन्धा हो गया, तो सड़क पर कैसे चलूँगा! यह सोचकर वह आँखें बन्द कर लेता है और कुछ कदम चलकर देखता है और इसलिए उस थैली पर उसकी नजर ही नहीं जाती। तब तक उस दूसरे आदमी को पता चल जाता है कि उसकी थैली शायद रास्ते पर कहीं गिर गई है, वह तुरंत उसे ढूँढने के लिए पुल पर पीछे की ओर लौट जाता है, जहाँ पुल पर पड़ी उसकी थैली उसे दिखाई देती है। वह भगवान को धन्यवाद देकर उस थैली को उठाकर ठीक से जेब में रख लेता है। 

वर्ष 2019 का आगमन हुआ और सारी दुनिया में बहुत से लोग अपनी जगह अटक गए और बहुत से दूसरे सैकड़ों मील पैदल  चलकर अपने घर या गाँव पहुँच गए। कुछ बेचारे कहीं और ही, जहाँ जाने की उन्होंने कभी स्वप्न में भी कल्पना तक न की थी।

ज्योतिष के नौ ग्रहों में दो ग्रह राहु और केतु भाग्य की ही तरह अदृष्ट हैं। राहु बेचारा कितना भी सोच-विचार कर ले, कहीं आ या जा नहीं सकता जबकि केतु कितना भी भटकते रहे, सोचना उसके लिए संभव ही नहीं होता। वैसे ये दोनों ग्रह एक ही राक्षस के सिर और धड़ हैं, ऐसा कहा जाता है। और ऐसा भी वर्णन है कि जरा नामक राक्षसी के एक पुत्र का जन्म सिर और धड़ इन दो टुकड़ों में मृतक के रूप में हुआ था और उसने उन्हें जोड़कर जीवित कर दिया और उसे वरदान दिया था कि जब तक दोनों टुकड़े अलग न हो जाएँगे तब तक उसकी मृत्यु नहीं होगी। यह मगध का राजा था, इसकी मृत्यु तब तक नहीं हुई जब तक कि भगवान् श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से इसके सिर को काटकर धड़ से अलग नहीं कर दिया।

तो भाग्य के कार्य करने का यही तरीका है। 2019 से अब तक मैं भी इसी भाग्य के फल से एक स्थान पर फँसकर रह गया हूँ और भाग्य से अब जब वह व्यक्ति 20 साल बाद पुनः मिला तो देखता हूँ कि वह चाहकर भी किसी एक जगह शान्तिपूर्वक नहीं टिक पा रहा है।

जरासंध और श्रीकृष्ण से श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक याद आए।

श्रीमद्भगवद्गीता के ये दो श्लोक शायद हर किसी ने पढ़े या सुने तो होंगे ही --

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

दूसरा इससे भी अधिक प्रसिद्ध दूसरा श्लोक इस प्रकार से है :

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफल हेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

फिर :

"विनाशकाले विपरीतबुद्धिः"

यह भी इतना ही प्रसिद्ध है।

मनुष्य भाग्य को बदलना और जानना भी चाहता है। इससे यही लगता है कि वह भाग्य को जानता ही नहीं । और अगर जानता ही नहीं तो उसे बदलने का विचार क्या हास्यास्पद ही नहीं है! 

कोई भी मनुष्य कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो, कार्य-कारण और कर्तृत्व बुद्धि पर उसका विश्वास अटूट होता है। जीवन में वह धन, यश, सफलता और भोग प्राप्त करने के लिए लालायित रहता है। किन्तु उसका ध्यान भूले से भी कभी इस प्रश्न पर नहीं जाता है कि क्या इन सबको प्राप्त कर लेने पर वह सुखी होगा? और सुखी होने पर क्या दूसरी अनेक चिन्ताओं और समस्याओं से उसे छुटकारा मिल जाएगा! तब भी क्या फिर वह शान्ति ही प्राप्त करने का इच्छुक नहीं होगा? किन्तु जब तक भाग्य उसे भटकाता रहता है, शान्तिपूर्वक रह पाना बहुत मुश्किल है।

बीस साल पहले उस व्यक्ति के प्रति मेरी जो सहानुभूति थी वह आज भी वह वैसी ही है, किन्तु क्या मैं उसके भाग्य को बदल सकता हूँ! मैं तो अपने ही भाग्य को भी कहाँ बदल सकता हूँ! और मैं अपने भाग्य को जानता ही कहाँ हूँ, तो उसे बदल पाने के बारे में कुछ सोच पाना भी मेरे लिए कैसे मुमकिन है! तो फिर उसके या और किसी के भाग्य के बारे में कुछ कहने का सवाल ही कहाँ उठता है!

