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Rowing the boat against the stream?
Or just flowing with the waters and floating with the stream?
Or, perhaps to sink and drown?
Isn't every alternative the same?
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जिन्दगी ये तो बता तेरा इरादा क्या है?
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04 अप्रैल 1990 को बैंक की नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद इस निर्णय पर पहुंचा कि जिन्दगी न तो दुनिया की और न ही अपनी, बल्कि जीवन की मरजी से जीना है। जेब में इतने पैसे थे कि दस साल तक अपनी आर्थिक हैसियत के अनुसार जैसे तैसे गुजर गए।
इस बीच बस जीवन की मरजी से ही अपनी कुुछ आध्यात्मिक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित रखकर समय व्यतीत करता रहा।1990 से 2000 तक दो महत्वपूर्ण कार्य हुए।
पहला तो यह कि श्री निसर्गदत्त महाराज की विश्वप्रसिद्ध आध्यात्मिक अंग्रेजी कृति I AM THAT का हिन्दी में अनुवाद किया, जिसे CHETANA MUMBAI द्वारा वर्ष 2001 में "अहं ब्रह्मास्मि" शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित किया गया। जेब खाली थी, कुछ शुभचिन्तकों और सहृदय मित्रों के द्वारा दी गई आर्थिक सहायता से इसके बाद तब से अब तक की जीवन की गाड़ी चलती रही है। इस बीच आधार कार्ड बनवाया, 2003 में पहला मोबाइल नंबर लिया, 2017 में एक और मोबाइल नंबर लिया। अब किन्हीं कारणों से पुराना नंबर फिलहाल स्थगित है। शायद KYC update करने की जरूरत हो। यहाँ से शहर दूर होने और depression तथा वृद्धावस्था से जुड़ी दूसरी और परेशानियों के चलते यह कार्य हो पाना भी मुश्किल जान पड़ता है। और इसलिए यह भी संभव है कि भविष्य में ब्लॉग लिखना भी बंद हो जाए!
फिलहाल सभी संपर्क और संबंध भी समाप्तप्राय हैं।
आगे जहाँ जीवन ले जाए, जैसी जीवन की मरजी।
जीवन के अलावा और कुछ ऐसा मुझे नहीं पता जिसे मैं ईश्वर या भगवान कह सकूँ, न तो यह तथाकथित दुनिया, न दुनिया के लोग और न ही कोई संबंध।
यहाँ यह पोस्ट केवल यह सूचना देने के लिए लिख रहा हूँ।
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