चलते चलते -- 

"तदात्मानं सृजाम्यहम् / तदा आत्मानं सृजामि अहं।"

में 'आत्मानं' और  'अहं' पद का प्रयोग लक्ष्यार्थ और वाच्यार्थ दोनों ही अर्थों में एक साथ हुआ है, इसलिए यह केवल भगवान् श्रीकृष्ण के ही नहीं प्रत्येक ही मनुष्य के संबंध में भी पूरी तरह से सुसंगत है। 

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Monday, 16 January 2023

प्रेयस् और श्रेयस्

Prayer and Urge. 

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Though the two words may look synonyms, if we relate their Sanskrit equivalents, we can see better :

A Prayer is saying a wish in words before a God "Pray" is cognate सजात / सज्ञात of the verb-root √प्रार्थ् > प्रार्थ्यते -- प्र अर्थ्य् - to express a desire / wish. It is essentially in words, be it mantra or a language.  A mantra is may be again a  sound-equivalent of the sense like ॐ, ह्रीम्, ऐं,  and the likes बीजाक्षर or a compound word of combination of letters that may not have a meaning or seem to have in any language.  Like : नमः शिवाय / ॐ नमः शिवाय . 

An urge which is cognate सजात / अपभ्रंश of two different verb-roots ऊर्ज् > ऊर्जयति / ऊर्ज्यते -- tob give strength / energy / power. The word "erg" unit of energy consumed or equivalent to work done -- is a direct derivative of  verb - root ऊर्ज् 

Again, the word 'urge' (used in the sense of a request in order to beseech a favour) comes from the Sanskrit verb-root 'अर्च्' having the sense of expressing the gratitude / devotion / love. The same word ' अर्च > अर्चति (to worship) took the form 'अर्ज़'; having the same sense, in the Urdu and possibly in the Arabic and the Persian also.

Yet there is another form of this धातु / Verb-root अर्च् as in अर्ज् / अर्ह्  which mean to earn and to deserve respectively.

"Urge" in English also denotes the longing, the deep essential earnest need, at the core of the heart of all and everyone, without fulfilling which there is no meaning and sense any, in life and living.

Therefore we could conclude that Sanskrit has two forms :

One is as a spoken / written language with a grammar and,

Another as the study of the genesis and the structure of any language what-so-ever.

Another form of the Sanskrit संस्कृत language as the spoken and written too is the Prakrit / प्राकृत which has its own grammar originated from the rules governing the conventions prevalent in the different and varied human groups, cultures and societies all over the globe. In comparison, the grammar व्याकरण of Sanskrit that was discovered by the ऋषि like  Panini (पाणिनी) and other sages was the result of the exploration into the nature of sound itself. The word sound (स्वन् / स्वं) conveys the sense "self" and "consciousness" / being also. And at the same time, "स्वं" / "स्वर" is also प्राण in it. This is what is  देवता / devata aspect of the Veda. So there are 33 core देवता / Devata who are conscious presiding deities of the different realms of existence / the universe. This forms the matrix of letters / phonemes in their respective phase. The word matrix too is cognate of the Sanskrit word  मातृका, which is also the "mother-principle" that is supposed to give birth to the universe and all that is there-in. In conclusion :

When you pray, you may worship, express your gratitude to the Lord of your conviction or you may simply remember Him / Her as The Supreme Reality is all in all, that could be addressed as a Father, a Mother, and even as a brother or sister, son or daughter, or in any form or even with no form any. 

This Divinity is also named ब्रह्मन् / Brahman, the Beginningless and the Endless Cause less cause of whatever that is always here and now, irrespective of time and place as is in our assumption.

In contrast and comparison to प्रेयस्, श्रेयस् is also one of the many names of the Reality, -  the ईशिता / ईश्वर, ब्रह्मन् / Brahman Who alone without a second governs the universe and all those things and beings in it.

So there is a Prayer as शान्ति-पाठ that is just an expression for the auspicious well-being for all :

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखमाप्नुयात्।।

मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।।

May all be happy, all free from disease, May all see auspicious, May no one grieve. 

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Saturday, 14 January 2023

Corrections

Patanjal Yoga Sutra 1:29

समाधिपाद : २९

ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्न्तरायाभावश्च।।२९।।

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पातञ्जल योगसूत्राणि

।। तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ।।

-साधनपाद १,

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Sunday, 8 January 2023

Dharma and History of Religions.

How And Why We Drifted Away! 

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Please treat this one as the last part of the earlier post.




Saturday, 7 January 2023

Thursday, 22 December 2022

चेतना के ध्रुव

एक-ध्रुवीय, द्वि-ध्रुवीय और त्रि-ध्रुवीय चेतना

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समस्त सांसारिक अनुभव तथा ज्ञान के अर्थ में चेतना सदैव एक द्वि-ध्रुवीय वास्तविकता है। जहाँ और जब भी चेतना का कार्य या गतिविधि किसी अनुभव, या ज्ञान के रूप में घटित होती है, तब वहाँ अपरिहार्यतः कोई न कोई विषय होता है और विषय तथा विषयी के मध्य का प्रसंग वृत्ति के रूप में पाया और देखा जाता है। विषय स्वयं जड होता है, जिसका स्वतंत्र अस्तित्व है,  यह संदेहास्पद है, जिसे न तो सिद्ध किया जा सकता है और न ही असिद्ध किया जा सकता है,  - शायद यह प्रश्न ही त्रुटिपूर्ण है। इसकी तुलना में जिस विषयी (चेतन) के प्रकाश में विषय (जड) वास्तविकता ग्रहण करता हुआ प्रतीत होता है, उसका अस्तित्व अकाट्यतः और निर्विवादतः स्वतंत्र है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि चेतन (विषयी) और जड (विषय) एक ही चेतना के दो पक्ष हैं, क्योंकि अभी यह कहना जल्दबाजी ही होगा कि क्या किसी विषय के अभाव में चेतन (विषयी) का अस्तित्व संभव है! किन्तु यह तो कहा जा सकता है कि विषय (जड) और विषयी (चेतन) जिस चेतना में अस्त्तित्वमान होते हैं (या होते हुए प्रतीत होते हैं) वह आधारभूत अधिष्ठान / आधार नित्य, और सदैव एकरस विशुद्ध और अखंड वास्तविकता है। यद्यपि इस विवेचना में उसे 'वह' कहना भी त्रुटिपूर्ण है, किन्तु तात्कालिक  और प्रयोजन की दृष्टि से इसका उपयोग है ही।

विषय-विषयी का संबंध ही मन है यही व्यक्तिगत अस्तित्व भी है क्योंकि मन सदैव और आवश्यक रूप से विषयी-केन्द्रित होता है । इस व्यक्तिगत विषयी का उल्लेख प्रत्येक मनुष्य "मैं" शब्द से करता है। इसकी तुलना में विषयमात्र का उल्लेख 'यह', 'वह' आदि शब्दों से किया जाता है। विषयी सदैव चेतन / 'मैं' है, और 'मैं' का उल्लेख 'यह' या 'वह' शब्द से नहीं किया जा सकता। इस प्रकार अपने अस्तित्व को 'मैं' के रूप में जानना अनायास होता है, और यह जानना ही चेतना है। इसलिए जानना चेतना है, जबकि 'मैं' चेतन। जैसे ही 'मैं जानता हूँ' कहा जाता है, तो तुरन्त ही विरोधाभास पैदा होता है। इसलिए एक जानना वह है जिसमें जाननेवाला (ज्ञाता) और जाना हुआ (ज्ञेय) सत्य परस्पर अभिन्न होते हैं, जबकि एक जानना वह है जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय दो भिन्न वस्तुएँ होती हैं। इस दूसरे प्रकार के जानने में ज्ञाता -जाननेवाला ही चेतन है, जबकि पहलेवाले जानने में ज्ञाता शुद्ध चेतना है।

फिर 'विचार' क्या है?  क्या विषय और विषयी किसी एक या दोनों के अभाव में 'विचार' का अस्तित्व संभव है? 'विचार' पुनः शाब्दिक, भावनात्मक, स्मृति या कल्पना के रूप में हो सकता है। किन्तु है तो यह किसी न किसी स्थूल या सूक्ष्म विषय और चेतन के बीच होनेवाली कोई प्रक्रिया ही। इस वैचारिक प्रक्रिया के होते समय विषय और विषयी दूध और पानी की तरह एक दूसरे से मिले हुए से हो जाते हैं, और जैसे ही वैचारिक प्रक्रिया का विषय बदलता है, विषयी तत्क्षण ही किसी दूसरे विषय से एकात्म हो जाता है। फिर भी उसे भूल से भी इस बारे में कभी संशय तक नहीं होता कि उसका अस्तित्व सतत है। विभिन्न और विविध विषयों के विचार स्वरूपतः एक शाब्दिक, भावनात्मक या धारणात्मक अनुभव या स्मृति ही होते हैं, जिनके पुनः होने की कल्पना ही 'भविष्य' है। यही मन, समग्र मन, सामूहिक मन या सामूहिक चेतना है, इसलिए समस्त ज्ञान बीजरूप में सब में और प्रत्येक में ही विद्यमान होता है, और अपने व्यक्तिगत 'मैं' का विचार केवल वैचारिक भ्रम है।

 चेतना इसलिए सार्वत्रिक, सार्वकालिक सत्य है, यद्यपि सर्वत्र (स्थान) काल (समय) भी चेतना की ही अभिव्यक्ति मात्र हैं।

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शब्द-कुँजी (हिन्दी-अंगरेजी) 

चेतना - consciousness

चेतन - sentient / conscious, 

जड - insencient

शुद्ध चेतना - pure consciousness, 

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Tuesday, 20 December 2022

सरलता, विनम्रता और कुटिलता

ज्ञान का दम्भ और दम्भ का ज्ञान!!

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विप्रतिषेधे परं कार्यं... 




कुछ और नये संकेत

विप्रतिषेधे परं कार्यम्।।

(अष्टाध्यायी १/४/२)

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तुल्यबलविरोधे(*१) परं कार्यं स्यात। इति लोपे प्राप्ते पूर्वत्रासिद्धमिति।

रोरीत्यस्यासिद्धत्वादुत्वमेव(*२)। मनोरथः।।

(ढ्रलोपेपूर्वस्य दीर्घोऽणः ६/३/१११)

*१ अत्रपूर्वग्रहणमुत्तरपदाधिकारनिवृत्त्यर्थमत एव व्यस्तप्रयोगं उदाहरति -- 'पुना रमते' इत्यादि 

*२ प्रकृते 'पुना रमते' इत्यत्र 'रो रि' ८/३/१४, इत्यस्य 'शिवो वन्द्यः' इत्यत्र 'हशि च' ६/१/११४ इत्यस्य लब्धावकाशतया 'मनोरथः' इत्येकस्मिँलक्ष्ये द्वयोः प्राप्तिरतो विप्रतिषेधः।। इस प्रकार इस सूत्र में कहीं कोई विसंगति या विरोधाभास तक नहीं है। ऋषि राजपोपट ने 'गुरुणा' (*३) पद की सिद्धि के लिए इस सूत्र को मनमाने तरीके से तोड़मरोड़कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि उसने 2500 वर्ष पुरानी समस्या का हल खोज लिया है! और स्पष्ट है कि यह सब इसलिए किया गया है कि पाणिनी, कात्यायन और पतञ्जलि के द्वारा की गई विवेचना त्रुटिपूर्ण है यह प्रतीत हो।

*३ इसी प्रकार से 'गुरुणा' पद की सिद्धि के लिए :

"स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम् भिस् ङे ..." ४/१/२ का प्रयोग पूरी तरह से अनावश्यक है। इस प्रकार से अनावश्यक विवाद पैदा करना इनके उद्देश्य को दर्शाता है। और इस पद 'गुरुणा' की सिद्धि में "विप्रतिषेधे परं कार्यं" लागू ही नहीं होता। 

यह सिद्ध करने के लिए बहुत सी बातें लिखी जा सकती हैं, कि किस प्रकार से यह सब एक षड्यन्त्र के तहत किया जा रहा है। 

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Thursday, 15 December 2022

पूर्वत्रासिद्धम्

मुनित्रय-प्रामाण्यम् 

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ऋषिराज पोपट नामक पी. एच. डी. संस्कृत के रिसर्च स्कॉलर हैं, जिन्होंने पाणिनी के अष्टाध्यायी के सूत्र :

८/२/१ -- पूर्वत्रासिद्धम् 

का नया तात्पर्य खोजा है। 

अभी तक यह माना जाता था कि इस सूत्र के अनुसार मुनित्रय अर्थात् पाणिनी, कात्यायन और पतञ्जलि के द्वारा प्रतिपादित नियमों में से किसके नियम को ग्रहण किया जाना उचित होगा, यह संदेह उठने पर बाद में हुए मुनि के द्वारा प्रतिपादित नियम को ही ग्रहण किया जाए, अर्थात् पहले हुए मुनि के नियम को बाद में हुए मुनि के संबंध में असिद्ध मानना चाहिए। 

किन्तु ऋषिराज पोपट की खोज के अनुसार इस सूत्र का तात्पर्य यह है कि जब किसी समास शब्द की व्युत्पत्ति करते समय दो भिन्न नियमों में से किसी एक को चुनने का प्रश्न हो, तो पाणिनी के द्वारा रचित अष्टाध्यायी के उपरोक्त सूत्र ८/२/१ का अर्थ यह ग्रहण करना उचित होगा कि पूर्वत्र -- पहले के शब्द से संबंधित नियम को, बाद के शब्द से संबंधित नियम के प्रति असिद्ध माना जाए।

[अस्वीकृति / Disclaimer :

पता नहीं यह कहाँ तक ठीक है!

केवल अपने रेकॉर्ड के लिए यहाँ नोट और पोस्ट कर रहा हूँ!]

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Monday, 21 November 2022

Everything.

Everything Is Made Up Of.....

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P O E T R Y / 22-11-2022

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Everything Is Essentially,

Made Up Of Everything,

Because Everything Is,

Made Up Of Matter.

Though The Matter Is,

Made Up Of The Five,

Fundamental Elements.

Just As, 

Thinking Of Anything, 

Is Made Up Of Thought. 

And Conversely As Well, 

The Thought Is,

Made Up Of Thinking.

But The Consciousness Is, 

Not Made Up Of,

Or From Anything, 

Whatever Or What-so-ever!

Everything,  That Is Made Up, 

Is the Consequence Of,

An Action And  Reaction, 

But The Consciousness Is, 

Neither The Action, 

Nor The Reaction. 

And Though It, 

Neither Causes, Creates,

Sustains Nor Destroys Anything,

It Remains In The Abeyance.

Ever So Conspicuous,

Ever So Resplendent!

One Who Knows This, 

Everything Indeed,

Everything Emerges From One, 

Everything Submerges Into One.

Everything Remerges From One,

Yet Consciousness Stays Alone. 

Immutable, Inimitable,

Innocuous, Innocent.

One Who Knows It, 

Is Verily Itself Alone!

One Who Is Itself, 

Knows It Alone. 

But the Thought,

That Emerges In, 

An Organism,

Declaring Oneself As

The Sole Independent Owner, 

And The Only Lord Of,

Everything That Is  Everything!

Causes The Illusion, 

That Is But The Light,

Of Consciousness Alone.

And Though Everything Is Essentially,

Made Up Of Everything, 

Consciousness Alone Is,

The Ground and Foundation,

Where-in And Where-upon, 

Everything Assumes Existence. 

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Wednesday, 9 November 2022

Mr.H.C.Joshi / ह.चिं.जोशी / ha.ciṃ.jośī

~~~ हरेश्वर चिन्तामणि जोशी ~~~
प. रेकॉर्ड नं. No  1/1
25-3-73
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A Date with Destiny.
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On that fateful day in the year 1992, I was lying on the bed.
Half-asleep, in a trans-like dream, I was listening Him while He was delivering a 'Talk' :
(निरूपणें / nirūpaṇeṃ). Where? I couldn't say. Nevertheless, I had a strong sense I was connected with Him as if over phone. I could see Him before my mental eyes, present at His home, before His devotees, disciples and visitors known and unknown to Him, where  some cosmic network connected us together so as to happen this dialogue.
"Oh!" -said He.
I instantly and spontaneously recognized, had an inkling, as if my sixth sense might have told me, He was none other than the Master (Parama pujya Sat-guru Shri Nisargadatta Maharaj) Himself. Though in the dream I also had a firm and clear understanding that my physical body was somewhere lying on a bed and this dream was taking place despite my knowing where I am in the physical world or even on this astral plane. summarily; I was but aware of 'me' and Him as two cosmic presences only.
I wanted to check, if my guess was correct.
But I had no enough courage to ask directly.
So my curiosity took this turn. I asked :
"Had you ever lived in Mumbai?"
"Oh, for so long, almost a big part of my whole life."
"O.K.! Could you please tell me about some-one who you know to and who know to me as well?"
"Mr Ratnaparakhe, Mr.H.C.Joshi, (Mr.Joshi)".
Quick came the reply.
I already knew Mr. Ratnaparakhe, an elderly gentleman living at Ujjain, where I too was living at that time. But I couldn't remember the other 2 names. At that time I thought He, in His native Marathi of Mumbai had told me not one but two other names besides Mr. Ratnaparakhi.
Then He prompted me to ask something else.
I asked Him :
"Why I find connecting with women in general, rather difficult?"
"Did you yourself ever try to find out, what could be the reason behind it?"
At this very moment, our conversation all of a sudden was disrupted by an outside sound. The trans-like statewas broken and I found myself lying on the bed, awakened from my dream.
I was suffering from Malaria and was trying to rest.
After a few days when I had recovered from Malaria, I narrated my this 'experience' to my 'friends'.
I told them how Maharaj had referred to me the three names. One was Mr. Ratnaparakhi, while another was something like 'Misechky' and the last was "Mr.Joshi". I tried to find out but in vain, who might have been 'Misechky', Maharaj had talked about?
An year or two went by, when I happened to buy some Marathi books of Sri Nisargadatta Mahaaj.
One book was 'सदाचार / sadācāra' His (निरूपणें / nirūpaṇeṃ) on this title, -text of 'श्री शङ्कराचार्य / śrī śaṅkarācārya'. In the introductory pages I came to know how He had categorically admired one of His disciples named :  हरेश्वर चिन्तामणि जोशी /  hareśvara cintāmaṇi jośī / who had attained the state of "स्वरूपदर्शन" or the "Self-Realization'.
I knew then that at that time, He was living at Mumbai. I found out His residential address and started correspondence with Him. During this time I was busy in translating 'I AM THAT', and had almost completed the whole manuscript. I had first written the whole manuscript in pencil because repeated alteration and editing needed that I could 'erase' the part of the text again and again. Then I wrote / copied down  this whole text 'neatly' onto loose papers and filed them spiral-bound.
Then I wrote to Him about my endeavours.
He was very happy and only because of His personal efforts and blessings the same saw the light of the day.
Years later while I was talking with a friend, I referred to His name as I found there in His signature.
And suddenly I could see my error. 
Shri Nisargadatta Maharaj had in fact told me names of two persons only.
One of Mr.Ratnaparakhi, who happened to live at the same place Ujjain, where I was living at that time.
Another was "Mr.H.C.Joshi" which I mistook for "Misechky".
And it dawned on me, this "Mr.H.C.Joshi" was none other than ह.चिं.जोशी / ha.ciṃ.jośī, which sounded to me as "Misechky".
Later on I met Him several times.
He gave me the 'notes' He had taken while he attended talks with Shri Nisargadatta Maharaj. These 'notes' are in Marathi, took down during 1973.

Maybe someday I or someone else keeps the records straight!
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Sunday, 25 September 2022

सनातन धर्म त्रयी

क्या हिन्दू असहिष्णु है!?

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(निर्भयता, निर्वैर और उदारता की त्रयी) 

"क्या हिन्दुत्व / हिन्दू आतंकवादी हो सकता है?"

इस लेख का एक शीर्षक यह भी हो सकता है। 

आतंकवादी होना तो दूर की बात, हिन्दुत्व का एक दोष अवश्य ही यह भी है, कि जहाँ उसे असहिष्णु होना चाहिए, वहाँ भी वह असहिष्णु नहीं है।

पिछले दो पोस्ट्स को लिखते लिखते यह विचार मन में आया कि ऐसा क्यों है / हुआ है? क्या अपने सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्यों का निर्वाह करने में हमसे प्रमाद नहीं हुआ। प्रमाद का जैसा तात्पर्य है, यह लापरवाही का ही पर्याय है और लापरवाही जानबूझकर भी की जा सकती है, या अपने दायित्व की उपेक्षा किए जाने से भी हो सकती है।

मूलतः सनातन धर्म का ही एक व्यावहारिक प्रकार होने से हिन्दू धर्म और संस्कृति, सभ्यता में और परंपरा में उदारता सहिष्णुता अन्तर्निहित तत्व ही है। इसीलिए सनातन धर्म किसी अन्य पंथ या मत आदि का विरोध तक नहीं करता, फिर बलपूर्वक उस पर अपने आदर्श, मूल्य थोपने की तो कल्पना कर पाना तक उसके लिए असंभव है। हिन्दू धर्म के रूप में प्रचलित सनातन धर्म की यही विशेषता हिन्दू धर्म की एक बहुत बड़ी कमजोरी हो जाती है। और इस पर सहसा किसी का ध्यान तक नहीं जाता।

सनातन धर्म से उत्पन्न हिन्दू धर्म में इसलिए उदारता जन्म-जात ही है और इसीलिए हिन्दू धर्म और परंपरा, हिन्दुत्व आक्रामक परंपराओं के निहित ध्येयों के प्रति असावधान होता है। यही तो सनातन धर्म का अर्थात् हिन्दू धर्म का अब तक का दुर्भाग्यपूर्ण और दुःखद इतिहास रहा है।

इसी आधार पर इस पर ध्यान देना आवश्यक है कि हिन्दू धर्म, संस्कृति, सभ्यता, और परंपरा को जहाँ सावधान रहना चाहिए था, वहाँ पर भी सावधानी रखने की बजाय लापरवाही से काम लिया गया। और जहाँ हिन्दू समाज को अपनी अस्मिता, गरिमा, स्वाभिमान और अस्तित्व की रक्षा के प्रति सतर्क होना चाहिए था, उसने वहाँ पर भी प्रमादवश सहिष्णुता का व्यवहार किया। 

आज भी यही स्थिति है और हिन्दू धर्म, सभ्यता, संस्कृति और परंपरा से द्वेष करनेवाले अपने कुत्सित ध्येयों को पूर्ण करने के लिए हिन्दू धर्म के माननेवालों पर आतंकवादी होने का आरोप लगाने की धृष्टता करने का दुःसाहस करने लगे हैं। 

हमारा यह प्रमाद ही है कि अपने बीच विद्यमान ऐसे दुष्ट लोगों को पहचान कर पाने तक में हम प्रमादवश ही भूल कर बैठते हैं, उनकी चिकनी चुपड़ी बातों से भ्रमित और मोहित भी हो जाया करते हैं। और कभी कभी तो हम उसे ही गौरवान्वित करने में प्रसन्नता भी अनुभव करने लगते हैं। क्योंकि हममें न तो राष्ट्रप्रेम की, न अपने धर्म, कर्तव्य और राष्ट्रीयता की ही पहचान है। अपने तात्कालिक क्षुद्र स्वार्थों और लाभों के लिए अपने दायित्व और कर्तव्यों को ताक पर रखने में हमें शर्म या हिचक तक नहीं होती है। यही तो हमारा एकमात्र दोष है!

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